Quote Of The Day

Quote Of The Day ब्रह्मांड में ज्ञान ही सर्वश्रेष्ठ है।ज्ञान का वितरण करना अच्छी बात है।

14/01/2026

🌟 देखो : इस निरर्थक, सूखे काठ के शरीर को !
पुनिगातिस्स स्थविर की कथा

स्थान : जेतवन, श्रावस्ती

एक समय थेर तिस्स शास्ता से प्रवज्या लेकर ध्यान विपश्यना करने लगे। इस अभ्यास काल में उन्हें भयंकर बीमारी ने आ दबोचा। शरीर पर छोटे-छोटे दाने फफोले के रूप में निकल आये और उनमें पीव भरने लगा। बाद में पीव बाहर आने लगा। भीषण बदबू आने लगी। उनके कपड़े भी गंदे हो गए। उनका बदबूदार चीवर चीवर उनके शरीर से चिपक गया। शरीर से खून की दुर्गन्ध आने लगी। पूरा का पूरा शरीर दुर्गन्धमय हो गया। अतः भिक्षुगण उन्हें 'पुनिगातिस्स' नाम से पुकारने लगे।

शास्ता ने अपनी दिव्यदृष्टि से देखा कि थेर तिस्स बहुत कष्ट में थे। उन्होंने पाया कि उसके सारे साथी उसकी हालत देखकर उससे अलग हो गए हैं। उन्होंने यह भी देखा कि उसके अन्दर अर्हत प्राप्त करने की संभावनाएँ हैं। अतः पानी गर्म किया और गर्म पानी लेकर वहाँ पहुँचे जहाँ तिस्स सो रहा था। जब अन्य भिक्षुओं ने उन्हें वहाँ आते देखा तो वे भी दौड़कर आ गए। तथागत ने तिस्स को आग के पास ले जाने का निर्देश दिया। फिर उसे नहलाया गया और उसके शरीर को साफ कपड़े से पोंछा गया। उसके चीवर को भी साफ किया गया और उसे धूप में सुखाया गया। स्नान से तिस्स स्वच्छ हो गया और अच्छा अनुभव करने लगा। उसका शरीर निर्मल हुआ और उसके साथ-साथ उसका चित्त भी निर्मल हो गया। उसका मन साधना में दृढ़ हो गया।

शास्ता जब तिस्स को स्नान करा रहे थे, उसका शरीर काठ की भाँति जमीन पर पड़ा हुआ था। उन्होंने समझाया, “भिक्षुओ! देखो यह शरीर जमीन पर कैसे काठ की भाँति पड़ा रहता है और धरती का बोझ बढ़ाता रहता है। निरर्थक लकड़ी की भाँति फेंका गया यह शरीर जल्द ही धरती पर सदा के लिए सो जाएगा। नौ द्वारों से सुसज्जित यह शरीर एक दिन शून्य हीन हो जाएगा।”

फिर उन्होंने यह गाथा कही।

गाथा:
अचिरं वतयं कायो, पटीव अधिस्ससति।
छुड्डो अपेतविज्ञाणो, निरत्थं व कलिंगरं॥ 41 ॥
अर्थ:
अहो! यह तुच्छ शरीर शीघ्र ही चेतनाहीन हो
निरर्थक काठ के टुकड़े की तरह धरती पर पड़ा रहेगा।




12/01/2026

🌟चित्त को बाण की तरह सीधा करें
मेधिय स्थविर की कथा

स्थान : चालिका पर्वत

एक समय शास्ता चालिय पर्वत पर वास कर रहे थे । उनके साथ उनके भिक्षु भी वहाँ वास कर रहे थे । एक दिन वे दिनचर्या के अनुसार भिक्षाटन के लिए गए । उनके साथ मेधिय नाम का एक भिक्षु भी था । भिक्षाटन के दौरान उसने एक बहुत ही मनोरम उद्यान देखा । उसने सोचा कि यह उद्यान बहुत ही शांत है, मनमोहक है, क्यों न मैं इसमें बैठकर ध्यान लगाऊँ । उसके मन में यह तीव्र विचार बार-बार आने लगा । भिक्षाटन के बाद उसकी इच्छा और अधिक प्रबल होने लगी । वह तथागत के पास गया और सादर प्रणाम कर आग्रह किया,

