Mahant Madhodas Udaseen

Mahant Madhodas Udaseen णमो लोए सव्व साहूणम

© भाई अजीत प्रताप सिंह जी ने हमारे हृदय उद्गारों को कितने सुन्दर तरीके से कहा है।लेख पढ़कर देखिए आप सब 👏क्या भाजपा हिन्द...
06/12/2025

© भाई अजीत प्रताप सिंह जी ने हमारे हृदय उद्गारों को कितने सुन्दर तरीके से कहा है।
लेख पढ़कर देखिए आप सब 👏

क्या भाजपा हिन्दू धर्म की एकमात्र प्रतिनिधि है?
क्या राम मंदिर के भूमिपूजन, शिलान्यास, प्राणप्रतिष्ठा और ध्वजारोहण के लिए मोदी और संघ के भागवत ही अधिकारी हैं?
क्या हिन्दू का अर्थ मात्र भाजपा है? क्या राम सबके नहीं, बस भाजपा के हैं?

उपरोक्त प्रश्न कुछेक मित्रों के हैं, और देख-सुनकर लगता है कि यह प्रश्न कइयों के मस्तिष्क में उठता रहता है।

देश को आजाद हुए कई साल हुए। हमने, हमारे बाप-दादाओं के कई सरकारें देखी। हमने ही उन अलग-अलग तरह की सरकारों को चुना। इस देश के सबसे बड़े बहुसंख्यक समाज ने, अर्थात हिंदुओं के एक बड़े प्रतिशत ने अपेक्षा रखी थी कि जो हमारा है, वह हमें वापस मिलना चाहिए। तमाम सरकारें आई और चली गई, अधिकांश को देखकर तो ऐसा लगा कि जैसे वे चाहती ही नहीं कि हमारे साथ न्याय हो। एकाध ने कुछ किया भी तो लगा कि बच्चे बहलाये जा रहे हैं। कानून बना दिया कि जो है, जैसा है, वैसा ही रहेगा।

हम ठगे से खड़े रह गए कि भाई, हमारा क्या? रामचरितमानस लिखने वाला तुलसीदास मस्जिद के सामने रोज जाकर प्रणाम करता था। क्या वह अकेला ऐसा था या उस जमाने में उसके जैसे हजारों लोग उस मस्जिद को रामजन्मभूमि मानकर प्रणाम और परिक्रमा करते थे? सरकार मुगलों का था, तो मस्जिद को ही प्रणाम करके लौट जाते थे लोग।

मुगल गए तो लख़नऊ-अवध के नवाब आ गए। तब भी वही हाल। नवाबी खत्म हुई तो अंग्रेज आ गए। तब भी वही हाल। अंग्रेज गए तो भारत सरकार आ गई। और जुल्म देखिए कि तब भी वही हाल।

सोचिए, सैकड़ों सालों बाद अयोध्या में ख़ालिस भारतीय सरकार, हिंदुओं के वोटों से चुनकर बनी सरकार, केंद्र में भी, राज्य में भी, पर राम भक्तों की स्थिति जस की तस।

फिर संघ सक्रिय हुआ। वही संघ जिसकी राजनैतिक शाखा कही जाती है भाजपा। संघ से निकले लोग विहिप में गए और विहिप ने मोर्चा संभाला। भाषण हुए, आंदोलन हुए, यात्राएँ निकली। गिरफ्तारियां हुई। इन सबमें किसने कष्ट झेला? बीजेपी और संघ वालों ने ही न?

कारसेवकों पर सपा सरकार ने गोली चला दी। हिंदू मारे गए। बाद में कई अवसरों पर सपा के मुखिया ने गर्व से यह बात बताई की हमने हिन्दू भीड़ पर गोली चलाई।

ढाँचा गिराया गया। भाजपा सरकार ने एक गोली नहीं चलाई। बाद में कई अवसरों पर भाजपा नेता ने गर्व से बताया कि हमने एक गोली नहीं चलाई।

इन दो बयानों के बाद हिन्दू, वह हिन्दू जो राम मंदिर के लिए पिछले पांच सौ साल से तड़प रहा था, वह क्या समझता? कौन है हिंदुओं के साथ?

