Dr.sheikh asad Qureshi

Dr.sheikh asad Qureshi Doctor
general physicians & consultant
CCH (Mumbai)
healthy life style coach �
Residency doctor

क्या कोलेस्ट्रॉल स्वास्थ्य का दुश्मन हें?भले ही आप भोजन से कोलेस्ट्रॉल लें या न लें, आपका शरीर (मुख्यतः liver) रोज़ लगभग...
14/04/2026

क्या कोलेस्ट्रॉल स्वास्थ्य का दुश्मन हें?
भले ही आप भोजन से कोलेस्ट्रॉल लें या न लें, आपका शरीर (मुख्यतः liver) रोज़ लगभग 70–80% कोलेस्ट्रॉल खुद बनाता है क्योंकि यह इतना जरूरी है कि शरीर इसे बाहरी आहार पर निर्भर नहीं छोड़ सकता।

शरीर को कोलेस्ट्रॉल की ज़रूरत निम्न कामों के लिए पड़ती है-
1.🧱 कोशिकाओं (Cells) की दीवार बनाने के लिए। कोलेस्ट्रॉल हर cell membrane का जरूरी हिस्सा है। यह झिल्ली को
मज़बूती देता है और लचीलापन (fluidity) बनाए रखता है। बिना कोलेस्ट्रॉल के कोशिकाएं ठीक से काम ही नहीं कर पाएंगी।
2. 🧪 हार्मोन बनाने के लिए। कोलेस्ट्रॉल से कई महत्वपूर्ण हार्मोन बनते हैं, जैसे टेस्टोस्टेरोन, एस्ट्रोजन, कोर्टिसोल इत्यादि। यानी reproduction, stress response और metabolism—सब इससे जुड़े हैं।
3. 🌞 विटामिन D बनाने के लिए। त्वचा में जब धूप पड़ती है, तो कोलेस्ट्रॉल से ही Vitamin D बनता है। यह हड्डियों, इम्युनिटी और कई रोगों से बचाव के लिए जरूरी है।
4. 🍳 पित्त (Bile acids) बनाने के लिए। लिवर कोलेस्ट्रॉल से bile बनाता है, जो फैट (वसा) को पचाने में मदद करता है। बिना इसके आप तेल-घी पचा ही नहीं पाएंगे।
5. 🧠 मस्तिष्क और नसों के लिए। मस्तिष्क में काफी मात्रा में कोलेस्ट्रॉल होता है। यह nerve insulation (myelin sheath) में मदद करता है। यानी memory, सोचने की क्षमता और nerve function में भी इसका महत्वपूर्ण योगदान है।

यानी कोलेस्ट्रॉल शरीर का निर्माण और मरम्मत का काम करने के साथ साथ हार्मोन बनाने वाला महत्वपूर्ण घटक है। यह मानव जीवन के लिए अत्यावश्यक है। कोलेस्ट्रॉल खुद पानी में नहीं घुलता, इसलिए यह लाइपोप्रोटीन (lipoproteins) के जरिए शरीर में घूमता रहता है:
LDL (Low-Density Lipoprotein)- ज्यादा होने पर arteries में जमा हो सकता है।
HDL (High-Density Lipoprotein)- यह अतिरिक्त कोलेस्ट्रॉल को वापस liver में ले जाता है (clean-up system)

कोलेस्ट्रॉल “बुरा” नहीं है—समस्या होती है जब LDL (खराब कोलेस्ट्रॉल) बढ़ जाता है, HDL (अच्छा कोलेस्ट्रॉल) कम होता है और arteries में जमा होने लगता है। इससे heart disease का खतरा बढ़ता है।

कोलेस्ट्रॉल बनना कोई समस्या नहीं है; असली गड़बड़ी तब होती है जब:
(1) clearance (हटने) धीमा पड़ जाए।
(2) लिपोप्रोटीन की “quality” (particle size/oxidation /function) खराब हो जाए।

ऐसी स्थिति में अच्छा कोलेस्ट्रॉल कम हो जाता है और बुरा/ बेकार कोलेस्ट्रॉल बढ़ जाता है जो शरीर में कई तरह के रोगों को जन्म देता है।‌

📉 कोलेस्ट्रॉल “अच्छा या बुरा” नहीं होता। समस्या तब होती है जब कोलेस्ट्रॉल की मात्रा ज्यादा हो जाए या उसका स्वरूप खराब (जैसे small dense LDL, oxidized LDL) हो जाए। कोलेस्ट्रॉल शरीर के लिए जरूरी है, लेकिन उसका imbalance ही बीमारी का कारण बनता है।

इस बारे में किसी तरह की शंका या प्रश्न या फिर कोई नई जानकारी हो तो बिना संकोच कमेंट करें। परामर्श/इलाज के इच्छुक व्यक्तिगत व्हाट्सएप पर संपर्क (फोन न करें) करें। फेसबुक पर इलाज असंभव है।

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09/04/2026

मरीज (घबराकर क्लिनिक में आते हुए):

“डॉक्टर साहब, 2–3 दिन से अचानक मेरे हाथ-पैर सूज गए हैं… सुबह उठता हूँ तो और ज्यादा सूजन रहती है… चप्पल भी टाइट हो गई है… समझ नहीं आ रहा क्या हो रहा है!”