“भन्ते ! वह उद्यान अत्यन्त ही सुन्दर और शांत है । वहाँ आसानी से ध्यान लग जाएगा । अतः वहाँ जाकर ध्यान-साधना करना चाहता हूँ । अगर आप अनुमति दें तो जाऊँ ।”
शाक्य-मुनि उस समय अकेले थे । उनके पास और कोई भिक्षु नहीं था । अतः उन्होंने मेधिय को थोड़ी देर रुक जाने के लिए कहा,

“कोई और दूसरा भिक्षु आ जाता है तब चले जाना ।”
पर मेधिय का मन नहीं माना । वह तो वहाँ जाने के लिए बेचैन हो रहा था । अपने आप को रोक नहीं पाया । उसने बुद्ध से पुनः प्रार्थना की कि उसे जाने दें । बुद्ध ने उसे फिर समझाया कि थोड़ी देर प्रतीक्षा कर लो । लेकिन उसका मन वहाँ जाने के लिए मचल रहा था । अतः उसने शास्ता से बार-बार निवेदन किया और अंततः उन्होंने उसे वहाँ जाने की अनुमति दे दी ।

मेधिय बहुत खुश हुआ, क्योंकि उसकी इच्छा पूरी हो गई । वह तुरंत विहार से निकला और जल्द ही उस आम्रवाटिका में पहुँच गया । एक वृक्ष के नीचे आसन लगाकर ध्यान-साधना में बैठ गया । पर उसका मन ध्यान-साधना में नहीं लगा, इधर-उधर भटकने लगा । वह उसे केन्द्रित करने में सफल नहीं हुआ । पूरा दिन इसी आन्तरिक द्वन्द्व में बीत गया पर मन शांत नहीं हुआ । शाम होने पर वह बौद्ध-विहार आया । विहार पहुँचकर वह शास्ता के सम्मुख प्रकट हुआ और उन्हें पूरे दिन की कहानी सुनायी । उसने बताया कि किस प्रकार उसने चित्त को एकाग्र करने की चेष्टा की पर वह पूर्णतः असफल रहा ।

तब शाक्य-मुनि ने उसे समझाया,
“मेधिय ! वहाँ जाकर तुमने बहुत ही गलत काम किया । मैं तुम्हें बता रहा हूँ कि मैं अभी अकेला हूँ । जब तक कोई भिक्षु नहीं आ जाता है तब तक तुम मुझे अकेला मत छोड़ो, पर तुमने मेरी बात नहीं मानी । भिक्षु को इतना कमजोर नहीं होना चाहिए कि वह सदैव अपने चित्त के ही वश में रहे । चित्त को अपने वश में रखना चाहिए ।”

ऐसा समझाकर शास्ता ने ये दो गाथाएँ कहीं ।

गाथा:

फन्दनं चपलं चित्तं, दूरक्कं दुन्निवारयं ।
उजुं करोति मेधावी, उसुकारो व तेजनं ॥ 33 ॥
अर्थ:

यह चित्त चंचल है, चपल है, कठिनाई से इसका संरक्षण और कठिनाई से इसका निवारण होता है । मेधावी पुरुष इसे उसी प्रकार सीधा करता है जैसे बाण बनाने वाला बाण को ।

गाथा:

वारिजो व थले खित्तो, ओकंओकं उब्भतो ।
परिफन्दतिदं चित्तं, मारधय्यं पहातवे ॥ 34 ॥
अर्थ:

जैसे तालाब से निकालकर जमीन पर फेंकी गई मछली तड़पड़ाती है उसी प्रकार यह चित्त भी मार के फंदे से निकलने के लिए तड़पड़ाता है ।

12/01/2026

⭐ प्रमाद से भय खायें : पतन नहीं होगा
किसी भिक्षु की कथा

स्थान : जेतवन, श्रावस्ती

एक भिक्षु ने त्रिरत्न में दीक्षा ली। वह इनके प्रति पूर्णतः समर्पित था। प्रत्यया के बाद वह अपना मन ध्यान में लगाने लगा पर उसका मन ध्यान में नहीं लगता था। वह अपनी दैनिकचर्या देखता तो लगता कि जैसे उसे कुछ उपलब्ध हुआ ही न हो। इसलिए वह उदास रहने लगा। पर वह लगन में दृढ़ था। अतः उसने सोचा कि शास्ता से मिलेगा और उनसे विचार-विमर्श करेगा कि मार्ग के अवरोधों को कैसे दूर किया जाए। इस दृढ़ निश्चय के साथ वह बुद्ध से मिलने के लिए निकल पड़ा।

