Mahant Madhodas Udaseen

Mahant Madhodas Udaseen णमो लोए सव्व साहूणम

महादेव
28/03/2026

महादेव

28/03/2026

पंजाब पुलिस के लुधियाना में तैनात एसीपी ट्रैफिक गुरदेव सिंह को सुनिए जब उनकी बेटी की कार गलत पार्किंग पर टो की गई,
तो उन्होंने किसी तरह की सिफारिश करने से साफ इनकार कर दिया और कानून के मुताबिक चालान भरने को कहा।
उनका संदेश साफ है—कानून सबके लिए बराबर है, कोई भी उससे ऊपर नहीं।
इन्होने अपनी बेटी की गाड़ी गलत पार्किंग पर टो होने पर भी कोई सिफारिश या रियायत नहीं दी।

बेटी के फोन पर उन्होंने साफ कहा—“कानून के मुताबिक चालान भर दो, मैं क्या कर सकता हूं?”।
उन्होंने अपना अनुभव एक कालेज में विद्यार्थियों के साथ शेयर भी किया, ताकि यह संदेश सब तक पहुंचे कि कानून सबके लिए बराबर है, चाहे वो कोई भी हो।
ऐसे उदाहरण दुर्लभ ही होते हैं।
आमतौर पर सत्ता या रिश्तेदारी के दबाव में नियम टूटते देखे जाते हैं, लेकिन गुरदेव सिंह जी जैसे अधिकारी न सिर्फ नियम का पालन करते हैं, बल्कि इसे दूसरों के लिए मिसाल भी बनाते हैं।
इससे ट्रैफिक नियमों के प्रति लोगों का विश्वास बढ़ता है और “सबका साथ, सबका विकास” वाला सिद्धांत व्यवहार में उतरता दिखता है।
पंजाब पुलिस को भी ऐसे ईमानदार अधिकारियों पर गर्व होना चाहिए।
अगर सभी राज्यों के अधिकारी इसी राह पर चलें, तो शहरों में ट्रैफिक व्यवस्था और कानून का सम्मान कहीं बेहतर हो सकता है।

मैं तो उण रे संतन को हु दास ,जिन्होंने मन मार लिया।मन मारया तन वश किया जी ,किया भरमना दूर।बाहर तो कुछ दिखत नाही ,भीतर भल...
27/03/2026

मैं तो उण रे संतन को हु दास ,
जिन्होंने मन मार लिया।

मन मारया तन वश किया जी ,
किया भरमना दूर।

बाहर तो कुछ दिखत नाही ,
भीतर भलके वारे नूर।

मैं तो उण रे संतन को हु दास ,
जिन्होंने मन मार लिया।

आश्रमवासियों का परम सौभाग्य जो विरक्त शिरोमणि स्वामी परमात्मानंद जी अपने परम शिष्य सहित आश्रम पधारे, संगतों को निहाल किया🙏💐🙏

25/03/2026
22/03/2026

शाहिद कमाल कहते हैं

“शाख़-ए-मिज़्गाँ पे महकने लगे ज़ख़्मों के गुलाब
पिछले मौसम की मुलाक़ात की बू ज़िंदा है”

तानाशाहों की आदत होती है अक्सर जख्म देना
तानाशाहों का शौंक होता है लोगों के जख्मों को कुरेदना
तानाशाहों को सदैव किसी के जख्मों पर अट्टहास करने में आन्नद आता है
तानाशाह कभी भी जख्मों को विस्मृत नहीं होने देते
तानाशाह अक्सर अपनों को ही दुश्मन बनाने की कला में माहिर होते हैं, और ट्रम्प का यह बयान इसी का उदाहरण है।

विश्व बड़े मीडिया आउटलेट्स (BBC, NYT, Guardian, Al Jazeera, Reuters आदि) में रिपोर्ट के अनुसार गुरुवार, 19 मार्च 2026 को वाशिंगटन डी.सी. में व्हाइट हाउस (ओवल ऑफिस) में जापान की नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री सनाई तकाइची (Sanae Takaichi) अपनी पहली आधिकारिक अमेरिका यात्रा पर थीं, जहाँ उनकी मुलाकात राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प से हुई।

