16/03/2026
तंत्रशास्त्र में एक ऐसी साधना का वर्णन मिलता है जिसके नाम से ही लोगों के मन में जिज्ञासा उत्पन्न हो जाती है। उस साधना का नाम है योनि साधना। बहुत से लोग इसका नाम सुनते ही इसे केवल स्त्री-पुरुष के संबंध से जोड़ देते हैं, परन्तु तंत्रग्रंथों में इसका अर्थ उससे कहीं अधिक गहरा और आध्यात्मिक बताया गया है।
तंत्र परम्परा के अनुसार योनि सम्पूर्ण सृष्टि का मूल द्वार है। जिस प्रकार बीज से वृक्ष उत्पन्न होता है उसी प्रकार शक्ति से ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति मानी जाती है। इसलिए तंत्र में योनि को आदिशक्ति का प्रतीक माना गया है और इसी तत्त्व की उपासना को योनि साधना कहा गया।
तंत्रग्रंथों में इसकी महिमा इस प्रकार कही गई है
योनिः सर्वस्य भूतानां मूलं सृष्टेः सनातनम्।
योनिपूजनमात्रेण सर्वदेवाः प्रसीदति॥
अर्थ
योनि सम्पूर्ण प्राणियों की उत्पत्ति का सनातन मूल है और जो साधक श्रद्धा से योनि तत्त्व की उपासना करता है उस पर देवता प्रसन्न होते हैं।
कुलार्णव तंत्र में भी यह कहा गया है
न योनिसदृशं तीर्थं न योनिसदृशं व्रतम्।
न योनिसदृशं ज्ञानं न योनिसदृशी गतिः॥
अर्थ
इस संसार में योनि के समान कोई तीर्थ, व्रत, ज्ञान या परम गति नहीं है।
अब सबसे बड़ा प्रश्न यही उठता है कि क्या योनि साधना में वास्तव में स्त्री-पुरुष का संभोग होता है। तंत्र परम्परा में इसका उत्तर सीधा नहीं है क्योंकि इसकी दो परम्पराएँ बताई गई हैं।
पहली परम्परा आंतरिक और प्रतीकात्मक साधना की है। इसमें साधक किसी स्त्री के साथ कोई शारीरिक क्रिया नहीं करता। वह यंत्र, मंत्र, ध्यान और कुंडलिनी साधना के माध्यम से शक्ति तत्त्व की उपासना करता है। इस मार्ग में योनि को केवल सृष्टि शक्ति का प्रतीक माना जाता है और साधना पूर्णतः आध्यात्मिक होती है।
दूसरी परम्परा कुछ वाममार्गी तांत्रिक संप्रदायों में वर्णित है जिसे कौलाचार या वामाचार साधना कहा जाता है। इसमें शिव और शक्ति के मिलन को साधना का प्रतीक माना जाता है। इस मार्ग में स्त्री को देवी और पुरुष को शिव का रूप मानकर साधना की जाती है। तंत्रग्रंथों में इसे अत्यंत गुप्त बताया गया है और स्पष्ट कहा गया है कि यह साधना केवल सिद्ध गुरु की दीक्षा से ही की जा सकती है। सामान्य व्यक्ति के लिए यह मार्ग निषिद्ध माना गया है।
भारत में इस साधना का सबसे प्रसिद्ध केन्द्र कामाख्या शक्तिपीठ माना जाता है जो असम के नीलाचल पर्वत पर स्थित है। यहाँ देवी की कोई मूर्ति नहीं है बल्कि प्राकृतिक शिला में बनी योनि आकृति की पूजा की जाती है जिसमें निरंतर जल प्रवाहित होता रहता है। मान्यता है कि यही स्थान वह है जहाँ सती की योनि गिरी थी।
योगिनी तंत्र में कामाख्या के बारे में कहा गया है
कामाख्यायां महापीठे योनिरूपा परा शक्तिः।
तत्र साधनमात्रेण सिद्धिर्भवति निश्चितम्॥
अर्थ
कामाख्या महापीठ में स्वयं पराशक्ति योनि रूप में विराजमान हैं और वहाँ साधना करने से सिद्धि प्राप्त हो सकती है।
तांत्रिक दर्शन का मूल सिद्धांत यह है कि शिव और शक्ति अलग नहीं हैं। शिव चेतना हैं और शक्ति ऊर्जा है। जब दोनों का मिलन होता है तभी सृष्टि का प्रकट होना संभव होता है। इसी सत्य को एक प्रसिद्ध श्लोक में कहा गया है
शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुं
न चेदेवं देवो न खलु कुशलः स्पन्दितुमपि॥
अर्थ
शिव जब शक्ति से संयुक्त होते हैं तभी सृष्टि की उत्पत्ति कर सकते हैं, शक्ति के बिना शिव स्वयं भी स्पंदन करने में समर्थ नहीं होते।
इस प्रकार योनि साधना को केवल शारीरिक क्रिया समझ लेना तंत्रज्ञान की गहराई को न समझना है। तंत्रमार्ग में यह साधना सृष्टि के मूल रहस्य, कुंडलिनी ऊर्जा और शिव-शक्ति के अद्वैत तत्त्व को अनुभव करने का मार्ग मानी जाती है। इसलिए इसे सदैव गुप्त रखा गया और केवल योग्य साधकों के लिए ही उपयुक्त बताया गया।