27/08/2022
वेगान्न धारयेद्वातविण्मूत्रक्षवतृट्क्षुधाम् निद्राकासश्रमश्वासजृम्भाश्रुच्छर्दिरेतसाम् ॥ १ ॥
वेगों को न रोकने का निर्देश – अपानवायु, मल-मूत्र, छींक, प्यास, भूख, निद्रा, कास, श्रमजनित श्वास, जृम्भा ( जँभाई), आँसू, छर्दि (वमन) तथा शुक्र के वेगों को नहीं रोकना चाहिए ॥ १ ॥
वक्तव्य — वास्तव में तेजी से जिसका प्रवाह हो उसे वेग कहते हैं। जैसे नदी के वेग को रोकने पर पानी उछल कर ऊपर की ओर को जाने लगता है, ठीक उसी प्रकार इन वेगों की भी स्थिति होती है; फलतः 'उदावर्त' रोग की उत्पत्ति हो जाती है। उदावर्त का अर्थ होता है—उलटा घुमाव।
जो वेग जिधर से निकलना चाहता है अथवा जो वेग जिस मार्ग से निकलता है, उधर रुकावट कर देने से वह उसके विपरीत किसी अन्य मार्ग से निकल जाता ही है। यदि किसी कारण नहीं निकल सका तो उससे अनेक प्रकार की हानियाँ हो सकती हैं, अतएव कहा गया है— 'वेगान् न धारयेत्' ।
साभार- अष्टांगह्र्दय पृष्ठ-५४