Acharya virendra ji maharaj

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 िमाचल_प्रदेश_के_दिव्य_ज्योती_पतञ्जली_योगआश्रम (मोडार ). के महाराजजी. #स्वामी_सुबोधानंद_सरस्वती_महाराज_जी_से_कई_सालो_बाद...
25/11/2023

िमाचल_प्रदेश_के_दिव्य_ज्योती_पतञ्जली_योगआश्रम (मोडार ). के महाराजजी.
#स्वामी_सुबोधानंद_सरस्वती_महाराज_जी_से_कई_सालो_बाद_मिलने_का_सानिध्य_प्राप्त_हुआ।।

 ोनावाला_के_आश्रम_मैं_युग_प्रवर्तक_श्रीमान_अवधजी_ओझा (इकरा_आईएएस (IQRA IAS).Avadh Ojha
14/11/2023

ोनावाला_के_आश्रम_मैं_युग_प्रवर्तक_श्रीमान_अवधजी_ओझा (इकरा_आईएएस (IQRA IAS).

Avadh Ojha

एकल जड़ी बूटियों से चिकित्सा केवल एक एक ही जड़ी बूटियां कई प्रकार के रोगों पर कार्य करती हैं| हमारी संस्था का एक उद्देश यह...
09/07/2023

एकल जड़ी बूटियों से चिकित्सा केवल एक एक ही जड़ी बूटियां कई प्रकार के रोगों पर कार्य करती हैं| हमारी संस्था का एक उद्देश यह भी है की हम प्रत्येक व्यक्ति को अपने घर का वैद्य बनाना चाहते हैं| जिससे हम अपनी और अपने परिवार की चिकित्सा स्वयं ही कर सकें ।
ी_हमारी_औषधि_है_रसोन_लहसुन

चिकित्सीय उपयोग-
१. आमाशयिक रस खाव को बढ़ाने के कारण इसका प्रयोग परिपाचक के रूप में तथा पेट में वायु भर जाने (उदराध्मान) में करते हैं।
२. यक्ष्मा दण्डाणुजन्य सभी विकृतियों यथा फुफ्फुसविकार, स्वरयन्त्रशोष, धर्मविकार, अस्थिव्रण तथा नाडीव्रण में यह अत्यन्त लाभकारी है। लहसुन के रस को इसमें सेवन कराते हैं तथा स्थानिक प्रयोग भी करते हैं।
३. यह पाचक एवं सारक होता है अर्थात् भोजन को पचाता है तथा कोष्ठबद्धता को दूर करता है।
४. यह भान सन्धानकारक अर्थात् टूटी हुई हड़ियों को जोड़ने वाला होता है।
५. कण्ठ के लिए हितकारी है।
६. शरीर में बल तथा वर्ण को उत्पन्न करता है।
७. जीर्णज्वरनाशक है।
८. अग्निमांद्य, अरुचि, कुक्षिशूल, गुल्म, कृमि, मल तथा वातादिक की विबन्धता तथा बवासीर को नष्ट करता है।
९. कुष्ठप्न है।
१०. श्वास, कास, कफ तथा हृदरोग को दूर करता है।

मात्रा स्वरस १० से ३० बूंद, कल्क-२ से ३ ग्राम।
हानिनिवारक कतीरा, धनियाँ, बादाम का तेल ।

#आचार्य_वीरेंद्रजी.
महर्षि पतञ्जलि योग फ़ाऊंडेशन पिम्पलोली
लोनावाला महाराष्ट्र.
७८७५३८०३८०.

#योगगुरु_स्वामी_कर्मवीर_जी_महाराज.
महर्षि पतञ्जलि अन्तर्राष्ट्रीय योग विद्यापीठ पुरकाज़ी मुज़फ़्फ़रनगर उत्तरप्रदेश
९०१२३३३३३५.

इसका छोटा सा क्षुप २ से ४ फीट ऊँचा होता है। शालवृक्ष के पत्रों के सदृश पत्र होने के कारण इसे संस्कृत में शालपर्णी कहते ह...
11/06/2023

इसका छोटा सा क्षुप २ से ४ फीट ऊँचा होता है। शालवृक्ष के पत्रों के सदृश पत्र होने के कारण इसे संस्कृत में शालपर्णी कहते हैं। यह त्रिदोषशामक, बल्य, बृंहण, रसायन एवं विशेष रूप से अंगमर्दप्रशमन है। नाड़ी बल्य होने के कारण इसे नाड़ी दौर्बल्य तथा वातव्याधि में देते हैं । हृद्य, शोथहर तथा शोणितस्थापन होने के कारण इसे हृद्रोग, रक्तविकार तथा शोथ में देते हैं। हृदयशूल में शालपर्णी का क्षीरपाक प्रयोग करते हैं। यह कफनिःसारक है, अतः कास, उरःक्षत तथा यक्ष्मा में इसका प्रयोग उपकारी है। यह ज्वर, श्वास, अतिसार तथा वमन को दूर करता है। यह विष, क्षयकास तथा कृमि का भी नाशक है। वृष्य होने के कारण शुक्रदौर्बल्य में इसे देते हैं। यह मूत्रल है।
प्रयोज्य अंग-मूल।
उत्पत्ति स्थान- यह समस्त भारत में प्रायः शुष्कभूमि तथा खुले हुए जंगलों में पाया जाता है। नाम-लै० – यूरेरिया पिक्टा (Uraria Picta Desv)। सं०–पृश्निपर्णी, पृथक्पर्णी, चित्रपर्णी, अहिपर्णी, क्रोण्टुविन्ना, सिंहपुच्छी, कलशी, धावनी, गुहा। हि० – पिठवन । म०-पिठवण । गु० - पीठवण । बं० - शंकरजटा । ते० – कोल्कुपोन्ना । ता० – कोलपोन्ना। पं० – देतेर्दानी।
विशिष्ट गुण-कर्म- यह उष्णवीर्य, लघु, स्निग्ध, त्रिदोषघ्न, दीपनीय, वृष्य, वातहर, संग्राहि, सन्धानीय, शोथहर, अंगमर्द प्रशमन तथा जीवाणुनाशक है। चिकित्सीय उपयोग - इसका उपयोग ज्वर, दाह, कास-श्वास, रक्तातिसार, रक्तार्श, गृहणी, तृष्णा, हृद्रोग, रक्तविकार, वातरक्त, शोथ, मूत्रकृच्छ्र, शुक्रदौर्बल्य, अंगमर्द तथा वातव्याधि एवं अस्थिभग्न में करते हैं।
मात्रा - क्वाथ - ५० से १०० मि.ली. । विशिष्ट योग– दशमूलारिष्ट

