06/12/2025
© भाई अजीत प्रताप सिंह जी ने हमारे हृदय उद्गारों को कितने सुन्दर तरीके से कहा है।
लेख पढ़कर देखिए आप सब 👏
क्या भाजपा हिन्दू धर्म की एकमात्र प्रतिनिधि है?
क्या राम मंदिर के भूमिपूजन, शिलान्यास, प्राणप्रतिष्ठा और ध्वजारोहण के लिए मोदी और संघ के भागवत ही अधिकारी हैं?
क्या हिन्दू का अर्थ मात्र भाजपा है? क्या राम सबके नहीं, बस भाजपा के हैं?
उपरोक्त प्रश्न कुछेक मित्रों के हैं, और देख-सुनकर लगता है कि यह प्रश्न कइयों के मस्तिष्क में उठता रहता है।
देश को आजाद हुए कई साल हुए। हमने, हमारे बाप-दादाओं के कई सरकारें देखी। हमने ही उन अलग-अलग तरह की सरकारों को चुना। इस देश के सबसे बड़े बहुसंख्यक समाज ने, अर्थात हिंदुओं के एक बड़े प्रतिशत ने अपेक्षा रखी थी कि जो हमारा है, वह हमें वापस मिलना चाहिए। तमाम सरकारें आई और चली गई, अधिकांश को देखकर तो ऐसा लगा कि जैसे वे चाहती ही नहीं कि हमारे साथ न्याय हो। एकाध ने कुछ किया भी तो लगा कि बच्चे बहलाये जा रहे हैं। कानून बना दिया कि जो है, जैसा है, वैसा ही रहेगा।
हम ठगे से खड़े रह गए कि भाई, हमारा क्या? रामचरितमानस लिखने वाला तुलसीदास मस्जिद के सामने रोज जाकर प्रणाम करता था। क्या वह अकेला ऐसा था या उस जमाने में उसके जैसे हजारों लोग उस मस्जिद को रामजन्मभूमि मानकर प्रणाम और परिक्रमा करते थे? सरकार मुगलों का था, तो मस्जिद को ही प्रणाम करके लौट जाते थे लोग।
मुगल गए तो लख़नऊ-अवध के नवाब आ गए। तब भी वही हाल। नवाबी खत्म हुई तो अंग्रेज आ गए। तब भी वही हाल। अंग्रेज गए तो भारत सरकार आ गई। और जुल्म देखिए कि तब भी वही हाल।
सोचिए, सैकड़ों सालों बाद अयोध्या में ख़ालिस भारतीय सरकार, हिंदुओं के वोटों से चुनकर बनी सरकार, केंद्र में भी, राज्य में भी, पर राम भक्तों की स्थिति जस की तस।
फिर संघ सक्रिय हुआ। वही संघ जिसकी राजनैतिक शाखा कही जाती है भाजपा। संघ से निकले लोग विहिप में गए और विहिप ने मोर्चा संभाला। भाषण हुए, आंदोलन हुए, यात्राएँ निकली। गिरफ्तारियां हुई। इन सबमें किसने कष्ट झेला? बीजेपी और संघ वालों ने ही न?
कारसेवकों पर सपा सरकार ने गोली चला दी। हिंदू मारे गए। बाद में कई अवसरों पर सपा के मुखिया ने गर्व से यह बात बताई की हमने हिन्दू भीड़ पर गोली चलाई।
ढाँचा गिराया गया। भाजपा सरकार ने एक गोली नहीं चलाई। बाद में कई अवसरों पर भाजपा नेता ने गर्व से बताया कि हमने एक गोली नहीं चलाई।
इन दो बयानों के बाद हिन्दू, वह हिन्दू जो राम मंदिर के लिए पिछले पांच सौ साल से तड़प रहा था, वह क्या समझता? कौन है हिंदुओं के साथ?
खामियाजा किसने भुगता? तत्कालीन यूपी की बीजेपी सरकार बर्खास्त कर दी गई। मध्य प्रदेश, राजस्थान और हिमाचल बीजेपी सरकारें भी बर्खास्त कर दी गईं। किसकी बर्खास्त हुई, बीजेपी की। किसने की, कोंग्रेस ने। इससे हिन्दू रामभक्त समाज क्या समझता कि कौन हिंदुओं के साथ है?