डॉक्टर (धैर्य से):

“ठीक है, पहले घबराइए मत… लेकिन ये एक important संकेत है, इसे हल्के में बिल्कुल मत लीजिए।”

डॉक्टर (समझाते हुए):

“देखिए, जब शरीर में पानी (Fluid) सही तरीके से बाहर नहीं निकल पाता, तो वो जमा होने लगता है… और इसी वजह से हाथ-पैर में सूजन आ जाती है।”

मरीज:

“लेकिन डॉक्टर साहब, ये अचानक क्यों हुआ?”

डॉक्टर:
“इसके कई कारण हो सकते हैं—”

१-किडनी की समस्या – जब किडनी सही से काम नहीं करती
२-दिल (Heart) की कमजोरी – शरीर में पानी रुकने लगता है
३-लिवर की बीमारी – खासकर fatty liver या chronic disease
४-ज्यादा नमक खाना – शरीर में water retention बढ़ जाता है
५- थायरॉइड imbalance
६- कोई दवा का साइड इफेक्ट
७-लंबे समय तक खड़े या बैठे रहना

डॉक्टर (गंभीर होकर):

“अगर सूजन के साथ ये लक्षण भी दिखें, तो तुरंत जांच कराएं—”

१-सांस फूलना
२-पेशाब कम आना
३-चेहरे/आंखों के आसपास सूजन
४-अचानक वजन बढ़ना
५-छाती में भारीपन

ये signs बताते हैं कि अंदर कोई बड़ी समस्या हो सकती है!”



मरीज:
“डॉक्टर साहब, अब मुझे क्या करना चाहिए? कोई दवा ले लूँ?”

डॉक्टर (साफ शब्दों में):

“खुद से दवा लेना सबसे बड़ी गलती होगी!”



डॉक्टर की सलाह:

-नमक (Salt) कम कर दीजिए
-दिनभर में एक ही पोजीशन में ज्यादा देर न रहें
-सोते समय पैरों को थोड़ा ऊँचा रखें
-Tight कपड़े/जूते avoid करें
-पानी सही मात्रा में लें (ना बहुत कम, ना बहुत ज्यादा)

मरीज (थोड़ा रिलैक्स होकर):

“अब समझ आया डॉक्टर साहब… मैं इसे सामान्य समझकर नजरअंदाज कर रहा था!”

डॉक्टर (अंत में समझाते हुए):

“याद रखिए—
शरीर अचानक सूजन नहीं करता, वो पहले से warning देता है
समय पर ध्यान देंगे तो बड़ी बीमारी से बच सकते हैं”

“आज सूजन है… कल ये किडनी या हार्ट की बड़ी समस्या बन सकती है!”

Comment में बताइए
क्या आपको या आपके किसी जानने वाले को ऐसी सूजन की समस्या हुई है?

06/04/2026
मैं इस विषय पर लिखना नहीं चाहता था, लेकिन आज हालात ने मजबूर कर दिया है।आज के दौर में महिलाओं के शरीर को लेकर एक नया, लेक...
14/01/2026

मैं इस विषय पर लिखना नहीं चाहता था, लेकिन आज हालात ने मजबूर कर दिया है।

आज के दौर में महिलाओं के शरीर को लेकर एक नया, लेकिन जानबूझकर रचा गया भय समाज में फैलाया जा रहा है। उन्हें यह यकीन दिलाया जा रहा है कि नॉर्मल डिलीवरी हो या सिज़ेरियन, या सिर्फ़ एक सामान्य यौन जीवन उसकी वजह से आपकी योनि (Va**na) “ढीली” हो चुकी है, कि अब आप अपने पति या साथी को आकर्षित नहीं कर पाएँगी। कि आपका आत्मविश्वास खत्म हो चुका है।

सोशल मीडिया पर सैकड़ों रीलें, विज्ञापन और चमचमाते क्लीनिक इसी डर को रोज़-रोज़ परोस रहे हैं। और इसी डर की कोख से जन्म ले चुका है "लेज़र वेजाइनल टाइटनिंग" लेडीज़ डॉक्टर्स द्वारा फैलाया गया एक नया, बेहद चालाक और खतरनाक पैसा कमाने का फंडा।

