14/01/2026
इस युग के प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ भगवान के पुत्र एवं इस युग के प्रथम चक्रवर्ती राजा भारत का नाम सब ने सुना ही होगा जिनके नाम से आज यह भारत देश जाना जाता है l
जैन आगम ग्रंथों में कर्क संक्रांति के दौरान भरत चक्रवर्ती सूर्ययान में अकृत्रिम जिन बिम्ब के दर्शन वंदन करते हैं, क्यूंकि उस दौरान सूर्य पृथ्वी के सबसे नजदीक होता है l संभवत: मकर संक्रांति के दिन भी वे ऐसा करते होंगे l
जैन दर्शन के अनुसार भरत चक्रवर्ती के आंखों से देखने की क्षमता लगभग 47000 योजन से अधिक या उसके आसपास अर्थात 13 करोड़ मिल के उपर या उसके आसपास) की दूरी तक देखने की होती है l
जैन आगम ग्रंथों (जैसे त्रिलोकसार, नेमिचंद्र सिद्धांत चक्रवर्ती द्वारा) में कर्क संक्रांति के दिन भरत चक्रवर्ती के सूर्ययान (सूर्य विमान) में अकृत्रिम जिनबिंब दर्शन का स्पष्ट उल्लेख है, क्योंकि तब सूर्य पृथ्वी के सबसे निकट होता है।
मकर संक्रांति के लिए आगमों में प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं मिलता, लेकिन लोक मान्यता और जैन परंपरा इसे संभावित मानती है—सूर्य के उत्तरायण प्रवेश पर भी दर्शन संभव, क्योंकि भरत चक्रवर्ती की दृष्टि क्षमता 47,000 योजन (लगभग 60,000 किमी या 13 करोड़ मीटर ऊपर) तक थी।
आगम प्रमाण
त्रिलोकसार गाथा 389-391 में कर्क संक्रांति का वर्णन है: भरत अपने षड्खंड महल से सूर्य में जिनालय और अर्हंत बिंबों का वंदन करते हैं।
मकर संक्रांति को कुछ जैन आचार्य (जैसे सुधासागरजी) विस्तार देते हैं, पर आगम सीमित है।
# # दृष्टि क्षमता
जैन दर्शन में चक्रवर्ती की दृष्टि "क्षीरसागर पार" तक (47,000 योजन ≈ 59,200 किमी व्यास) थी, जो सूर्य विमान (लोकालोक पर्वत से परे) तक पहुँचती थी। यह उनकी लैणिक शक्ति से संभव।
ज्ञानियों से सन आई पड़ी बातों के आधार पर यह पोस्ट किया गया है फिर भी निश्चय में जिनवाणी के विरुद्ध कुछ कहा हो या कोई त्रुटि हुई है तो मन वचन काया से क्षमा याचना और मिच्छामी दुक्कडम l