12/04/2026
किडनी फेल्योर का आयुर्वेद में ही है सही इलाज !!
अंग्रेजी चिकित्सा विज्ञान में बताया जाता है कि किडनी फेल्योर दो प्रकार का होता है- तीव्र (एक्यूट) और जीर्ण (क्रॉनिक) । एक्यूट में किसी भी कारण से पहले वायु की क्रिया विषम होती है परिणामतः अग्नि (मेटाबोलिक फायर) की क्रिया भी असंतुलित हो जाती है। परिणामतः मलों (यूरिया, क्रिटनीन) का निष्कासन करने वाले अवयव, गुर्दों का कार्य भी बन्द हो जाता है या कम हो जाता है, डॉक्टर कहने लगते हैं कि 'एक्यूट रीनल फेल्योर' ।
जीर्ण (क्रॉनिक) गुर्दा फेल्योर जिसे डॉक्टर क्रॉनिक रीनल फेल्योर (सी. आर.एफ.) कहते हैं उसमें गुर्दे के नेफ्रान्स आदि अवयव क्षतिग्रस्त हो जाते हैं और किडनी द्वारा किये जाने वाले कार्यों की क्षमता घट जाती है या नष्ट ही हो जाती है । फिर शरीर में विजातीय तत्व (यूरिया, क्रिटनीन आदि) एकत्र हो जाते हैं जो शरीर के लिये घातक होते हैं।
आधुनिक चिकित्सा वैज्ञानिक अन्य की तुलना में जिन रोगों में गुर्दा फेल्योर होने की आशंकायें अधिक बताते हैं वे रोग हैं-
1 - हाई ब्लडप्रेशर होना ।
2 - मधुमेह (डायबिटीज) होना ।
3 - क्रॉनिक किडनी डिजीज का पारिवारिक इतिहास असाध्य होना।
4 - अधिक उम्र होना ।
5 - गुर्दे की पथरी होना ।
6 - गठिया, गाउट, सीआरपी के कारण दर्द वाले रोगी जो अक्सर पेन किलर्स लेते हैं।
7 - एण्टीबायोटिक और पेनकिलर का अनियमित
प्रयोग।
अब आयुर्वेदीय सिद्धान्तों के आधार पर जब हम आगे बढ़ते हैं तो पाते हैं कि आधुनिक चिकित्सा वैज्ञानिक उपर्युक्त जिन कारणों को गुर्दा फेल्योर में हेतु बताते हैं उनमें वायु की विषमता/ असंतुलन ही प्रधान रूप से सिद्ध होती है।
'हाई ब्लडप्रेशर' तो वायु जन्य विकार है ही इस पर बहुत बताने की आवश्यकता प्रतीत नहीं होती । मधुमेह को भी विकृत 'वायु' ही पैदा करता है-
'तैरावृत्तगतिर्वायुरोज आदाम गच्छति ।
यदा वस्तिं तदा कृच्छ्रो मधुमेहः प्रवर्तते ॥' च.सू.17/81
अनेक कारणों से शरीर में विचरण करने वाली वायु की गति में अवरोध उत्पन्न होता है जिससे कुपित (Aggravated) वायु शरीर के ओज को लेकर मूत्राशय में प्रवेश करती है और कष्टकर मधुमेह की उत्पत्ति होती है।
देखें-
कषायमधुरं पाण्डु रुक्षं मेहति यो नरः । वातकोपादसाध्यं तं प्रतीयान्मधुमेहितम् ॥ चि.नि. 4/ 44
अर्थात् वात प्रकोप से प्रभावित व्यक्ति जब कसैला, मधुर, पाण्डु और रूक्ष मूत्र का त्याग करता है तो उसे मधुमेही कहते हैं और वह असाध्य होता हैं।
किडनी फेल्योर में एक अवस्था यह भी होती हैं कि मूत्र के साथ शरीर का कुछ महत्वपूर्ण पोषक द्रव्य भी जाने लगता है, उस समय मूत्र परीक्षण में प्रोटीन / एल्ब्यूमिन पाया जाता है।
