Mahant Madhodas Udaseen

Mahant Madhodas Udaseen णमो लोए सव्व साहूणम

27/02/2026

आसक्ति कहाँ तक ?

आरम्भमें ऐसा मालूम पड़ता है कि अपनी मौजसे जो काम मैं कर रहा हूँ,
उसको जब चाहूँ, छोड़ सकता हूँ।

मेरा बुलाया हुआ है, माना हुआ है, वशमें है।
परन्तु थोड़े दिनोंका अभ्यास होने पर उसकी आदत पड़ जाती है
और
उसको छोड़ना बहुत कठिन हो जाता है।
यदि उस काम में दूसरोंका सहयोग हो तब तो और भी कठिन बन्धन हो जाता है।

अतः जिस कर्मको कम-से-कम जीवन-भर निभा सकते हों उसमें निष्ठा रख सकते हों, उसीकी आदत पड़ने दीजिये।
आप जिससे प्रेम करते हैं, जीवन भर कर सकें।
आप जो काम करते हैं, वह अन्तिम क्षण तक अपनी निष्ठाके रूपमें रह सके।
जो आजीवन निष्ठाके रूपमें न रह सके, उस निषिद्ध कर्मको मत कीजिये।
चाहे मना करने वाला शास्त्र हो, गुरुजन हों, समाज हो, अपनी बुद्धि हो- मना किया हुआ काम छोड़ दीजिये।
हिचकिये मत।
बिचकिये मत।
लचकिये मत।
उसे छोड़ दीजिये।
जो काम आप कर रहे हैं, क्या वह करनेसे ही आपको संतोष या तृप्ति नहीं है?
उसका कुछ फल चाहते हैं?
तब, वह दो कौड़ीका काम हो गया।
फल मुख्य, कर्म गौण।
अच्छा, मान लिया कि आप फल नहीं चाहते हैं, आपकी कर्मोंमें फलासक्ति नहीं है, बहुत बढ़िया। धन्यवाद! परन्तु, क्या आप उस कर्मको पूरा करना चाहते हैं?
उसको पूरा कर लेना आपके हाथमें है?

कर्म पूरा करनेके लिये नहीं किया जाता।
कर्म पूरा करना अपने हाथमें नहीं है।
वह समय भरनेके लिये है।
कर्म करते जाइये बस, आगे बढ़िये।
आप समझते हैं कि कर्म पूरा करना आपके हाथमें नहीं है, फिर भी करते जा रहे हैं- करनेका अभ्यास है। बिना किये रह नहीं सकते।
आपका कर्तापन बहुत दृढ़ है।
यही आपको तब दुःखी करेगा, जब आप कर नहीं सकेंगे।
फिर तो अपनेको अकर्ता समझना आवश्यक है।
परन्तु,
अकर्तापनको बोझा बनाकर अपने सिर पर मत थोपिये।

अकर्तापन भी एक अभिमान ही है।
फलासक्ति, कर्मासक्ति, कर्तृत्वासक्ति अकर्तृत्वासक्ति- इन चारोंसे आप तब छूटेंगे, जब आत्माकी पूर्णताका बोध होगा।
आ जाइये हमारे साथ। आप पूर्ण हैं।

आनंद सुत्र
अखंडानंद जी सरस्वती
9-1-85

आपका एक शेयर किसी जंजीरों में जकड़े मनुष्य को मुक्ति दिला सकता है
26/02/2026

आपका एक शेयर किसी जंजीरों में जकड़े मनुष्य को मुक्ति दिला सकता है

मुक्ति प्रवास डायरी: जब रूह कांप गई...
'मुक्ति अभियान' के इस सफर में 18 फरवरी 2026 की वह रात हमारी टीम के दिलों पर हमेशा के लिए अंकित हो गई है। जोधपुर में फील्ड विजिट के दौरान रात के लगभग 9 बज रहे थे, जब डॉ. धनेश जी के साथ हम एक ऐसे घर की दहलीज पर पहुँचे जहाँ मानवता सिसक रही थी।
वहाँ का मंजर देख हमारी रूह कांप गई। एक महिला मानसिक रोगी, जो कभी अपने घर की खुशहाली और रौनक हुआ करती थी, आज लोहे की जंजीरों से जकड़ी हुई घर से दूर एक छोटे से टीन शेड के नीचे कैद थी। उसे उस नग्न अवस्था में देख मन में बस यही सवाल उठा कि क्या वाकई आज के आधुनिक युग में भी कोई इंसान इस तरह जीने को मजबूर हो सकता है?
मरीज की गरिमा और मर्यादा का ध्यान रखते हुए, हमने उसके पास पहुँचने से पहले ही परिवार से निवेदन किया कि उसे कपड़े पहना दिए जाएँ या उसके शरीर को किसी चीज़ से ढक दिया जाए। जब हमने बेबस परिवार से बात की, तो पता चला कि वह सालों से इसी नारकीय स्थिति में जी रही है।पिता ने बताया की हमने बहुत इलाज करवाया लेकिन कुछ ज़्यादा सुधार न हुआ और मरीज की हालत ख़राब होती गई तो हमे उसे बाँधना पड़ा। उसके पिता की आँखों में वो बेबसी साफ दिख रही थी, जब उन्होंने भारी मन से बताया कि उनकी बेटी बीमार होने से पहले बिल्कुल सामान्य थी। वह शादीशुदा है, उसका एक प्यारा सा बच्चा है और वह सिलाई का काम भी बड़ी कुशलता से किया करती थी। आज उसे पशुओं की तरह जंजीरों में बंधा देख कलेजा फट गया।
हमने परिवार को पूर्ण विश्वास दिलाया कि ईश्वर की कृपा और सही इलाज से निष्काम फाउंडेशन की टीम उसे फिर से स्वस्थ करने और उसका पुराना सम्मानजनक जीवन लौटाने के लिए अपनी पूरी जान लगा देगी। हमारे लिए यह सिर्फ एक मेडिकल केस या इलाज नहीं है, बल्कि एक तड़पती आत्मा को उसकी बेड़ियों से आजाद कर फिर से समाज की मुख्यधारा में लाने का पवित्र संकल्प है।
हमारा लक्ष्य: बेड़ियों से मुक्ति, सम्मान से जीवन।

