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भारत की धरती को जड़ी-बूटियों और औषधीय पौधों की जननी कहा जाता है। यहाँ सदियों से आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति में ऐसे अनेक ...
05/01/2026

भारत की धरती को जड़ी-बूटियों और औषधीय पौधों की जननी कहा जाता है। यहाँ सदियों से आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति में ऐसे अनेक पौधों का उल्लेख मिलता है, जो बिना दवाओं के भी कई रोगों में लाभ पहुँचाते हैं। इन्हीं औषधीय पौधों में से एक है "चिरायता"। यह अपनी कड़वी लेकिन अत्यंत प्रभावशाली प्रकृति के लिए जाना जाता है, जो शरीर से विषैले तत्वों को बाहर निकालने और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में सहायक होती है। चिरायता एक "बारहमासी औषधीय जड़ी-बूटी" है, जो मुख्य रूप से पहाड़ी क्षेत्रों और ठंडे जलवायु वाले इलाकों में पाई जाती है।

✅ चिरायता के अद्भुत औषधीय फायदे जानिए —

🌿 बुखार, खांसी और जुकाम :-
चिरायता में मौजूद एंटी-वायरल गुण बुखार, खांसी और जुकाम में लाभकारी होते हैं। इसकी जड़ का उपयोग वायरल संक्रमण से होने वाले लक्षणों में राहत देने में सहायक माना जाता है।

🌿 इम्यूनिटी बढ़ाए :-
चिरायता में पाए जाने वाले बायोएक्टिव कंपाउंड जैसे "मैग्निफेरिन" शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करते हैं और इम्यून सिस्टम को संतुलित रखते हैं।

🌿 एनीमिया में सहायक :-
चिरायता की पत्तियों में मौजूद विटामिन और खनिज तत्व रक्त निर्माण में मदद करते हैं, जिससे खून की कमी (एनीमिया) में लाभ मिल सकता है।

🌿 लिवर को स्वस्थ रखें :-
चिरायता में पाए जाने वाला "स्वेरचिरिन" यौगिक लिवर को नुकसान से बचाने में सहायक होता है। यह हेपेटाइटिस जैसी लिवर संबंधी समस्याओं में उपयोगी माना जाता है।

🌿 पाचन तंत्र के लिए लाभकारी :-
चिरायता की कड़वाहट पाचन रसों को सक्रिय करती है, जिससे अपच, गैस और कब्ज की समस्या में राहत मिलती है। यह पित्त स्राव को बढ़ाकर पाचन को बेहतर बनाता है।

🌿 खून साफ करने में सहायक :-
आयुर्वेद में चिरायता का उपयोग खून को शुद्ध करने वाली औषधियों में किया जाता है, जिससे त्वचा और शरीर को लाभ मिलता है।

🌿 भूख बढ़ाए :-
चिरायता पित्त के स्राव को बढ़ाता है, जिससे भूख खुलती है और शरीर को पोषण बेहतर तरीके से मिलता है।

🌿 पेट के कीड़े नष्ट करें :-
चिरायता में एंथेल्मिंटिक गुण पाए जाते हैं, जो पेट और आंतों के कीड़ों को नष्ट करने में मदद करते हैं।

🌿 जोड़ों के दर्द में राहत :-
चिरायता की जड़ में मौजूद यौगिक गठिया से जुड़ी सूजन और जोड़ों के दर्द को कम करने में सहायक माने जाते हैं।

🌿 त्वचा के लिए लाभकारी :-
चिरायता में एंटीऑक्सीडेंट और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण होते हैं, जो त्वचा की उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को धीमा करते हैं और त्वचा रोगों में लाभ देते हैं।

✅️ चिरायता इस्तेमाल करने का तरीका —

1️⃣ चिरायता का काढ़ा :-
इसे बनाने के लिए एक छोटा चम्मच सूखी चिरायता को दो कप पानी में उबालें। जब पानी आधा रह जाए तो छानकर गुनगुना पिएँ। यह काढ़ा बुखार, शुगर नियंत्रण, लिवर स्वास्थ्य और इम्यूनिटी बढ़ाने में सहायक माना जाता है। इसका सेवन दिन में एक बार करना पर्याप्त होता है।

2️⃣ चिरायता पाउडर :-
पाचन सुधारने, भूख बढ़ाने और खून साफ करने के लिए चिरायता का चूर्ण उपयोग किया जाता है। इसके लिए एक चौथाई से आधा चम्मच चिरायता पाउडर गुनगुने पानी या शहद के साथ दिन में एक बार लिया जा सकता है।

3️⃣ चिरायता का पानी :-
डिटॉक्स और हल्के बुखार में चिरायता का पानी लाभकारी होता है। इसके लिए रात में एक चम्मच चिरायता पानी में भिगो दें और सुबह उसे छानकर पिएँ।