आपको मेरी बात आज भले अजीब लगे, लेकिन आने वाले समय में आप देखिएगा इसकी आक्रामक मार्केटिंग हर गली, हर मोबाइल स्क्रीन पर होगी। हर महिला को यह महसूस कराया जाएगा कि अगर उसने यह नहीं कराया, तो वह “पीछे” रह गई।

क्योंकि हमारा समाज आज भी सेक्स को सबसे बड़ा कंट्रोल टूल मानता है। यह मान लिया गया है कि अगर सेक्स “परफेक्ट” है
तो आदमी काबू में रहेगा, और अगर नहीं है तो वह इधर-उधर जा सकता है।

आप लाख इंकार कीजिए, लेकिन कड़वी सच्चाई यही है।

ख़ैर अब ज़रा वैज्ञानिक सच्चाई भी सुन लीजिए।

योनि कोई ढीली पड़ने वाली मशीन नहीं है। मेडिकल साइंस साफ़ कहता है कि योनि एक इलास्टिक, मांसपेशीय अंग है
जो प्रसव, उम्र और यौन संबंधों के बावजूद अपनी कार्यक्षमता बनाए रखती है।

नॉर्मल डिलीवरी या बार-बार सेक्स से योनि खराब या ढीली हो हो जाती है यह दावा मेडिकल साइंस नहीं, बल्कि घोर अज्ञान और झूठी मार्केटिंग है।

आज तक किसी भी अंतरराष्ट्रीय मेडिकल जर्नल में ऐसा कोई ठोस वैज्ञानिक प्रमाण मौजूद नहीं है कि तथाकथित टाइटनिंग से महिला का यौन जीवन या आत्मविश्वास बेहतर हो जाता हो।

अमेरिका की FDA खुद चेतावनी दे चुकी है कि लेज़र आधारित वेजाइनल टाइटनिंग जैसी प्रक्रियाओं को न तो सुरक्षित घोषित किया गया है, और न ही इनके दीर्घकालिक लाभों के पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध हैं।

इसके बावजूद भारत जैसे देशों में इसे “आधुनिक चमत्कारी इलाज” बताकर बेचना शुरू किया जा चुका है और यह सीधे सीधे मेडिकल एथिक्स की हत्या है।

जबकि लेज़र वेजाइनल टाइटनिंग से जुड़े संभावित दुष्प्रभावों मेंजलन, सूखापन, संक्रमण, दाग़ पड़ना और कई मामलों में सेक्स के दौरान दर्द का बढ़ जाना शामिल है यानी जिस “सुख” का सपना दिखाया जाता है, वह कई बार ज़िंदगी भर का कष्ट बन जाता है।

ये सारी बातें मरीजों को पहले नहीं बताई जातीं, क्योंकि डर बेचने वालों को सच से हमेशा परहेज़ होता है।

इस पूरे धंधे की जड़ में एक बेहद खतरनाक सोच छुपी है कि महिला की क़ीमत उसके शरीर के किसी हिस्से की “टाइटनेस” से तय होगी।

कि अगर उसने बच्चा पैदा किया, अगर उसका शरीर बदला,
तो वह कमतर हो गई। यकीन मानिये यह चिकित्सा नहीं है। यह पितृसत्ता और पूँजीवाद की मिलीभगत है।

हाँ ये सच यह है कि कुछ गिने-चुने मामलों में जैसे गंभीर पेल्विक प्रोलैप्स या पेशाब रोकने में वास्तविक चिकित्सकीय समस्या मेडिकल हस्तक्षेप की ज़रूरत पड़ सकती है।

लेकिन वहाँ भी पहला रास्ता ऐक्सरसाइज़, काउंसलिंग
और प्रमाणित इलाज होता है न कि डर दिखाकर लेज़र मशीन थमा दी जाती है। और सबसे बडी बात सबसे बड़ा झूठ यह फैलाया जा रहा है कि महिला का आत्मविश्वास
उसकी योनि से जुड़ा है।

जबकि सच्चाई यह है कि आत्मविश्वास ज्ञान, स्वीकार्यता और सम्मान से आता है किसी लेज़र मशीन से नहीं। बाक़ी ध्यान रखियेगा जो डॉक्टर पहले आपको डराता है, और फिर उसी डर को दूर करने के नाम पर लाखों का पैकेज बेचता है वह आपका इलाज नहीं कर रहा, वह आपकी असुरक्षा का सौदा कर रहा है। इसलिये ऐसे शातिर डॉक्टरों के नाम पर ठगों से होशियार रहें सतर्क रहें, धन्यवाद !

06/01/2026

"हार्ट अटैक" और 'कार्डियेक अरेस्ट' ..