मामला कोर्ट में गया। एक दूसरे मामले में सरकार के वकील ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दिया था कि राम तो काल्पनिक हैं। उस सरकार में कौन-कौन से दल थे? कॉंग्रेस, ममता बनर्जी की पार्टी, लालू की पार्टी, शरद पवार की पार्टी, स्टालिन की पार्टी, कम्युनिस्ट पार्टियां और बाहर से समर्थन दे रही थी मुलायम-अखिलेश की पार्टी। कोर्ट में विरोध में कौन था, भाजपा, जयललिता और विश्व हिंदू परिषद।
सोचिए कि राम भक्त हिंदू मानस किसे अपना मानेगा?
इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला आया। जमीन का बंटवारा कर दिया। केस लड़ने वाली सभी पार्टियां सुप्रीम कोर्ट चली गई। उसने स्टे लगा दिया। और स्टे कब तक चला? पूरे आठ साल।
बीजेपी की केंद्र में सरकार आ गई। राज्य में बीजेपी की सरकार आ गई। क्या लगता है कि कोर्ट ने क्यों सुनवाई फिर से शुरू की होगी?
क्या जनभावना का दबाव होता है कोर्ट पर? खुद कोर्ट ने कई अन्य मामलों में इसके अप्रत्यक्ष संकेत दिए हैं। केस शुरू हुआ और कोर्ट ने बोला कि चलो, इतना टाइम देते हैं, मिलबैठकर खुद ही मामला सुलझा लो। कमाल की बात कही थी कोर्ट ने। मिलबैठकर सुलझ सकता तो क्या यह मामला 500 साल से चला आ रहा होता? पर चलिए, दिया गया समय पूरा हुआ।
बीजेपी सरकार ने त्वरित सुनवाई, डेली सुनवाई की बात कही। विपक्ष बोला कि इतनी जल्दी क्या है। सोचिए, कोई मेरे घर में घुसा बैठा है तो मैं तो कहूंगा ही कि जल्दी-जल्दी मामला सुनो, जल्दी से फैसला दो। कोर्ट के बाहर बयान आते रहे कि भाजपा अनावश्यक जल्दीबाजी मचा रही है।
तमाम कागजों की जरूरत थी कोर्ट में। ऐसे दस्तावेज जो फ़ारसी में, उर्दू में, संस्कृत में, हिंदी में, फ्रेंच और स्पेनिश में थे। भाजपा की राज्य सरकार ने त्वरित अनुवाद कराएं। क्या यूपी में तब कोई और, जैसे गोली चला देने वाली सपा, या राम को काल्पनिक कहने वाली कोंग्रेस होती तो ये डॉक्युमेंट्स इतनी जल्दी ट्रांसलेट हो पाते?
फैसला आ गया। और लागू हो गया।
फैसला लागू होना कितनी बड़ी बात है यह एक उदाहरण से समझिए। बनारस में एक बीघे की जमीन है जिसे शिया मुस्लिम मस्जिद मानते हैं और सुन्नी कब्रिस्तान। यह मामला आज का नहीं, बल्कि 1878 से चला आ रहा है। इसपर सुप्रीम कोर्ट ने 1981 में निर्णय सुनाया कि जो दो कब्रें हैं उन्हें हटा दो, बाउंड्री बना दो और जगह जो है वो शिया मुस्लिमों की है। जानते हैं सरकार ने, यूपी की कॉंग्रेस सरकार ने क्या किया? वो कोर्ट चली गई कि हम तो भाई इस फैसले को लागू नहीं कर सकते, दंगे भड़क सकते हैं। और मजा देखिए कि कोर्ट का फैसला आये आज चालीस साल हो गए, फैसला लागू नहीं हो सका। एक बीघे की छोटी सी जमीन, बस 100 साल पुराना मामला, मुस्लिमों के आपस की बात, कोई बड़ा ऐतिहासिक महत्व नहीं, पर दंगों के डर से सुप्रीम कोर्ट का फैसला लागू ही नहीं हुआ। आज तक नहीं हुआ। चालीस साल हो गए।
इधर 500 साल पुराना मामला, ऐतिहासिक मामला, देश की दो बड़ी बहुसंख्यक आबादी वाले समुदायों, हिन्दू-मुस्लिम के बीच का मामला, बस तीन महीने में पूरी तरह लागू हो गया।