4️⃣ त्वचा के लिए उपयोग :-
त्वचा संबंधी समस्याओं जैसे मुंहासे, खुजली या फोड़े-फुंसी में चिरायता के काढ़े को ठंडा करके प्रभावित स्थान पर रुई की सहायता से लगाया जा सकता है। इसे दिन में एक से दो बार लगा सकते है।

⚠️ सावधानी —
चिरायता एक अत्यंत कड़वी और शक्तिशाली औषधीय जड़ी-बूटी है, इसलिए इसकी अधिक मात्रा नुकसानदायक हो सकती है। गर्भवती महिलाओं को इसका सेवन नहीं करना चाहिए। लो ब्लड प्रेशर या अत्यधिक कमजोरी की स्थिति में भी इसके सेवन से बचना चाहिए। लंबे समय तक नियमित सेवन करने से पहले किसी योग्य आयुर्वेदिक चिकित्सक से परामर्श अवश्य लें।

कितने प्रकार की रोटियां कैसे और कब किस रोटी का आहार ले जानिए बीमारी अनुसार...1️⃣ मधुमेह (डायबिटीज)खाएँ: ज्वार, बाजरा, जौ...
04/01/2026

कितने प्रकार की रोटियां कैसे और कब किस रोटी का आहार ले जानिए बीमारी अनुसार...
1️⃣ मधुमेह (डायबिटीज)
खाएँ: ज्वार, बाजरा, जौ, रागी की रोटी
लाभ: कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स, शुगर धीरे बढ़ती है
बचें: मैदा व बहुत मुलायम गेहूं की रोटी

2️⃣ मोटापा
खाएँ: जौ, ज्वार, बाजरा, ओट्स की रोटी
लाभ: अधिक फाइबर, देर तक पेट भरा रहता है
बचें: मैदा, घी-मक्खन लगी रोटियाँ

3️⃣ कब्ज
खाएँ: गेहूं (चोकर सहित), ज्वार, बाजरा की रोटी
लाभ: आँतों की गति सुधरती है
साथ में: पर्याप्त पानी

4️⃣ हृदय रोग
खाएँ: ज्वार, जौ, ओट्स, रागी की रोटी
लाभ: कोलेस्ट्रॉल घटाने में सहायक
बचें: रिफाइंड आटा

5️⃣ उच्च रक्तचाप
खाएँ: ज्वार, बाजरा, रागी की रोटी
लाभ: पोटैशियम व फाइबर से रक्तचाप संतुलन
बचें: बहुत नमक वाली रोटियाँ

6️⃣ एनीमिया (खून की कमी)
खाएँ: बाजरा, रागी, चना आटा की रोटी
लाभ: आयरन की अच्छी मात्रा
साथ में: विटामिन-C युक्त भोजन

7️⃣ थायरॉइड
खाएँ: ज्वार, बाजरा, रागी की रोटी
लाभ: पोषक तत्व संतुलित
बचें: अत्यधिक मैदा

8️⃣ कमजोरी व कुपोषण
खाएँ: गेहूं, चना आटा मिश्रित रोटी
लाभ: प्रोटीन व ऊर्जा में वृद्धि

9️⃣ पेट की गैस/अम्लता
खाएँ: जौ, रागी की हल्की रोटी
बचें: बहुत मोटी व अधपकी रोटियाँ

