15/01/2026
स्त्री की इच्छा
Sanskari Kameena
उसे कभी यह सिखाया ही नहीं गया कि इच्छा भी उसकी अपनी हो सकती है।
उसे बताया गया कि इच्छा ग़लत होती है—खासकर अगर वह स्त्री की हो।
बचपन से ही उसके शरीर को नियमों में बाँध दिया गया।
कैसे बैठे, कैसे हँसे, कैसे चले।
कब चुप रहे, कब सिर झुकाए।
उससे पहले उसकी इच्छा को नियंत्रित किया गया,
बाद में उसकी देह को।
जब वह बड़ी हुई,
तो समाज ने उसे सिखाया कि पुरुष की इच्छा स्वाभाविक है—
और स्त्री की इच्छा खतरनाक।
इसलिए उसे या तो नकार दिया गया
या चरित्र के सवाल में बदल दिया गया।
विवाह को सुरक्षा कहा गया।
लेकिन उसी सुरक्षा के भीतर उसकी ‘हाँ’ को स्थायी मान लिया गया
और उसकी ‘ना’ को अवज्ञा।
उससे कभी यह नहीं पूछा गया
कि वह चाहती भी है या नहीं।
क्योंकि चाहना उसका अधिकार नहीं माना गया—
केवल निभाना।
धर्म, परंपरा और संस्कृति
उसे लगातार समझाते रहे
कि उसकी इच्छा परिवार की इज़्ज़त के लिए खतरा है।
इसलिए उसने चुप रहना सीख लिया।
इतनी गहरी चुप्पी
कि कई बार उसे खुद भी याद नहीं रहा
कि वह क्या चाहती है।
विडंबना यह है कि
जिस समाज ने उसकी इच्छा दबाई,
उसी समाज ने उसकी देह को बाज़ार में सजा दिया।
फिल्मों, विज्ञापनों और स्क्रीन पर
उसकी देह दिखी—
लेकिन उसकी इच्छा कभी नहीं।
अगर वह स्वयं बोले,
तो उसे अश्लील कहा गया।
अगर कोई और उसकी तरफ़ से बोले,
तो उसे कला कहा गया।
लेकिन इच्छा कोई अपराध नहीं होती।
अपराध होता है
इच्छा को कुचलना,
उसे चुप कर देना,
उसे शर्म में बदल देना।
स्त्री की इच्छा केवल यौन नहीं होती।
वह सम्मान चाहती है।
वह चयन चाहती है।
वह यह अधिकार चाहती है
कि वह ‘हाँ’ भी कह सके
और ‘ना’ भी—
बिना डर, बिना सफ़ाई, बिना सज़ा।
मुक्ति किसी एक क़ानून से नहीं आएगी।
वह तब आएगी
जब स्त्री की इच्छा को
चरित्र नहीं, अनुभव माना जाएगा।
क्योंकि
जो समाज स्त्री की देह से डरता है,
वह दरअसल उसकी स्वतंत्रता से डरता है।