रास्ते में उसने एक पर्वत पर आग की तीव्र ज्वाला देखी। वह बहुत ही तीव्रता से जल रही थी तथा तेजी से बढ़ रही थी। वह आग का दृश्य देखने के लिए पहाड़ी की चोटी पर चढ़ गया। आग चारों ओर बहुत तेजी से बढ़ रही थी। आग जिस तरफ भी जा रही थी सबकुछ जलाकर राख कर दे रही थी। उसके अन्तर्चक्षु खुल गए। उसने सोचा कि जिस प्रकार आग सबकुछ जलाकर राख कर देती है उसी प्रकार अन्तर्दृष्टि से प्राप्त आग भी मानव के अन्दर विद्यमान सभी आसवों को, बुराइयों को जलाकर खत्म कर देती है, भले ही वे बड़े और विशाल ही क्यों न हों।

तथागत ने अपने अन्तर्चक्षु से भिक्षु को देखा। उन्होंने अपने आप को भिक्षु के सम्मुख प्रस्तुत किया और उसे प्रोत्साहित किया,
"वत्स! तुम्हारा मार्ग बिल्कुल सही है। तुम इस मार्ग पर दृढ़निश्चयी हो कर चलते रहो। हर व्यक्ति अपने प्रयत्न से आसवों को जला देता है।"

फिर उन्होंने यह गाथा कही।

गाथा :

अप्पमादरतो भिक्खु, प्रमादे भयदस्सि वा
संयोजनों अणुं थूलं, डहं अग्गी व गच्छति ॥ 31 ॥

अर्थ :

जो साधक अप्रमाद में रत रहता है या प्रमाद में भय देखता है, वह अपने छोटे-बड़े सभी कर्म-संस्कारों के बंधनों को आग की तरह जलाते हुए चलता है।

06/01/2026

🌟 काली यक्षिणी की कथा

वैर रूपी बीमारी का उपचार: प्रेम, दया, करुणा

स्थान : जेतवन, श्रावस्ती

एक गृहस्थ की पत्नी बाँझ थी। उसने किसी संतान का जन्म नहीं दिया। इसलिए उसके पति के परिवार वाले उससे बहुत नाराज रहते थे तथा उसे तरह-तरह से प्रताड़ित किया करते थे। इस समस्या से मुक्ति के लिए उस स्त्री ने अपने पति का ब्याह एक दूसरी औरत से करा दिया। पर हृदय से उसे सौतन का आगमन अच्छा नहीं लगा। अतः दो अवसरों पर जब वह नई औरत गर्भवती हुई तब उस औरत ने उसे एक ऐसी दवा दे दी कि गर्भपात हो गया। तीसरे अवसर पर उसने एक ऐसी दवा दे दी कि उस स्त्री का भी उसके गर्भ के साथ ही देहान्त हो गया। मरते समय उस औरत के मन में बाँझ औरत के प्रति घृणा और प्रतिशोध का भाव भरा हुआ था।

अगले जन्मों में उन दोनों में दुश्मनी का सिलसिला जारी रहा। किसी जन्म में पहली औरत दूसरी से बदला लेती तो उसके प्रत्युत्तर में अगले जन्म में दूसरी औरत पहली से बदला लेती। इसी प्रकार भिन्न योनियों में जन्म लेने पर भी उनमें द्वेष का सिलसिला जारी रहा।