ओवल ऑफिस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान, एक रिपोर्टर ने ट्रम्प से पूछा कि अमेरिका ने ईरान पर हमला करने से पहले अपने सहयोगियों (Allies) को सूचित क्यों नहीं किया।

इसके जवाब में ट्रम्प ने जापान का ज़िक्र करते हुए एक ऐसी टिप्पणी की जिसे दुनिया भर में एक बड़ा कूटनीतिक अपमान (Diplomatic Gaffe) माना जा रहा है

ट्रम्प मजाक के रूप में अपमान करते हुए बोले “हम सरप्राइज चाहते थे।
और सरप्राइज के बारे में जापान से बेहतर कौन जानता है? है न?
तुमने भी तो मुझे (अमेरिका को) पर्ल हार्बर के बारे में पहले क्यों नहीं बताया था?” (Why didn’t you tell me about Pearl Harbor?)
“मुझे लगता है कि आप लोग हम पर हमला करने और सरप्राइज देने में हमसे कहीं ज़्यादा यकीन रखते हैं।”
रिपोर्ट्स और वीडियो फुटेज के अनुसार, जब ट्रम्प ने यह ‘मज़ाक’ किया, तो कमरे में सन्नाटा छा गया।
प्रधानमंत्री तकाइची के चेहरे के भाव तुरंत बदल गए, उनकी मुस्कान गायब हो गई और उन्होंने अपनी कुर्सी पर असहज होकर स्थिति बदली।
चूंकि वे एक अनुवादक (Interpreter) के माध्यम से बात कर रही थीं, उन्होंने तुरंत कोई तीखा जवाब नहीं दिया, लेकिन उनकी आंखों में हैरानी और चेहरे पर स्पष्ट नाराजगी देखी गई।

जापान के दृष्टिकोण से Al Jazeera चैनल के अनुसार जापान में इस पर embarrassment, confusion और unease का माहौल है
NYT और AP में भी स्कॉलर्स, पॉलिटिशियंस और कमेंटेटर्स ने कहा कि वो बोलतीं तो बेहतर होता, या ये रिलेशनशिप को हर्ट कर सकता है।
कुछ जापानी कट्टर राष्ट्रवादी आलोचकों ने तकाइची की वहां साधी गई चुप्पी पर भी सवाल उठाए,
पूर्व राजनयिक हितोशी तनाका ने लिखा कि राष्ट्राध्यक्ष के रूप में दोनों बराबर हैं, और केवल ट्रम्प को खुश करना और बिना नुकसान के लौट आना ही पर्याप्त नहीं है।
जापानी मीडिया में ऐसे कई पूर्व डिप्लोमैट्स की राय है कि “equal partners” की तरह ट्रिट होना चाहिए था।

