18/01/2026
आजकल कुछ समाजवादी कार्यकर्ता और कई जोशीले युवा BMC चुनाव की हार को लेकर Abu Asim Azmi साहब पर तंज़ कस रहे हैं। पोस्ट कर रहे हैं, वीडियो बना रहे हैं, और ऐसा माहौल बनाया जा रहा है जैसे मुसलमानों की पूरी राजनीति की असफलता का ठीकरा सिर्फ़ एक आदमी के सिर पर फोड़ दिया जाए।
मैं उनसे सीधा पूछना चाहता हूँ:
आप 1992 में कहाँ थे?
जब मुंबई जल रही थी,
जब मस्जिदें निशाने पर थीं,
जब मुसलमान घरों में कैद थे,
जब पुलिस की लाठियाँ सब पर बराबर नहीं पड़ती थीं
तब अबू आसिम आज़मी सड़क पर थे।
राहत शिविरों में थे।
पीड़ितों के घरों में थे।
वकीलों के दफ़्तरों में थे।
और सबसे बढ़कर — डरे हुए मुसलमानों को हिम्मत दे रहे थे।
आज आलोचना करने वाले कई लोग तब या तो बच्चे थे, या चुप थे, या सुरक्षित दूरी पर थे।
राज्यसभा में बैठकर अल्पसंख्यक अधिकारों की बात करना आसान नहीं था।
CAA–NRC के समय सरकार से टकराना आसान नहीं था।
Uniform Civil Code पर खुलकर बोलना आसान नहीं था।
“वंदे मातरम” पर अपनी धार्मिक स्थिति साफ़ करना आसान नहीं था।
लेकिन आज़मी साहब ने यह सब किया —
नाम के लिए नहीं, नतीजे के लिए।
और आज कुछ लोग एक नगर निगम चुनाव की हार के बाद कह रहे हैं:
“अब आज़मी साहब का समय ख़त्म हो गया।”
वाह!
एक चुनाव हार = तीन दशक का संघर्ष शून्य?
यह वही तर्क है जैसे कोई कहे:
“एक मैच हार गए तो पूरा करियर बेकार।”
BMC हार: व्यक्ति नहीं, परिस्थिति हारी
BMC चुनाव हारना किसी एक नेता की विफलता नहीं है।
यह गठबंधन, प्रशासन, संसाधन, ध्रुवीकरण और सत्ता की मशीनरी का खेल है।
लेकिन सुविधाजनक राजनीति यही है कि सारा दोष एक मुस्लिम नेता पर डाल दिया जाए।
याद रखए,सत्ता वाले जब हारते हैं तो “रणनीति गलत थी” कहते हैं
मुसलमान जब हारते हैं तो “नेता बेकार था” कह दिया जाता है
यह दोहरा पैमाना कब तक चलेगा?
आपका गुस्सा सही है।
आपका सवाल करना सही है।
आपका नया नेतृत्व चाहना भी सही है।
लेकिन एक बात मत भूलिए,अगर आज आप मंच पर खड़े होकर बोल पा रहे हैं,
अगर आज आप टिकट मांग सकते हैं,
अगर आज आप चुनावी राजनीति को अपना भविष्य मानते हैं
तो उसका रास्ता 90 के दशक में आज़मी जैसे नेताओं ने खून-पसीने से बनाया है।
आप नया अध्याय लिखिए
लेकिन पुराने पन्ने फाड़कर नहीं
आलोचना कीजिए, ज़रूर कीजिए।
पर कुर्बानियों का मज़ाक मत बनाइए।
क्योंकि जिसने आग में चलकर रास्ता बनाया हो,
उसे एयर-कंडीशनर में बैठकर उपदेश नहीं दिया जाता।
अबू आसिम आज़मी एक चुनाव नहीं हैं,वो एक दौर हैं, एक संघर्ष हैं, एक राजनीतिक स्मृति हैं,और वह स्मृति तब तक जिंदा रहेगी,
जब तक मुसलमानों को इस देश में बराबरी की लड़ाई लड़नी है।
और यह लास्ट लाइन उन नेताओं के लिए जो प्रदेश अध्यक्ष बदलने की मांग कर रहे हैं उन्हें पता होना चाहिए की अबू आसिम आज़मी ने खून पसीना और अपनी मेहनत की कमायी दी है पार्टी को बिना सत्ता की लालच के उनके पास ऑप्शन था मंत्री बनने का जैसे की सपा के और विधायक भागे और मंत्री बने लेकिन आज़मी साहब वफादारी की मिसाल बने जबकि आज़मी साहब अपने दम पर एक साथ दो दो सीट पर जीतने वाले विधायक हैं