🔟 बच्चों व वृद्धों के लिए
खाएँ: नरम गेहूं या जौ की रोटी
लाभ: पचने में आसान

02/01/2026

पहचानो जड़ी बूटी किस बीमारी में कौनसी काम आती है कैसे करें उपयोग आयुर्वेद जीवन
1. अश्वगंधा
किस बीमारी में: कमजोरी, तनाव, अनिद्रा, पुरुष-शक्ति
कैसे: 1 चम्मच चूर्ण गुनगुने दूध के साथ
कब: रात को सोने से पहले
2. गिलोय
किस बीमारी में: बुखार, इम्युनिटी कमजोर, डेंगू
कैसे: 10–15 ml रस या काढ़ा
कब: सुबह खाली पेट
3. तुलसी
किस बीमारी में: सर्दी-खाँसी, दमा, संक्रमण
कैसे: 5–7 पत्ते चबाएँ या काढ़ा
कब: सुबह खाली पेट
4. एलोवेरा
किस बीमारी में: कब्ज, त्वचा रोग, पेट की जलन
कैसे: 20 ml रस
कब: सुबह खाली पेट
5. नीम
किस बीमारी में: त्वचा रोग, खून की गंदगी
कैसे: पत्तों का रस / दातून
कब: सुबह
6. आंवला
किस बीमारी में: आँखों की कमजोरी, बाल झड़ना, गैस
कैसे: 1 चम्मच चूर्ण या रस
कब: सुबह
7. ब्राह्मी
किस बीमारी में: याददाश्त कमजोर, तनाव
कैसे: चूर्ण दूध के साथ
कब: रात
8. शतावरी
किस बीमारी में: महिलाओं की कमजोरी, हार्मोन असंतुलन
कैसे: 1 चम्मच चूर्ण दूध के साथ
कब: सुबह
9. मुलेठी
किस बीमारी में: गले की खराश, खाँसी
कैसे: छोटा टुकड़ा चूसें
कब: दिन में 2 बार
10. अर्जुन
किस बीमारी में: हृदय रोग, उच्च रक्तचाप
कैसे: छाल का काढ़ा
कब: सुबह-शाम
11. हरड़
किस बीमारी में: कब्ज, अपच
कैसे: चूर्ण गुनगुने पानी से
कब: रात
12. बहेड़ा
किस बीमारी में: खाँसी, आँख रोग
कैसे: चूर्ण
कब: सुबह
13. पुनर्नवा
किस बीमारी में: सूजन, किडनी रोग
कैसे: काढ़ा
कब: सुबह
14. कालमेघ
किस बीमारी में: लिवर रोग, पीलिया
कैसे: काढ़ा
कब: सुबह
15. गुड़मार
किस बीमारी में: मधुमेह (डायबिटीज)
कैसे: चूर्ण
कब: सुबह-शाम
16. भृंगराज
किस बीमारी में: बाल झड़ना, सफेद बाल
कैसे: रस या तेल
कब: रात
17. दारुहल्दी
किस बीमारी में: त्वचा रोग, संक्रमण
कैसे: चूर्ण पानी के साथ
कब: सुबह
18. नागरमोथा
किस बीमारी में: गैस, अपच
कैसे: चूर्ण
कब: भोजन बाद
19. चिरायता
किस बीमारी में: बुखार, मलेरिया
कैसे: काढ़ा
कब: सुबह
20. शंखपुष्पी
किस बीमारी में: मानसिक तनाव, नींद न आना
कैसे: सिरप/चूर्ण
कब: रात
⚠️ महत्वपूर्ण सावधानी
गर्भवती महिलाएँ बिना वैद्य की सलाह न लें
अधिक मात्रा हानिकारक हो सकती है

28/12/2025
27/12/2025

वात दोष बढ़ने से कौन-कौन से दर्द होते हैं?

प्रश्न:
कई लोगों को कभी गर्दन में, कभी कमर में, कभी घुटनों या पिंडलियों में दर्द होता है। दर्द जगह बदलता रहता है, कभी हल्का तो कभी चुभने जैसा लगता है। क्या यह वात दोष बढ़ने का संकेत हो सकता है?

उत्तर:
आयुर्वेद के अनुसार वात दोष नसों, हड्डियों और गति से जुड़ा होता है। जब वात असंतुलित होता है, तो दर्द स्थिर नहीं रहता और शरीर के अलग-अलग हिस्सों में महसूस होता है।
वात बढ़ने से होने वाले प्रमुख दर्द हैं—
- गर्दन और कंधों का अकड़न भरा दर्द
- कमर और पीठ के निचले हिस्से में खिंचाव
- घुटनों व जोड़ों में चुभन या सूखापन
- पिंडलियों में रात का दर्द या ऐंठन
- नसों में झनझनाहट या बिजली-सा दर्द
- चलते समय अस्थिरता या कमजोरी का एहसास

ये दर्द ठंड, खाली पेट, अधिक चलने, कम नींद और सूखे भोजन से और बढ़ जाते हैं।

मुख्य सहायक जड़ी-बूटी
अश्वगंधा चूर्ण — नसों और मांसपेशियों को बल देता है, वात को शांत करता है।

सेवन विधि:
- रात को
- ½ चम्मच अश्वगंधा चूर्ण
- गुनगुने दूध या पानी के साथ
- 15–20 दिन नियमित सेवन

बाहरी सहारा:
- रोज़ तिल के तेल से हल्की मालिश
- ठंडी हवा और सूखेपन से बचाव
- अचानक भारी काम या झटके से परहेज़

दर्द समझिए, वात संतुलित कीजिए

25/12/2025

चिंता रोग का मूल कारण है

मनुष्य का शरीर और मन एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। जो कुछ मन में चलता है, वही शरीर में उतरकर रोग का रूप ले लेता है। आज के समय में अधिकांश शारीरिक और मानसिक रोगों की जड़ में यदि किसी एक तत्व को सबसे ऊपर रखा जाए, तो वह है चिंता। चिंता केवल एक भाव नहीं, बल्कि धीरे-धीरे पूरे शरीर की व्यवस्था को बिगाड़ देने वाली मानसिक अवस्था है, जो भीतर ही भीतर स्वास्थ्य को खोखला कर देती है।