कोर्ट का फैसला आया। देश में, प्रदेश में एक कौवा नहीं चीखा। एक सियार नहीं रोया। एक पत्थर नहीं उछला। एक गोली नहीं चली। एक गिरफ्तारी नहीं हुई। एक सड़क नहीं छेकी गई। फैसला रामलला के टेंट में पहुंचा, जिलाधिकारी को मिला, और अगले दिन जमीन मुक्त हो गई। तीन महीने में केंद्र सरकार ने कमेटी बना दी और भूमि ट्रांसफर हो गई।
आज तमाम संगठन बोलते हैं कि मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त किया जाए। अयोध्या मंदिर ट्रस्ट तो केंद्र की भाजपा सरकार ने ही बनाया, कोर्ट ने अधिकार दिया था। सरकार चाहती तो नियंत्रण अपने पास रख सकती थी। पर नहीं, मामूली से मामूली अधिकार भी सरकार के पास नहीं है। कमेटी बना दी और उसे स्वतंत्र कर दिया। कमेटी में 15 सदस्य, जिनमें से 5 को कोई वोटिंग अधिकार नहीं। मतलब ये 5 कोई भी निर्णय नहीं ले सकते, हस्तक्षेप नहीं कर सकते। इन पांच में से तीन सरकारी हैं। केंद्र सरकार का प्रतिनिधि, उत्तरप्रदेश सरकार का प्रतिनिधि और अयोध्या जिले के जिलाधिकारी। जिलाधिकारी भी हिन्दू हो तभी, अगर हिंदू नहीं है तो जिलाधिकारी की जगह पर उपजिलाधिकारी सदस्य होंगे। सरकार मंदिर के चढ़ावे से एक पैसा नहीं ले सकती। एक ईंट नहीं खिसका सकती।
हिन्दू मानस क्या यह सब नहीं देखता कि तमाम मंदिरों की आय सरकारें लूट लेती हैं, मनमर्जी से खर्च करती हैं, गैर हिन्दू ट्रस्टी नियुक्त करती है, मंदिर की रंगाई-पुताई पर मनमाने फैसले लेती हैं। तमिलनाडु के एक मंदिर पर सरकारी अधिकारी ने चूना पुतवा दिया था। क्या अयोध्या मंदिर पर आज, कल, आज से 50 साल बाद भी कोई सरकार अपनी मनमर्जी चला पाएगी? किसने मनमर्ज़ियों पर हमेशा-हमेशा के लिए रोक लगा दी है? जबकि वह चाहती तो कुछ भी करने को परम स्वतंत्र थी।
प्रश्न था कि क्या हिन्दू का अर्थ मात्र भाजपा है, क्या राम सबके नहीं, बस भाजपा के हैं। प्रश्न था कि क्या भाजपा हिंदुओं की एकमात्र प्रतिनिधि है।
नहीं है, पर और कोई दिखता है क्या किसी को? चलो, एक बार को मान लिया कि राम सबके हैं। पर क्या सब राम के हैं?
प्रश्न था कि क्या राम मंदिर के भूमिपूजन, शिलान्यास, प्राणप्रतिष्ठा और ध्वजारोहण के लिए मोदी और संघ के भागवत ही अधिकारी हैं। मेरा प्रतिप्रश्न है कि और कौन था अधिकारी? आज राममंदिर हिंदुओं के मन से निकलकर भौतिक स्वरूप में आँखों के सामने है तो संघ के कारण, विहिप के कारण। संघ ने कार्य किया तो उसके प्रतिनिधि के रूप में उनके मुखिया से अधिक उपयुक्त कौन होता? और मोदी और भले कुछ हों या न हों, भारत देश के मुखिया हैं। लोकतांत्रिक रूप से चुने गए शासक हैं, नागरिकों के प्रतिनिधित्व के लिए प्रधानमंत्री से बेहतर और कौन होगा?
मंदिर निर्माण हेतु हवन में हव्य डालता हुआ, बालक राम की आरती उतारता हुआ, रामलला के चरणों में पुष्प चढ़ाता हुआ वह हाथ, धर्मध्वजा को प्रणाम करता हुआ वह कपकपाता हुआ हाथ मेरा ही था। मैं वहाँ नहीं हो सकता था, मेरे जैसे लाखों-करोड़ों लोग नहीं हो सकते थे, इसलिए वहाँ हमारा प्रतिनिधि था।
बाकी,
मस्त रहें, मर्यादित रहें, महादेव सबका भला करें।]
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अजीत
2 दिसम्बर 25