मोदी बड़ा जालिम हैपता नही इसको इंडिया डिजिटल क्यों करना है?2014 से पहले कितना सकून थालोग खाते भी थे खिलाते भी थेइन छड़े ...
26/02/2026

मोदी बड़ा जालिम है
पता नही इसको इंडिया डिजिटल क्यों करना है?
2014 से पहले कितना सकून था
लोग खाते भी थे खिलाते भी थे
इन छड़े छांटों को क्या पता घर बार कैसे चलता है?

इसी जालिम दौर में एक बंदे के साथ गजब हो गया।
इनकम टैक्स ने AI की मदद से ₹68 लाख का फ्रॉड पकड़ लिया।
"Digital India" के दौर में टैक्स चोरी करने वालों के लिए ये किस्सा एक बड़ी चेतावनी है!
यह मामला दिखाता है कि अब इनकम टैक्स डिपार्टमेंट या ED सिर्फ कागज़ नहीं देखता, बल्कि उन कागज़ों की DNA जाँच (Forensic Audit) भी कर रहा है।
इसे "The Calibri Scandal" के नाम से भी जाना जाता है,
और यह सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी (जैसे पाकिस्तान के पनामा पेपर्स केस में) फर्जीवाड़े पकड़ने का बड़ा हथियार बना है।

आजकल टैक्स डिपार्टमेंट जो AI टूल्स इस्तेमाल कर रहा है, वे केवल आंकड़ों की मिलान नहीं करते, बल्कि बहुत बारीकियों पर ध्यान देते हैं

अब हुआ क्या कि जब उसने अपनी ITR भरी, तो उसने प्रॉपर्टी की कॉस्ट दिखाई ₹73 लाख और प्रॉपर्टी बनाने के खर्चे वगैरह जिसे हम Cost of Improvement बोलते हैं, वो दिखाए ₹68 लाख।

​अब ये सब करने के बाद उसका टैक्स हो गया निल (zero)। इनकम टैक्स डिपार्टमेंट से नोटिस आता है कि आपने जो खर्चे किए हैं, आप उसके बिल वगैरह सबमिट करें और प्रूफ करें। उसने बिल वगैरह प्रॉपर सबमिट कर दिए, उसने प्रूफ कर दिया कि मेरे इतने खर्चे हुए हैं।

​अब मजे की बात यहाँ आती है, वहाँ स्टार्ट हुआ Forensic Audit AI की मदद से। उसमें जितने भी बिल थे, वो सारे बिल थे 2002 से लेकर 2006 तक के और उसमें font यूज़ किया हुआ था Calibri।

​Calibri फॉन्ट ऑफिशियली लॉन्च हुआ था 2007 में, और AI की मदद से ये चीज़ पकड़ में आई कि ये सारे बिल फेक हैं। और इसी के बेसिस पर इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने उनके ऊपर टैक्स + इंटरेस्ट + पेनल्टी सब लगा दी।

​तो अब आप ये सोच सकते हैं कि scrutiny का लेवल कहाँ तक हो गया है। इसलिए ऐसे फेक इनवॉइसेस लगाना खुद के लिए ही हानिकारक है।

Metadata Analysis से स्कैन किए गए डॉक्यूमेंट्स की फाइल प्रॉपर्टीज से पता चल जाता है कि फाइल असल में कब बनाई गई थी।
Ink and Paper Ageing यानी फॉरेंसिक जांच में यह भी पकड़ा जाता है कि क्या 20 साल पुराने बिल पर लगी स्याही वाकई उतनी पुरानी है या उसे पिछले हफ्ते ही प्रिंट किया गया है।
Pattern Recognition करके AI यह भी पकड़ लेता है कि अलग-अलग वेंडर्स के बिलों का फॉर्मेट, राइटिंग स्टाइल या गलतियां एक जैसी तो नहीं हैं (जो अक्सर एक ही आदमी के फर्जीवाड़ा करने पर होती हैं)।

अब या तो लोग अपने आप सुधर जाएं वरना सुधार तो हो ही जायेगा😂
Technology is smarter than you: अब वो ज़माना गया जब पेन से लिखकर या बैक-डेट में बिल बनाकर काम चल जाता था।
अब विभाग के पास Insight और Project Lotus जैसे हाई-टेक प्लेटफॉर्म हैं।
Penalties are Brutal यानी अब पकड़े जाने पर सिर्फ टैक्स नहीं देना पड़ता, बल्कि 200% तक पेनल्टी और भारी ब्याज भी लगता है। साथ ही, जेल जाने की नौबत (Prosecution) अलग से आ सकती है।
तो चारा यही है कि Honesty is the only Policy जेन्युइन खर्चे दिखाएं और उनके असली रिकॉर्ड संभाल कर रखें।