इसका छोटा सा क्षुप २ से ४ फीट ऊँचा होता है। शालवृक्ष के पत्रों के सदृश पत्र होने के कारण इसे संस्कृत में शालपर्णी कहते ह...
10/06/2023

इसका छोटा सा क्षुप २ से ४ फीट ऊँचा होता है। शालवृक्ष के पत्रों के सदृश पत्र होने के कारण इसे संस्कृत में शालपर्णी कहते हैं। यह त्रिदोषशामक, बल्य, बृंहण, रसायन एवं विशेष रूप से अंगमर्दप्रशमन है। नाड़ी बल्य होने के कारण इसे नाड़ी दौर्बल्य तथा वातव्याधि में देते हैं । हृद्य, शोथहर तथा शोणितस्थापन होने के कारण इसे हृद्रोग, रक्तविकार तथा शोथ में देते हैं। हृदयशूल में शालपर्णी का क्षीरपाक प्रयोग करते हैं। यह कफनिःसारक है, अतः कास, उरःक्षत तथा यक्ष्मा में इसका प्रयोग उपकारी है। यह ज्वर, श्वास, अतिसार तथा वमन को दूर करता है। यह विष, क्षयकास तथा कृमि का भी नाशक है। वृष्य होने के कारण शुक्रदौर्बल्य में इसे देते हैं। यह मूत्रल है।
प्रयोज्य अंग - पञ्चांग ।
उत्पत्ति स्थान - यह समस्त भारत में होता है।
नाम – लै० – डेस्मोडिअम् गॅन्जेटिकम (Desmodium gangeticum DC)। सं०–शालपर्णी, - विदारिगंधा, अंशुमती। हि० - सरिवन, सालवन । म० – सालवण । गु० - शालवण । बं० - शालपानि । ते० – गीतनारम् । ता० – पुल्लादि । मल० - पुल्लाटि । कन्न० – मरुल होन्ने, काडगांजि।
स्वरूप—इसका स्वावलम्बी छोटा सा क्षुप २ से ४ फीट ऊँचा होता है। इसके काण्ड किञ्चित् कोणयुक्त होते हैं। पत्र शालपत्र के सदृश होता है। यह लम्बाई में ३ से ६ इंच, चौड़ाई में १/२ से २ इंच, एक पत्रकीय, भालाकार, आयताकार या लट्वाकार तथा तीक्ष्णाग्र होते हैं। अधर तल फीके हरे रंग का तथा रोमश होता है। पुष्प - श्वेताभ गुलाबी या जामुनी रंग के, छोटे, ६ से १२ इंच लम्बी अक्षीय या अन्त्य मञ्जरियों में लगते हैं। फली या शिम्बी आधा से पौन इंच लम्बी, चपटी, ६ से ८ संधियों की, टेढ़ी तथा वक्र रोमों से आवृत होती है, जिससे यह कपड़ो में चिपक जाती है।
रासायनिक संघटन—इसके मूल में एक पीत राल, तैल, क्षाराभ तथा भस्म पाए जाते हैं। यह गुण में स्निग्ध तथा वीर्य में उष्ण होने के कारण वात का, रस में मधुर होने से पित्त का तथा तिक्त होने से कफ का शमन करता है।
विशिष्ट गुण कर्म- यह उष्ण, ज्वरघ्न, शोथघ्न, मूत्रजनन, बल्य, रसायन, वयस्थापन, बृंहण, सर्वदोषहर, अंगमर्दप्रशमन तथा विषघ्न है।
चिकित्सीय उपयोग-
१. दौर्बल्य, क्षय, शोष एवं अंगमर्द में इसका प्रयोग करते हैं।
२. श्वासनलिका शोथ, फुफ्फुसशोथ तथा सूतिका ज्वर में इसे देने से विशेष लाभ होता है।
३. रक्तविकार में- इसके पञ्चांग के क्वाथ में काली मिर्च मिलाकर देते हैं।
४. हृदयशूल में शालपर्णी का क्षीरपाक देते हैं।
५. ज्वर, वातरोग, अतिसार, वमन, शोथ, प्रमेह, अर्श, कृमि, राजयक्ष्मा एवं क्षत, कास मे इसका प्रयोग लाभकारी है।
मात्रा - चूर्ण- ३ से ६ ग्राम । क्वाथ - ५० से १०० मि०ली० ।
विशिष्ट योग - शालपर्ण्यादि क्वाथ।

यथा नाम तथा गुण के आधार पर पुत्रजीवक के सेवन से सन्तान सुख की प्राप्ति होती है। यह शुक्रक्षय तथा गर्भस्राव, बन्ध्यत्व आद...
05/06/2023

