14/01/2026
डॉ राजपालसिंह जी कश्यप
निदेशक (अनुसंधान), CIIMS
क्षयरोग (TB) आज भी एक वैश्विक स्वास्थ्य चुनौती बना हुआ है. जो दवा प्रतिरोध (ड्रग रेज़िस्टेंस) तथा वर्तमान उपचारों जैसे आइसोनियाज़िड और रिफैम्पिसिन की सीमाओं के कारण और अधिक जटिल हो गया है। इन उपचारों में विषाक्तता, लंबे समय तक चलने वाली चिकित्सा अवधि तथा रोगियों द्वारा उपचार का समुचित पालन न कर पाना जैसी समस्याएँ जुड़ी रहती हैं। आयुर्वेदिक औषधि के रूप में प्रयुक्त गोमूत्र अर्क (Cow Urine Distillate -CUD) ने विभिन्न अध्ययनों में दवाओं के अवशोषण और उपचारात्मक प्रभाव को बढ़ाने वाले जैव-वर्धक (बायो-एन्हांसर) गुण प्रदर्शित किए हैं।
CIIMS Central india institute of Medical Sciences, Nagpur एवं गोविज्ञान अनुसंधान केंद्र के सहयोग से, क्षयरोग (टीबी) की औषधियों के लिए गोमूत्र अर्क (Cow Urine Distillate) को जैव-वर्धक के रूप में विकसित करने हेतु AYUSHआयुष मंत्रालय-वित्तपोषित एक परियोजना का क्रियान्वयन कर रहा है। यह अध्ययन आइसोनियाज़िड और रिफैम्पिसिन के साथ CUD के जैव-वर्धक प्रभावों का मूल्यांकन करने का उद्देश्य रखता है। इस अध्ययन में इन संयोजनों की सुरक्षा एवं प्रभावकारिता का मूल्यांकन इन विट्रोतथा इन विवोप्रयोगों के माध्यम से किया जाएगा, जिसमें दवा की जैवउपलब्धता, जीवाणु उन्मूलन तथा विषाक्तता में कमी जैसे पहलुओं पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। न्यूनतम अवरोधक सांद्रता (MIC) स्थापित करने के लिए क्रमिक पतलीकरण तकनीकों का उपयोग किया जाएगा। MTB या M. bovis BCG संस्कृतियों का प्रयोग करते हुए दवाओं की जैवउपलब्धता तथा अंतः कोशिकीय गतिविधि पर CUD के प्रभाव का परीक्षण किया जाएगा। इसके अतिरिक्त भी अनेक आकलन एवं परीक्षण किए जाएंगे एवं सांख्यिकीय विश्लेषण द्वारा प्राप्त परिणामों की प्रामाणिकता स्थापित की जाएगी।
Tuberculosis
यह अपेक्षित है कि आइसोनियाज़िड और रिफैम्पिसिन के साथ CUD का संयोजन जीवाणुरोधी गतिविधि को बढ़ाएगा, MIC मानों को कम करेगा तथा दवाओं की जैवउपलब्धता में सुधार करेगा। साथ ही, यह संयोजन कम विषाक्तता प्रदर्शित करेगा, जिससे टीबी का उपचार अधिक सुरक्षित एवं प्रभावी बन सकता है। यह अध्ययन एंटी-टीबी दवाओं के लिए CUD को एक जैव-वर्धक के रूप में वैज्ञानिक मान्यता प्रदान करने का प्रयास करता है, जिससे सहायक (एडजंक्ट) उपचारों के नए मार्ग खुलेंगे, टीबी उपचार की प्रभावशीलता और सुलभता बढ़ेगी तथा दवा-प्रतिरोधी उपभेदों से निपटने में सहायता मिलेगी।
CIIMS के डॉ राजपालसिंह कश्यप, निदेशक (अनुसंधान) के नेतृत्व में कार्यरत 7 सदस्यीय विशेषज्ञ टीम को लगभग दो वर्षों के सतत कार्य के उपरांत उत्साहवर्धक परिणाम प्राप्त हुए हैं. साथ ही कुछ ऐसे वैज्ञानिक एवं व्यावहारिक (ट्रांसलेशनल) पक्ष भी सामने आए हैं, जिन पर विशेषज्ञ स्तर पर विमर्श किया जाना आवश्यक है। इस कार्य को अगले स्तर तक ले जाने तथा इसके सामाजिक प्रभाव को और अधिक व्यापक बनाने के उद्देश्य से फरवरी मार्च 2026 में, गोविज्ञान अनुसंधान केंद्र देवलापार के श्याम सभागार में, एक विचार-मंथन सत्र आयोजित कर रहे हैं। गोविज्ञान अनुसंधान केंद्र के अध्यक्ष पदमेश जी गुप्ता ने इस अत्यंत महत्त्वपूर्ण एवं सम्पूर्ण देश ही नहीं विश्व हेतु उपयोगी अनुसंधान कार्य की अनुसंधान टीम में वैद्य नंदिनी भोजराज एवं अनुसंधान समन्वयक के दायित्व में डॉ मनोज तत्त्वादी नामित किए हैं.