AI टूल्स अब फॉन्ट एनालिसिस , मेटाडेटा चेक (क्रिएशन डेट) , पेपर वॉटरमार्क , इंक एजिंग और डिजिटल सिग्नेचर वेरिफिकेशन आदि सब एक साथ करते हैं। 5-10 मिनट में पूरी डिजिटल पोस्टमाटर्म रिपोर्ट तैयार।
पहले ऐसे केस में महीनों लगते थे, अब AI की वजह से scrutiny का लेवल आसमान छू रहा है।
विभाग ने 2024-25 में ही हजारों फेक इनवॉइस वाले केस पकड़े हैं।

मजा ये है कि अब लोग सोचते हैं “अरे यार पुराना बिल तो कोई नहीं चेक करेगा”… लेकिन AI बिना थके 24×7 चेक कर रहा है 😂

ये तो एक बंदा ही था
हाल ही में देश में टैक्स चोरी के खिलाफ चल रही कार्रवाई में अब तक का सबसे बड़ा खुलासा सामने आया है.
आयकर विभाग ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की मदद से 1.77 लाख रेस्टोरेंट्स की धांधली पकड़ ली है.
जांच में सामने आया है कि इन रेस्टोरेंट्स ने पिछले पांच वर्षों में करीब 70,000 करोड़ रुपये की बिक्री छिपाकर टैक्स नहीं चुकाया.
यह कार्रवाई खासतौर पर हैदराबाद आयकर विभाग की यूनिट ने की, जिसने देशभर में इस्तेमाल हो रहे बिलिंग सॉफ्टवेयर के 60 टेराबाइट लेनदेन डेटा का विश्लेषण किया.
शुरुआती जांच में ही यह साफ हो गया कि खाद्य बाजार में सॉफ्टवेयर के जरिए बड़े पैमाने पर फर्जीवाड़ा कर काली कमाई छिपाई जा रही थी.

आयकर विभाग की टीम ने AI मॉडल्स की मदद से बिलिंग सॉफ्टवेयर के डेटा में असामान्य पैटर्न खोजे.
AI ने यह पहचाना कि कई रेस्टोरेंट्स में बिक्री दर्ज होने के बाद बिल सिस्टम से हटा दिए जाते थे.
कुछ मामलों में रकम बदल दी जाती थी, डिजिटल रिकॉर्ड और वास्तविक बिक्री में बड़ा अंतर था.

जांच में सामने आया कि देशभर में 70,000 करोड़ रुपये की अघोषित बिक्री में से 13,317 करोड़ रुपये के बिल भुगतान के बाद डिलीट या बदले गए. यह तरीका लंबे समय से अपनाया जा रहा था ताकि टैक्स रिकॉर्ड में कम बिक्री दिखाई दे और टैक्स बचाया जा सके.

आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में सबसे ज्यादा गड़बड़ी

जांच में यह भी सामने आया कि आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में टैक्स चोरी का आंकड़ा सबसे ज्यादा था. इन दोनों राज्यों में 5,100 करोड़ रुपये से ज्यादा की बिक्री छिपाई गई. हैदराबाद जैसे बड़े फूड हब में चल रहे कई लोकप्रिय रेस्टोरेंट्स इस रडार में आए. आयकर विभाग के अधिकारियों के मुताबिक, बड़े शहरों में डिलीवरी ऐप्स और कैश/डिजिटल पेमेंट की वजह से बिक्री ज्यादा होती है, इसलिए वहां सॉफ्टवेयर से हेरफेर कर छिपाना आसान समझा गया.

जमीनी जांच में भी निकली सच्चाई

डेटा एनालिसिस के बाद आयकर विभाग ने 40 रेस्टोरेंट्स का फिजिकल वेरिफिकेशन किया.टीमों ने मौके पर जाकर वास्तविक बिक्री, किचन ऑर्डर, काउंटर पर हुए पेमेंट और कंप्यूटर रिकॉर्ड की तुलना की. इस छोटी सी जांच में ही करीब 400 करोड़ रुपये की अघोषित बिक्री सामने आ गई. इससे साफ हो गया कि AI के जरिए सामने आई गड़बड़ी जमीनी हकीकत से मेल खाती है.

कौन सा तरीका अपनाया जा रहा था?
जांच में सामने आए कुछ प्रमुख तरीके:

पेमेंट के बाद बिल डिलीट करना: ग्राहक से पैसे लेने के बाद सिस्टम से बिल हटा दिया जाता था.
रकम कम दिखाना:असली बिल की जगह कम रकम का रिकॉर्ड सेव करना
डुप्लीकेट बिलिंग सॉफ्टवेयर: एक सॉफ्टवेयर असली बिक्री के लिए, दूसरा टैक्स रिकॉर्ड के लिए
कैश ट्रांजैक्शन छिपाना :नकद भुगतान को पूरी तरह सिस्टम में दर्ज न करना
इन तरीकों से सालों तक टैक्स बचाया जा रहा था.

अभी जुर्माना और टैक्स की गणना बाकी

आयकर विभाग के अधिकारियों ने बताया कि अब तक केवल छिपाई गई बिक्री का आंकड़ा सामने आया है. इस पर कितना टैक्स, जुर्माना और ब्याज लगेगा इसकी गणना अभी बाकी है. संभावना है कि दोषी रेस्टोरेंट्स पर भारी जुर्माना लगेगा, बड़े मामलों में कानूनी कार्रवाई और प्रोसीक्यूशन भी हो सकता है और बिलिंग सॉफ्टवेयर कंपनियों की भूमिका की भी जांच होगी.

