Dr. Rakesh Patel

Dr. Rakesh Patel MBBS, MD MEDICINE
DIABETOLOGIST

जीवन  की रफ्तार एकदम अपने सुनियोजित रास्ते पर होती  है, आप और हम अक्सर तैयारियां  करते  हैं ,  योजनायें  बनाते  हैं ; ऐस...
05/05/2026

जीवन की रफ्तार एकदम अपने सुनियोजित रास्ते पर होती है, आप और हम अक्सर तैयारियां करते हैं , योजनायें बनाते हैं ; ऐसा करेंगे , वैसा करेंगे फिर ऐसा होगा , फिर ए होगा | कई बार हम लोग प्रकृती से गच्चा खा जाते हैं , बेबस और असहाय से नजर आते हैं |

गोमती मुझसे करीब 3 साल छोटा था | हमारा बचपन खासकर गर्मियों का साथ मे बीता था | बचपन से ही बहुत शांत था| गांव मे आम ताकने का जो रिवाज था उसमे सभी बच्चे अपना आम ताकने और दूसरे का पीटने की जुगाड मे रहते थे , रात मे भी कई बार आम चोरी की जाती थी , मै खुद कई बार इन सब मे शामिल रहता पर कभी भी गोमती इन मे सामिल नही था |

उसका एक आम का पेड था "सिन्दुरा " नाम का , वो बहुत बड़ा स्वादिष्ट और सिन्दूरी रंग मे फलता था | उसके बब्बा (जमादार ) जब आम ताकते तो चिडियों और गिलहरियों के लिये भी हिम्मत ना होती आम तक पहुचने की , पर जब हम गोमती से आम मांगते तो वो जल्दी ही हमारी अनुनय विनय स्वीकार कर लेता |

पिछले 1 साल से वो हमारे साथ परिवार की तरह रहता था , बच्चे भी उसे के साथ घूले मिले रहते, वो उनको स्कूल लाता ले जाता और हम बेफिक्र | कुछ भी मंगाना हो हमेशा हाजिर | परिवार का एक बहुत ज़रूरी हिस्सा और मैडम का सारथी | कहीं जाओ कोई सवाल नही , कोई अलग से ड़ीमांड नही |

गोमती हमारे पास से 8 बजे घर गया , 12 बजे खबर आई गोमती नही रहा , हमे यकीन नही हुआ ...हम रातभर खुद को और बीनू को समझा नही सके , उसका 12 साल का बेटा चितकार उठा , उसकी मा बदहवास सी हो गई , उसकी पत्नी चीखने लगी | मेरे पास आंसुओं के सिवा कोई शब्द ना थे , एक ज़िन्दागी अचानक खत्म हुई थी जैसे कोई बरगद गिरा हो और उसपर निवासरत चिडियों का शोर उसे उठाने के विलाप कर रहा हो | पर बरगद अब गिर चुका था , कभी ना उठने के लिये |

आज मेरा जन्मदिन है और बिडंबना देखिये आज गोमती की तेरवीं है , ए कैसा रिवाज है एक माँ ज़िसके मुह मे एक निवाला नही जा रहा वही बैठकर लोग रसगुल्ला खाना चाह रहे हैं |
मेरे दोस्त तुम हमेशा हमारे दिल मे रहोगे , और तुम्हारे परिवार के लिये जो भी मुझसे हो सकेगा मै करूँगा🙏🙏🙏🙏,
विनम्र श्रधांजली 🙏🙏

इतनी नफरत  कहा से ले आते हो यार ....  घोडी  किसी और की , पैसा  किसी और का तुम्हे क्या  तकलीफ  है , ए बात समझ से परे है अ...
30/04/2026

इतनी नफरत कहा से ले आते हो यार ....
घोडी किसी और की , पैसा किसी और का
तुम्हे क्या तकलीफ है , ए बात समझ से परे है

अरे होना तो ए चाहिए की तुम्हारे गांव मे बारात आई है , मस्त उनके साथ मिलकर खुशी मनाओ , नाचो और खाओ पियो |
प्रेम बाटने वाले इस देश मे ऐसी नफरत बहुत दुखद है ...

28/04/2026

HEAT STROKE लू से कैसे बचें ..

