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⭐ अँधेरे में क्यों हो ?विशाखा की सहेलियों की कथास्थान : जेतवन, श्रावस्तीश्रावस्ती के कुछ पुरुषों ने अपनी पत्नियों को विश...
23/05/2026

⭐ अँधेरे में क्यों हो ?
विशाखा की सहेलियों की कथा

स्थान : जेतवन, श्रावस्ती

श्रावस्ती के कुछ पुरुषों ने अपनी पत्नियों को विशाखा की तरह दयालु एवं धर्मपरायण बनाने हेतु, विशाखा को अभिभावक बना, उनके पास भेज दिया । एक दिन नगर में एक उत्सव का आयोजन हुआ और पुरुषों ने मद्यपान किया । बाद में बची शराब का उन स्त्रियों ने भी सेवन कर लिया और होश-हवास खो बैठीं । उ-नके पति को पता चला तो उनकी पिटाई की ।

दूसरे अवसर पर उन्होंने बुद्ध-प्रवचन सुनने की इच्छा प्रकट की और विशाखा को बुद्ध के पास ले चलने के लिए आग्रह किया । लेकिन जाते समय अपने वस्त्रों में शराब की छोटी बोलतें छुपाकर ले गईं । वहाँ उन्होंने चुपके से उनका सेवन किया । उधर विशाखा ने बुद्ध से धर्म-प्रवचन का आग्रह किया । स्त्रियाँ मदहोश हो असभ्य ढंग से नाचने-गाने लगीं । मार को अच्छा अवसर मिल गया । उसने आग में घी डालने का काम किया । वे शीघ्र ही शर्म, हया छोड़, मर्यादा की लक्षण रेखा लाँघने लगीं । बुद्ध ने महसूस किया कि मार को अप-ना कुकर्म करने का अवसर नहीं देना चाहिए । अतः सर्वत्र अँधेरा हो गया । अब स्त्रियाँ डरने लगीं और उनका चित्त शांत होने लगा । शास्ता ने हजारों सूरज के प्रकाश से धरती को प्रकाशित कर दिया और उन स्त्रियों को समझाते हुए कहा, "तुम्हें इस प्रमादित चित्त के साथ विहार में नहीं आना चाहिए था । तुम सतर्क नहीं थीं; अतः मार को अपना खेल दिखाने का अवसर मिल गया ।
तुमने अपने अन्दर विद्यमान रागाग्नि को प्रज्वलित कर दिया और नंग-धड़ंग होकर नाचने-गाने लगीं । लेकिन यह आनंद कैसा, यह खुशी कैसी ? जब सारा संसार राग की ज्वाला से धधक रहा है तो उसे बुझाने का यत्न करना चाहिए, न कि उसमें और हवा देने का । तुम्हें उस रागाग्नि को बुझाने का प्रयत्न करना चाहिए । अतः इस आग की ज्वाला से बाहर निकलो, क्योंकि जब सब कुछ ही जल रहा है तो फिर प्रमाद कैसा ? आनंद का कारण ही कहाँ है? चारों ओर जब अँधेरा है तो उस अँधेरे से निकलने के लिए दीपक ढूँढ़ने का प्रयास क्यों नहीं करते ? दीपक ढूँढ़ना ही एक मात्र कार्य होना चाहिए।"

टिप्पणी: कुत्ता हड्डी को काटता है, उस प्रक्रिया में अपनी जीभ काट लेता है; खून का नमकीन स्वाद अच्छा लगता है और उसे लगता है कि हड्डी से उसे आनंद मिल रहा है । दाद-दिनाय होने पर खुजलाना अच्छा लगता है पर वही खुजलाना उस जगह पर खून निकाल देता है । शराबी का मन शराब से नहीं भरता और न समुद्र-जल से प्यास बुझती है । उसी तरह संसार में अच्छी लगने वाली चीजें वस्तुतः आनंददायक नहीं होतीं । वे अंततः पीड़ा का ही कारण बनती हैं । रागाग्नि में हम क्या उसी तरह नहीं झुलस रहे, जैसे पतंगा अग्नि में गिरकर प्राण गंवा बैठता है ?

गाथा:
को नु हासो किमानन्दो, निच्चं पज्जलिते सति ।
अन्धकारेन ओनद्धा, पदीपं न गवेसथ ॥ १४६ ॥
अर्थ:
यह सम्पूर्ण संसार रागाग्नि से अनंत काल से जल रहा है । ऐसी स्थिति में तुम्हारा यह आनंद करना, हँसना किस बात के लिए है ? अविद्या के अंधकार में तुमलोग अपने आत्मज्ञान के लिए दीपक की खोज क्यों नहीं करते ?