सरकार की सख्ती और डिजिटल निगरानी का नया दौर

यह मामला बताता है कि सरकार अब AI और डेटा एनालिटिक्स के जरिए टैक्स चोरी पर सख्ती कर रही है.GST नेटवर्क,आयकर विभाग और फाइनेंशियल इंटेलिजेंस यूनिट अब डिजिटल फुटप्रिंट के आधार पर संदिग्ध लेनदेन को पकड़ रहे हैं.

वहीं,विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले समय में POS सिस्टम, डिलीवरी ऐप्स के डेटा और UPI ट्रांजैक्शन को जोड़कर और सटीक निगरानी होगी.

ईमानदार व्यापारियों के लिए राहत, धोखेबाजों के लिए चेतावनी

इस कार्रवाई से ईमानदारी से टैक्स चुकाने वाले रेस्टोरेंट मालिकों को राहत मिलेगी, क्योंकि टैक्स चोरी करने वाले कारोबारियों से उन्हें अनुचित प्रतिस्पर्धा झेलनी पड़ती थी. वहीं, जो लोग सिस्टम से खेल कर टैक्स बचा रहे थे, उनके लिए यह कड़ा संदेश है कि डिजिटल दौर में छिपना आसान नहीं रहा.

ग्राहकों पर क्या असर पड़ेगा?

आम ग्राहकों के लिए यह मामला एक सीख है. आम ग्राहकों को रेस्टोरेंट से हमेशा बिल लेना, डिजिटल पेमेंट पर रसीद सेव करना और संदिग्ध मामलों में शिकायत दर्ज करना, इससे टैक्स चोरी पर लगाम लगाने में मदद मिल सकती है.

बिलिंग सॉफ्टवेयर कंपनियों पर भी शिकंजा कस सकता है

जांच में यह पहलू भी सामने आया है कि कुछ बिलिंग सॉफ्टवेयर कंपनियों ने ऐसे फीचर्स दिए, जिनसे बिल डिलीट या एडिट करना आसान हो जाता था. अब आयकर विभाग इन कंपनियों की भूमिका की भी जांच कर सकता है. अगर यह साबित हुआ कि सॉफ्टवेयर जानबूझकर टैक्स चोरी को आसान बनाने के लिए डिजाइन किया गया था, तो कंपनियों पर भी कार्रवाई संभव है. इससे भविष्य में बिलिंग सॉफ्टवेयर के नियम और सख्त हो सकते हैं.

GST सिस्टम के साथ इंटीग्रेशन से बढ़ेगी पारदर्शिता

सरकार अब यह भी विचार कर रही है कि रेस्टोरेंट्स के POS और बिलिंग सॉफ्टवेयर को सीधे GST नेटवर्क से जोड़ा जाए. इससे हर बिक्री का डेटा रियल-टाइम में रिकॉर्ड होगा और बाद में बिल डिलीट या बदलने की गुंजाइश कम हो जाएगी.विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसा होने से कारोबार में पारदर्शिता बढ़ेगी और टैक्स चोरी पर काफी हद तक रोक लगेगी.

वाकई मोदी बड़ा ही जालिम है
चाहे UGC के बहाने से हटे या संविधान बदलने के मुद्दे पर हटे
इसको कैसे भी करके हटाना ही पड़ेगा
नहीं तो ये सिस्टम इतना पारदर्शी बना देगा कि फिर बाद में किसी पैंतरे परिवारवादी दल अगर सत्ता में आ भी गए तो पब्लिक एआई वाले माईक्रोस्कोप लिए हर समय सर पर ही खड़ी होगी
इसलिए अगर हम सब 2029 के चुनाव मे मोदी को किसी भी हथकंडे से न हटा सके तो योगी नाम की कयामत का आगाज 2034 में तय है फिर वो केवल छड़ा ही नहीं है बुल्डोजरधारी सन्यासी भी है

या यूं कहूं कि योगी तो मोदी से भी बड़े वाला जालिम है

अब भगवान बताते हैं कि यह संघात बन्धु होने से क्या लाभ करता हैजितात्मन: प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः।शीतोष्ण-सुखदुःखेषु त...
24/02/2026

अब भगवान बताते हैं
कि
यह संघात बन्धु होने से क्या लाभ करता है

जितात्मन: प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः।
शीतोष्ण-सुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः।। ७ ।।

जिसने संघात पर विजय पा ली
और
बाह्य-आन्तर करणों को अत्यधिक उपरत कर लिया उसे ही परमात्मा का दृढ़ अपरोक्ष होता है।
ऐसे साधक को सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख और सम्मान-अपमान में सम रहना चाहिये।

कार्य-करण संघातको जिसने अपने वश में कर लिया,
वह सर्दी-गर्मी आदि परेशानियों से अपने रास्ते से इधर-उधर नहीं भटकता।
कहीं भी जाओ, कभी सर्दी कभी गर्मी होनी ही है।
कहीं गर्मी ज़्यादा हो जाएगी, कहीं सर्दी ज़्यादा हो जाएगी।
सर्वथा तो एक जैसा कहीं रहेगा नहीं।
यह ठीक है कि जो तुम्हारे शरीर की प्रकृति के अनुकूल हो, उससे मिलती-जुलती जो परिस्थिति हो, उसमें रहो।
लेकिन वहाँ भी सर्दी-गर्मी आदि से घबरा कर अगर स्थान ही परिवर्तन करते रहोगे तो साधना नहीं कर सकोगे।
सर्दी-गर्मी से ऐसे कौन प्रभावित नहीं होगा?