चिंता तब उत्पन्न होती है जब मन भविष्य की आशंकाओं में उलझ जाता है। जो हुआ नहीं है, जो शायद कभी होगा भी नहीं, उसी के डर में मन लगातार दौड़ता रहता है। यह निरंतर चलने वाली मानसिक बेचैनी शरीर के तंत्रिका तंत्र पर दबाव डालती है। मस्तिष्क जब बार-बार तनाव की स्थिति में रहता है, तो शरीर में स्ट्रेस हार्मोन का स्राव बढ़ जाता है। यही हार्मोन लंबे समय तक सक्रिय रहें, तो पाचन, नींद, हार्मोन संतुलन और रोग प्रतिरोधक क्षमता सब पर बुरा प्रभाव डालते हैं।

आयुर्वेद के अनुसार चिंता वात दोष को अत्यधिक बढ़ा देती है। वात का असंतुलन शरीर में अनियमितता लाता है। गैस, कब्ज, सिरदर्द, जोड़ो का दर्द, दिल की धड़कन तेज होना, अनिद्रा, हाथ-पैरों में कंपन, बेचैनी—ये सभी वात विकार के लक्षण हैं और इनका मूल कारण अक्सर मानसिक चिंता होती है। जब मन स्थिर नहीं रहता, तो वात को नियंत्रित करना असंभव हो जाता है।

चिंता का सबसे पहला आघात पाचन तंत्र पर होता है। चिंतित व्यक्ति ठीक से भूख महसूस नहीं करता या फिर बार-बार खाने की इच्छा करता है। दोनों ही स्थितियाँ पाचन अग्नि को कमजोर करती हैं। कमजोर पाचन से शरीर में आम (विषैले तत्व) बनने लगते हैं। यही आम आगे चलकर मधुमेह, उच्च रक्तचाप, मोटापा, त्वचा रोग और जोड़ों के रोगों का कारण बनता है। इस प्रकार एक मानसिक विकार अनेक शारीरिक रोगों को जन्म देता है।

हृदय रोगों के पीछे भी चिंता एक बड़ा कारण है। लगातार तनाव में रहने वाला व्यक्ति भीतर से कभी शांत नहीं रहता। दिल की धड़कन असामान्य रहने लगती है, रक्तचाप बढ़ता है और रक्त नलिकाओं पर दबाव पड़ता है। वर्षों तक चली यह प्रक्रिया अंततः हार्ट अटैक या स्ट्रोक जैसी गंभीर स्थिति में बदल सकती है। कई बार व्यक्ति स्वस्थ भोजन करता है, व्यायाम भी करता है, फिर भी बीमार पड़ जाता है, क्योंकि उसके मन में निरंतर चिंता चल रही होती है।

चिंता केवल शरीर को नहीं, बल्कि सोचने-समझने की शक्ति को भी कमजोर कर देती है। निर्णय क्षमता घटने लगती है, स्मरण शक्ति कमजोर होती है और व्यक्ति छोटी-छोटी बातों में भी घबरा जाता है। इससे आत्मविश्वास कम होता है और व्यक्ति स्वयं को असहाय महसूस करने लगता है। यह मानसिक दुर्बलता आगे चलकर अवसाद, भय और अकेलेपन का रूप ले लेती है।

स्त्रियों में चिंता का प्रभाव हार्मोनल संतुलन पर अधिक दिखाई देता है। मासिक धर्म की अनियमितता, थायरॉइड, पीसीओडी, कमजोरी और चिड़चिड़ापन—इन सबमें मानसिक तनाव की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। पुरुषों में चिंता से यौन कमजोरी, थकान और क्रोध की प्रवृत्ति बढ़ जाती है। बच्चों में यही चिंता पढ़ाई में मन न लगना, डर और आत्मविश्वास की कमी के रूप में दिखाई देती है।

चिंता का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि व्यक्ति इसे सामान्य मान लेता है। वह सोचता है कि चिंता तो जीवन का हिस्सा है, लेकिन धीरे-धीरे यही चिंता जीवन की गुणवत्ता को समाप्त कर देती है। जब तक रोग स्पष्ट रूप से सामने आता है, तब तक शरीर भीतर से काफी कमजोर हो चुका होता है।

चिंता से मुक्ति का मार्ग बाहर नहीं, भीतर से शुरू होता है। जीवन की अनिश्चितताओं को स्वीकार करना, वर्तमान क्षण में जीना और आवश्यक से अधिक सोचने की आदत को छोड़ना—यही स्वास्थ्य की पहली सीढ़ी है। संयमित दिनचर्या, समय पर भोजन, पर्याप्त नींद और प्रकृति के साथ जुड़ाव मन को स्थिर करता है। मन शांत होगा, तभी शरीर स्वस्थ रह पाएगा।

अंततः यह समझना आवश्यक है कि रोग अचानक नहीं आते। वे वर्षों की चिंता, भय और तनाव का परिणाम होते हैं। यदि मन को संभाल लिया जाए, तो शरीर अपने-आप संभलने लगता है। इसलिए यह कहना बिल्कुल सत्य है कि चिंता रोग का मूल कारण है, और शांति ही सच्ची औषधि है।

24/12/2025
24/12/2025

त्रिफला प्राचीन भारतीय चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद में अनेक जड़ी-बूटियों और नुस्खों का उल्लेख है, लेकिन कुछ संयोजन इतने प्रभावशाली हैं कि हज़ारों साल बीतने के बावजूद उनका महत्व कभी कम नहीं होता,,,,...