चलते-फिरते आदमी की अचानक मौत क्यों हो रही है?
आजकल अचानक चलते फिरते लोगों की मौत की खबर सुनने के मिल जाती है।
ये बहुत चिंताजनक और डराने वाली बात है। हंसता खेलता इंसान अचानक मर जाता है।
कार्डियेक अरेस्ट और हार्ट अटैक में अंतर होता है।
-अचानक हार्ट काम करना बंद कर देता है तो उसे कार्डियेक अरेस्ट कहते हैं।
-कार्डियेक अरेस्ट बिना चेतावनी और अचानक होता है।
-कार्डियेक अरेस्ट हार्ट के इलेक्ट्रिकल सिस्टम में खराबी से आता है.
-पूरा शरीर एक झटके में काम करना बंद कर देता है।
-कार्डियेक अरेस्ट आने पर 1 मिनट के अंदर मौत हो सकती है।
-दिल की धमनियों के ब्लॉक होने से ब्लड सप्लाई पर असर पड़ता है, यानी दिल के किसी हिस्से तक ब्लड सप्लाई रुक जाती है.
-ब्लड सप्लाई कम होने से हार्ट के फंक्शन पर धीरे धीरे असर पड़ता है।
दिल तक ब्लड फ्लो में दिक्कत से "हार्ट अटैक" आता है।
'कार्डियेक अरेस्ट' कैसे आता है,ये समझना जरूरी है क्योंकि जानकारी ही बचाव है।
-दिल के अंदर एक इलेक्ट्रिकल सिस्टम होता है
-इलेक्ट्रिकल सिस्टम हार्ट और दिमाग से कनेक्ट रहता है
-इसी सिस्टम से दिल को तरंगों के जरिए संकेत मिलते रहते हैं
-इन्ही संकेतों के आधार पर दिल काम करता है
-ये इलेक्ट्रिक तरंगे दिल की धड़कन को मॉनिटर करती है
-दिल की इलेक्ट्रिक एक्टिविटी मापने के लिए ही ECG टेस्ट किया जाता है।
-इलेक्ट्रिक तरंगों में गड़बड़ी के कारण कार्डियेक अरेस्ट आता है
-इलेक्ट्रिक सिस्टम में कई एक्टिविटी एक साथ होने पर दिक्कत होती है
-जिसके कारण हार्ट खून को पंप करना बंद कर देता है
-हार्ट बीट बहुत ज्यादा बढ़ जाती है, जिसके कारण दिल काम करना बंद कर देता है
दिल के इलेक्ट्रिक सिस्टम में एक तरह का 'शॉर्ट सर्किट' होता है जिसके कारण कार्डियेक अरेस्ट आता है।
कार्डियेक अरेस्ट आने पर दिल की धड़कनें बहुत तेज हो जाती हैं। इस अनियमित हार्ट बीट को मेडिकल लैंग्वेज में Arrhythmia एरिथमिया कहते हैं। एरिथमिया में खून पंप करने वाले चैंबर में कंपन होती है, जिस से दिल की धड़कनें अनियमित हो जाती हैं। इसे हार्ट के फंक्शन से समझते हैं।
हमारे हार्ट में 4 चैंबर होते हैं, ऊपर के दो चैंबर्स को Atria कहते हैं और नीचे के दोनों चैंबर्स को Ventricles कहते हैं। चारों चैंबर्स के बीच दीवार होती है। इन्ही चैंबर्स के जरिए ब्लड पंप होता है और ब्लड पंप करने के लिए Heart में 4 वॉल्व होते हैं। वॉल्व के जरिए ही खून चैंबर में जाता है। एरिथमिया में दिल के नीचे वाले चैंबर अपना काम छोड़कर तेजी से कांपने लगते हैं। जिसके कारण दिल की धड़कनें अचानक बहुत तेज हो जाती हैं. और उसके बाद अचानक बहुत कम हो जाती हैं। और धीरे धीरे बंद हो जाती हैं,जैसा ECG टेस्ट में दिखता है।

देश में 50% हार्ट अटैक 50 साल से कम उम्र के लोगों को आता है।
-25% हार्ट अटैक के मामलों में मरीज की उम्र 40 साल से कम होती है
-26 से 40 एज ग्रुप के 53% लोग हार्ट अटैक के हाई रिस्क जोन में हैं
-कार्डियेक अरेस्ट के कारण 10 में से 9 लोगों को अस्पताल तक पहुंचने का समय नहीं मिल पाता है।
हर गुजरते साल के साथ कार्डियेक अरेस्ट से मौत का आंकड़ा बढ़ता जा रहा है। जो खतरनाक ट्रेंड है।
Cardiac Arrest आने का कारण है
-हाइपरटेंशन
-सुस्त लाइफस्टाइल
-डायबिटीज़
-एल्कोहल और स्मोकिंग !