इस  साल   TEACH TO  EACH  से 3 बच्चों  सालिनी कोल , सुनयना  शाहू  और शौर्य  तिवारी  का चयन  नवोदय  विद्यालय मे हुआ ,    ...
27/04/2026

इस साल TEACH TO EACH से 3 बच्चों सालिनी कोल , सुनयना शाहू और शौर्य तिवारी का चयन नवोदय विद्यालय मे हुआ ,
TEACH TO EACH के सभी साथियों और शिक्षकों को ढ़ेरों शुभकामनाये और बच्चों को ढ़ेर सारा प्यार ...आप हमेशा आगे बढो ,अच्छे इंसान बनो ..

मध्यप्रदेश  सरकार की SUPER 100  की परीक्षा शिक्षा के क्षेत्र  मे एक बेहतरीन  कदम  है जहां सरकार  100 बच्चों को  BIOLOGY ...
19/04/2026

मध्यप्रदेश सरकार की SUPER 100 की परीक्षा शिक्षा के क्षेत्र मे एक बेहतरीन कदम है जहां सरकार 100 बच्चों को BIOLOGY और 100 को MATH समूह से चुनकर 2 साल के लिये शाशकीय छात्रवासों मे रखकर NEET और JEE की तैयारी का मौका देती है ...
TEACH TO EACH के 2 केन्द्रों माहसांव और डढवा से 1 - 1 बच्चों का चयन हुआ है ....मेरी ढ़ेरों शुभकामनाओं बच्चों को भी और teach to each के शिक्षकों को भी ...

1. नगमणि विश्वकर्मा
2. अंजली जायसवाल

TEACH TO EACH      DUARI (दुआरी)     DADHWA( डढवा) परीक्षा परिणाम 10वीं
17/04/2026

TEACH TO EACH
DUARI (दुआरी)
DADHWA( डढवा)
परीक्षा परिणाम 10वीं

TEACH TO EACH  के दो केन्द्रों का परीक्षा परिणाम...   शिक्षा जीवन का अनमोल ख़ज़ाना  है ...
15/04/2026

TEACH TO EACH के दो केन्द्रों का परीक्षा परिणाम...
शिक्षा जीवन का अनमोल ख़ज़ाना है ...

अपनी पुरानी पीढ़ियों  को याद करता हूं  तो उनमें बहुत अच्छाईयों के बीच  एक जो कमी  खलती  है वो उन बस्तियों  और इंसानो के ...
14/04/2026

अपनी पुरानी पीढ़ियों को याद करता हूं तो उनमें बहुत अच्छाईयों के बीच एक जो कमी खलती है वो उन बस्तियों और इंसानो के प्रति भेदभाव की है , जिनके साथ वो सदियों तक बैठ ना सके , खा ना सके , गले ना लगा सके । उनके दुखो मे सहानुभूति तो दी पर कभी साथ ना दिया ।
आज उन सभी से और उनकी पीढ़ियों से मै क्षमा चाहता हूँ, और जीवनभर ए कोशिस रहेगी की देश के हर इंसान से प्रेम कर सकूं...
एक पुरानी मेरी आत्मकथा...

गांवों मे भूत ...    बचपन  मे गांवों मे ज़ितनी आबादी  इंसानो और जानवरों की होती उतनी ही लगभग य़ा उससे थोड़ी अधिक ही भूतों ...
12/04/2026

गांवों मे भूत ...

बचपन मे गांवों मे ज़ितनी आबादी इंसानो और जानवरों की होती उतनी ही लगभग य़ा उससे थोड़ी अधिक ही भूतों ,प्रेतों, देवी देवताओं और दानवों की भी होती थी ।
गांव का कोई घर , कोई बागीचा, कोई तालाब य़ा कोई सुनसान जगह ऐसी नही थी जहां उनकी उपस्थिति दर्ज ना हो। किसी के बीमार होने का पहला और बुज़ुर्गों के हिसाब से एकमात्र कारण यही लोग थे ।
बचपन मे गर्मियों के दिनो मे जब आँगन मे खाट डालकर सब सोते तो कुछ बूढे और जानकार समझे जाने वाले बुजुर्ग भूतों की ऐसी ऐसी डरावनी और अपनी बहादुरी की कहानियां सुनाते की हमारे रोंगटे खडे हो जाते ।
एक बार एक बब्बा ने बताया - दादू का बताई,
हम लोग - बताई बबा!
एक बेरा घुप अधियारी रात रहय , आ अहीमक आंधी चलय , ता हम सोचेन के हमार आमा सब आन बिन लेईही ; ए से रातिन हम बगएचा पहूच गयेन ।
हम का दिखेन !!!
हम लोग - का?
एक ठे दुय पोर्सा ( लगभग 12 फीट) के आदमी, निछक्क उज्जर ( सफेद ) ओंन्ना (कपड़ा) पहिने , आये के खडा होईगे !!! हम ता जानिन गयेन के आहीं ।
हम लोग - के बबा ?
बबा - अरे दानू मामा