यथा नाम तथा गुण के आधार पर पुत्रजीवक के सेवन से सन्तान सुख की प्राप्ति होती है। यह शुक्रक्षय तथा गर्भस्राव, बन्ध्यत्व आदि विकारों में उपयोगी है। इनमें इसके बीजों का प्रयोग करते हैं तथा रुद्राक्ष के समान इसके बीजों की माला भी धारण करते हैं। संस्कृत में इसे गर्भस्थापन होने से 'गर्भद कहते हैं। इसके अतिरिक्त यह वात-पित्त शामक होने से वात-पैत्तिक रोगों में प्रयुक्त होता है। इसके में क्वाथ, अरिष्ट पिलाने के साथ-साथ उसके क्वाथ की उत्तरबस्ति भी देते हैं। यह ग्राही, रक्तसंग्राहक, गर्भाशय के लिए उत्तेजक एवं संकोचक, श्लेष्मघ्न एवं व्रणरोपक है। प्रयोज्य अङ्ग - काष्ठसार । उत्पत्ति स्थान- यह बंगाल, दक्षिण भारत, श्रीलंका, बर्मा तथा मलेशिया में अधिकता से पाया जाता है।
नाम - लै० - सीजलपिनिया सैप्पन ( Caesalpinia Sappan) । सं०-पतंग, रक्तसार, सुरङ्ग, रञ्जन, पट्टरञ्जक (इसकी लकड़ी के लाल रंग से कपड़े रंगे जाते हैं), पत्तूर, कुचन्दन। हि०- पतंग, बकम । म० - पतंग । बं० - बकम काष्ठ, बोकोम । गु० - पतंग। कन्न० - पत्तंग । ते० - वकमु । ता० - पतुंगम् । मल० - सप्पन्नम् । अ० - बग्गम। फा०. - -बकम । अं० –सैप्पन (Sappan)।
स्वरूप – इसका कंटकयुक्त छोटा सा झाड़ीदार वृक्ष होता है। आधा से एक फुट लम्बी पत्र की मध्य सिरा होती है, जिसमें २० से २४ पक्ष होते हैं। पत्र के बराबर ही लम्बी इसकी पुष्पमञ्जरी होती हैं। फली ३ से ४ इंच लम्बी होती है, जिसमें ३-४ बीज होते हैं। इसकी लकड़ी लाल रंग की होती है। औषधि रूप में इसके काष्ठसार को ग्रहण करते हैं । रासायनिक संघटन — इसमें ब्रेजिलिन (Brazilin) नामक एक रंजक द्रव्य पाया जाता है, जो हवा - के सम्पर्क में आते ही ब्रेजिलीन (Brazilien) में बदल जाता है। इसकी फलियों तथा काण्ड की छाल में टैनिन पाया जाता है। पत्तियों में सुगंधित तैल होता है । विशिष्ट गुण-कर्म- गुण में रुक्ष तथा रस में तिक्तकषाय होने के कारण यह कफ तथा पित्त का शमन करता है। यह व्रणरोपण, रक्तस्तम्भन तथा यौनिगत स्राव का नाशक है, अतः इसका प्रयोग अनेक यौनिव्यापदों में विशेष रूप से रक्तप्रदर तथा श्वेतप्रदर में करते हैं। यह रक्तदोष को दूर करता है। दाहप्रशमन है, अतः दाह की शान्ति के लिए इसका प्रयोग करते हैं।
चिकित्सीय उपयोग-
१. व्रणों तथा चर्मरोगों में इसका लेप लाभकारी है। रक्तस्राव को रोकने के लिए इसका चूर्ण छिड़कते हैं। इसके क्वाथ की पट्टी रखने से स्थानिक रक्तस्राव रुक जाता है।
२. मांसार्बुदों में पतंग एवं बनफ्शा के क्वाथ का प्रयोग करते हैं। इस क्वाथ से मांसाबुदों को धोने से पीड़ा कम हो जाती है तथा दुर्गन्धि का नाश होता है ।
३. लिचेन (Lichen) नामक चर्मरोग में इसका लेप लाभकारी है।
४. फुफ्फुस, गर्भाशय एवं आन्त्र आदि स्थानों से रक्तस्राव होने पर इसका क्वाथ पिलाने से लाभ होता है।
५. रक्तप्रदर तथा श्वेतप्रदर में इसका क्वाथ उपकारी है। क्वाथ की उत्तरबस्ति भी देते हैं।
६. यह मस्तिष्क शामक तथा आक्षेपहर है, अतः उन्माद, अपस्मार आदि विकारों में इसका प्रयोग करते हैं।
मात्रा - क्वाथ - ५० से १०० मि.ली. ।
चूर्ण - १ से २ ग्राम ।

बुद्धि एवं स्मृतिशक्ति को बढ़ाने के लिए, मस्तिष्क दौर्बल्य तथा तज्जनित उन्माद, अपस्मार आदि विकारों को दूर करने के लिए, म...
21/05/2023