खामियाजा किसने भुगता? तत्कालीन यूपी की बीजेपी सरकार बर्खास्त कर दी गई। मध्य प्रदेश, राजस्थान और हिमाचल बीजेपी सरकारें भी बर्खास्त कर दी गईं। किसकी बर्खास्त हुई, बीजेपी की। किसने की, कोंग्रेस ने। इससे हिन्दू रामभक्त समाज क्या समझता कि कौन हिंदुओं के साथ है?

मामला कोर्ट में गया। एक दूसरे मामले में सरकार के वकील ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दिया था कि राम तो काल्पनिक हैं। उस सरकार में कौन-कौन से दल थे? कॉंग्रेस, ममता बनर्जी की पार्टी, लालू की पार्टी, शरद पवार की पार्टी, स्टालिन की पार्टी, कम्युनिस्ट पार्टियां और बाहर से समर्थन दे रही थी मुलायम-अखिलेश की पार्टी। कोर्ट में विरोध में कौन था, भाजपा, जयललिता और विश्व हिंदू परिषद।

सोचिए कि राम भक्त हिंदू मानस किसे अपना मानेगा?

इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला आया। जमीन का बंटवारा कर दिया। केस लड़ने वाली सभी पार्टियां सुप्रीम कोर्ट चली गई। उसने स्टे लगा दिया। और स्टे कब तक चला? पूरे आठ साल।

बीजेपी की केंद्र में सरकार आ गई। राज्य में बीजेपी की सरकार आ गई। क्या लगता है कि कोर्ट ने क्यों सुनवाई फिर से शुरू की होगी?

क्या जनभावना का दबाव होता है कोर्ट पर? खुद कोर्ट ने कई अन्य मामलों में इसके अप्रत्यक्ष संकेत दिए हैं। केस शुरू हुआ और कोर्ट ने बोला कि चलो, इतना टाइम देते हैं, मिलबैठकर खुद ही मामला सुलझा लो। कमाल की बात कही थी कोर्ट ने। मिलबैठकर सुलझ सकता तो क्या यह मामला 500 साल से चला आ रहा होता? पर चलिए, दिया गया समय पूरा हुआ।

बीजेपी सरकार ने त्वरित सुनवाई, डेली सुनवाई की बात कही। विपक्ष बोला कि इतनी जल्दी क्या है। सोचिए, कोई मेरे घर में घुसा बैठा है तो मैं तो कहूंगा ही कि जल्दी-जल्दी मामला सुनो, जल्दी से फैसला दो। कोर्ट के बाहर बयान आते रहे कि भाजपा अनावश्यक जल्दीबाजी मचा रही है।

तमाम कागजों की जरूरत थी कोर्ट में। ऐसे दस्तावेज जो फ़ारसी में, उर्दू में, संस्कृत में, हिंदी में, फ्रेंच और स्पेनिश में थे। भाजपा की राज्य सरकार ने त्वरित अनुवाद कराएं। क्या यूपी में तब कोई और, जैसे गोली चला देने वाली सपा, या राम को काल्पनिक कहने वाली कोंग्रेस होती तो ये डॉक्युमेंट्स इतनी जल्दी ट्रांसलेट हो पाते?