हार्ट अटैक, कार्डियेक अरेस्ट आने पर CPR ( Cardio Pulmonary Resuscitation ) समय पर मिल जाये तो बेशकीमती जिंदगियां बचाई जा सकती हैं , CPR का ज्ञान चिकित्सकों, अस्पताल कर्मचारियों सहित प्रत्येक नागरिक को होना चाहिये ... किसी को कहीं भी कभी भी यह समस्या हो सकती है, आसपास कोई जागरूक व्यक्ति होगा ( कोई भी) तुरंत CPR कर जीवन दाता बन सकता है...

हार्ट के इलेक्ट्रिक सिस्टम खराब (कार्डियेक अरेस्ट) होने पर ईलाज के लिये "पेस-मेकर" लगता है और दिल में खून की नालियां बंद होने से आने वाले 'हार्टअटैक' में कार्डियेक "स्टेंट" डाल कर खून की नालियां खोली जाती हैं या दूसरा रास्ता बनाने को "कार्डियेक बाई-पास सर्जरी" की जाती है।

अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक रहें, समय समय पर स्वास्थ्य जाँच करवाते रहें!
शरीर में होने वाले बदलाव और लक्षण नजर अंदाज़ न करें !
ब्लड शुगर, ब्लड प्रेशर, कोलेस्ट्रोल कन्ट्रोल में रखें
खान पान में सतर्कता बरतें,
सैर ,व्यायाम, मेडिटेशन उत्तम स्वास्थ्य के लिये बेहतरीन विकल्प हैं,
किसी भी प्रकार के नशे से अपने को कोसों दूर रखें -
लापरवाही महँगी पड़ सकती है ...
एक पल नहीं लगता-
लापरवाही से पलक झपकते ही सब बर्बाद हो जाता है ...

जनवरी–फरवरी की कड़ाके की ठंड में ज़्यादातर माता-पिता के मन में यह डर बैठा होता है कि ठंडी हवा लगने से बच्चे को निमोनिया,...
05/01/2026

जनवरी–फरवरी की कड़ाके की ठंड में ज़्यादातर माता-पिता के मन में यह डर बैठा होता है कि ठंडी हवा लगने से बच्चे को निमोनिया, सर्दी-जुकाम या बुखार हो जाएगा। यह बात पूरी तरह सही नहीं है। मेडिकल साइंस के अनुसार निमोनिया ठंडी हवा से नहीं, बल्कि वायरस या बैक्टीरिया के संक्रमण से होता है। ठंड खुद बीमारी नहीं करती, लेकिन ठंड के मौसम में बच्चे ज़्यादा समय बंद कमरों में रहते हैं, हवा का आवागमन कम होता है और संक्रमण फैलने का मौका बढ़ जाता है, इसलिए बीमारियाँ ज़्यादा दिखती हैं।

सर्दी-जुकाम और हल्का बुखार ठंड के मौसम में आम बात है। इसका कारण यह है कि इस समय वायरल इंफेक्शन ज़्यादा सक्रिय रहते हैं और बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यूनिटी) थोड़ी कमजोर हो सकती है। लेकिन यह समझना बहुत ज़रूरी है कि हर सर्दी-जुकाम निमोनिया नहीं होता और हर खांसी को लेकर घबराने की ज़रूरत नहीं होती।

बच्चों को कितना ओढ़ाना-लपेटना चाहिए, यह भी एक बड़ा कन्फ्यूजन रहता है। सही नियम यह है कि बच्चे को उतनी ही परतें पहनाएँ जितनी आप खुद पहनते हैं, बस एक लेयर ज़्यादा। ज़रूरत से ज़्यादा कपड़े पहनाने से बच्चा पसीना करता है, कपड़े गीले होते हैं और उल्टा ठंड लगने का खतरा बढ़ जाता है। बहुत ज़्यादा लपेटने से बच्चे को सांस लेने में भी परेशानी हो सकती है, खासकर सोते समय।

अगर बच्चे को खांसी-जुकाम हो जाए तो एक जागरूक माता-पिता को घबराने के बजाय समझदारी से काम लेना चाहिए। बच्चे को पर्याप्त आराम दें, माँ का दूध या गुनगुने तरल पदार्थ पिलाते रहें। नाक बंद हो तो डॉक्टर की सलाह से सलाइन ड्रॉप्स इस्तेमाल किए जा सकते हैं। बिना डॉक्टर की सलाह के एंटीबायोटिक या बड़े लोगों की खांसी की दवा कभी न दें। बच्चे को बहुत गर्म, बंद कमरे में रखना भी सही नहीं है हवादार लेकिन ठंड से सुरक्षित माहौल ज़रूरी है।

