30/12/2025
🌼 २. अलगद्दूपमसुत्त 🌼
एक समय भगवान सावत्थी में अनाथपिण्डिक के आराम जेतवन में विहार करते थे। उस समय अरिट्ठ नाम के भिक्षु को ऐसी पापपूर्ण दृष्टि उत्पन्न हुई –
👉 “मैं भगवान द्वारा उपदिष्ट धर्म को ऐसे जानता हूं कि जिन्हें भगवान ने विघ्नकारक धर्म बतलाया है, वे सेवन किए जाने पर विघ्न नहीं कर सकते।”
⚠️ इस गलत धारणा के लिए भगवान ने उसकी भर्त्सना की और कहा –
“मैंने तो अनेक प्रकार से विघ्नकारक धर्मों को विघ्नकारक बतलाया है और सेवन किए जाने पर वे विघ्न ही करते हैं। मैंने कामभोगों को अस्थि-कंकाल, मांस-पेशी, तृण-उल्का, सुलगते अंगार, स्वप्न, वध-शाला, शक्ति-शूल, सर्प-शिर आदि की उपमा देते हुए इन्हें अत्यंत दुःखदायी, बहुत परेशानी पैदा करने वाला और दुष्परिणामी बखाना है।”
🐍 अलगद्द (सांप) की उपमा
तत्पश्चात भगवान ने कहा कि कोई-कोई मोघपुरुष धर्म को धारण करते हुए भी उसके अर्थ को प्रज्ञा से नहीं परखते, जिससे वे इसकी अनुभूति से वंचित रह जाते हैं।
🔹 जैसे अलगद्द (सांप) की तलाश में घूमता हुआ व्यक्ति एक बड़े सांप को पा ले, परंतु उसे गलत स्थान से पकड़े, जिससे सांप उसे डस ले और वह मृत्यु अथवा मृत्यु-समान दुःख को प्राप्त हो जाए – वैसे ही मोघपुरुष द्वारा दुर्गृहीत धर्म चिरकाल तक उसके अहित एवं दुःख का कारण बना रहता है।
🔹 इसके विपरीत कोई-कोई कुलपुत्र धर्म को धारण करते हुए उसके अर्थ को प्रज्ञा से परखते हैं, जिससे वे इसे अनुभूति पर उतार लेते हैं। जैसे अलगद्द की तलाश में घूमता हुआ व्यक्ति एक बड़े सांप को पा ले और उसे सही प्रकार से पकड़े, जिससे सांप भले उससे लिपट जाए परंतु वह उसकी कोई हानि न कर सके – वैसे ही कुलपुत्र द्वारा सुगृहीत धर्म चिरकाल तक उसके हित एवं सुख का कारण बना रहता है।
🛶 बेड़े (नाव) की उपमा
तदनंतर भगवान ने कहा –
“मैं एक बेड़े के समान (भवसागर से) पार जाने के लिए धर्म का उपदेश करता हूं, उसे पकड़ रखने के लिए नहीं।”
👁️ छः दृष्टि-स्थानों का विवेचन
इसके बाद भगवान ने छः दृष्टि-स्थानों पर प्रकाश डाला।
❌ अनार्य व्यक्ति रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार, विज्ञान और दृष्ट, श्रुत, मुत, विज्ञात, प्राप्त, पर्येषित और मन द्वारा अनुविचारित पदार्थों को –
👉 ‘यह मेरा है’, ‘यह मैं हूं’, ‘यह मेरी आत्मा है’ – ऐसा समझता है।
✅ परंतु आर्य-श्रावक इन्हें ऐसा नहीं समझता, जिससे वह अशनित्रास (भय) को प्राप्त नहीं होता है।
🌿 अशनित्रास (भय) का निरोध
तत्पश्चात भगवान ने यह भी समझाया कि बाहर किस प्रकार अशनित्रास होता है और कैसे अशनित्रास नहीं होता है। ऐसे ही भीतर किस प्रकार अशनित्रास होता है और कैसे अशनित्रास नहीं होता है।
🪷 पंचस्कंधों पर अनात्म-दृष्टि
भगवान ने आगे समझाया कि –
👉 (शरीर के) भीतर अथवा बाहर,
👉 स्थूल अथवा सूक्ष्म,
👉 निकृष्ट अथवा उत्कृष्ट,
👉 दूर अथवा निकट,
👉 जो कुछ भी भूत-भविष्य-वर्तमान का रूप है,
वह सब –
‘यह मेरा नहीं है’, ‘यह मैं नहीं हूं’, ‘यह मेरी आत्मा नहीं है’ –
ऐसे इसे यथार्थतः ठीक से जानकर देखना चाहिए।
ऐसा ही वेदना, संज्ञा, संस्कार तथा विज्ञान के बारे में भी करना चाहिए।
✨ विमुक्ति का क्रम
🔹 इससे आर्य-श्रावक निर्वेद को प्राप्त करता है।
🔹 निर्वेद से विराग को प्राप्त होता है।
🔹 विराग से विमुक्त होता है।
🔹 विमुक्त होने पर जान लेता है –
“मैं विमुक्त हो गया!”
फिर वह प्रज्ञापूर्वक जान लेता है –
“जन्म क्षीण हुआ, ब्रह्मचर्यवास पूरा हुआ, जो करनाथा सो कर लिया, इससे परे यहां आना नहीं है।”
इसी को कहते हैं –
🟢 उत्क्षिप्त-परिघ
🟢 संकीर्ण-परिख
🟢 वीततृष्ण
🟢 निरर्गल
🟢 आर्य
🟢 पन्न-ध्वज
🟢 पन्न-भार
🟢 वि-संयुक्त
(भगवान ने इनका आशय भी स्पष्ट किया)
📿 अंतिम उपदेश
अंत में भगवान ने भिक्षुओं से कहा –
“रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार, विज्ञान तुम्हारे नहीं हैं। इन्हें छोड़ दो। यह छोड़ना चिरकाल तक तुम्हारे हित-सुख के लिए होगा।”
भगवान ने बताया कि ऐसे सु-आख्यात धर्म में –
✔️ अर्हत,
✔️ अनागामी,
✔️ सकदागामी,
✔️ सोतापन्न,
✔️ श्रद्धानुसारी,
✔️ धर्मानुसारी – सभी संबोधिपरायण हैं।
और जिनकी मुझ में मात्र श्रद्धा अथवा प्रेम है, वे स्वर्गपरायण है उनका स्वर्ग लाभ करना निश्चित है
🌹 मेरे अर्जित पुण्य में भाग सभी का हो 🌹
🙏🏻 मेरी सुख-शांति का लाभ सभी को होय 🙏🏻
🌹 जल के, थल के, गगन के सब प्राणी सुखिया होय 🌹
🙏🏻 सबका मंगल, सबका मंगल होय 🙏🏻
📚 स्रोत :
मज्झिम निकाय – १
मूलपण्णास
ओपम्मवग्ग (उपमावग्ग / Opamma Vagga)
अलगद्दूपम सुत्त — MN