समय बीतता गया। जन्म-जन्मान्तर बीत गए। बुद्ध काल आया। बुद्ध काल में उनमें से एकक ने श्रावस्ती के एक प्रतिष्ठित परिवार में जन्म लिया तथा दूसरी काली यक्षिणी के रूप में पैदा हुई। वैर का सिलसिला जारी रहा। पहली को एक संतान हुई। दूसरी उसे मारने के पीछे पड़ गई। पहली घबड़ा गई और उसने शास्ता की शरण में जाने का निर्णय लिया। उसे पता चला कि बुद्ध जेतवन में प्रवचन दे रहे हैं। अतः वह दौड़ती हुई सीधी वहाँ पहुँची और अपनी संतान को बुद्ध के चरणों में रखकर उनसे अपनी संतान की रक्षा के लिए प्रार्थना करने लगी। उधर यक्षिणी को बौद्ध विहार में प्रवेश की हिम्मत नहीं हो रही थी। बाद में बुद्ध ने काली यक्षिणी को भी बुलाया तथा दोनों को डाँटा। बुद्ध ने सभी को बताया कि किस प्रकार हर जन्म में वे एक-दूसरे से बदला लेती रही हैं और किस प्रकार वे दोनों एक-दूसरे के प्रति घृणा भाव से भरी हुई हैं। बुद्ध ने समझाया कि किस प्रकार घृणा का अंत घृणा से नहीं होता। बल्कि घृणा से और अधिक घृणा का सृजन होता है। घृणा का अंत होता है प्रेम, दया, करुणा एवं मैत्री से। दोनों ने अपनी गलती स्वीकार की और बुद्ध के उपदेश के बाद उनके बीच का कलह समाप्त हो गया।

तब बुद्ध ने महिला को आदेश दिया कि वह अपने पुत्र को यक्षिणी की गोद में दे दे। औरत पहले तो हिचकिचाई पर बाद में बुद्ध में अटूट श्रद्धा और विश्वास के कारण उसने अपने पुत्र को उसे दे दिया।

यक्षिणी ने बड़े प्यार से उस बालक को गोद में लिया और उसे चूमा मानो वह उसका ही पुत्र हो। फिर उसे उसकी माँ को वापस कर दिया। दोनों के बीच की घृणा समाप्त हो गई।

🌟 गाथा
परे च न विजानन्ति, यमम्हे यमामसे।
ये च तत्थ विजानन्ति, ततो सम्मन्ति मेधगा ॥ ६ ॥
अर्थ:
मूर्ख लोग नहीं समझते कि उन्हें एक न एक दिन संसार से जाना ही होगा। जो इस बात को समझते हैं उनके कलह शांत हो जाते हैं।

02/01/2026

🌷पटाचारा🌷

एक दुर्घटनावश अपने पूरे परिवार को खो चुकी अपनी सुध-बुध खोई विक्षिप्त निर्वस्त्र विपन्नावस्था में अपने पूर्व पुण्य के कारण वह एक दिन जेतवन विहार के पास से गुजरी। वहां भगवान एक बड़ी सभा को धर्म समझा रहे थे। लोगों ने उसे आते देखा तो दूर भगाना चाहा। कहीं यह पगली औरत धर्मसभा की शांति में विघ्न न पैदा कर दे।

परंतु भगवान की नजर उस दुखियारी पर पड़ी तो लोगों को रोका। दुखियारी भगवान के समीप आयी।
भगवान ने करुणाभरे शब्दों में कहा, “मेरी दुखियारी बेटी! होश संभाल!" वाणी में अमृत भरा था। सुनते ही उस दुखियारी को जरा-सा होश आया। उसका ध्यान अपने सर्वथा नग्न शरीर पर गया तो लाज के मारे सिकुड़ गयी। वहीं उकडूं बैठ गयी। समीप खड़े किसी भाई ने उस पर अपनी चादर डाली। उसने तुरंत चादर ओढ़ ली। वह उपसम्पदा प्राप्त करके पूर्व में पतित आचार वाली होने के कारण ‘पटाचारा' (पतिताचारा) नाम से प्रख्यात हुई।

पटाचारा भगवान के और समीप आयी और अपने दोनों पांव, दोनों हाथ और सिर धरती को छुआ कर पंचांग प्रणाम करती हुई बोली, “भंते भगवान! मुझे शरण दीजिये, मैं बहुत दुखियारी हूं।"
"बेटी! तू सही शरण-स्थल पर आ गयी है। तुझे यहां अवश्य शरण मिलेगी।" भगवान ने आश्वासन-भरे शब्दों में कहा।
“भंते भगवान! मेरे पति को काले नाग ने डस लिया । एक पुत्र को गिद्ध दबोचकर ले गया। दूसरे को नदी बहा ले गयी। माता पिता, भाई दब कर मर गये। उन्हें एक साथ चिता पर जलाया गया। अब संसार में मेरा कोई नहीं। मुझे कौन शरण देगा?" अपने दुःख को याद कर पटाचारा फिर फूट-फूटकर रोने लगी।

“बेटी, होश में आ। माता-पिता, भाई-बंधु, पति-पुत्र शरण नहीं दे सकते । सही शरण तो अपना धारण किया हुआ धर्म ही देगा। तू कौन-से प्रिय स्वजनों की मृत्यु पर दुःख के आंसू बहा रही है? इस अनादि भव
संसार में तूने अनगिनत बार जन्म लिया है। सभी जन्मों में तेरे प्रिय स्वजन मरे हैं। उनके मरने पर तूने जितने आंसू बहाये हैं, यदि एक जगह एकत्र कर दिये जायं तो इन चारों महासमुद्रों का जल भी उनके मुकाबले कम होगा। और कितने जन्मों तक इसी प्रकार प्रिय-वियोग में रोती रहेगी?