कुछ लक्षण ऐसे होते हैं जिनमें तुरंत डॉक्टर को दिखाना चाहिए। जैसे बच्चे की सांस बहुत तेज चलना, छाती का अंदर की तरफ धंसना, दूध या खाना न लेना, बहुत ज़्यादा सुस्ती, तीन दिन से ज़्यादा बुखार रहना या होंठों का नीला पड़ना। ये संकेत किसी गंभीर संक्रमण या निमोनिया की तरफ इशारा कर सकते हैं।

बाक़ी आख़िर में आपको एक जादूई टिप दे रहा हूँ इसको नोट कर लीजिये हर रात बच्चे को सोने से 10–15 मिनट पहले 2–3 घूंट गुनगुना पानी (हल्का गर्म, कभी भी गरम नहीं) पिलाने की आदत डालिए। यह कोई दवा नहीं है, लेकिन सही तरीके से दिया जाए तो इसके फायदे काफ़ी उपयोगी होते हैं।

गुनगुना पानी बच्चे के गले को आराम देता है, दिन भर जमा हुआ हल्का कफ ढीला करता है और गले की सूखापन कम करता है। इसी वजह से रात में बार-बार खांसी आने की संभावना घटती है और बच्चा ज़्यादा चैन की नींद सो पाता है। सर्दियों में बच्चों में हल्की डिहाइड्रेशन आम होती है, गुनगुना पानी शरीर में नमी बनाए रखता है जिससे म्यूकस ज़्यादा गाढ़ा नहीं होता।

इसे पिलाने का एक और फायदा यह है कि बच्चे का नाइट रूटीन सेट होता है। जैसे ब्रश करना या दुआ पढ़ना, वैसे ही गुनगुना पानी शरीर को संकेत देता है कि अब आराम का समय है। इससे नींद की क्वालिटी बेहतर होती है।

ध्यान रखने वाली बात यह है कि यह टिप 1 साल से ऊपर के बच्चों के लिए ज़्यादा उपयुक्त है। छोटे शिशुओं में ज़बरदस्ती पानी न पिलाएँ। और याद रखिए यह आदत सर्दी-खांसी या निमोनिया का इलाज नहीं है, बल्कि एक सपोर्टिव हेल्दी प्रैक्टिस है। 🙂

03/01/2026

Breast-feed करवाने वाली मेरी महिला मित्रों आप सबको पता है छ महीने तक बच्चे के लिए मां का दूध कितना जरूरी है।
इससे स्वस्थ और मस्त विकल्प कुछ नहीं हो सकता। हालांकि आज कल फॉर्मूला मिल्क को भी मां के दूध जैसा ही बोला जाता है लेकिन याद रखना वो मां के दूध जैसा है लेकिन मां का नहीं।
फॉर्मूला मिल्क के इतने झंझट है नापो तोलो गरम करो फिर ठंडा करो रात की गहरी नींद में ये सब कितना कष्टदाई लगता है लेकिन हम बच्चे के लिए करते है जबकि मां का दूध पिलाने में भी आसान ना ठन्डे गरम का झंझट और ना ही गहरी नींद खराब होती।
लेकिन आज कल समस्या ये आ रही है कि 10 में से 7 महिलाओं को दूध नहीं बनता है । मुझे पता है हर मां बच्चे को अपना दूध पिलाना चाहती है लेकिन जब ना ही आए तो क्या करें अब बच्चे को भूखे रोते हुए तो नहीं छोड़ सकते ना ।
दोस्तों मै डॉक्टर तो नहीं लेकिन अपने एक्सपीरियंस से बता रही हूं दूध ना भी आए तो भी हिम्मत ना हारे और बेबी को कंटिन्यू फीड करवाते रहे । और फीड करवाने से पहले एक ग्लास गुनगुना पानी पिए। पेट भर कर अच्छे से अच्छा अच्छा खाना खाए और दूध भी पिएं। 95% दूध पक्का बनेगा ।
मुझे तो पूरा पूरा फायदा हुआ है कर के देखिए शायद आप लोगों को भी हो जाए । याद रखना मां के दूध से बच्चा तंदरुस्त भी रहता है।!🧿🌸

आजकल में अपनी क्लीनिकल प्रेक्टिस में मेहसूस कर रहा हूँ कि मेरे पास उन पेशेंट्स की तादाद ख़ासकर 40 साल से ऊपर की ऐज वाले ...
03/01/2026