यह अवस्था बहुत ही कृच्छ्रसाध्य या असाध्य होती है। पर आपको जानकर आश्चर्य और आयुर्वेद की वैज्ञानिकता पर गर्व होगा कि यदि इस अवस्था को अंग्रेजी चिकित्सा वैज्ञानिकों ने मेटाबोलिक विकृति कहते हैं तो आयुर्वेद के आचार्य सुश्रुत ने बहुत पहले ही इसे शरीर में विकृत या विषम वायु से उत्पन्न बीमारी ही बताते आ रहे हैं-
शुक्रदोष प्रमेहांस्तु व्यानापान प्रकोपजः । सु.नि. 1/20
अर्थात् व्यान और अपान वायु के प्रकोप से शुक्रदोष (Seminal Disorders) और प्रमेह विकार होते हैं।
वायु के प्रकोप से अग्नि (मेटाबोलिक फॉयर) की विषमता या मृदुकता फिर प्रमेह यानी पेशाब में प्रोटीन या एल्ब्युमिन का आना।
इस प्रकार आयुर्वेद के अनुसार गुर्दा फेल्योर में ऐसी जीवनशैली या ऐसे कारण बनते हैं जिससे पक्वाशय में वायु प्रकुपित होती है, पश्चात् अपानवायु गति प्रतिलोम होती है, जिससे मल, मूत्र व शरीर के टॉक्सिक बाहर करने वाले वायु का अवरोध होता है। जिससे जठराग्नि मन्द पड़ती है, साथ - साथ किडनी जैसे अवयव क्षतिग्रस्त हो जाते हैं।
चिकित्सा- यदि रोगी अत्यन्त वमन से पीड़ित हो, क्षीण हो, यानी रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र धातुयें क्षीण हो गयीं हों, शूल हों, रोगी मल का वमन कर रहा हो, रोगी की रोग प्रतिरोधक क्षमता बहुत कमजोर हो तो ऐसा रोगी असाध्य होता है ।
योग रत्नाकरकार चिकित्सा स्थान -1 में कम शब्दों में कितना श्रेष्ठ चिकित्सा सूत्र बताया है-
'सर्वेष्वेतेषु भिषजा चोदावर्त्तेषु कृत्स्न्त्शः ।
वायो क्रिया विधातव्याः स्वमार्गप्रतिपत्तये॥' अर्थात् वायु की क्रिया को प्रकृतिस्थ करने का उपक्रम करना चाहिए ।
रोग चाहे जो भी हो सभी की साध्य, कृच्छ्रसाध्य, याप्य, प्रत्याख्येय और असाध्य अवस्था होती है पर यह हम दावे के साथ कह सकते हैं कि आयुर्वेद में किडनी फेल्योर की बहुत ही श्रेष्ठ चिकित्सा है।
यह हम इसलिए कहते हैं कि जिस असाध्य, याप्य और प्रत्याख्येय किडनी फेल्योर रोगी को अंग्रेजी डॉक्टर और अस्पताल मरने के लिए छोड़ देते हैं उस अवस्था तक के रोगी आयुर्वेद चिकित्सा में जीवन पा जाते हैं । यदि रोगी साध्य अवस्था का हो, पथ्य पालन करे, स्वस्थ जीवनशैली का पालन करे, तो डायलेसिस से बचा रहता है और लम्बा जीवन व्यतीत करना कोई मुश्किल काम नहीं है।
जब कोई चिकित्सक किडनी फेल्योर रोगी को चिकित्सा में लेता है उस समय उसके सामने चुनौती रहती है कि जितनी किडनी खराब हो गयी है उससे आगे न खराब होने पाये, साथ ही जितने नेफ्रान्स डिजेनरेट हो गये हैं, मृदूकता आ गयी है
तो उन्हें पुनर्जीवित करे, यूरिया, क्रिटनीन जैसे विष जो शरीर में जमा हैं उनका निष्कासन हो अन्यथा किसी भी समय यूरेमिया होकर जान का खतरा हो सकता है।