यह बैठक ईरान के साथ चल रहे युद्ध और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) की सुरक्षा को लेकर बुलाई गई थी।
ट्रम्प चाहते तो ये थे कि जापान इस युद्ध में अमेरिका का साथ दे और अपनी नौसेना भेजे, लेकिन उन्होंने जापानियों के व संपूर्ण मानवता के कभी न भरने वाले जख्म पर नमक मिर्च छिड़क दिया जबकि जापान या अन्य देशों की अपनी संवैधानिक सीमाएं हैं।
इस घटना में हुए अपमान का क्या असर हो रहा है?
जापान में आक्रोश
जापान में इस टिप्पणी को बेहद ‘असंवेदनशील’ माना जा रहा है। दूसरे विश्व युद्ध की कड़वी यादों को इस तरह से कुरेदना एक गहरे अपमान के रूप में देखा जा रहा है।
तकाइची पर दबाव
तकाइची एक ‘हॉक’ (Hawkish) और राष्ट्रवादी नेता मानी जाती हैं। जापान के भीतर उन पर दबाव बढ़ रहा है कि वे इस अपमान का कड़ा जवाब दें और अमेरिका पर अपनी सुरक्षा निर्भरता को कम करें।
चीन की नज़र
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ट्रम्प की इस “बदतमीजी” का सबसे ज़्यादा फायदा चीन उठा सकता है, क्योंकि इससे अमेरिका-जापान के अटूट गठबंधन में पहली बार इतनी बड़ी दरार दिख रही है।
सोशल मीडिया और जापानी मीडिया में इस समय “Pearl Harbor Comment” की ज़बरदस्त चर्चा है
और
इसे ट्रम्प की अब तक की सबसे खराब कूटनीतिक गलतियों में से एक बताया जा रहा है।
ट्रम्प ने सरेआम जापानी प्रधानमंत्री की बेइज्जती की और जापान पर बहुत घटिया टिप्पणी की।
यह अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति के लिहाज से एक बहुत ही गंभीर और तनावपूर्ण स्थिति है।
यह दशकों पुराने अमेरिका-जापान संबंधों में एक बड़ी दरार पैदा कर सकती है।
​वैसे भी ट्रम्प आदतन व्हाइट हाउस में विदेशी राष्ट्राध्यक्षों की बेइज्जती करने के लिए कुख्यात हैं।
अनुवादक से अनुवाद सुनते ही जापानी प्रधानमंत्री बहुत ही असहज हो गईं।
जापान का गौरव (The Bushido Spirit) यानी जापान की संस्कृति में ‘अपमान’ को कभी भी भुलाया नहीं जाता।
तकाइची जैसी राष्ट्रवादी नेता के लिए यह व्यक्तिगत नहीं, बल्कि ये राष्ट्रीय सम्मान की बात है।
सनाई तकाइची (Sanae Takaichi) अपनी राष्ट्रवादी छवि और सख्त रुख के लिए जानी जाती हैं।
वे चीन जैसे देशों के सामने भी झुकने वालों में से नहीं हैं।
ऐसे में तकाइची जैसी नेता से यह उम्मीद करना स्वाभाविक है कि वे केवल कूटनीतिक नाराजगी ही नहीं जताएंगी, बल्कि जापान की संप्रभुता और सम्मान की रक्षा के लिए सीधा और कड़ा रुख अपनाएंगी।
जापान में आत्म-सम्मान (Self-respect) संस्कृति का एक अभिन्न हिस्सा है।
जापानी राष्ट्रप्रमुख का अपमान पूरी जापानी जनता का अपमान माना जाएगा, जिससे वहां अमेरिका विरोधी भावनाएं भड़क सकती हैं।
​सनाई तकाइची खुद बहुत ही आक्रामक नेता हैं, जो चीन की भी आंखों में आंखें डालकर बात करती हैं।
​ट्रम्प को तकाइची का जवाब जरूर आएगा। ट्रम्प ने अपनी बदतमीजी से अमेरिका का बड़ा नुकसान कर दिया है।
ट्रंप का यह व्यवहार अमेरिका के लिए रणनीतिक रूप से आत्मघाती साबित हो सकता है परिणामस्वरूप इंडो-पैसिफिक गठबंधन कमजोर होगा , अमेरिका-जापान गठबंधन (U.S.-Japan Security Treaty) इंडो-पैसिफिक की नींव है।
अब से अगर जापान ने ‘सुरक्षा के लिए आत्मनिर्भरता’ का रास्ता चुना, तो यह अमेरिकी वर्चस्व के अंत की शुरुआत होगी।
चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए जापान, अमेरिका का सबसे महत्वपूर्ण सहयोगी है। अगर यह रिश्ता टूटता है, तो इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अमेरिका की पकड़ ढीली हो जाएगी।
अमेरिका और जापान के बीच किसी भी तरह की अनबन का सीधा फायदा चीन को मिलेगा।
वह इस मौके का इस्तेमाल जापान को अपनी ओर झुकाने या कम से कम अमेरिका से दूर करने में कर सकता है।
अन्य मित्र देशों (जैसे दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और यूरोपीय देश) भी अब अमेरिकी नेतृत्व पर भरोसा करने से कतराएंगे, क्योंकि उन्हें डर रहेगा कि उनके साथ भी ऐसा ही व्यवहार हो सकता है।
इतिहास गवाह है कि तानाशाहों की बदतमीजी और अहंकार से उन्हे व्यक्तिगत सुर्खियां तो मिल सकती हैं, लेकिन राष्ट्रों के बीच बने बनाए संबंध पल भर में बिखर जाते हैं।
“क्या 21वीं सदी की कूटनीति में ‘अहंकार’ सबसे बड़ा आत्मघाती हथियार बन चुका है?”