बुद्धि एवं स्मृतिशक्ति को बढ़ाने के लिए, मस्तिष्क दौर्बल्य तथा तज्जनित उन्माद, अपस्मार आदि विकारों को दूर करने के लिए, मस्तिष्क को शान्त रखने के लिए तथा सामान्य दौर्बल्य में रसायन रूप में मण्डूकपर्णी का उपयोग यश देने वाला सिद्ध हुआ है । स्तन्यजनन एवं स्तन्यशोधक होने के कारण इसका प्रयोग प्रसव के पश्चात् स्तन्य (दूध) की कमी एवं विकृति में करते हैं। कुष्ठघ्न होने के कारण कुष्ठ, विशेष रूप से ग्रन्थिक कुष्ठ, जीर्ण व्रण तथा क्षयजव्रण में इसका प्रयोग करते हैं। गण्डमाला एवं श्लीपद में भी यह उपयोगी है।
मेंढक के समान पत्र वाली होने से इसे 'मण्डूकपर्णी' कहते हैं । स भवतः मण्डूकवत् जलासन्न स्थानों में होने के कारण या मण्डूक ऋषि के द्वारा प्रचारित होने के कारण इसे 'माण्डूकी' कहा गया है। बुद्धिवर्धक होने के कारण इसे 'ब्राह्मी' तथा मेध्य व जलासन्न भूमि में होने के कारण 'सरस्वती' कहते हैं।
प्रयोज्य अंग - पञ्चांग । उत्पत्ति स्थान—भारत एवं लंका में सर्वत्र उपलब्ध है, विशेष रूप से जलाशयों तथा नदी - नालों के किनारे होती है।
नाम – लै० – सेण्टेला एशियाटिका (Centella Asiatica)। सं०–ब्राह्मी, मण्डूकपर्णी, माण्डूकी, -- सरस्वती। हि० – बेंगसाग, ब्राह्मी । म० – करिवणा । गु० – खण्डब्राह्मी । बं० – थुलकुड़ी । ते० - मण्डूक ब्राह्मी । ता० - वाल्लरीकिरि ।
स्वरूप – इसका क्षुप वर्षायु होता है तथा काण्ड लम्बे, प्रसरी तथा ग्रंथियों पर मूलों से युक्त हैं । इसके पत्र गोल तथा वृत्ताकार होते हैं। पुष्प- लाल रंग के होते हैं। फल ८ मि०मी० लम्बे तथा चिपटे होते हैं, जिनके भीतर चिपटे बीज निकलते हैं। होते रासायनिक संघटन - इसमें एक क्षाराभ हाइड्रोकोटिलिन, एक ग्लायकोसाइड, एशियाटिकोसाइड, अल्प उड़नशील तैल, स्थिर तैल तथा रालीय द्रव्य उपस्थित होते हैं। इसके अतिरिक्त वेलेराइन (Vellarine), पेक्टिक एसिड् तथा विटामिन सी भी प्राप्त होता है।
विशिष्ट गुण-कर्म- यह रसायन, बलदायक, मूत्र को उत्पन्न करने वाला, वयःस्थापन, मेध्य, रक्तशोधक, कुष्ठघ्न, व्रणशोधक एवं व्रणरोपक है। अधिक मात्रा में होने पर मद को उत्पन्न करता है। इससे शिरःशूल, चक्कर आना तथा कभी-कभी संन्यास (Coma) की अवस्था भी हो जाती है। इससे त्वचा की रक्तवाहिनियों का विस्फार होता है।
चिकित्सीय उपयोग-
१. कुष्ठ, व्रण तथा अन्य चर्मरोगों में इसका लेप किया जाता है। इसके प्रयोग से यदि त्वचा में लालिमा एवं कण्डू हो तो कुछ दिन इसे रोकना चाहिए तथा रेचक औषध देनी चाहिए ।
२. मस्तिष्कजनित दौर्बल्य तथा तज्जनित उन्माद, अपस्मार आदि में इसका प्रयोग करते हैं।
३. बच्चों को शब्दोच्चारण ठीक करने के लिए इसके ताजे पत्ते चबाने को देते हैं।
४. स्मरणशक्ति को बढ़ाने के लिए इसका चूर्ण गोदुग्ध के साथ देने से लाभ होता है।
५. दीपन होने के कारण इसका प्रयोग अग्निमांद्य, ग्रहणी आदि में करते हैं।
मात्रा - स्वरस - १० से २० मि.ली. । चूर्ण - २५० मि.ग्राम से ५०० मि.ग्राम। ताजे पत्ते -८ से १२ (प्रौढ़ के लिए)। २ से ४ (बच्चों के लिए)।

हारसिंगार का छोटा, झाड़ीदार वृक्ष अपने अत्यन्त सुगन्धित पुष्प जो कि रात्रि में खिलते हैं और सुबह झड़ जाते हैं - के लिए अ...
17/05/2023