जो जितात्मा है उसें सर्दी-गर्मी से सुख-दुःख नहीं होगा, यह नहीं कह रहे हैं।
शरीर के प्रतिकूल सर्दी या गर्मी होगी तो अनुकूल नहीं होगी इसलिए सुख-दुःख तो होगा,
परंतु उससे प्रभावित न होने का मतलब है कि उसके कारण अपने श्रवण आदि का त्याग नहीं करना।
जितात्मा उसे सहन करके साधना में रत रहेगा।
शीतोष्ण की तरह दूसरे सुख-दुःख भी समझ लेने चाहिए।
जैसे सर्दी-गर्मी दुःख देती है वैसे ही कोई ज़ोर से डण्डा मारे तो जो दुःख होता है, वह भी शरीर के कारण ही।
डण्डा तो शरीर पर ही मारा जाता है। अथवा, गर्मी में पसीना बह रहा है,
किसी ने पंखे से हवा कर दी तो सुख भी होता है।
वह सुख भी तो शरीर को लेकर ही है
कोई तुम्हें गाली देता है तो तुम्हारे शरीर को कोई चोट नहीं लगती, मन को ही चोट लगती है, दुःख होता है।
कोई तुम्हारी प्रशंसा करता है तो शरीर को कोई आराम नहीं मिलता परंतु मन को सुख होता है।
इसलिये यहाँ ‘शीतोष्ण’ के द्वारा शरीर को प्रधान करके कहा, ‘सुख-दुःख’ के द्वारा मन को प्रधान करके कहा।
जितात्मा बनो ताकि उन सुख-दुखों के द्वारा परमात्मा की तरफ जाने को कम न करना पड़े।

अब किसी ने गाली दे दी और उपनिषद् का श्रवण करने बैठो तो तीन चौथाई समय मन कहता रहता है ‘उसने देखो, गाली दे दी! मेरा अपमान कर दिया!’
ऐसे में उपनिषद् का श्रवण ही पूरा नहीं हो पायेगा, आधी बात समझ में आयेगी, आधी समझ में ही नहीं आयेगी।

शीतोष्ण में और सुख-दुःख में तुमको अपने मार्ग से विचलित करने की सामर्थ्य न होवे,
यही तो उनको जीत लेना है, वश में कर लेना है।

इसी प्रकार मान और अपमान हैं।
मान अर्थात् तुमको कोई पूज्य समझे, तुम्हारी पूजा करे।
अपमान, कोई तुम्हारा परिभव करे, तिरस्कार करे।
पूजा और तिरस्कार से भी तुम अपनी साधना को मत छोड़ो, तब जितात्मा हो।

इस प्रकार जो जितात्मा होता है, वही प्रशान्त होता है।
प्रशान्त मायने प्रसन्न;
जैसे कार्तिक के महीने में तालाब प्रसन्न होते हैं,
सारी गंदगी नीचे बैठ जाती है,
ऊपर पानी बिल्कुल निर्मल होता है।
वर्षा में गंगा जी इतनी मटमैली हो जाती हैं कि हाथ डालो तो दीखता नहीं।
उसके बाद जब कार्तिक आता है तब धीरे-धीरे ऐसी निर्मल हो जाती हैं कि गहरे तले में जो पत्थर हैं वे चाहे तो ऊपर से गिन लो!
गंदगी सारी बैठ जाती है।
ऐसे स्वच्छ नदी, सरोवर आदि को कहते हैं कि प्रसन्न हो गये।

इसी प्रकार,
अन्तःकरण में राग-द्वेषादि संस्कारों का मैलापना है।
जितना-जितना तुम कार्य-करण-संघात को जीतते चले जाते हो उतना-ही-उतना अन्तःकरण शांत, प्रशान्त होता चला जाता है अर्थात् विकार नहीं रहते।
ऐसा जो प्रसन्न अन्तःकरण वाला,
अर्थात् राग-द्वेषादि से रहित,
सर्वथा निर्मल अन्तःकरण वाला, परमात्मा उसके अत्यन्त पास में बैठा हुआ है
अर्थात्
उसकी अपनी अहंकारात्मक वृत्ति के अंदर प्रतिबिम्बित हो रहा है।
अपने ही स्वच्छ हृदय में परमात्मा प्रकाशित होता है,
जिस प्रकार मुख साफ काँच में प्रकाशित होता है।
मुख तो अपने को कभी नहीं देख सकता,
परंतु साफ काँच में पड़ा हुआ जो प्रतिबिम्ब है वह जैसा मुँह है वैसा ज्ञान करा देता है,
ठीक ठीक बतला देता है कि मुँह कैसा है।
गंदा काँच होता है तो मुँह जैसा है वैसा नहीं दीखता,
काँच में पड़े हुए धब्बे भी मुँह पर दीखते हैं,
काँच के दोषों वाला मुँह दीखता है।