हम लोग - (आश्चर्य से, हम लोगो की हालत खराब हो रही )फेर का
भा ?
बबा - फेर हम तुरंतय दोहराबय लागेन -
तू मामा हम भैने !
तू मामा हम भैने !
तू मामा हम भैने !

हम लोग- ( उस दिन हम लोगों ने ए अचूक विद्या सीखी की दानवों से हमारा मूलतह रिश्ता मामा भांजे का है )

फ़ेर?

फ़ेर, फ़ेर ऊ कहिन- या समय हमार पचेन के आय, अब दूबारा एय ना ।
हम फेर घरे आय गयेन ।

ऐसे ही कितनी कहानियां आप सब ने सुनी होंगी
आज तबीयत खराब थी तो अचानक कुछ याद आ गया ..

indian  nutritional  journal  मे मेरा एक आर्टिकल  पब्लिश  हुआ  है ....      जल्दी  ही DIABETES (मधुमेह )   पर मेरी एक कि...
08/04/2026

indian nutritional journal मे मेरा एक आर्टिकल पब्लिश हुआ है ....

जल्दी ही DIABETES (मधुमेह ) पर मेरी एक किताब आ रही है ज़िसमे बघेल खण्ड के खानो के शुगर लेबल की भी चर्चा है...

युद्ध ....        दुनिया मे हर कोई युद्ध मे है , कुछ अंदर से तो कुछ बाहर से लड़  रहे हैं । ज्यादातर का   युद्ध खुद के सुध...
29/03/2026

युद्ध ....