हारसिंगार का छोटा, झाड़ीदार वृक्ष अपने अत्यन्त सुगन्धित पुष्प जो कि रात्रि में खिलते हैं और सुबह झड़ जाते हैं - के लिए अत्यन्त प्रसिद्ध है। रात्रि के वातावरण को अपनी सुगन्ध से सुगन्धित कर वहाँ की शोभा बढ़ा देना - यह हारसिंगार वृक्ष का ही कार्य है। सुगन्धित पुष्पों के अतिरिक्त यह अपने ज्वरघ्न गुण के लिए, तिक्त पौष्टिकता के लिए, पित्तविकारों के संशोधनार्थ तथा गृध्रसी रोग के लिए एक उत्तम औषध के रूप में जाना जाता है। कृमिघ्न एवं मृदुविरेचक के रूप में इसके पत्तों के स्वरस का प्रयोग किया जाता है। इसके बीजों का लेप सर के गंज पर लगाने से नए बाल उग आते हैं। कफघ्न होने के कारण यह कफ का चिपचिपापन कम कर खाँसी तथा दमा में आराम पहुँचाता है। यह यकृत् एवं प्लीहा वृद्धि का नाशक है। प्रयोज्य अंग-पत्र, त्वक् (छाल) ।
उत्पत्ति स्थान —यह भारत के प्रायः सभी प्रान्तों के बगीचों में लगाया हुआ मिलता है। विशेष रूप से यह मध्यभारत तथा हिमालय के नीचे वाले प्रदेशों में अधिकता से पाया जाता है।
नाम - ले० – निक्टेन्थिस् आर्बोर-ट्रिस्टिस (Nyctanthes Abor Tristis) । सं०- पारिजात, शेफालिका । हि० – हारसिंगार, पारिजात। म० – पारिजातक । बं० – शेफालिका, शिउली । गु०- हारशणगार । ते० - पारिजातमु, पगड़मल्ले । ता० - मज्जपु, पवलमल्लिकै । कन्न० - हरसिंग, पारिजात। अं० – नाइट जैस्मिन (Night Jasmine), कोरल जैस्मिन (Coral Jasmine)। स्वरूप – इसका वृक्ष छोटा, झाड़ीदार तथा कभी-कभी २५ से ३० फीट तक ऊँचा होता है। पत्ते - अभिमुख, नीचे रोमश और ऊपर खर, नुकीले, लट्वाकार, अखण्ड या दन्तुर एवं मजबूत पर्णवृत्त से युक्त होते हैं। पुष्प श्वेत पंखुड़ियों एवं केसरिया वर्ण के पुष्पवृन्त से ये रात को खिलते हैं तथा सुबह झड़ जाते हैं। फल ३/४ से १ इंच लम्बा, चौड़ा, १/८ से १/६ इंच मोटा चपटा होता है, जो दो एक बीजी खण्डों में विभक्त हो जाता है। युक्त अत्यन्त सुगन्धित होते हैं।
रासायनिक संघटन -
इसके पुष्पों में एक सुगन्धित उड़नशील तैल पाया जाता है। पुष्पवृन्त से एक प्रकार का रंग प्राप्त होता है, जिससे रेशमी वस्त्रों को रंगा जाता है। इसके बीजमज्जा से एक पीले-भ रंग का स्थिर तैल प्राप्त होता है। निक्टैन्थीन (Nyctanthine) नामक क्षाराभ पाया
रासायनिक संघटन - इसके पुष्पों में एक सुगन्धित उड़नशील तैल पाया जाता है। पुष्पवृन्त से एक प्रकार का रंग प्राप्त होता है, जिससे रेशमी वस्त्रों को रंगा जाता है। इसके बीजमज्जा से एक पीले-भ रंग का स्थिर तैल प्राप्त होता है। निक्टैन्थीन (Nyctanthine) नामक क्षाराभ पाया विशिष्ट गुण-कर्म- यह ज्वरघ्न, कफघ्न, यकृत् उत्तेजक, मृदुविरेचक एवं शामक है। इसके पत्तों का स्वरस कृमिघ्न, ज्वरघ्न, तिक्तपौष्टिक, पित्तद्रावक, एवं मृदुरेचक होता है। पित्तसंशोधन होने से पित्तविकारों में इसे संशोधनार्थ देते हैं। यकृत् एवं प्लीहा वृद्धि को यह कम करता है। चिकित्सीय उपयोग-
१. मन्दाग्नि पर बनाया गया हारसिंगार के पत्तों (शेफालिका दलैः ) का क्वाथ गृध्रसी (Sciatica) में अत्यन्त लाभदायक माना जाता है (चक्रदत्त) । (विशेष- शेफालिका यह नाम नीलनिर्गुण्डी का भी है, जिसका उपयोग गृध्रसी में किया जाता है।)
२. ज्वरघ्न के रूप में- जीर्णज्वर में- इसके ७ से ८ कोमल पत्तों का स्वरस, आर्द्रक स्वरस तथा मधु के साथ मिलाकर देने से लाभ होता है। मलेरिया में यह अत्यन्त लाभकारी है। जीर्ण मलेरिया होने पर त्रिकटु के साथ इसका प्रयोग करना उचित है। इससे यकृत एवं प्लीहा की वृद्धि कम हो जाती है। पाण्डु होने की स्थिति में लौह का प्रयोग इसके साथ करते हैं। इसके सेवन काल में पथ्य में दूध, घी एवं शर्करा का अधिक उपयोग किया जाना चाहिए।
३. बच्चों के कृमि (केंचुए) के लिए पत्रस्वरस में चीनी मिलाकर देते हैं, लाभ होता है।
४. इसके पत्र या छाल का चूर्ण खाँसी तथा दमा में प्रयुक्त किया जाता है।
५. बीजों को जल में पीसकर सर के गंज पर लेप करने से नए बाल उगते हैं।

गुलाब का फूल अपनी सुन्दरता एवं सुगन्ध के लिए सुप्रसिद्ध है। गुलाब की कई प्रजातियाँ एवं भेद पाए जाते हैं। गुलाब से अतिसुग...
16/05/2023