पुत्र रक्षा नहीं कर सकते, न पिता और न ही बंधुजन । जब मृत्यु पकड़ लेती है तब जाति वाले रक्षा नहीं कर सकते । प्रमाद छोड़! होश में आ! समझदार को चाहिये कि इस असीम दुःखमय भवसागर की सच्चाई को समझ कर शीघ्र-से-शीघ्र मुक्ति का मार्ग खोजे और सदा के लिये दुःखविमुक्त हो जाय।"

भगवान की वाणी से अमृत बरसा। भगवान की वाणी सुनते-सुनते उस दुखियारी का चित्त एकाग्र हुआ। थोड़ी देर के लिये स्वमुखी हुई, अंतर्मुखी हुई। शरीर के अणु-अणु में उदय-व्यय की प्रत्यक्ष अनुभूति हुई। अनेक जन्मों की असीम पुण्य पारमी के कारण इस अनित्य बोध की धर्मगंगा में सारे पाप ताप धुलने लगे। वहीं बैठे बैठे पटाचारा ने निर्वाण अवस्था का साक्षात्कार किया। स्रोतापन्न हुई।

कृतज्ञता-विभोर हो भगवान को नमस्कार किया और उनसे प्रव्रज्या की याचना की। भगवान ने उसे भिक्षुणियों के पास भेज कर प्रव्रजित करवाया।
पटाचारा मुक्ति के मार्ग पर दृढ़तापूर्वक आरूढ़ हुई।
जो भव-संस्कार बचे थे, उनका सामना करना था। उन्हें भी अंतर्तप करते हुये विपश्यना की अग्नि में जलाना था। काम करने में कठिनाइयां आ रही थीं।

कभी-कभी अकाल मृत्यु को प्राप्त हुये स्वजनों, प्रियजनों की फिर याद आ जाती थी। एक दिन सायंकाल दृढ़ चित्त से साधना की तैयारी में लगी। बाल्टी से लोटा-भर जल लेकर अपने पांव धोये । सूखी जमीन पर बहता हुया जल कुछ ही दूर जा कर सूख गया। आगे न बढ़ पाया। एक लोटा जल पांव पर और डाला। इस बार जलधारा पहले की अपेक्षा कुछ और दूर जा कर सूख गयी। तीसरी बार पांव पर जल डाला तो जलधारा कुछ और भी दूर जाकर सूख गयी।

इस छोटी-सी घटना ने भीतर के ज्ञानतंतुओं को झकझोर दिया। मोहजन्य अज्ञान का पर्दा दूर हुआ। जैसी जलधारा वैसी ही जीवनधारा । इस संसार में किसी-किसी की जीवनधारा कम उम्र में ही सूख जाती है। किसी-किसी की अधेड़ उम्र में और किसी किसी की बढ़ी उम्र में। पर मरते तो सभी हैं। कोई नहीं बचता। इस मरणानुस्मृति के आधार पर साधना
करने बैठी। उसी समय भगवान के अमृतभरे बोल कानों में गूंज उठे :
“यो च वस्ससतं जीवे, अपस्सं उदयब्बयं ।
एकाहं जीवितं सेय्यो, पस्सतो उदयब्बयं ॥"
धम्मपदपालि (११३)

[(पंचस्कंध के) उदय-व्यय को न देखने वाले (व्यक्ति) के सौ वर्ष के जीवन से उदय-व्यय को देखने वाले (व्यक्ति) का एक दिन का जीवन श्रेयस्कर होता है।]