त्रिफला (Triphala) उन्हीं में से एक है—एक ऐसा अनुपम योग जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना वेदों के समय था।

लेकिन क्या कारण है कि त्रिफला को आयुर्वेद का "सर्वश्रेष्ठ संयोजन" कहा जाता है?
आइए, इस चमत्कारी मिश्रण की शक्ति को गहराई से समझते हैं।

त्रिफला क्या है,,,,,,?
"त्रिफला" संस्कृत का शब्द है, जिसका अर्थ है "तीन फलों का योग"। यह तीन औषधीय फलों से मिलकर बनता है:

आंवला (Amalaki - Emblica officinalis): विटामिन C से भरपूर, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है।

हरड़ (Haritaki - Terminalia chebula): वात नियंत्रण में सहायक, पाचन सुधारक और कायाकल्प में उपयोगी।

बहेड़ा (Bibhitaki - Terminalia bellirica): कफ का शमन करता है, श्वसन प्रणाली को बल देता है।

तीनों फल अपने-अपने औषधीय गुणों के लिए प्रसिद्ध हैं, लेकिन जब इन्हें संतुलन में मिलाया जाता है, तो यह बनता है त्रिफला – एक त्रिदोष नाशक अमृत।

⚖️ त्रिफला: त्रिदोष संतुलन का मंत्र
आयुर्वेद का मूल सिद्धांत है – शरीर में वात, पित्त और कफ का संतुलन बनाए रखना। ज़्यादातर औषधियाँ एक या दो दोषों पर कार्य करती हैं, परंतु त्रिफला उन विरले औषध संयोजनों में से है जो तीनों दोषों को संतुलित करता है:

हरड़ वात को संतुलित करती है।

आंवला पित्त का शमन करती है।

बहेड़ा कफ को नियंत्रित करता है।

इसलिए त्रिफला को किसी भी प्रकृति (dosha type) के व्यक्ति द्वारा सेवन किया जा सकता है—यह सभी के लिए उपयुक्त और हितकारी है।

पाचन और शुद्धिकरण में सर्वोत्तम
आज के समय में अपच, कब्ज, गैस, एसिडिटी जैसी समस्याएं आम हो गई हैं। त्रिफला, विशेषतः अपनी हल्के रेचक (mild laxative) गुणों के कारण, न केवल मल निष्कासन को आसान बनाता है, बल्कि आंतों को साफ करता है और जठराग्नि को बल देता है।

यह:

पुरानी कब्ज से राहत देता है

आंतों की परतों को स्वस्थ बनाता है

पाचन क्रिया को संतुलित करता है

शरीर में एकत्रित विष (toxins) को धीरे-धीरे निकालता है

यह सब कुछ बिना किसी निर्भरता या कमजोरी के। यही कारण है कि इसे "स्मूद डिटॉक्स" भी कहा जाता है।

रोग प्रतिरोधक क्षमता में इज़ाफ़ा
आंवला, त्रिफला का सबसे शक्तिशाली एंटीऑक्सिडेंट स्रोत है। इसके नियमित सेवन से शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली मज़बूत होती है, संक्रमणों से लड़ने की ताकत बढ़ती है और कोशिकाओं की क्षति से सुरक्षा मिलती है।

यह शरीर में:

फ्री रेडिकल्स को कम करता है

सूजन को घटाता है

त्वचा और बालों को अंदर से पोषण देता है

तनाव से लड़ने में सहायक होता है

⚖️ वजन नियंत्रण और मेटाबॉलिज्म में सुधार
त्रिफला चयापचय (metabolism) को बेहतर बनाकर वजन को नियंत्रित करने में मदद करता है। यह:

पाचन को तेज करता है

फैट मेटाबोलिज्म को बढ़ाता है

अतिरिक्त वसा को शरीर से निकालता है

शुगर लेवल को नियंत्रित करता है

हाल के शोध बताते हैं कि त्रिफला आंतों में अच्छे बैक्टीरिया की वृद्धि को भी प्रोत्साहित करता है, जिससे मोटापा, मूड और रोग प्रतिरोधक क्षमता पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

आधुनिक शोध भी करता है समर्थन
त्रिफला को लेकर हाल के वर्षों में कई वैज्ञानिक अध्ययन किए गए हैं, जो इसके पारंपरिक उपयोग को सही ठहराते हैं:

Journal of Alternative and Complementary Medicine में प्रकाशित अध्ययन बताता है कि त्रिफला कोलेस्ट्रॉल कम करने में सहायक है।

Phytotherapy Research के अनुसार, यह डायबिटीज के नियंत्रण में भी उपयोगी हो सकता है।