गुलाब का फूल अपनी सुन्दरता एवं सुगन्ध के लिए सुप्रसिद्ध है। गुलाब की कई प्रजातियाँ एवं भेद पाए जाते हैं। गुलाब से अतिसुगन्धित द्रव्य इत्र प्राप्ति के अतिरिक्त इसका चिकित्सा में भी मृदुसारक द्रव्य गुलकन्द के रूप में उपयोग सर्व प्रसिद्ध है। इसके चूर्ण को शरीर पर मलने से स्वेदाधिक्य कम होकर दुर्गन्ध दूर हो जाती है। नेत्रबिन्दु के रूप में गुलाब जल का प्रयोग करते हैं। सेवती गुलाब का प्रयोग ज्वर में शीतलता लाने के लिए करते हैं। इससे हृदय की बढ़ी हुई धड़कन भी कम होती है। यह त्रिदोषघ्न है। संस्कृत में इसे तरुणी तथा शतपत्री कहते हैं। अनेक पुष्प दल होने के कारण इसे शतपत्री कहा गया है। प्रयोज्य अंग - पुष्प ।
जाति-अनेक प्रजातियाँ होती हैं। गुलाब की एक विशेष जाति सेवती गुलाब (रोजा अॅल्बा) है, जिसमें श्वेत पुष्प आते हैं।
रासायनिक संघटन — इसमें एक उड़नशील तैल, दैनिक एसिड्, गैलिक एसिड्, मैलिक एसिड् तथा कुछ राल आदि द्रव्य पाए जाते हैं।
विशिष्ट गुण-कर्म- यह शीतल, हृदय के लिए हितकर, संग्राही, शुक्रजनक, लघु, त्रिदोष तथा रक्तविकार को दूर करने वाली, शरीर के वर्ण को उत्तम बनाने वाली, कटु तथा तिक्त रसयुक्त एवं पाचक होती है।
चिकित्सीय उपयोग-
१. स्वेद से दुर्गन्ध आने पर त्वचा पर इसका लेप करने से लाभ होता है। स्वेदाधिक्य हो पर इसके चूर्ण को शरीर पर मलते हैं।
२. होठों को गुलाबी करने के लिए-गुलाब की ताजी पंखुड़ियों को छाया में पीसकर चूर्ण करें और उसमें ग्लिसरीन मिलाकर प्रतिदिन नियमित रूप से होठों पर लगाएँ। यह प्रयोग दिन में दो बार करें। आठ-दस दिन के प्रयोग से ही होंठ गुलाबी हो जाते हैं। इससे पपड़ी पड़े होंठ नर्म एवं चिकने भी हो जाते हैं सुखाकर
३. मुखव्रण में इसका स्थानिक प्रयोग हितकर है।
४. मधुरविपाक होने के कारण यह धातुवर्धक है, अतः दौर्बल्य में उपयोगी है।
५. वर्ण विकारों तथा पैत्तिक व्रणशोथ में इसका लेप करने से लाभ होता है। व्रणों में इसका अवचूर्णन करते हैं। ६. अतिसार, प्रवाहिका, कोष्ठवात तथा विबन्ध में उपयोगी है।
७. स्वेदापनयन तथा त्वक्दोषहर होने से इसका प्रयोग अतिस्वेद तथा चर्म रोगों में लाभप्रद ।
८. इससे शौच साफ होकर भूख बढ़ती है तथा शरीर पुष्ट होता है, अतः ग्रीष्म ऋतु में स्त्रियों तथा बच्चों को गुलकन्द खाना चाहिए।
९. गुलकंद तथा गुलाब जल का अनुपान के रूप में प्रयोग करते हैं। नेत्रबिन्दु में गुलाब जल का उपयोग किया जाता है।
१०. शरीर में दाह होने पर इसका प्रयोग करते हैं।
११. मस्तिष्क दौर्बल्यजनित विकारों में यह लाभकारी है।
१२. क्लैब्य रोग में इसका प्रयोग करते हैं मात्रा - पुष्प चूर्ण-१ से ३ ग्राम। अर्क गुलाब - २० से ४० मि.ली. । गुलकन्द-१० से २० ग्राम।

गुड़हल के पुष्पों को पीसकर रंग निकाला जाता है, जो बाल रंगने के काम आता है। इसके रंग से पहले जूते रंगे जाते थे, इसलिए इसे...
15/05/2023

गुड़हल के पुष्पों को पीसकर रंग निकाला जाता है, जो बाल रंगने के काम आता है। इसके रंग से पहले जूते रंगे जाते थे, इसलिए इसे अंगेजी में 'शूफ्लावर' भी कहा जाता । गुड़हल को संस्कृत में 'जपा तथा ओड्रपुष्प' कहते हैं। लाल तथा सफेद रंग के गुड़हल के पुष्प को संस्कृत में ‘त्रिसन्ध्या’ कहा गया है। इसके पुष्प प्रदरनाशक तथा गर्भनिरोधक होते हैं। यह केश्य, मस्तिष्कबल्य, रक्तरोधक, ग्राही, हृद्य, शोणितस्थापन तथा मूत्रसंग्रहणीय है।
रासायनिक संघटन -
पुष्प में कैल्शियम, फास्फोरस, लौह, थियामिन, राइबो लेविन, नियासिन तथा विटामिन 'सी' पाए जाते हैं। पत्तों में केरोटीन पाया जाता है। पुष्पों को पीसकर उससे एक रंग प्राप्त किया जाता है, जो केश रंगने के काम में आता है।
विशिष्ट गुण- कर्म
यह ग्राही, रक्तसंग्राहक, केश्य, हृद्य एवं मस्तिष्क के लिए बलप्रद है। इसका प्रयोग प्रदर, प्रमेह एवं ज्वर में किया जाता है। यह गर्भरोधक है।
चिकित्सीय उपयोग-
१. गंजापन - पुष्पों को काली गाय के मूत्र के साथ पीसकर सिर पर लगाने से गंजापन दूर हो जाता है। बाल आने लगते हैं और बालों का रंग सुन्दर हो जाता है।
२. प्रदर में ४ से ५ पुष्प कलियाँ दूध में पीसकर पीने से व पथ्य में दूध का सेवन करने से प्रदर रोग में लाभ होता है।
३. हृदय तथा मस्तिष्क की दुर्बलता, उन्माद तथा पैत्तिक विकार में इसका शरबत लाभकारी है।
४. गुड़हल के पत्तों को पीसकर शोथयुक्त स्थान पर लगाने से शोथ एवं पीड़ा शान्त होती है।
५. इसके पत्तों को चबाकर या पीसकर सुबह-शाम खाने से कफ और वात का प्रकोप शान्त हो जाता है।
६. सोजाक (Gonorrhoea) में इसका सेवन अत्यन्त लाभप्रद है। सोजाक के रोगी को पहले दिन एक फूल या पुष्प बताशे के साथ खाना चाहिए। दूसरे दिन दो फूल, तीसरे दिन तीन फूल - इस प्रकार पाँचवे दिन पाँच फूल बताशों के साथ सेवन करना चाहिए। फिर एक-एक फूल कम करते हुए एक फूल खाकर दसव दिन प्रयोग बन्द कर देना चाहिए। बताशे उतने ही सेवन करें जितने में स्वाद मीठा हो जाए।
७. मुँह के छाले में इसे चबाने से लाभ होता है।
८. यूनानी चिकित्सा पद्धति के अनुसार इसके सूखे पत्तों के ५ ग्राम चूर्ण को ५ ग्राम शक्कर मिलाकर चालीस दिन तक सेवन करने से स्मरणशक्ति, स्नायविकशक्ति एवं यौनशक्ति में अत्यन्त वृद्धि होती है। ९. गर्भनिरोध के लिए इसके फूलों का प्रयोग किया जाता है ।
१०. गुड़हल है दिल का रक्षक—देशी गुड़हल की बन्द कली एक-एक की मात्रा में सुबह खाली पेट ताजे पानी के साथ सेवन करने से हृदय के छिद्र में लाभ होता है। गुड़हल का ताजा फूल खाने से हम अपने दिल को सुरक्षित रख सकते हैं। गुड़हल का सत् निकालकर उसका सेवन करने से कोलेस्ट्रॉल व उच्च रक्तचाप में अद्भुत लाभ होता है।