“और अंत में हबीब जालिब के वो शब्द, जो आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं:”

तुम से पहले वो जो इक शख़्स यहाँ तख़्त-नशीं था
उस को भी अपने ख़ुदा होने पे इतना ही यक़ीं था

कोई ठहरा हो जो लोगों के मुक़ाबिल तो बताओ
वो कहाँ हैं कि जिन्हें नाज़ बहुत अपने तईं था

आज सोए हैं तह-ए-ख़ाक न जाने यहाँ कितने
कोई शोला कोई शबनम कोई महताब-जबीं था

अब वो फिरते हैं इसी शहर में तन्हा लिए दिल को
इक ज़माने में मिज़ाज उन का सर-ए-अर्श-ए-बरीं था

छोड़ना घर का हमें याद है ‘जालिब’ नहीं भूले
था वतन ज़ेहन में अपने कोई ज़िंदाँ तो नहीं था

(बाड़मेर के पूराने व संगरिया में अपनों से मिले ताजा जख्मों व उन पर छिड़के नमक पर व उसमें अपने परायों की श्रोताओं वाली भुमिका पर फिर कभी लिखूँगा)

कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्।सदा वसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥“कर्पूरगौरं- कपूर के समान ग...
19/03/2026

कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्।
सदा वसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥

“कर्पूरगौरं-
कपूर के समान गौर (सफेद) वर्ण वाले।
कपूर की तुलना इसलिए दी जाती है क्योंकि कपूर न केवल श्वेत होता है, बल्कि पवित्र और सुगंधित भी होता है। शिव की दिव्यता का यह सुंदर प्रतीक है।

करुणावतारं संसारसारं-
करुणा के साक्षात् अवतार।
इसका अर्थ है कि जब संसार की हर वस्तु का सार निकाला जाए, तो अंत में शिव ही शेष रहते हैं वे ही परम तत्व हैं। जो इस संसार के सार तत्व हैं।

भुजगेन्द्रहारम्-
जिन्होंने सर्पों के राजा (वासुकि) को हार के रूप में धारण किया है।
वासुकि नाग को हार की तरह धारण करना शिव के निर्भय और वैरागी स्वरूप को दर्शाता है। जो सबके लिए भयंकर है, वह शिव का आभूषण है।

सदा वसन्तं हृदयारविन्दे-
जो सदैव (भक्तों के) हृदय रूपी कमल में निवास करते हैं।
हृदय को कमल कहना भारतीय दर्शन की सुंदर परंपरा है
जैसे कमल कीचड़ में रहकर भी निर्मल रहता है, वैसे ही भक्त का हृदय संसार में रहकर भी शिव का वास-स्थान बन सकता है।

भवं भवानीसहितं नमामि-
उन भगवान शिव और माता पार्वती (भवानी) को मैं प्रणाम करता हूँ।

18/03/2026

भीड़ की भावनाओं के साथ बह कर लोकप्रिय हो जाने की राह अक्सर आसान लगती है
इतिहास हमें ऐसे ही तीन उदाहरण बताता हैं जो ठीक इसी विभाजक रेखा को रेखांकित करते हैं।

रूपकंवर कांड (1987) में राजस्थान के सीकर जिले के देवराला गांव में 18 वर्षीय रूप कंवर की सती प्रथा के अंतर्गत मौत ने पूरे देश को हिला दिया था।
यह घटना क्षेत्रीय गौरव (खासकर राजपूत समाज में) और क्रूर कुरीति के बीच की धुंधली लकीर को उजागर करती है।
उस समय इसके पक्ष में उन्माद चरम पर था
हजारों लोग इसे ‘स्वैच्छिक’ और पवित्र मान रहे थे।
भैरो सिंह शेखावत, जो तब राजस्थान के मुख्यमंत्री थे और जिनका मुख्य वोट बैंक राजपूत समाज था,
उन्होंने भीड़ के रूख के खिलाफ जाकर इस प्रथा के खिलाफ स्पष्ट रुख अपनाया।
उन्होंने सती को रोकने के लिए तत्काल कदम उठाए, कानूनी कार्रवाई की वकालत की,
और बाद में इसी घटना ने सती (रोकथाम) अधिनियम 1987 को जन्म दिया।
हालाँकि भैरोसिंह शेखावत जी की भूमिका को लेकर कुछ इतिहासकारों में मतभेद है