आजकल में अपनी क्लीनिकल प्रेक्टिस में मेहसूस कर रहा हूँ कि मेरे पास उन पेशेंट्स की तादाद ख़ासकर 40 साल से ऊपर की ऐज वाले यंग शादीशुदा मर्दों की तादाद बढती जा रही है जिनमें सेक्स की बिल्कुल इच्छा न होना (Low Libido) और इरेक्शन की समस्या आ रही है। ख़ैर यह कोई शर्म की बात नहीं है और न ही इसे सिर्फ़ दिमाग़ का वहम समझना चाहिए। ज़्यादातर मामलों में यह समस्या हॉर्मोन, शुगर, थायरॉइड, लाइफस्टाइल और मानसिक तनाव से जुड़ी होती है।

सबसे आम कारण Testosterone हॉर्मोन का कम होना है। Testosterone ही पुरुषों में सेक्स की इच्छा, मज़बूत इरेक्शन, जोश, ताक़त और आत्मविश्वास बनाए रखता है। जब यह हॉर्मोन कम हो जाता है तो आदमी को न सेक्स में दिलचस्पी रहती है, न इरेक्शन सही से होता है, साथ ही थकान और चिड़चिड़ापन भी रहने लगता है।

डायबिटीज़ (शुगर), थायरॉइड की बीमारी, मोटापा और हाई बीपी भी इस समस्या को बढ़ा देते हैं। ख़ासकर शुगर के मरीज़ों में नसें और ब्लड फ्लो कमज़ोर हो जाता है, जिससे प्राइवेट पार्ट तक सही मात्रा में खून नहीं पहुँच पाता और इरेक्शन कमजोर पड़ जाता है।

ज़्यादा तनाव, डिप्रेशन, नींद की कमी और मोबाइल/स्क्रीन का अत्यधिक इस्तेमाल दिमाग़ के हॉर्मोन सिस्टम को बिगाड़ देता है। दिमाग़ और सेक्स हॉर्मोन का सीधा रिश्ता होता है। जब दिमाग़ लगातार टेंशन में रहता है तो शरीर सेक्स हॉर्मोन बनाना कम कर देता है।

शराब, सिगरेट, गुटखा और बिना डॉक्टर की सलाह के लिए गए स्टेरॉयड धीरे-धीरे सेक्स पावर को अंदर से खत्म कर देते हैं। खासकर जिम के नाम पर लिए जाने वाले स्टेरॉयड प्राकृतिक Testosterone को बंद कर देते हैं, जिससे आगे चलकर गंभीर समस्या खड़ी हो जाती है।

अच्छी बात यह है कि इसका इलाज संभव है। सही जांच, सही डॉक्टर, लाइफस्टाइल में सुधार और ज़रूरत पड़ने पर दवा से सेक्स की इच्छा और इरेक्शन दोनों वापस आ सकते हैं।

अगर आप में से किसी को इस तरह की प्रॉब्लम आ रही है तो बिल्कुल शर्मिंदा होने की ज़रूरत नहीं है बल्कि सही टेस्टिंग की ज़रूरत है , में आपको उन टेस्टस के बारे में बता रहा हूँ जिनको करा कर इसके कारण को पता किया जा सकता है , इन टेस्ट्स को अच्छे से नोट कर लीजिये

1. Serum Total Testosterone (सुबह 8–10 बजे)
2.Fasting Blood Sugar / HbA1c (शुगर के लिए)
3.Thyroid Profile (TSH, T3, T4)
4.Serum Prolactin
5.Lipid Profile (कोलेस्ट्रॉल)
6.Vitamin D और Vitamin B12
7. LH, FSH हार्मोन टेस्ट
8. Prostate-Specific Antigen ( Psa test)
9. Shbg (S*x Hormone Binding Globulin)

ये टेस्ट यह साफ़ कर देते हैं कि दिक्कत हॉर्मोन की है, शुगर की है या लाइफस्टाइल से जुड़ी है।

अब आप कहेंगे कि इन टेस्टस को कराने के बाद दिखाना किसको है तो इसमें सबसे बेस्ट डॉक्टर ऐंडोक्राइनोलॉजिस्ट होता है, लेकिन अगर मानसिक तनाव ज़्यादा है तो Psychiatrist या Counsellor की मदद भी ली जा सकती है , इसके अलावा कुछ मामलों में Urologist की राय भी ली जाती है , बाक़ी डायबिटीज़ या ब्लड प्रेशर से जुडी समस्या होने पर जनरल फिजीशन से मदद ली जा सकती है ।

बाक़ी दोस्तों आप सबको ख़ास सलाह है कि बिना जांच के ऑनलाइन गोलियाँ, ताक़त बढ़ाने वाले पाउडर, देसी नुस्खे और झूठे विज्ञापनों से दूर रहें। ये कुछ दिन का फ़ायदा दिखाकर शरीर को अंदर से और ज़्यादा नुकसान पहुँचाते हैं।