वैसे ही अन्तःकरण के दागों से,
अन्तःकरण के हिलने से,
दाग और हिलने वाला मैं चेतन ही प्रतीत हो रहा हूँ।
अन्तःकरण में प्रतीत चेतन वही है,
परंतु अन्तःकरण के दोषों वाला लग रहा है।
निर्विकार होने पर भी विकारी,
अकर्ता होने पर भी कर्त्ता,
अभोक्ता होने पर भी भोक्ता दीख रहा है क्योंकि अन्तःकरण के विकारादि से ‘मैं ऐसा हूँ’ यह दीख रहा है।
जितना-जितना अन्तःकरण प्रशान्त होता है उतना-ही-उतना अपना अकर्त्तृपना-अभोक्तापना प्रकट होने लगता है।
जब सर्वथा प्रशान्त हो जाता है तब ‘परमात्मा समाहितः।’
उसी अंतःकरण में शुद्ध ब्रह्मरूप का प्रतिभास होता है,
साक्षात्कार होता है।।७।।

अन्नत श्री विभुषित
महेशानंदगिरी जी महाराज
#श्रीकृष्णसंदेश

हर हर महादेव
23/02/2026

हर हर महादेव

20/02/2026
मनुष्य का जीवन अत्यंत अनिश्चित और क्षणभंगुर है। कोई नहीं जानता कि अगला पल क्या लेकर आएगा। आज जो व्यक्ति पूर्ण रूप से स्व...
13/02/2026

मनुष्य का जीवन अत्यंत अनिश्चित और क्षणभंगुर है।
कोई नहीं जानता कि अगला पल क्या लेकर आएगा।
आज जो व्यक्ति पूर्ण रूप से स्वस्थ, सुंदर और शक्तिशाली दिखाई देता है,
कल वही किसी गंभीर बीमारी या संकट से घिर सकता है।

इसी सच्चाई को हाशिम रज़ा की जीवन-कहानी गहराई से उजागर करती है...
हाशिम रज़ा एक ऐसे व्यक्ति थे जिनका चेहरा आकर्षक था
और
शरीर पूरी तरह से सेहतमंद प्रतीत होता था।
उन्हें देखकर कोई यह कल्पना भी नहीं कर सकता था कि जीवन अचानक उनसे इतनी बड़ी परीक्षा लेने वाला है।
एक दिन अचानक यह पता चला कि वे लिवर कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से पीड़ित हुए इसके बाद उनका जीवन संघर्ष, दर्द और असहनीय पीड़ा में बदल गया।
लंबे समय तक बीमारी से लड़ने के बाद अंततः उनका निधन हो गया।

हाशिम रज़ा दुबई में एक मरीन इंजीनियर के रूप में कार्यरत थे।
एक मरीन इंजीनियर का काम काफी चुनौतीपूर्ण और तकनीकी होता है,
जिसमें समुद्री जहाजों के इंजन, मशीनरी और उनके संचालन की पूरी जिम्मेदारी होती है।
वे अपने पेशेवर जीवन में काफी सफल थे और अपनी फिटनेस का भी बहुत ध्यान रखते थे।

जनवरी 2022 में जब उन्हें चौथे चरण (Stage 4) के कैंसर का पता चला,
तब वे अपने करियर के एक मजबूत पड़ाव पर थे।
काम छोड़ना पड़ा और उनका जीवन पूरी तरह से अस्पतालों और इलाज के बीच सिमट गया।
एक कुशल इंजीनियर होने के नाते उनमें जो अनुशासन और मानसिक दृढ़ता थी,
वही उनके कठिन समय में भी दिखाई दी।
उन्होंने अपनी शारीरिक स्थिति बिगड़ने के बावजूद अंतिम समय तक हिम्मत नहीं हारी

हाशिम रज़ा की पहली तस्वीर उनके आत्मविश्वास और शारीरिक सौष्ठव को दर्शाती है,
लेकिन दूसरी तस्वीर यह बताती है कि समय कैसे सब कुछ छीन लेता है।

इस पर शंकराचार्य भगवान कहते हैं:

"दिनमपि रजनी सायं प्रातः,
शिशिरवसन्तौ पुनरायातः।

कालः क्रीडति गच्छत्यायुस्तदपि
न मुञ्चत्याशावायुः॥"

दिन और रात, शाम और सुबह, शीत और वसंत—ये ऋतुएँ बार-बार आती-जाती रहती हैं।
काल हमारे जीवन के साथ खेल रहा है
और
निरंतर आयु बीतती जा रही है,
फिर भी मनुष्य अपनी तृष्णाओं और आशाओं के जाल को नहीं छोड़ता।
हाशिम का जीवन भी अपनी पूरी गति से चल रहा था, वे अपने करियर के शिखर पर थे,
तभी नियति ने अपना रुख बदल लिया।
एक मरीन इंजीनियर के रूप में हाशिम के पास सम्मान, पद और धन की कोई कमी नहीं रही होगी। परंतु जब चौथे चरण के कैंसर ने दस्तक दी,
तो ये भौतिक उपलब्धियां गौण हो गईं।

"मा कुरु धनजनयौवनगर्वं
हरति निमेषात्कालः सर्वम्।

मायामयमिदमखिलं हित्वा
ब्रह्मपदं त्वं प्रविश विदित्वा॥"

अर्थात्
अपने धन, शक्ति, मित्रों और यौवन पर कभी अहंकार मत करो;
समय एक पल में इन सबका हरण कर सकता है।
इस संपूर्ण संसार को मायाजाल समझकर
और
इसके मोह को त्यागकर उस परम सत्य को जानने का प्रयास करो।
हाशिम की कहानी चीख-चीख कर कह रही है कि जिस शरीर और पद को हम स्थायी मानते हैं,
वह पल भर में ही ढह सकता है।
अंतिम समय में व्यक्ति अपनी पीड़ा में अकेला होता है।
अस्पताल के बिस्तर पर लेटे हुए हाशिम का संघर्ष केवल उनका अपना था।