मखान्नं स्निग्धवृष्यं च गर्भसंस्थापक परम्। lवातपित्तहरं बल्यं शीतं पित्तास्रदाहनुत् ॥यज्ञ में प्रयुक्त अन्न होने के कारण...
14/05/2023

मखान्नं स्निग्धवृष्यं च गर्भसंस्थापक परम्। l
वातपित्तहरं बल्यं शीतं पित्तास्रदाहनुत् ॥
यज्ञ में प्रयुक्त अन्न होने के कारण इसे 'मखान्न' कहते हैं । यह कमलगट्टे सदृश होता है, अतः 'पद्मबीजाभ' कहलाता है। जल में होने के कारण इसे 'पानीय फल' कहते हैं। यह तालाबों की तली में लोटने वाला होता है, अतः इसे 'अङ्कलोड्य' कहते हैं। यह बल को प्रदान करने वाला, वाजीकर तथा ग्राही होता है। गर्भावस्था, प्रदर तथा प्रसवोत्तर दौर्बल्य में इसे देते हैं। यह शुक्रजनन, शुक्रस्तम्भन तथा प्रजास्थापन है। यह बल्य, बृंहण एवं दाहप्रशमन भी है। यह हृदय के लिए हितकर तथा शोणितस्थापन है। यह सुपाच्य होता है तथा आहार के रूप में इसका उपयोग किया जा सकता हैं।
प्रयोज्य अंग - फल ।
उत्पत्ति स्थान - यह विशेष रूप से उत्तर, मध्य तथा पश्चिम भारत के तालाबों तथा झीलों में होता है। - लै० — यूरीएल फेराक्स (Euryale Ferox Salisb)। सं० –मखान्न, पद्मबीजाभ, पानीयफल। नाम- हि० — मखाना । म० - मखाणे, मकाणे । गु० - मखाणा । बं० – माखाना । ते० – मेल्लुनिपदमम्। अं०—फॉक्स नट (Fox nut), जार्गन फ्रूट (Gorgon fruit)। रासायनिक संघटन — इसमे प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, स्नेह, लौह, फॉस्फोरस तथा कॅरोटीन आदि द्रव्य पाए जाते हैं।
यह पौष्टिक खाद्य-पदार्थ है। यह स्निग्ध, वृष्य, अति प्रजास्थापन, वात-पित्त नाशक, बलदायक, शीत तथा पित्त, रक्तपित्त या रक्तविकार तथा दाह को दूर करने वाला है।चिकित्सीय उपयोग-
शुक्रमेह, गर्भावस्था, प्रदर, प्रसवोत्तर दौर्बल्य तथा वीर्याल्पता में इसे दूध में पकाकर खिलाते हैं। यह एक सुपाच्य, पौष्टिक आहार है। यह बल्य, वाजीकर एवं ग्राही है।
मात्रा -५ से १० ग्राम विशिष्ट योग — पौष्टिक चूर्ण ।

नारिकेल या नारियल को भारतवर्ष में कौन नहीं जानता? विविध प्रकार से खाने में नारियल का उपयोग किया जाता है। रोगियों के दौर्...
01/05/2023

