02/01/2019
मेरी वो चार लाइन वाली कॉपी याद है तुम्हें?
हाँ वही, जिसके आखिरी पन्ने पर अक्सर हम खेला करते थे। खेल का नाम शायद कुछ FLAME जैसा था। हम दोनों के नाम लिखकर, तुम्हारा, बारी बारी से एक एक अक्षर को काटना और फिर कुछ भविष्यवाणी सा करना। कितना हँसता था मैं, इस बेकार की बात पर। और नहीं तो क्या इतनी पुरानी दोस्ती के बाद, 'E' आना मेरे लिए हसने की बात ही थी । वो भी एक बार नहीं, बार बार। पता नहीं क्यों तुम हर रोज अलग नियम के साथ खेलना चाहती थी। जब जिस अक्षर से चाहा, वहीं से शुरू किया। पता नहीं क्यों तुम्हें ये खेल इतना पसंद था।क्या पता तुम शायद कुछ और ही चाहती थी। या तुम्हें इस खेल के सच होने का डर था, जिसे बदलने के लिए रोज खेलने की ज़िद्द करती थी। मैं तो बस दोनों के नाम एक साथ देखकर ही खुश रहता था।
अच्छा! वो याद है जिस दिन हमने मेरी कॉपी के बीच वाले पन्ने पर ये खेला था और मैंने घर पर पिटाई से बचने के लिए उन्हें गोंद से चिपका दिया था? याद है ना?
कितनी डाँट पड़ी थी मुझे घर जाकर। उफ़्फ़ !
पता है, आज घर की सफाई में वही कॉपी मिली। पूरी कॉपी में तुम्हारी लिखावट। उस समय तुमसे अपनी कॉपी में लिखवाना मानो स्कूल के बाद तुम्हें अपने साथ ले जाने जैसा था। आखिरी पन्ने पर पड़ते ही सबकुछ मेरे आँखों के सामने था। स्कूल का आखिरी दिन, और फिर से खेल 'E' पर ही खत्म हुआ। कॉपी में भी और हमारी ज़िंदगी में भी। उस दिन हँस नहीं पाया मैं, तुम्हारी भविष्यवाणी सच होती दिख रही थी। तुम्हारे गुस्से की बलि चढ़ा था वो आखिरी पन्ना।
फिर तुमने स्कूल बदल लिया और धीरे धीरे सब बदलता चला गया। घर, शहर, फ़ोन का नंबर, दोस्त, सोच, और समय।
ख़ैर!अब तो सब बदल चुका है।
पर वो बीच वाले पन्ने आज भी अलग ही नहीं हुए हैं। क्या पता रखे रखे 'E', बाकी किसी भी अक्षर में बदल गया हो।
-शिव मिश्रा 'केदार'