अज्ञात

अज्ञात कलम और कागज़ का संगम

मेरी वो चार लाइन वाली कॉपी याद है तुम्हें?हाँ वही, जिसके आखिरी पन्ने पर अक्सर हम खेला करते थे। खेल का नाम शायद कुछ FLAME...
02/01/2019

मेरी वो चार लाइन वाली कॉपी याद है तुम्हें?
हाँ वही, जिसके आखिरी पन्ने पर अक्सर हम खेला करते थे। खेल का नाम शायद कुछ FLAME जैसा था। हम दोनों के नाम लिखकर, तुम्हारा, बारी बारी से एक एक अक्षर को काटना और फिर कुछ भविष्यवाणी सा करना। कितना हँसता था मैं, इस बेकार की बात पर। और नहीं तो क्या इतनी पुरानी दोस्ती के बाद, 'E' आना मेरे लिए हसने की बात ही थी । वो भी एक बार नहीं, बार बार। पता नहीं क्यों तुम हर रोज अलग नियम के साथ खेलना चाहती थी। जब जिस अक्षर से चाहा, वहीं से शुरू किया। पता नहीं क्यों तुम्हें ये खेल इतना पसंद था।क्या पता तुम शायद कुछ और ही चाहती थी। या तुम्हें इस खेल के सच होने का डर था, जिसे बदलने के लिए रोज खेलने की ज़िद्द करती थी। मैं तो बस दोनों के नाम एक साथ देखकर ही खुश रहता था।

अच्छा! वो याद है जिस दिन हमने मेरी कॉपी के बीच वाले पन्ने पर ये खेला था और मैंने घर पर पिटाई से बचने के लिए उन्हें गोंद से चिपका दिया था? याद है ना?
कितनी डाँट पड़ी थी मुझे घर जाकर। उफ़्फ़ !

पता है, आज घर की सफाई में वही कॉपी मिली। पूरी कॉपी में तुम्हारी लिखावट। उस समय तुमसे अपनी कॉपी में लिखवाना मानो स्कूल के बाद तुम्हें अपने साथ ले जाने जैसा था। आखिरी पन्ने पर पड़ते ही सबकुछ मेरे आँखों के सामने था। स्कूल का आखिरी दिन, और फिर से खेल 'E' पर ही खत्म हुआ। कॉपी में भी और हमारी ज़िंदगी में भी। उस दिन हँस नहीं पाया मैं, तुम्हारी भविष्यवाणी सच होती दिख रही थी। तुम्हारे गुस्से की बलि चढ़ा था वो आखिरी पन्ना।
फिर तुमने स्कूल बदल लिया और धीरे धीरे सब बदलता चला गया। घर, शहर, फ़ोन का नंबर, दोस्त, सोच, और समय।

ख़ैर!अब तो सब बदल चुका है।
पर वो बीच वाले पन्ने आज भी अलग ही नहीं हुए हैं। क्या पता रखे रखे 'E', बाकी किसी भी अक्षर में बदल गया हो।

-शिव मिश्रा 'केदार'

27/12/2018

"मास्टरपीस"

मेरी वो काली स्लेट याद है तुम्हें? वही जिसके कोनों पर मेटल लगी थी, जिन्हें जंग खाये जा रही थी । गोद में रखकर, छुपाकर उसपर कुछ लिख रही थी तुम शायद । बिल्कुल वैसे ही जैसे किसी बच्चे को गोद में लेते हैं । पूछने पर तुमने कहा था 'मास्टरपीस' बना रही हो।
पता नहीं क्यों मुझसे ये देखा नहीं गया, और मैंने ज़िद कर दी कि "वापस करो मेरी स्लेट ..ये मेरी है... तुमने क्यों ली?"
और ये कहते हुए मैंने अपनी ओर जोर से खींचा था। उस कोने से तुम्हारी हथेली थोड़ी कट भी गयी थी,शायद। और फिर गुस्से में तुमने सब कुछ मिटा डाला...जो लिखा था वो, और जो हम लिख सकते थे वो भी।
हालाँकि जो था वो पूरी तरह मिट तो नहीं पाया और स्लेट भद्दी सी हो गयी थी...काले आसमान पर राख के तूफान सी।
तब से लेकर आजतक उसपे कुछ लिखा नहीं मैंने और ना ही किसी और को लिखने दिया। कोई लिखता भी कैसे,मैंने इसे छुपा जो रखा था ।
वो स्लेट आज भी वैसी ही, थोड़ी सफेद,थोड़ी काली छोड़ी हुई है।
और सबकुछ 'काश' पे रुक गया है।
काश! मैंने उस दिन तुम्हारा हाथ पकड़ लिया होता।
काश! मैंने तुम्हें मिटाने नहीं दिया होता।
काश! तुमने हल्के हाथों से मिटाया होता।
काश! मैंने तुम्हें रंगीन चॉक दे दिया होता...तो आज वो स्लेट एक मास्टरपीस होती।