नारिकेल या नारियल को भारतवर्ष में कौन नहीं जानता? विविध प्रकार से खाने में नारियल का उपयोग किया जाता है। रोगियों के दौर्बल्य एवं कृश अवस्था, गर्भावस्था, तृषावस्था, ज्वर, मूत्रकृच्छ्र तथा मूत्रगत विकारों में, दाह आदि पैत्तिक विकारों में प्रयोग करना हितकर है। अम्लपित्त में नारियल का पानी (डाभ का पानी) अत्यन्त प्रशस्त है। नारियल का जल-स्वादिष्ट, शीतल, हृदय के लिए हितकर, भूख को बढ़ाने वाला, शुक्रल, लघु, अत्यन्त बस्तिशोधक एवं प्यास तथा पित्त को शान्त करने वाला होता है, लेकिन ताजा नारियल डाभ पानी होना चाहिए। नारियल का कोमल फल विशेष रूप से पित्तज्वर तथा पित्त दोष को शान्त करने वाला होता है- 'विशेषतः कोमल नारिकेलं निहन्ति पित्तज्वर पित्तदोषान्' । अतः कोमल फल महास्रोत के पैत्तिक विकार अम्लाधिक्य आदि में अत्यन्त लाभकर है । यह अनुलोमन होने से आध्मान आदि वातविकारों को नष्ट करता है और पुरीषोत्सर्ग में सहायक होने के कारण पित्त संशोधन भी करता है। अम्लपित्त रोग की यह अत्यन्त प्रसिद्ध औषध है। पैत्तिकशूल तथा परिणाम शूल में इसी कारण इसे दिया जाता है। मधुर स्निग्ध होने के कारण यह आमाशय के क्षोभ को दूर कर उसके क्षत का सन्धान करता है। नारियल का तैल क्षय रोग में कॉड लिवर आयल के समान ही लाभकारी है, हाँ पचने में थोड़ा गुरु होता है। नारियल का तैल केश बढ़ाने के लिए अत्यन्त प्रसिद्ध है। चर्मरोगों और व्रणों में इसके तैल में कपूर, सफेदा और कबीला मिलाकर लगाने से लाभ होता है । कवच को जलाकर निकाला हुआ तैल कुष्ठघ्न एवं व्रणरोपण होता है। इसका बाह्य प्रयोग ही करना चाहिए। नारियल के जल से मसूरिका के दानों को धोने से दाह की शान्ति होती है एवं दाग भी मिट जाते हैं। प्रयोज्य अंग-फल, पुष्प, तैल, मूल, क्षार आदि । उत्पत्ति स्थान- भारत के समुद्र तटवर्ती प्रदेशों यथा- दक्षिण भारत (विशेष रूप से केरल), पूर्वी बंगाल, उड़ीसा, लंका, वर्मा आदि में यह अधिकता से पाया जाता है।
१. बाल अवस्था- इसमें केवल जल रहता है।
२. मध्यम अवस्था– इसमें जल कम रहता है तथा कोमल या मृदु दुग्धवत् गिरी होती है।
३. पक्व अवस्था–मज्जा अत्यन्त कठोर, स्वादरहित एवं प्रायः निर्जल हो जाती है।

विशिष्ट गुण-कर्म- नारियल का फल – यह वीर्य में शीतल, दुर्जर अर्थात् देर से पचने वाला, बस्तिशोधक, विष्टम्भक (कोष्ठ में अधिक वात उत्पन्न कर आध्मान आदि उत्पन्न करने वाले), बृंहण (रस-रक्तादिवर्धक), बलदायक, वात-पित्त रक्त विकार तथा दाह को दूर करने वाला होता है नारियल का कोमल फल- विशेष रूप से पित्तज्वर तथा पित्त दोष को दूर करने वाला होता है। नारियल का पुराना फल-गुरु, पित्तकारक, उष्ण, विदाही तथा विष्टम्भक होता है। उष्ण होने के कारण यह आर्तवजनन एवं वाजीकरण है, अतः पकी गिरी कष्टार्तव में प्रयुक्त होती है तथा बाजीकरण योगों में इसे डालते हैं। यह वृष्य है। नारियल का जल – यह स्वादिष्ट, शीतल, हृदय के लिए हितकर, अग्निदीपक, शुक्र को बढ़ाने - वाला, लघु, अत्यन्त बस्तिशोधक एवं प्यास तथा पित्त को शान्त करने वाला होता है।
चिकित्सीय उपयोग-
१. दौर्बल्य, कृश, गर्भ, ज्वर, तृषा, दाह, मूत्रकष्ट एवं अम्लपित्त में नारियल का जल हितावह है।
२. इसकी ताड़ी या ताड़ी से निर्मित मद्य दाहशामक, मूत्रकारक, बलदायक, निद्राजनक, वाजीकरण एवं बृंहण होता है।
३. नारियल का जल पीने से मूत्र साफ हो पथरी निकल जाती है। बहुमूत्रता में इसका पुष्प लाभकारी है।
४. इसका जल हिक्का रोग में लाभकारी है ।
५. कष्टार्तव में पकी गिरी का सेवन लाभदायक है ।
६. इसका तैल बालों के लिए हितकारी है। इसके लगाने से बाल बढ़ते हैं, सुन्दर, काले व घने हो जाते हैं। यह व्रणरोपक भी है।

७. इसके कवच को जलाकर निकाला हुआ तैल चर्मरोगों में तथा अग्निदग्ध व्रणों में हितकारी है ।
८. नारियल का दूध क्षय, दुर्बलता आदि में तथा सर्जरी के पूर्व तथा पश्चात् में पिलाने से रक्तस्राव का भय नहीं रहता ।
९. नारियल का क्षार भेदन है, अतः नारिकेल क्षार का प्रयोग गुल्म तथा श्लैष्मिक शूल में करते हैं।
१०. चिपटे कृमि के लिए एक नारियल की गिरी खिलाते हैं, साथ में विरेचन देना आवश्यक है।
११. नारियल का जल, पुष्प तथा कोमल फल रक्तपित्त में लाभकारी है।
१२. चेहरे पर नारियल का पानी नित्य दो बार लगाने से चेहरे के धब्बे, मुँहासे, कील, चेचक के दाग आदि मिट जाते हैं। चेहरा सुन्दर एवं कान्तिमय हो जाता है
१३. नकसीर होने पर - सुबह खाली पेट २५ ग्राम कोमल नारियल खाने से नकसीर आना बन्द हो जाता है। ऐसा सात दिनों तक करना है।
१४. खुजली - ५० ग्राम नारियल के तैल में दो नींबू का रस मिलाकर मालिश करने से खुजली का नाश हो जाता है ।
मात्रा - फल- १० से २० ग्राम । तेल - १० से २० बूँद । क्षार-१ से २ ग्राम । विशिष्ट योग– नारिकेल खण्ड, नारिकेल लवण, नारिकेलामृत

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