धर्मवाणी सुन कर साधिका पटाचारा का रोम-रोम रोमांचित हो उठा। मैंने जीवन के पच्चीस वर्ष अपने भीतर उदय-व्यय का दर्शन किये बिना ही गँवा दिये। अब भगवान की असीम अनुकंपा से इस सत्य का साक्षात्कार हुआ है। इसी सत्य के प्रति साक्षीभाव रखने से मुझे निर्वाण के प्रथम दर्शन हुये थे। इसी उदय-व्यय का निरंतर दर्शन करते-करते आगे की अवस्थाएं प्राप्त होंगी। किसान खेत में परिश्रम करता है। जोतता है, बोता है तो फल प्राप्त करता है। मैं शुद्ध शील में प्रतिष्ठित बुद्ध-पुत्री! उनके बताये मार्ग पर अप्रमत्त हो पुरुषार्थ करूं तो परम मुक्त अवस्था प्राप्त कर ही लूंगी ।

यो निश्चय करके अपनी कुटिया में विपश्यना करने बैठी। समीप जलते हुये दीपक की लौ मंद पड़ने लगी तो सुई से ठीक करने की कोशिश की, परंतु इससे लौ बुझ गयी। फिर अंतर्बोध जागा। जिस प्रकार इस दीपक की लौ बुझी, उसी प्रकार मेरे राग, द्वेष और मोह के संस्कारों की लौ बुझेगी और मनुष्य-जीवन सार्थक होगा। पटाचारा अधिक दृढ़ चित्त से विपश्यना में लग गयी। शरीर और चित्त के प्रपंच को उसके अनित्य स्वभाव में तटस्थ भाव से देखते-देखते अंतर्मन पर पड़ी हुयी भव-संस्कारों की परतें उतरने लगीं और रात बीतने के पहले ही वह स्रोतापन्न से सकदागामी, सकदागामी से अनागामी और अनागामी से अहंत अवस्था तक जा पहुंची। भवचक्र टूटा। नितांत विमुक्ति मिली। मनुष्य-जीवन सफल हुआ; सार्थक हुआ।

🌷पंचसता पटाचारा🌷
पटाचारा की पांच सौ भिक्षुणी-शिष्याएं एसी थी जिन्होंने विवाह उपरांत गृहस्थ जीवन व्यतीत किया। किंतु संतान वियोगवश शोकाभिभूत होकर उन्होंने पटाचारा का शिष्यत्व स्वीकार कर लिया। पटाचारा की शिष्याएं होने के कारण इन्हें वर्गगत रूप से 'पंचसता पटाचारा' अर्थात ‘पांच सौ पटाचाराएं' भी कह कर पुकारा गया। पटाचारा ने उनको जो उपदेश दिया और उसका उन पर जो असर पड़ा, उसी का दिग्दर्शन इन गाथाओं में है :-

["जब तुम प्राणी के आने-जाने का मार्ग ही नहीं जानतीं, किस पथ से आया था, किस पथ से चला गया! इतना तक जिसके विषय में तू नहीं जानती; तब उसके लिये तू 'मेरा पुत्र! मेरा पुत्र!' कह-कह कर क्यों रोती है?"]

["वह किस पथ से आया, किस पथ से चला गया! इतना यदि तुझे ज्ञात भी हो; तो भी तू रुदन क्यों करे? यह तो प्राणियों का स्वभाव ही है!]

["बिना पूछे वह आया था, बिना आज्ञा लिये चला गया! कतिपय दिनों के लिये वह कहीं से आया था, कतिपय दिन ठहर कर वह फिर कहीं चल दिया! एक पथ से आगमन दूसरे पथ से गमन, यहां एक मार्ग से आया यहां से दूसरे मार्ग से चला गया!]

[“वह तो मनुष्य रूप में प्रेत सदृश है, जो संसरण करता हुआ जायगा। जैसे वह आया था, वैसे ही वह चला गया, उसके विषय में क्यों रोना!]

पटाचारा के इन उपदेशों पर चिंतन-मनन करती हुई विपश्यना की वृद्धि के साथ अर्हत्व का साक्षात कर उपर्युक्त पांच सौ भिक्षुणियों में से प्रत्येक भिक्षुणी कहती है :-

[“पुत्र शोक-रूपी जो दुर्दश शल्य मेरे हृदय में गहरा बिंधा हुआ था, जिस पुत्र शोक ने मुझे अभिभूत कर रखा था, वह आज निकल गया!"]