किडनी फेल्योर की चिकित्सा लम्बे समय तक चलने वाली चिकित्सा होती है अतः रोगी को बहुत धैर्य और नियम पालन के साथ इलाज जारी रखना पड़ता है।
हमने अनेकों रोगियों को देखा है कि रोगी यहाँ जब रहा पंचकर्म कराया, औषधियाँ तथा खान- पान का सही सेवन किया तो अच्छे परिणाम आये किन्तु घर जाने पर खान-पान का परहेज किया पर ब्रह्मचर्य का पालन नहीं किया तो फिर उसी दशा में हो गये। क्योंकि उधर रक्तादि धातुओं का निर्माण तो हो नहीं रहा, उधर मैथुन करके धातुक्षय किया तो हानि होना तो सुनिश्चित है । इसीलिए पुरुषों की अपेक्षा किडनी फेल्योर महिलायें उत्तम लाभ पाती हैं।
इस प्रकार किडनी फेल्योर रोगी में निम्नांकित स्तर पर चिकित्सा करनी होती है ।
👉 अग्निबल व्यवस्थित/सम्यक हो इसके लिए वायु को प्रकृतिस्थ करना
👉 शारीरिक दुर्बलता नष्ट हो और धातुओं का पुननिर्माण हो, इसके लिये रसायन चिकित्सा और उचित खान-पान ।
👉 शरीरस्थ विषाक्तता दूर हो इसके लिए पंचकर्म चिकित्सा द्वारा शरीर शोधन |
👉 शरीर में विषाक्तता बढ़े नहीं इसके लिये उचित खान-पान और ।
1️⃣ सहचर तैल, अश्वगन्धाबला तैल, पिण्ड तैल, वृहद् सैन्धवादि तैल, निर्गुण्डी चन्दनबला क्षादि तैल, रोग, रोगी के अनुसार अभ्यंग हेतु चयन |
2️⃣ सहचर तैल, महानारायण तैल, वृ. सैन्धवादि तैल, महानारायण तैल का पान।
3️⃣ गुग्गुलुतिक्तकघृतम्, पंचगव्यघृत, महापंचगव्य, दाड़िमादिघृत, धान्वन्तरम् घृत का सेवन ।
4️⃣ रोग में वायु की अधिकता हो तो अनुवासन बस्ति, स्नेहन बस्ति, मधुतैलिक बस्ति, योग बस्ति का प्रयोग करना चाहिए, पित्त की प्रधानता हो तो क्षीर बस्ति तथा कफ की प्रधानता हो तो गोमूत्र की बस्ति देनी चाहिए।
5️⃣ यदि बस्ति कर्म के बाद भी दोष अधिक हो तो सामान्य विरेचन दिया जा सकता है। धातुक्षय हो, पाण्डु हो तो विरेचन में सावधान रहें।
6️⃣ शिरोभ्यंग के पश्चात् मोहान्धसूर्य नस्य देना चाहिए। अणु तैल का नस्य भी लाभप्रद है।
7️⃣ अमृतांजन का अंजन करना चाहिये ।
8️⃣ लघु, सुपाच्य आहार, लौकी, परवल, कच्चा पपीता, बथुआ, चौलाई, पपीता, जीरक, उष्ण जलपान, गोदुग्ध, अजा (बकरी) दुग्ध का आहार नियमों के अनुसार सेवन कराना चाहिए।
9️⃣ शतावरी घनवटी, पुनर्नवादि मण्डूर, शोथारि तो मण्डूर, स्वर्णमाक्षिक भस्म, मुक्तापिष्टी, प्रवाल भस्म, प्रवालपंचामृत मुक्तायुक्त, मुक्तापंचामृत, गिलोयघन, सर्वतोभद्रा वटी, महेश्वर वटी, शिलाजित्वादि वटी स्वर्ण (शुक्ररोगाधिकार), गोक्षुरादि गुग्गुल, शाल्मली घृत, पुनर्नवासव, उशीरासव, स्फटिक भस्म, अभ्रक भस्म शतपुटी, पाषाण भेद चूर्ण, श्वेत पर्पटी, गन्धर्वहस्तादि `तैलम्/कैपसूल आदि।
यह चिकित्सा और चिकित्सा सिद्धान्त हजारों रोगियों पर की जाती है और इसके आधार पर लगातार किडनी फेल्योर रोगियों को जीवनदान मिल रहा है।