"यावत्पवनो निवसति देहे
तावत्पृच्छति कुशलं गेहे।

गतवति वायौ देहापाये
भार्या बिभ्यति तस्मिन्काये॥"

अर्थात्

जब तक शरीर में प्राण हैं,
तब तक घर-परिवार के लोग कुशलता पूछते हैं।
जैसे ही प्राण निकलते हैं
और
शरीर निर्जीव होता है,
तो सबसे प्रियजन भी उस काया से संकोच करने लगते हैं।

अंततः तो जीव को अपनी यात्रा अकेले ही तय करनी है,
चाहे वह बीमारी का संघर्ष हो या मृत्यु के बाद का पथ।

समय रहते शरीर व शरीरी को जान लेना ही परम पुरूषार्थ है

11/02/2026

अधिकार
(तीसरा सुत्र)

आपके मनमें कोई कार्य करनेकी रुचि है ?
सोच-विचार कर लीजिये,
आप कौन-सा कार्य करना चाहते हैं !
कार्य करनेका निश्चय
और
आरम्भ करनेसे पूर्व आपको अपनी योग्यता
एवं
शक्तिकी जाँच-पड़ताल कर लेनी चाहिये।

आप इन्जीनियर हैं तो डॉक्टरीका काम मत कीजिये,
वैज्ञानिक हैं तो दार्शनिक मत बनिये।
जिस विषयकी विशेष योग्यता आपने प्राप्त की है,
उसीमें हाथ डालिये !
आप क्या चाहते हैं,
आपमें क्या करनेका सामर्थ्य है,
आप उस विषयको अच्छी तरह समझते हैं कि नहीं,
आपके लिये वह निषिद्ध अर्थात् गैर-कानूनी तो नहीं है-
इन सब बातों पर विचार करके निश्चय कीजिये !

आप जो काम करने जा रहे हैं उससे आप अपनी कौन-सी कामना पूरी करने जा रहे हैं ?
कामना पूरी होनेके बाद निवृत्त हो जाती है उसके विषयमें अरुचि हो जाती है,
कभी-कभी तो ग्लानि भी हो जाती है-
इसलिये जो कामना हो वही काम करना-
यह प्रवृत्ति युक्तिसंगत नहीं है !
कार्य करनेका प्रयोजन होता है, वह कामसे विलक्षण है।

प्रयोजन-पूर्तिका अर्थ है कि उससे जो वस्तु मिले वह अपने साथ रहे,
वह अपने साथ मिल जाये !
जो छूट जाता है सो काम है, जो अपने साथ मिलकर रहता है वह प्रयोजन है !
अपने अधिकार,
कार्यकी रूप-रेखा,
सामर्थ्य, समझदारी, विहित
और
प्रयोजन पर ध्यान रखकर ही कोई कार्य करना चाहिये।

आप जो कार्य कर रहे हैं उससे आपका प्रयोजन पूर्ण हो जायेगा न ?
क्यों ?
प्रयोजन क्या है ?
सदाचारके संस्कार, सद्भाव, भगवद्भक्ति या तत्त्वज्ञान ?
ये मिलेंगे तो अपने साथ रहेंगे।

स्वामी अखंडानंद जी सरस्वती
“आनंद सूत्र “
3-1-85

श्रवणादि तीनों का स्वरूप बताते हैं श्रवण अर्थात् गुरु के और शास्त्र के उपदेश के तात्पर्य का अवधारणा करना। मनन अर्थात् उस...
11/02/2026

श्रवणादि तीनों का स्वरूप बताते हैं

श्रवण अर्थात् गुरु के और शास्त्र के उपदेश के तात्पर्य का अवधारणा करना।
मनन अर्थात् उस तात्पर्य-विषयभूत अर्थ के बारे में स्वयं को जो शंकाएँ उठें उनका युक्तियों से समाधान करना।
विज्ञान अर्थात् उक्त अर्थ स्वयं का अनुभव बन जाये।
अतः श्रवण - मनन -
श्रुत-मत-विज्ञानानि

श्रवणं गुरुशास्त्राभ्यां
मननं तु स्वयुक्तिभिः।

विज्ञानं स्वानुभूत्येति
श्रवणादेरसङ्करः।। २७ ।।

विज्ञान का स्वतंत्र स्वरूप और उपयोग स्पष्ट है।। २७ ।।

आत्मतत्त्व मन वाणी से परे है अतः शब्द उसे वाच्य के रूप में कहता नहीं जिससे विचार अपेक्षित होता है शब्द का इंगित अर्थ समझने के लिये।
उस विचार को श्रवण कहते हैं।
अरुंधति दिखाने के लिये जैसे स्थूल तारों का सहारा लेना पड़ता है वैसे आत्मा को बताने के लिये उपाधियों का सहारा लेना पड़ता है
और
विचार से उपाधियाँ छोड़ने पर आत्मा पता चलता है।

यहीं मिट्टी, लोहे, सोने जैसी अतिस्थूल चीज़ों के उदाहरण से परमसूक्ष्म सत्तत्त्व को समझाना पड़ा है।
अतः बिना गहन विचार के पता नहीं लगता कि शास्त्र कह क्या रहा है।
इसी से गुरु का अत्यधिक महत्त्व हो जाता है।