दुनिया मे हर कोई युद्ध मे है , कुछ अंदर से तो कुछ बाहर से लड़ रहे हैं । ज्यादातर का युद्ध खुद के सुधार को कम , दूसरों के सुधार को ज्यादा आतुर है ।
बचपन के युद्ध भी कितने मासूम और अपनी तरह की विराटता से सुसज्जित थे, लगता था हमसे बड़ा कोई योद्धा हो नही सकता , दुनिया को बस हम ही पलट सकते हैं । और वो दुनिया थी मोहल्ले य़ा स्कूल के 4 दोस्त । बचपन के कुछ ही युद्ध याद हैं , ज्यादातर लड़ाइयां तो जेहन मे दर्ज ही नही हैं अब ।
मेरे बचपन का एक दोस्त था सूर्य प्रताप सिंह ( सूर्या ) । जब मैं कक्षा चौथी ( सरस्वती शिशु मंदिर बैढ़न) मे था तब वो मेरे साथ आया , उसके पापा पुलिस मे थे । वो थोड़ा तेजतार्रर था ( एक तो पढ़ने मे होशियार और दूसरा पापा पुलिस मे)।
मै अपने कक्षा का मानीटर था और अपने को सबसे होशियार समझता था। वो , मै और मनीष शर्मा ( एक और दोस्त जो साडा कालोनी से आता था, आजकल दुबई मे है ) हम तीनों दोस्त पढ़ने मे लगभग एक जैसे थे , पर अव्वल रहने के लिये मै प्रतिबद्ध था अंदर से भी बाहर से भी ।
मनीष के पापा ( जो कि सीनेटरी इन्सपेक्टर थे) उसको स्कूटर से छोडने आते, मै पैदल आता और सूर्या भी अक्सर पैदल आता य़ा उसके पापा सायकिल से छोड देते। उसका घर थाने के पास था , जो की स्कूल के काफी नजदीक था , मै बिलौंजी मे रहता था करीब 2km दूर । रीवा से जाने मे पहले साडा कालोनी, फिर बिलौंजी, फिर थाना फिर स्कूल पड़ता था ।
छठवीं (6th class ) मे मेरे 92% आने पर मेरे पापा ने मुझे Avon की साइकिल दिला दी थी , अब मै और सूर्या उस सायकल से बैढ़न के आसपास के 30km के एरिया मे मौका मिलते ही देशाटन पर निकल पड़ते । हम दोनो और हमारा परिवार इतने घुलमिल गये की वो और मै दोनो मे से किसी भी घर मे रुक जाते, खाते पीते और पढते। मै अपने घर से उसके घर जाता और वहां से उसको आगे डंडे पर बैठाता( करियर मे बस्ता रहता ) फिर हम साथ मे स्कूल जाते ।
एक बार हम दोनो मे युद्ध हो गया , बात इतनी विशाल थी की ठीक से याद नही किस बात पर , पर युध तो हुआ। युद्ध हम दोनो के बीच था , तो इसमें घर को सामिल नही किया जा सकता था; झापड पड़ने का खतरा था , उसकी तो मम्मी भी कभी कभी पीट देती थी , मेरे घर मे ए खतरा सिर्फ पिता जी से था।
तो हुआ ए की सुबह जब स्कूल जाने की बारी आई तो मै अपने सबसे करीबी दुश्मन से कैसे बात करूँ और कैसे उसको मै अपनी प्यारी सायकल प़र बैठाऊ , अभी कल ही तो युद्ध हुआ है और उसने कोई युद्धविराम की भी घोषणा नही की है, पर अगर घर वालों को पता चला तो मुझे ही सरेंडर करना पडेगा ।
खैर, मै उसके घर के सामने सायकल खड़ी किया , वो बिना कुछ बोले चुपचाप डंडे पर आकर बैठ गया , हम दोनो स्कूल आ गये, डंडे से उतरते ही फिर दुश्मन। ए शीतयुद्ध कई दिनो तक चला। अब आप मेरी हालत सोच ही सकते हैं की एक कट्टर दुश्मन को अपनी सायकल (जो मुझे आज की fortuner से कहीं ज्यादा प्यारी थी) मे बैठाकर मेरी छाती मे कितना ही दर्द हुआ होगा ।
कुछ दिनो मे ही घर बालों को शक हुआ क्युकी आजकल एक दुसरे के घर जाना कम हुआ, ताकी घर वालों के सामने कहीं बात ना करनी पड़ जाय तो इसे समझौता और हार माना जा सकता है, साथ मे क्रिकेट नही , साथ मे घुमना नही । तो सूर्या की मम्मी ने मुझसे पूँछा - का बात है दादू ?
मैं- का बात है , कुछ नहीं, कोई बात नही !! ( मै थोड़ा असहज हुआ)
मम्मी- (उनको भी मै मम्मी ही कहता था ) ता बोलत चालत काहे नाई आय ?
मैं- .........मै तो बोल रहा हुं
मम्मी- ठीक है पापा से संझा बताईथे
मै - नही नही , पापा से बताने की कोई जरूरत ही नही है , कोई बात ही नही है , चलो सूर्या ( मन मारके ) ।
मम्मी- कुछ खाबे
मैं- नही
मम्मी- ऐतवार का घरे अउब , अम्मा का बताई देहा ।
मैं- जी
हम दोनो के प्राण सूख गये , रविवार डेड लाइन थी , किसी भी कीमत पर रविवार के पहले समझौते पर हस्ताक्षर जरूरी थे वरना मोहल्ले भर के सामने इज्ज़त का साम्राज्य ढहने का खतरा था ।
सूर्या - चलो यार आज स्कूल के बाद क्रिकेट खेलेंगे और आज सायकल मै चलाऊंगा।
मम्मी- आँखे उपर की , एक बार मेरी तरफ , एक बार सूर्या की तरफ देखा ,
युद्ध विराम !!

सूर्या आजकल रायपुर मे है , हम दोनो कभी कभी मिलते हैं , परिवार के साथ , प्रेम को आविरल धारा आज भी हमारी रगों मे बहती है ...
काश की सभी युद्धों का अंत ऐसा ही हो ...

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