01/05/2023
नारिकेल या नारियल को भारतवर्ष में कौन नहीं जानता? विविध प्रकार से खाने में नारियल का उपयोग किया जाता है। रोगियों के दौर्बल्य एवं कृश अवस्था, गर्भावस्था, तृषावस्था, ज्वर, मूत्रकृच्छ्र तथा मूत्रगत विकारों में, दाह आदि पैत्तिक विकारों में प्रयोग करना हितकर है। अम्लपित्त में नारियल का पानी (डाभ का पानी) अत्यन्त प्रशस्त है। नारियल का जल-स्वादिष्ट, शीतल, हृदय के लिए हितकर, भूख को बढ़ाने वाला, शुक्रल, लघु, अत्यन्त बस्तिशोधक एवं प्यास तथा पित्त को शान्त करने वाला होता है, लेकिन ताजा नारियल डाभ पानी होना चाहिए। नारियल का कोमल फल विशेष रूप से पित्तज्वर तथा पित्त दोष को शान्त करने वाला होता है- 'विशेषतः कोमल नारिकेलं निहन्ति पित्तज्वर पित्तदोषान्' । अतः कोमल फल महास्रोत के पैत्तिक विकार अम्लाधिक्य आदि में अत्यन्त लाभकर है । यह अनुलोमन होने से आध्मान आदि वातविकारों को नष्ट करता है और पुरीषोत्सर्ग में सहायक होने के कारण पित्त संशोधन भी करता है। अम्लपित्त रोग की यह अत्यन्त प्रसिद्ध औषध है। पैत्तिकशूल तथा परिणाम शूल में इसी कारण इसे दिया जाता है। मधुर स्निग्ध होने के कारण यह आमाशय के क्षोभ को दूर कर उसके क्षत का सन्धान करता है। नारियल का तैल क्षय रोग में कॉड लिवर आयल के समान ही लाभकारी है, हाँ पचने में थोड़ा गुरु होता है। नारियल का तैल केश बढ़ाने के लिए अत्यन्त प्रसिद्ध है। चर्मरोगों और व्रणों में इसके तैल में कपूर, सफेदा और कबीला मिलाकर लगाने से लाभ होता है । कवच को जलाकर निकाला हुआ तैल कुष्ठघ्न एवं व्रणरोपण होता है। इसका बाह्य प्रयोग ही करना चाहिए। नारियल के जल से मसूरिका के दानों को धोने से दाह की शान्ति होती है एवं दाग भी मिट जाते हैं। प्रयोज्य अंग-फल, पुष्प, तैल, मूल, क्षार आदि । उत्पत्ति स्थान- भारत के समुद्र तटवर्ती प्रदेशों यथा- दक्षिण भारत (विशेष रूप से केरल), पूर्वी बंगाल, उड़ीसा, लंका, वर्मा आदि में यह अधिकता से पाया जाता है।
१. बाल अवस्था- इसमें केवल जल रहता है।
२. मध्यम अवस्था– इसमें जल कम रहता है तथा कोमल या मृदु दुग्धवत् गिरी होती है।
३. पक्व अवस्था–मज्जा अत्यन्त कठोर, स्वादरहित एवं प्रायः निर्जल हो जाती है।
विशिष्ट गुण-कर्म- नारियल का फल – यह वीर्य में शीतल, दुर्जर अर्थात् देर से पचने वाला, बस्तिशोधक, विष्टम्भक (कोष्ठ में अधिक वात उत्पन्न कर आध्मान आदि उत्पन्न करने वाले), बृंहण (रस-रक्तादिवर्धक), बलदायक, वात-पित्त रक्त विकार तथा दाह को दूर करने वाला होता है नारियल का कोमल फल- विशेष रूप से पित्तज्वर तथा पित्त दोष को दूर करने वाला होता है। नारियल का पुराना फल-गुरु, पित्तकारक, उष्ण, विदाही तथा विष्टम्भक होता है। उष्ण होने के कारण यह आर्तवजनन एवं वाजीकरण है, अतः पकी गिरी कष्टार्तव में प्रयुक्त होती है तथा बाजीकरण योगों में इसे डालते हैं। यह वृष्य है। नारियल का जल – यह स्वादिष्ट, शीतल, हृदय के लिए हितकर, अग्निदीपक, शुक्र को बढ़ाने - वाला, लघु, अत्यन्त बस्तिशोधक एवं प्यास तथा पित्त को शान्त करने वाला होता है।
चिकित्सीय उपयोग-
१. दौर्बल्य, कृश, गर्भ, ज्वर, तृषा, दाह, मूत्रकष्ट एवं अम्लपित्त में नारियल का जल हितावह है।
२. इसकी ताड़ी या ताड़ी से निर्मित मद्य दाहशामक, मूत्रकारक, बलदायक, निद्राजनक, वाजीकरण एवं बृंहण होता है।
३. नारियल का जल पीने से मूत्र साफ हो पथरी निकल जाती है। बहुमूत्रता में इसका पुष्प लाभकारी है।
४. इसका जल हिक्का रोग में लाभकारी है ।
५. कष्टार्तव में पकी गिरी का सेवन लाभदायक है ।
६. इसका तैल बालों के लिए हितकारी है। इसके लगाने से बाल बढ़ते हैं, सुन्दर, काले व घने हो जाते हैं। यह व्रणरोपक भी है।
७. इसके कवच को जलाकर निकाला हुआ तैल चर्मरोगों में तथा अग्निदग्ध व्रणों में हितकारी है ।
८. नारियल का दूध क्षय, दुर्बलता आदि में तथा सर्जरी के पूर्व तथा पश्चात् में पिलाने से रक्तस्राव का भय नहीं रहता ।
९. नारियल का क्षार भेदन है, अतः नारिकेल क्षार का प्रयोग गुल्म तथा श्लैष्मिक शूल में करते हैं।
१०. चिपटे कृमि के लिए एक नारियल की गिरी खिलाते हैं, साथ में विरेचन देना आवश्यक है।
११. नारियल का जल, पुष्प तथा कोमल फल रक्तपित्त में लाभकारी है।
१२. चेहरे पर नारियल का पानी नित्य दो बार लगाने से चेहरे के धब्बे, मुँहासे, कील, चेचक के दाग आदि मिट जाते हैं। चेहरा सुन्दर एवं कान्तिमय हो जाता है
१३. नकसीर होने पर - सुबह खाली पेट २५ ग्राम कोमल नारियल खाने से नकसीर आना बन्द हो जाता है। ऐसा सात दिनों तक करना है।
१४. खुजली - ५० ग्राम नारियल के तैल में दो नींबू का रस मिलाकर मालिश करने से खुजली का नाश हो जाता है ।
मात्रा - फल- १० से २० ग्राम । तेल - १० से २० बूँद । क्षार-१ से २ ग्राम । विशिष्ट योग– नारिकेल खण्ड, नारिकेल लवण, नारिकेलामृत