इंद्रियादि से गम्य बात तो किसी तरह समझी भी जाये पर उन सभी से अगम्य वस्तु को ठीक समझा या गलत, इसका स्वतः निर्णय करना कठिन है।
जानकार गुरु परीक्षापूर्वक कह सकता है कि हम ठीक समझे या नहीं।
इसीलिये संप्रदाय के प्रति आदर आवश्यक है।
आचार्य शंकर ने यहाँ तक कहा कि संप्रदायानुसार न समझने वाला चाहे जितना विद्वान् हो, मूर्ख की तरह उपेक्षा के ही योग्य है।
क्योंकि तत्त्व इतना सूक्ष्म है इसलिये अपनी मनीषा से यह निर्णय असंभव है कि हमने सही अनुभव पाया या नहीं।
जब शास्त्र-तात्पर्य मालूम चल जाये तब तद्विषयक जो शंकाएँ स्वयं को हों उनका उन्मूलन करना पड़ता है
अन्यथा निश्चय नहीं होगा कि वही बात ठीक है।
श्रवण में तो गुरु भी बहुत-सी युक्तियाँ बतायेगा,
शास्त्र भी युक्तियाँ देगा,
किंतु मनन में खुद युक्तियाँ सोचनी पड़ेंगी,
सहारा गुरु-शास्त्र से मिलेगा।
स्वयं को जाँचे इसके लिये किया विचार मनन है।
वकील की तरह चाहे-जिस पक्ष में तर्क बटोरना मनन नहीं है।

साधक के जैसे संस्कार हैं वैसी उसकी शंकाएँ होंगी जो वैसी ही युक्तियों से दूर भी होंगी।
मीमांसा-संस्कारों से उठी शंकाएँ न्याय की युक्तियों से कभी दूर नहीं होंगी,
आधुनिक विचारधाराओं के अनुसार होने वाली शंकाएँ प्राचीन परिपाटी के उत्तरों से दूर नहीं होंगी।
अतः जिस स्तर की शंका है,
उस स्तर पर उसका विश्लेषण साधक स्वयं करे।

एक बात याद रखने की है समस्या के स्तर से समाधान का स्तर ऊँचा ही होना पड़ेगा।
जो स्तर समस्या खड़ी कर रहा है वह समाधान दे पाता तो समस्या खड़ी ही क्यों करता!
अतः साधक शंका उठाने वाली युक्ति की काट के लिये उससे बेहतर स्तर की युक्ति सोचे यह ज़रूरी है।

‘मैं जितना समझता हूँ उतने पर ही बना रहूँ और समाधान निकल आये'
इस आशा में नहीं रहना चाहिये वरन् श्रेष्ठ शिक्षा ग्रहण करने का श्रम करके शंकाओं का उन्मूलन करना चाहिये।
सावधानी यह रखनी होगी कि उच्च स्तर पर जाते ही उस स्तर की शंकाएँ भी उठ सकती हैं जिनके लिये फिर और ऊँचा जाना पड़ेगा!
अतः हमेशा याद रखना है कि हम विचार क्यों कर रहे हैं?
मनन का एकमात्र प्रयोजन विज्ञान है,
अनुभव की अविचलितता है।
जो स्वयमेव उपस्थित होकर विचलन कराये उस शंका को दूर करना मनन है।

खोज कर शंकाओं का उद्भावन करें
फिर उन्हें दूर करें यह अभीष्ट नहीं है।
जिसे विज्ञानलाभ हो चुका वह पूर्वसंस्कारवश यदि तार्किक ऊहापोह का आनंद लेना चाहे तो अवश्य ले,
जैसे यदि वह खेती करने का मज़ा लेना चाहे तो ज़रूर ले,
पर साधक उस भँवर से अवश्य बचे,
मनन के नाम पर तर्कव्यूह में न घुसे।

श्रवण-मनन से प्राप्त होगा विज्ञान अर्थात् वह तत्त्व अपना स्थायी अनुभव हो जायेगा।
जैसे स्फीतालोक में घट साफ-साफ दिख जाता है ऐसा सुस्पष्ट अपरोक्ष होना विज्ञान है।
आत्मा वस्तु अपरोक्ष है तो इसका श्रवण से हुआ ज्ञान भी अपरोक्ष होता है पर संशय-विपर्यय के कारण वह निस्तेज होता है,

संशयादि मिटने पर वह विज्ञान हो जाता है,
तेजस्वी ज्ञान हो जाता है,
अविद्या को जला डालता है।। २७ ।।

महेशानंद गिरी जी
अनुभुतिप्रकाश:
श्वेतकेतु विद्याप्रकाश: प्रकरण

Address

Chak 3MJD नाथवाणा रोड़ ; रतनपुरा
Sangaria
335063

Opening Hours

Monday 9am - 5pm
Tuesday 9am - 5pm
Wednesday 9am - 5pm
Thursday 9am - 5pm
Friday 9am - 5pm
Saturday 9am - 5pm
Sunday 9am - 5pm

Telephone

+919828293538

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Mahant Madhodas Udaseen posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Contact The Practice

Send a message to Mahant Madhodas Udaseen:

Share

Share on Facebook Share on Twitter Share on LinkedIn
Share on Pinterest Share on Reddit Share via Email
Share on WhatsApp Share on Instagram Share on Telegram