इसके एंटी-कैंसर और एंटी-बैक्टीरियल गुणों पर भी शोध चल रहे हैं।

इससे स्पष्ट है कि त्रिफला केवल एक परंपरागत औषधि नहीं, बल्कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी प्रमाणित बहुपयोगी संयोजन है।

सौंदर्य के लिए भी लाभकारी,,
त्रिफला का उपयोग केवल शरीर के भीतर नहीं, बल्कि बाहरी सुंदरता के लिए भी किया जाता है:

चेहरे पर लगाने से यह मुंहासे, दाग-धब्बों को दूर करता है

त्वचा को क्लीन और टोन करता है

बालों में लगाने पर यह जड़ें मज़बूत करता है, रूसी हटाता है और घने बाल लाता है

इसलिए यह आजकल प्राकृतिक स्किनकेयर और हेयर केयर रूटीन का हिस्सा बन चुका है।

सेवन विधि और सही समय
त्रिफला को कई रूपों में लिया जा सकता है:

चूर्ण (पाउडर): ½ या 1 चम्मच रात में गुनगुने पानी के साथ

टैबलेट/कैप्सूल: यात्रा या व्यस्त दिनचर्या में सुविधाजनक

काढ़ा / चाय: गर्म पानी में उबालकर सेवन करें

सर्वोत्तम समय:

रात को सोने से पहले या

सुबह खाली पेट

विशेष परिस्थितियों (जैसे गर्भावस्था, विशेष रोग) में वैद्य से परामर्श आवश्यक है।

क्या हैं संभावित सावधानियाँ,,,,,,?
त्रिफला एक सुरक्षित औषधि है, लेकिन कुछ लोगों को शुरुआती दिनों में:

हल्का दस्त

गैस या अफारा

तीव्र प्रभाव महसूस हो सकता है

यह संकेत हैं कि शरीर में विष निकल रहे हैं। आमतौर पर यह प्रभाव कुछ दिनों में अपने आप समाप्त हो जाते हैं।

त्रिफला: एक जीवनशैली, केवल औषधि नहीं
आयुर्वेद कहता है—"स्वास्थ्य वह नहीं जो केवल रोग से मुक्त हो, बल्कि वह जो शरीर, मन और आत्मा के संतुलन में हो।"
त्रिफला इसी संतुलन की ओर एक सरल, सुलभ और प्रभावी कदम है।

यह:

शरीर की गहराई से सफाई करता है

कोशिकाओं का पोषण करता है

रोगों से लड़ता है

मानसिक शांति और ऊर्जा देता है

इसलिए इसे केवल एक "उपचार" नहीं, बल्कि एक जीवनशैली सहयोगी माना जाता है।

🔚 निष्कर्ष: तीन फलों में छुपा संपूर्ण आरोग्य
त्रिफला केवल तीन फलों का मिश्रण नहीं—यह हज़ारों वर्षों की परंपरा, शोध, और अनुभव का परिणाम है।

यदि आप:

कब्ज से परेशान हैं

ऊर्जा की कमी महसूस करते हैं

प्राकृतिक डिटॉक्स की तलाश में हैं

वजन संतुलन और सुंदरता की चाह रखते हैं

तो त्रिफला आपके जीवन में शामिल होना चाहिए। यह सस्ता, सहज, और पूर्णतया प्राकृतिक है।

आज की दुनिया में जहां "फास्ट हेल्थ" का बोलबाला है, त्रिफला हमें धीरे, स्थायी और सच्चे आरोग्य की राह दिखाता है।

23/12/2025

आयुर्वेद में हरड़ (हरितकी) को अत्यंत महत्वपूर्ण औषधि माना गया है। इसे “औषधियों की माता” कहा गया है, क्योंकि यह अकेले ही अनेक रोगों में लाभ पहुँचाने की क्षमता रखती है। हरड़ मुख्य रूप से दो प्रकार की प्रचलित है — छोटी हरड़ और बड़ी हरड़। दोनों का मूल एक ही है, परंतु आकार, गुण, प्रभाव, उपयोग और मात्रा में स्पष्ट अंतर होता है। सही प्रकार की हरड़ का चयन न होने पर लाभ कम हो सकता है, इसलिए इनका अंतर समझना आवश्यक है।

छोटी हरड़ (लघु हरितकी)

छोटी हरड़ आकार में छोटी, हल्की और अधिक झुर्रीदार होती है। इसका स्वाद तीखा-कड़वा होता है और यह शीघ्र असर दिखाती है। आयुर्वेद के अनुसार छोटी हरड़ वात और पित्त दोष को संतुलित करने में विशेष रूप से उपयोगी मानी जाती है।