तात्कालिक तौर पर तो यह राजनीतिक सुसाइड जैसा जोखिम लग रहा था,
लेकिन
उन्होंने इसको वोट बैंक से ऊपर मानवीय मूल्यों को चुना जो यह साबित करता है कि सच्चा लीडर समाज को mirror नहीं दिखाता, बल्कि खुद दर्पण बनकर उसकी कमियों को सुधारने का साहस करता है।

चंद्रशेखर का ‘यंग तुर्क’ कहलाना उनकी बेबाकी का सदा रहने वाला प्रमाण है।
ऑपरेशन ब्लू स्टार (1984) के निराशा , भय और अवसाद से भरे समय में जब अधिकांश राजनीतिक दल या तो चुप थे या सरकार के साथ थे, उन्होंने इसका मुखर विरोध किया।
उन्होंने स्वर्ण मंदिर पर सैन्य कार्रवाई को दूरगामी प्रभावों को भांपते हुए सिख समुदाय की भावनाओं पर हमला माना जो आज पंजाब के राजनीतिक हालातों को देख सही सिद्ध हो रहा है
लेकिन
उनका सबसे मार्मिक उनका रुख 1984 के सिख विरोधी दंगों के भयावह दौर में था
जब इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली की सड़कों पर षड्यंत्रपूर्वक लक्षित हिंसा फैली,
व्यवस्था या तो खामोश थी या पक्षपाती थी, तब चंद्रशेखर सड़कों पर उतरे, सिख परिवारों की रक्षा की, आग बुझाई और पीड़ितों की मदद की।
ये उनका नैतिकता को सत्ता की गणित से ऊपर रखने का जीवंत प्रमाण है भीड़ के उन्माद के बीच अकेले खड़े होना कभी आसान नहीं होता।

ऐसे ही सूर्यदेव सिंह जो झारिया (धनबाद) के पूर्व विधायक और एक तथाकथित ‘बाहुबली’ छवि वाले नेता कहे जाते थे,
लेकिन 1984 के संकट में (सिख विरोधी दंगों के दौरान) उन्होंने सिख समुदाय के लोगों को संरक्षण दिया। जब कई ‘रक्षक’ खुद भक्षक बन रहे थे, तब उनका यह व्यक्तिगत साहस इस बात का प्रतीक था कि मानवीय संवेदना किसी छवि, पद या राजनीतिक लाभ से बंधी नहीं होती।
सच्चा साहस संकट में सामने आता है, न कि भीड़ की तालियों में ये तीनों उदाहरण एक ही सिद्धांत की पुष्टि करते हैं कि सच्चा नेतृत्व लोकप्रियता की बलि पर सत्य और न्याय चुनता है।
आज के दौर में जब सोशल मीडिया और पॉपुलिज्म ने ‘भीड़-pleasing’ को आसान बना दिया है, ऐसे ऐतिहासिक उदाहरण हमें याद दिलाते हैं कि असली राजमर्मज्ञ वही है जो समाज के हित में कठोर फैसले ले सके, भले ही उसकी लोकप्रियता दांव पर लग जाए।

हर आंदोलन या घटनाओं के यही सिद्ध होता है कि “भीड़ के साथ बहना लोकप्रियता तो दे सकता है, नेतृत्व नहीं।
क्योंकि भीड़ का लाभ हमेशा कोई और उठा जाता है और पीछे बचती है सिर्फ निराशा।
सच्चा राजमर्मज्ञ वही है जो उस भीड़ को रचनात्मक दिशा दे, उसके साथ बह न जाए।”

"कुछ सूरज के साथ रहकर भी भूले नहीं अदब..
और कुछ जुगनू का साथ पाकर ,,,मगरूर हो गये!"

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