विपश्यना पर महावीर के वचन....
23/05/2026

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21/05/2026
⭐ ज्ञानी पुरुष स्वावलंबी होते हैंसुख सामानेर की कथास्थान : जेतवन, श्रावस्तीकिसी समय श्रावस्ती में सारिपुत्र के एक उपासक ...
18/05/2026

⭐ ज्ञानी पुरुष स्वावलंबी होते हैं
सुख सामानेर की कथा

स्थान : जेतवन, श्रावस्ती

किसी समय श्रावस्ती में सारिपुत्र के एक उपासक के घर में पुत्र पैदा हुआ। उसके गर्भ में आने के समय से ही परिवार में सुख छा गया। अतः उसका नाम "सुखकुमार" रखा गया।

सात वर्ष की आयु होने पर सुखकुमार ने अपनी माता से प्रवज्या ग्रहण करने की इच्छा जाहिर की। उसी दिन उसे अलंकृत कर, विहार में ले जाकर उसे प्रवज्या दिलाई गई। प्रवज्या दिलाने से पूर्व सारिपुत्र ने प्रवज्या से होने वाली कठिनाइयों से परिचित करा दिया पर सुखकुमार दृढ़निश्चयी था। उसने गुरु के प्रत्येक आदेश के पालन का आश्वासन दिया। उसके माता-पिता भी सात दिनों तक विहार में रहने के बाद अपने घर चले गए।

आठवें दिन सुख सामानेर सारिपुत्र स्थविर के साथ भिक्षाटन हेतु निकला। रास्ते में उसने देखा कि किसान खेतों में क्यारियां बना रहे हैं और उन क्यारियों से जिधर भी जल ले जाना चाहते हैं, ले जा रहे हैं। बाण बनाने वाले भी बेंत को अपनी इच्छानुसार मोड़ रहे हैं और बाण बना रहे हैं। इसी प्रकार बढ़ई कठोर से कठोर लकड़ी को तराश कर रथ, चक्र आदि का निर्माण कर रहे हैं। इन सभी को देखकर सामानेर ने एक पंडित सामानेर की तरह प्रश्न किया, "क्या कोई भी व्यक्ति इन निर्जीव वस्तुओं को जैसा भी रूप देना चाहे, दे सकता है?" सारिपुत्र ने समझाया, "अवश्य! अपने प्रयत्न से मनुष्य सभी कुछ कर सकता है।"

सुख सामानेर की अन्तर्दृष्टि खुल गई। उसने सारिपुत्र भन्ते से आग्रह किया कि वे उसे विहार वापस जाने की अनुमति दें। सारिपुत्र ने उसे अनुमति दे दी। वह बौद्ध विहार आकर समाधि में बैठ गया। बुद्ध ने और शक्र आदि देवताओं ने देखा कि सुख सामानेर के अन्तर्ज्ञान खुलने का समय आ गया है। अतः उन्होंने विहार के बाहर खड़े रहकर सामानेर की रक्षा की कि कोई उसके ध्यान में बाधा नहीं पहुँचाए। इस प्रकार ध्यानस्थ हो सामानेर को अन्तर्दृष्टि मिल गई। वह अर्हत हो गया।

संध्या बेला में धर्मसभा में बैठे भिक्षुओं को शास्ता ने सामानेर के अर्हत प्राप्ति के विषय में बताया तो सभी भिक्षु बहुत आश्चर्यचकित हुए। शाक्य मुनि ने उन्हें समझाया कि आश्चर्यचकित होने की कोई बात नहीं है। पुण्यवान व्यक्ति जब श्रमणधर्म में लीन हो जाते हैं तब देवता और मनुष्य सभी उनकी सहायता करते हैं। "आज इन्द्र ने ही नहीं, मैंने भी स्वयं सामानेर की कुटिया के बाहर खड़े होकर उसकी रक्षा की ताकि उसको किसी प्रकार का व्यवधान न हो। सारिपुत्र को भी निर्देश दिया कि उससे भी सामानेर को किसी प्रकार की बाधा न पहुँचे।" शास्ता ने यह भी स्पष्ट किया, "आज सामानेर किसानों को क्यारी बनाते हुए, बाण बनाने वालों को बेंत से बाण बनाते हुए तथा बढ़इयों को लकड़ी से रथ आदि बनाते हुए देखकर चिंतन में डूब गया। उसने अनुभूति की कि यदि इन निर्जीव चीजों को अपनी इच्छा से रूप दिया जा सकता है तो निश्चय ही दृढ़निश्चयी पुरुष अपने आप को संयमित कर, अपना दमन कर आत्मज्ञान प्राप्त कर सकते हैं।" इन आलम्बनों के सहारे आज सुख सामानेर ने अर्हत्व प्राप्त कर लिया।

गाथा:
उदकं हि नयन्ति नेतिका, उसुकारा नमयन्ति तेजनं ।
दारुं नमयन्ति तच्छका, अत्तानं दमयन्ति सुब्बता ।।145।।
अर्थ:
जैसे नहरों को बनाने वाले इच्छानुसार जल ले जाते हैं,
बढ़ई कुशलतापूर्वक लकड़ी छीलकर रथ आदि का
निर्माण करते हैं तथा बाण बनाने वाले सावधानी से
बाण बनाते हैं, उसी प्रकार अनुशासित लोग अपने
आत्मदमन में लगे रहते हैं।

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