-शिव मिश्रा 'केदार'

" शून्य "
18/12/2018

" शून्य "

10/12/2018
06/12/2018

"घूँघट"

आगे बढ़ते कदमों को अब,
घूँघट भी ना रोक सके,
गगरी से जो जल छलके तो,
पनघट भी ना टोक सके ।

मरघट से जाती है बस्ती,
कौवे सौ हो पीछे तेरे,
दो दो हाथ तू कर लेना,
आँचल को जो खींचे तेरे।

पनघट पर हैं बैठे कुत्ते,
पत्थर हाथ लिए तू बढ़ जा,
दरवाजे पे जो घेरें वो,
तू डाल डाल ऊपर चढ़ जा ।

जो डाल पे हो कोई विषधर बैठा,
दंड प्रहार तू कर देना,
पंख फैलाना, उड़ जाना,
स्वप्न साकार तू कर लेना ।

फिर नीचे जब तू देखेगी,
सब कुछ तेरा ही होगा ।
गगरी होगी पनघट होगा,
बस्ती और मरघट भी होगा।
खिड़की होगी चौखट होगा,
बस ना कोई घूँघट होगा ।
बस ना कोई घूँघट होगा ।
-शिव मिश्रा 'केदार'

17/11/2018

कल चाँद जो उनके छत पे जा ठहरा,
ये रात अमावस सी बनी बैठी है ।
उन आँखों पे देख पुतलियों का पहरा,
ये नज़रें बड़ी बेबस सी बनी बैठीं हैं।

- #शिव_मिश्रा_केदार

17/11/2018

आगे की ना सोचे क्यूँ तू ,
क्या कुछ पीछे भी छूटा है ?

बुत सा क्यूँ तू बने फिरे यूँ ,
क्या कुछ नाज़ुक सा टूटा है ?

क्या अपना अपना करते करते,
कोई अपना ही रूठा है ?

लब खोल भी दे, सच बोल भी दे,
क्या सच भी तेरा झूठा है ?

- शिव मिश्रा 'केदार'

28/09/2018

अब बंदिशें हैं चाँद पर, हम रात रोके बैठे हैं,
बस नज़रें ही अब कह रहीं, हर बात रोके बैठे हैं।

धड़कनें भी शांत हैं, जज़्बात रोके बैठे हैं,
मुस्कुराती आँखों से, बरसात रोके बैठे हैं।

फूल से नाज़ुक बने, हालात रोके बैठे हैं,
उम्मीद है जीतेंगे अब, और मात रोके बैठे हैं।

अब बंदिशें हैं चाँद पर, हम रात रोके बैठे हैं,
बस नज़रें ही अब कह रहीं, हर बात रोके बैठे हैं।
©

06/08/2018

"मुखौटा"

हाथ में कलम लिए सफर की शुरुआत हुई,
इसी दौरान मेरी फिर खुद से काफ़ी बात हुई।

"Scene 1- प्लेटफार्म"

नए चेहरे,और नई दुनिया
हाथ फैलाता मुन्ना,करतब दिखाती मुनिया।
मुन्ने ने टोपी पर घिरनी भी लगा रखी है,
अपनी मासूम आँखों में उम्मीद जगा रखी है।
मुनिया सर को पैर से छूना चाहती है
क्योंकि आज वो बख्शीश कल से दूना चाहती है।