["मैं परिनिर्वृत्त हुई, शोकशल्य से मुक्त हुई, आज मैं मुनि बुद्ध, उनके धर्म और संघ की शरण लेती हूं।”]
थेरीगाथापालि (१२७-१३२)

🌹धन्य विपश्यना🌹

पटाचारा भगवान की प्रमुख शिष्याओं में से एक हुई। जिन थोड़े से भिक्षु-भिक्षुणियों, गृहस्थ पुरुष-नारियों को भगवान ने अग्र की उपाधि दी, उनमें से पटाचारा भी एक थी। भिक्षुणियों के विनय नियमों को अच्छी तरह जानने और उनका पालन करने वाली भिक्षुणियों में पटाचारा अग्रगण्य मानी गयी। उसने अपना संपूर्ण शेष जीवन अपनी जैसी दुखियारी नारियों को धर्म के मार्ग पर आरूढ़ कर दुःख-मुक्त कराने में ही बिताया। अपने कल्याण के साथ-साथ अनेकों के कल्याण का कारण बनी। पटाचारा विपश्यना को और विपश्यना पटाचारा जैसी भिक्षुणी को पाकर धन्य हुई। एक बार श्रावस्ती के जेतवन आराम में भगवान भिक्षुओं के बीच बैठे थे। उन्होंने भिक्षुओं को संबोधित किया “भिक्षुओ! मेरी भिक्षुणी श्राविकाओं में ये अग्र हैं - विनय-धारियों में अग्र है पटाचारा।"

पुस्तक : पटाचारा
विपश्यना विशोधन विन्यास।।
🙏🙏🙏

30/12/2025

🌼 २. अलगद्दूपमसुत्त 🌼
एक समय भगवान सावत्थी में अनाथपिण्डिक के आराम जेतवन में विहार करते थे। उस समय अरिट्ठ नाम के भिक्षु को ऐसी पापपूर्ण दृष्टि उत्पन्न हुई –

👉 “मैं भगवान द्वारा उपदिष्ट धर्म को ऐसे जानता हूं कि जिन्हें भगवान ने विघ्नकारक धर्म बतलाया है, वे सेवन किए जाने पर विघ्न नहीं कर सकते।”

⚠️ इस गलत धारणा के लिए भगवान ने उसकी भर्त्सना की और कहा –

“मैंने तो अनेक प्रकार से विघ्नकारक धर्मों को विघ्नकारक बतलाया है और सेवन किए जाने पर वे विघ्न ही करते हैं। मैंने कामभोगों को अस्थि-कंकाल, मांस-पेशी, तृण-उल्का, सुलगते अंगार, स्वप्न, वध-शाला, शक्ति-शूल, सर्प-शिर आदि की उपमा देते हुए इन्हें अत्यंत दुःखदायी, बहुत परेशानी पैदा करने वाला और दुष्परिणामी बखाना है।”

🐍 अलगद्द (सांप) की उपमा

तत्पश्चात भगवान ने कहा कि कोई-कोई मोघपुरुष धर्म को धारण करते हुए भी उसके अर्थ को प्रज्ञा से नहीं परखते, जिससे वे इसकी अनुभूति से वंचित रह जाते हैं।

🔹 जैसे अलगद्द (सांप) की तलाश में घूमता हुआ व्यक्ति एक बड़े सांप को पा ले, परंतु उसे गलत स्थान से पकड़े, जिससे सांप उसे डस ले और वह मृत्यु अथवा मृत्यु-समान दुःख को प्राप्त हो जाए – वैसे ही मोघपुरुष द्वारा दुर्गृहीत धर्म चिरकाल तक उसके अहित एवं दुःख का कारण बना रहता है।

🔹 इसके विपरीत कोई-कोई कुलपुत्र धर्म को धारण करते हुए उसके अर्थ को प्रज्ञा से परखते हैं, जिससे वे इसे अनुभूति पर उतार लेते हैं। जैसे अलगद्द की तलाश में घूमता हुआ व्यक्ति एक बड़े सांप को पा ले और उसे सही प्रकार से पकड़े, जिससे सांप भले उससे लिपट जाए परंतु वह उसकी कोई हानि न कर सके – वैसे ही कुलपुत्र द्वारा सुगृहीत धर्म चिरकाल तक उसके हित एवं सुख का कारण बना रहता है।