याद रखिए यह मर्दानगी का नहीं, सेहत का मसलाहै और सेहत का इलाज सही डॉक्टर और सही जांच से पूरी तरह संभव है।

01/01/2026

नवजात शिशु को जुकाम होने पर उसे खूब तरल पदार्थ (स्तनपान/फॉर्मूला दूध) दें, नाक साफ करने के लिए सलाइन ड्रॉप्स और बल्ब सिरिंज का इस्तेमाल करें, कमरे में कूल-मिस्ट ह्यूमिडिफायर चलाएं, और सिर को थोड़ा ऊपर करके सुलाएं, जिससे उसे सांस लेने में आसानी हो; बुखार या सांस लेने में दिक्कत होने पर तुरंत डॉक्टर को दिखाएं। छोटे शिशुओं में दवा देने से पहले हमेशा डॉक्टर की सलाह लें।

अगर थायराइड की समस्या शुरू हो रही हो, तो शरीर पहले से संकेत देने लगता है  इन्हें नज़रअंदाज़ न करें!हमारा शरीर हमेशा हमसे...
31/10/2025

अगर थायराइड की समस्या शुरू हो रही हो, तो शरीर पहले से संकेत देने लगता है इन्हें नज़रअंदाज़ न करें!

हमारा शरीर हमेशा हमसे बात करता है बस ज़रूरत होती है उसके संकेतों को समझने की। थायराइड की शुरुआती समस्या भी ऐसे ही कुछ छोटे-छोटे बदलावों के रूप में सामने आती है। आइए जानें 5 आम लक्षण 👇

1️⃣ वजन में अचानक बदलाव:
अगर बिना वजह वजन तेजी से बढ़ने या घटने लगे, तो इसे हल्के में न लें। यह थायराइड के असंतुलन का पहला संकेत हो सकता है।

2️⃣ हर वक्त थकान और कमजोरी:
थोड़ा-सा काम करने के बाद भी थकान महसूस होना ये सिर्फ आलस्य नहीं, बल्कि आपके शरीर का मदद के लिए संकेत हो सकता है।

3️⃣ गले के पास सूजन या गांठ:
अगर गले में हल्की सूजन या कोई गांठ महसूस हो, तो तुरंत डॉक्टर से जांच करवाएं। यह थायराइड ग्लैंड से जुड़ी समस्या का शुरुआती लक्षण हो सकता है।

4️⃣ बाल झड़ना और त्वचा का रूखापन:
जब हार्मोनल संतुलन बिगड़ता है, तो बाल और त्वचा सबसे पहले प्रभावित होते हैं। अगर बाल अधिक झड़ने लगें या त्वचा सूखी लगे, तो सावधान रहें।

5️⃣ मूड में उतार-चढ़ाव और नींद की समस्या:
थायराइड लेवल में बदलाव मूड स्विंग, चिड़चिड़ापन या नींद की कमी जैसी परेशानियाँ ला सकता है।

💬 ध्यान रखें:
थायराइड की पहचान जितनी जल्दी हो जाए, उसका इलाज उतना आसान और प्रभावी होता है।
अपने शरीर की आवाज़ सुनें “सेहत पहले, थायराइड बाद में!” 🌼

👉 ऐसे लक्षण दिखें तो देर न करें, डॉक्टर से सलाह लें और अपनी डाइट व जीवनशैली पर ध्यान दें।
Health plus medical and poly clinic
Dr Sheikh Asad yunus
9669969651

बच्चों के गले में कुछ फंस जाए तो हेइम्लीच मैन्योर ट्रिक अपनाएं👇
22/10/2025

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मोटा होना स्वास्थ का संकेत नहीं है 👉सिर्फ़ इसलिए कि मेरा बच्चा मोटा नहीं है वह अस्वस्थ है ⭐️एक बच्चे को तब स्वस्थ माना ज...
21/10/2025

मोटा होना स्वास्थ का संकेत नहीं है

👉सिर्फ़ इसलिए कि मेरा बच्चा मोटा नहीं है वह अस्वस्थ है
⭐️एक बच्चे को तब स्वस्थ माना जाता है जब उसका वजन उसकी उम्र के हिसाब से बढ़ रहा हो और वे समय पर अपने लक्ष्य पूरे
कर रहा हो ।
⭐️हर बच्चे की शारीरिक संरचना और ग्रोथ अलग-अलग होता है और यह अधिक महत्वपूर्ण है
⭐️यह परिवार की अनुवांशिक संरचना पर भी निर्भर करता है इसलिए पतला होना बीमारी का संकेत नहीं है ।
👉याद रखना :-
एक स्वस्थ बच्चा वह है खुश,सक्रिय और अपनी उम्र के हिसाब से बढ़ रहा हो-भले ही वह मोटा न हो ।…

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