लाभ:
छोटी हरड़ का प्रमुख कार्य पाचन को सुधारना है। यह आँतों में जमी गंदगी को बाहर निकालती है और हल्के रेचक (लैक्सेटिव) के रूप में कार्य करती है। गैस, अपच, खट्टी डकार, पेट फूलना और हल्की अम्लता में इसका नियमित सेवन लाभ देता है। यह भूख को नियंत्रित करती है, आंतों की गतिशीलता बढ़ाती है और मल को साफ करती है। कमजोर पाचन शक्ति वाले, दुबले-पतले शरीर वाले, बुजुर्ग और वे लोग जिन्हें जल्दी कब्ज हो जाती है, उनके लिए छोटी हरड़ अधिक उपयुक्त मानी जाती है।

उपयोग और मात्रा:
½ से 1 चम्मच छोटी हरड़ का चूर्ण रात को सोने से पहले गुनगुने पानी के साथ लें। यदि पित्त की समस्या अधिक हो तो पानी के बजाय दूध के साथ लेना बेहतर रहता है। लगातार सेवन 3–4 सप्ताह से अधिक बिना विराम के न करें।

बड़ी हरड़ (बृहद् हरितकी)

बड़ी हरड़ आकार में मोटी, भारी और अपेक्षाकृत कम झुर्रीदार होती है। इसका प्रभाव धीमा लेकिन गहरा होता है। यह विशेष रूप से वात दोष पर कार्य करती है और शरीर के अंदर जमे पुराने दोषों को धीरे-धीरे बाहर निकालती है।

लाभ:
बड़ी हरड़ पुरानी कब्ज, मोटापा, शरीर में जमी चर्बी, जोड़ों के दर्द और गठिया जैसी समस्याओं में अधिक उपयोगी मानी जाती है। यह शरीर की गहरी सफाई करती है और आम (विषैले तत्व) को हटाने में मदद करती है। मजबूत पाचन शक्ति वाले, भारी शरीर, बैठने-वाली जीवनशैली और पुराने रोगों से ग्रस्त लोगों के लिए बड़ी हरड़ अधिक लाभकारी रहती है। यह रक्त शुद्धि में भी सहायक मानी जाती है।

उपयोग और मात्रा:
½ चम्मच बड़ी हरड़ का चूर्ण रात को गुनगुने पानी के साथ लें। यदि कब्ज बहुत पुरानी हो तो मात्रा 1 चम्मच तक ली जा सकती है, परंतु रोज़ाना अधिक मात्रा लंबे समय तक नहीं लेनी चाहिए।

छोटी और बड़ी हरड़ में मुख्य अंतर

छोटी हरड़ हल्की, शीघ्र प्रभाव करने वाली और नाजुक पाचन वाले व्यक्तियों के लिए उपयुक्त है, जबकि बड़ी हरड़ भारी, धीरे-धीरे असर करने वाली और मजबूत शरीर व पुराने रोगों में अधिक लाभकारी मानी जाती है। छोटी हरड़ दैनिक पाचन सुधार के लिए बेहतर है, जबकि बड़ी हरड़ शरीर की गहरी सफाई और दीर्घकालिक समस्याओं के लिए प्रयोग की जाती है।

सावधानियाँ

हरड़ का अत्यधिक या गलत प्रकार से सेवन करने पर दस्त, कमजोरी, चक्कर या जलन हो सकती है। गर्भवती महिलाएँ, अत्यधिक दुर्बल व्यक्ति और लंबे समय से दस्त से पीड़ित लोग हरड़ का सेवन बिना वैद्य की सलाह के न करें। आयुर्वेद में हर औषधि की तरह हरड़ भी मात्रा और व्यक्ति की प्रकृति के अनुसार ही अमृत समान लाभ देती है।

सही हरड़ का सही मात्रा में नियमित और समझदारी से सेवन करने पर यह पाचन से लेकर संपूर्ण स्वास्थ्य तक में अत्यंत उपयोगी सिद्ध होती है।

23/12/2025

एक अध्ययन में अश्वगंधा (विदानिया सोम्निफेरा) से प्राप्त विथाफेरिन ए को टीबी के इलाज में सहायक माना गया है। विथाफेरिन ए शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करने में योगदान देता है और टीबी के प्रबंधन में उपयोगी पाया गया है।

#ʜᴇᴀʟᴛʜʏʟɪᴠɪɴɢ

..शतावरी..शतावरी एक अत्यंत उपयोगी और शक्तिशाली आयुर्वेदिक जड़ी-बूटी है। इसे आयुर्वेद में “जड़ी-बूटियों की रानी” कहा जाता...
23/12/2025

..शतावरी..
शतावरी एक अत्यंत उपयोगी और शक्तिशाली आयुर्वेदिक जड़ी-बूटी है। इसे आयुर्वेद में “जड़ी-बूटियों की रानी” कहा जाता हैं क्योंकि यह शरीर को अंदर से पोषण देकर उसे पुनर्जीवित करती है और दीर्घकालीन स्वास्थ्य प्रदान करती है। शतावरी एंटीऑक्सीडेंट, विटामिन और खनिजों से भरपूर होती है, जो शरीर की शक्ति, संतुलन और प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने में सहायक है।