🛶 बेड़े (नाव) की उपमा

तदनंतर भगवान ने कहा –

“मैं एक बेड़े के समान (भवसागर से) पार जाने के लिए धर्म का उपदेश करता हूं, उसे पकड़ रखने के लिए नहीं।”

👁️ छः दृष्टि-स्थानों का विवेचन

इसके बाद भगवान ने छः दृष्टि-स्थानों पर प्रकाश डाला।

❌ अनार्य व्यक्ति रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार, विज्ञान और दृष्ट, श्रुत, मुत, विज्ञात, प्राप्त, पर्येषित और मन द्वारा अनुविचारित पदार्थों को –
👉 ‘यह मेरा है’, ‘यह मैं हूं’, ‘यह मेरी आत्मा है’ – ऐसा समझता है।

✅ परंतु आर्य-श्रावक इन्हें ऐसा नहीं समझता, जिससे वह अशनित्रास (भय) को प्राप्त नहीं होता है।

🌿 अशनित्रास (भय) का निरोध

तत्पश्चात भगवान ने यह भी समझाया कि बाहर किस प्रकार अशनित्रास होता है और कैसे अशनित्रास नहीं होता है। ऐसे ही भीतर किस प्रकार अशनित्रास होता है और कैसे अशनित्रास नहीं होता है।

🪷 पंचस्कंधों पर अनात्म-दृष्टि

भगवान ने आगे समझाया कि –

👉 (शरीर के) भीतर अथवा बाहर,
👉 स्थूल अथवा सूक्ष्म,
👉 निकृष्ट अथवा उत्कृष्ट,
👉 दूर अथवा निकट,
👉 जो कुछ भी भूत-भविष्य-वर्तमान का रूप है,

वह सब –

‘यह मेरा नहीं है’, ‘यह मैं नहीं हूं’, ‘यह मेरी आत्मा नहीं है’ –
ऐसे इसे यथार्थतः ठीक से जानकर देखना चाहिए।

ऐसा ही वेदना, संज्ञा, संस्कार तथा विज्ञान के बारे में भी करना चाहिए।

✨ विमुक्ति का क्रम

🔹 इससे आर्य-श्रावक निर्वेद को प्राप्त करता है।
🔹 निर्वेद से विराग को प्राप्त होता है।
🔹 विराग से विमुक्त होता है।
🔹 विमुक्त होने पर जान लेता है –

“मैं विमुक्त हो गया!”

फिर वह प्रज्ञापूर्वक जान लेता है –

“जन्म क्षीण हुआ, ब्रह्मचर्यवास पूरा हुआ, जो करनाथा सो कर लिया, इससे परे यहां आना नहीं है।”

इसी को कहते हैं –
🟢 उत्क्षिप्त-परिघ
🟢 संकीर्ण-परिख
🟢 वीततृष्ण
🟢 निरर्गल
🟢 आर्य
🟢 पन्न-ध्वज
🟢 पन्न-भार
🟢 वि-संयुक्त
(भगवान ने इनका आशय भी स्पष्ट किया)

📿 अंतिम उपदेश

अंत में भगवान ने भिक्षुओं से कहा –

“रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार, विज्ञान तुम्हारे नहीं हैं। इन्हें छोड़ दो। यह छोड़ना चिरकाल तक तुम्हारे हित-सुख के लिए होगा।”

भगवान ने बताया कि ऐसे सु-आख्यात धर्म में –
✔️ अर्हत,
✔️ अनागामी,
✔️ सकदागामी,
✔️ सोतापन्न,
✔️ श्रद्धानुसारी,
✔️ धर्मानुसारी – सभी संबोधिपरायण हैं।

और जिनकी मुझ में मात्र श्रद्धा अथवा प्रेम है, वे स्वर्गपरायण है उनका स्वर्ग लाभ करना निश्चित है

🌹 मेरे अर्जित पुण्य में भाग सभी का हो 🌹

🙏🏻 मेरी सुख-शांति का लाभ सभी को होय 🙏🏻

🌹 जल के, थल के, गगन के सब प्राणी सुखिया होय 🌹

🙏🏻 सबका मंगल, सबका मंगल होय 🙏🏻
📚 स्रोत :
मज्झिम निकाय – १
मूलपण्णास
ओपम्मवग्ग (उपमावग्ग / Opamma Vagga)
अलगद्दूपम सुत्त — MN

09/12/2025

Address

Puri

Telephone

+919938311279

Website

http://www.vridhamma.org/

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