कहीं जूते घिस घिसकर कोई,
अपनी किस्मत चमकाने में लगा है।
तो कहीं कचरे के डब्बे से कोई,
रोटी उठाने में लगा है ।

कहीं अखबारों के गट्ठर में है,
अपनी रोज़ी टटोलता कोई,
कहीं तीन बच्चों की माँ है,
उसी अखबार पे है सोई ।

इक पूछताछ केंद्र है जो,
निरंतर सवालों से घिरा रहता है,
और अंदर बैठा इक शख्स,
बड़ी विनम्रता से कहता है।

"अभी कोई गाड़ी आपके स्टेशन से होकर नहीं जाएगी"
"जी हाँ! हावड़ा मेल प्लेटफार्म नंबर सात पर ही आएगी"

कहीं चम्पक में किसी को खुशी मिल जाती है,
तो कहीं दूर बैठी बुढ़िया ये देखकर जल जाती है।
अफसोस! कि नहीं था ऐसा उसका बचपन,
इसी प्लेटफार्म पर रहते उसकी उम्र हो गयी पचपन।

और वो सत्रह साल का लड़का,कैनवास पर,
ना जाने क्या आँक रहा है?
अपनी उत्सुक आंखों से सबमें,
ना जाने क्या क्या झाँक रहा है ?
पर कोशिश पूरी है उसकी,
कि इस प्रतीक्षा और कौतूहल को
कोई सा तो रंग दे,
इस बेढंगी दौड़ती ज़िन्दगी को
अपना अलग ही ढंग दे।
पर ऐसा करने में वो बिल्कुल भी समर्थ नहीं,
क्योंकि अनुभवहीन कलाकारी में जीवन का कोई अर्थ नहीं।
दरअसल!
मेहनतकश जूतों पर भी घाव कहाँ दिखते हैं,
और मुखौटों के ऊपर जनाब भाव कहाँ दिखते हैं।

(Scene-2,AC coach)

बस यही मंजर लिए मैं ट्रेन पर चढ़ता हूँ,
अब तक जो देखा, उसे शब्दों में गढ़ता हूँ,

और अब शुरू होता है मेरा सफर।
मेरे 8 घंटे के अज्ञातवास का सफर।
मेरे 8 घंटे के वनवास का सफर ।

कहीं पे मुन्ना रोता है,
कहीं हँस रही मुनिया है
यहाँ पर्दों और शीशों के बीच,
मेरी 8 घंटे की दुनिया है।
इस दुनिया में, बस मैं ही रहता हूँ
खुद ही सुनता हूँ, खुद की सुनता हूँ,
खुद से ही कुछ कुछ कहता हूँ।
ये मौनव्रत, ये जो एकांतवास है,
मुझे अब लुभाने लगा है,
सबसे घुल-मिलकर रहने का मोह,
धीरे धीरे जाने लगा है।
शिकायत नहीं किसी से भी,
जो पर्दे के उस पार हैं,
सोचता हूँ कि इसी सफर में,
जीवन का सच्चा सार है।

कि, जब तक ये पर्दा है,
मैं, मैं रहूँगा,
खुद की सुनूँगा,
और खुद से सच कहूँगा ।
पर्दा उठते ही सच्चाई कहीं खो जाएगी,
मेरे अंदर की चाह फिर से कहीं सो जाएगी।
फिर सब से झूठी मुस्कान लिए मिलना होगा,
हृदय के मरुभूमि में,बनावटी फूल को खिलना होगा-2

और बस, इसी सोच के साथ,
मैं गंतव्य को पाता हूँ।
अपनी गठरी टटोलता हूँ और,
मुखौटा एक लगाता हूँ।
मुखौटा एक लगाता हूँ।

-अज्ञात

01/05/2018

है कौन नहीं मजदूर यहाँ,
है हर कोई मजबूर यहाँ,
साँसें सबकी शर्मिंदा हैं,
बस मौत खड़ी मगरूर यहाँ ।
- अज्ञात
#मजदूरदिवस

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