✅️ शतावरी के चमत्कारिक औषधीय फायदे —

1️⃣ महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए वरदान :-
शतावरी को विशेष रूप से महिलाओं की औषधि कहा जाता है। यह हार्मोन संतुलन बनाए रखती है और मासिक धर्म की अनियमितता, दर्द, कमजोरी और थकान में लाभ देती है। गर्भावस्था के बाद शरीर को पुनः शक्ति देती है तथा स्तनपान कराने वाली माताओं में दूध की मात्रा बढ़ाने में सहायक मानी जाती है।

2️⃣ पुरुषों में ताकत, ऊर्जा और स्टैमिना बढ़ाए :-
शतावरी पुरुषों में शारीरिक कमजोरी दूर करती है, ऊर्जा और स्टैमिना बढ़ाती है तथा तनाव और थकान को कम करने में मदद करती है। यह संपूर्ण शारीरिक और मानसिक शक्ति को सहारा देती है।

3️⃣ इम्युनिटी बढ़ाने में सहायक :-
यह शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाती है। मौसमी बीमारियों से बचाव करती है और शरीर को अंदर से पोषण प्रदान करती है।

4️⃣ पाचन तंत्र को मजबूत बनाए :-
शतावरी गैस, एसिडिटी और कब्ज जैसी समस्याओं में राहत देती है। यह आंतों को ठंडक पहुंचाती है, पाचन सुधारती है और भूख बढ़ाने में मदद करती है।

5️⃣ मानसिक तनाव और अनिद्रा में लाभकारी :-
शतावरी दिमाग को शांत करती है। यह तनाव, घबराहट, बेचैनी को कम करती है और नींद की गुणवत्ता बेहतर बनाने में सहायक होती है।

6️⃣ शरीर को ठंडक और संतुलन प्रदान करें :-
शतावरी की तासीर ठंडी होती है, जिससे शरीर की अंदरूनी गर्मी शांत होती है। यह मूत्र संबंधी जलन में लाभकारी है और डिहाइड्रेशन से बचाव करती है।

7️⃣ त्वचा और बालों के लिए फायदेमंद :-
शतावरी त्वचा को अंदर से पोषण देती है, जिससे त्वचा में निखार आता है। यह झुर्रियाँ और रूखापन कम करती है तथा बालों की जड़ों को मजबूत बनाकर बालों के स्वास्थ्य में सुधार करती है।

✅️ शतावरी इस्तेमाल करने का तरीका जाने —

● शतावरी चूर्ण :-
½ से 1 चम्मच शतावरी चूर्ण गुनगुने दूध या पानी के साथ दिन में 1–2 बार लें सकते हैं।

● शतावरी का काढ़ा :-
1 चम्मच शतावरी चूर्ण या जड़ को 1 कप पानी में उबालें। आधा रह जाने पर छानकर सुबह खाली पेट पिएँ।

⚠️ सावधानियाँ —

1. शतावरी का सेवन संतुलित मात्रा में करें। ज्यादा मात्रा में लेने पर पचता नहीं है और पेट खराब हो सकता है।

2. गर्भावस्था, स्तनपान या किसी विशेष बीमारी की स्थिति में डॉक्टर या योग्य वैद्य की सलाह अवश्य लें।

23/12/2025

उषःपान

यह केवल जल पीने की क्रिया नहीं,
बल्कि एक दिव्य चिकित्सा है,
जो शरीर को शुद्ध करती है,
मन को स्थिर करती है,
और दिन की गति को संतुलित करती है।
जब जल को सही समय, मात्रा और विधि से लिया जाए,
तो वही जल औषधि बन जाता है।

प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में,
जब सूर्य क्षितिज पर भी नहीं होता,
तब शरीर स्वाभाविक रूप से शुद्धि की प्रवृत्ति में होता है।

उस समय पीया गया
गुनगुना या उबाला हुआ, तांबे, मिट्टी या चांदी के पात्र में रखा जल
शरीर से अमा (toxins) को बाहर निकालता है,
पाचन अग्नि को प्रज्वलित करता है,
और मल-मूत्र त्याग को सहज बनाता है।

यह केवल पाचन नहीं,
बल्कि नेत्रों, त्वचा, यकृत, मूत्राशय और मस्तिष्क की आंतरिक सफाई का माध्यम है।

❌ लेकिन यदि इसके बाद पुनः निद्रा ले ली जाए,
तो यह प्रक्रिया रुक जाती है
और जल, जो अमृत था,
कफ बनकर शरीर में ठहर जाता है।

Desi Alchemist में हम मानते हैं
रोज़मर्रा के कर्म,
जब परंपरा से जुड़ते हैं,
तो वे साधारण नहीं रहते,
वे संस्कार बन जाते हैं।

अब जल को केवल पानी न समझें
यह है दिन की पहली औषधि।
उषःपान।

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