फैसला आ गया। और लागू हो गया।

फैसला लागू होना कितनी बड़ी बात है यह एक उदाहरण से समझिए। बनारस में एक बीघे की जमीन है जिसे शिया मुस्लिम मस्जिद मानते हैं और सुन्नी कब्रिस्तान। यह मामला आज का नहीं, बल्कि 1878 से चला आ रहा है। इसपर सुप्रीम कोर्ट ने 1981 में निर्णय सुनाया कि जो दो कब्रें हैं उन्हें हटा दो, बाउंड्री बना दो और जगह जो है वो शिया मुस्लिमों की है। जानते हैं सरकार ने, यूपी की कॉंग्रेस सरकार ने क्या किया? वो कोर्ट चली गई कि हम तो भाई इस फैसले को लागू नहीं कर सकते, दंगे भड़क सकते हैं। और मजा देखिए कि कोर्ट का फैसला आये आज चालीस साल हो गए, फैसला लागू नहीं हो सका। एक बीघे की छोटी सी जमीन, बस 100 साल पुराना मामला, मुस्लिमों के आपस की बात, कोई बड़ा ऐतिहासिक महत्व नहीं, पर दंगों के डर से सुप्रीम कोर्ट का फैसला लागू ही नहीं हुआ। आज तक नहीं हुआ। चालीस साल हो गए।

इधर 500 साल पुराना मामला, ऐतिहासिक मामला, देश की दो बड़ी बहुसंख्यक आबादी वाले समुदायों, हिन्दू-मुस्लिम के बीच का मामला, बस तीन महीने में पूरी तरह लागू हो गया।

कोर्ट का फैसला आया। देश में, प्रदेश में एक कौवा नहीं चीखा। एक सियार नहीं रोया। एक पत्थर नहीं उछला। एक गोली नहीं चली। एक गिरफ्तारी नहीं हुई। एक सड़क नहीं छेकी गई। फैसला रामलला के टेंट में पहुंचा, जिलाधिकारी को मिला, और अगले दिन जमीन मुक्त हो गई। तीन महीने में केंद्र सरकार ने कमेटी बना दी और भूमि ट्रांसफर हो गई।

आज तमाम संगठन बोलते हैं कि मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त किया जाए। अयोध्या मंदिर ट्रस्ट तो केंद्र की भाजपा सरकार ने ही बनाया, कोर्ट ने अधिकार दिया था। सरकार चाहती तो नियंत्रण अपने पास रख सकती थी। पर नहीं, मामूली से मामूली अधिकार भी सरकार के पास नहीं है। कमेटी बना दी और उसे स्वतंत्र कर दिया। कमेटी में 15 सदस्य, जिनमें से 5 को कोई वोटिंग अधिकार नहीं। मतलब ये 5 कोई भी निर्णय नहीं ले सकते, हस्तक्षेप नहीं कर सकते। इन पांच में से तीन सरकारी हैं। केंद्र सरकार का प्रतिनिधि, उत्तरप्रदेश सरकार का प्रतिनिधि और अयोध्या जिले के जिलाधिकारी। जिलाधिकारी भी हिन्दू हो तभी, अगर हिंदू नहीं है तो जिलाधिकारी की जगह पर उपजिलाधिकारी सदस्य होंगे। सरकार मंदिर के चढ़ावे से एक पैसा नहीं ले सकती। एक ईंट नहीं खिसका सकती।

हिन्दू मानस क्या यह सब नहीं देखता कि तमाम मंदिरों की आय सरकारें लूट लेती हैं, मनमर्जी से खर्च करती हैं, गैर हिन्दू ट्रस्टी नियुक्त करती है, मंदिर की रंगाई-पुताई पर मनमाने फैसले लेती हैं। तमिलनाडु के एक मंदिर पर सरकारी अधिकारी ने चूना पुतवा दिया था। क्या अयोध्या मंदिर पर आज, कल, आज से 50 साल बाद भी कोई सरकार अपनी मनमर्जी चला पाएगी? किसने मनमर्ज़ियों पर हमेशा-हमेशा के लिए रोक लगा दी है? जबकि वह चाहती तो कुछ भी करने को परम स्वतंत्र थी।

प्रश्न था कि क्या हिन्दू का अर्थ मात्र भाजपा है, क्या राम सबके नहीं, बस भाजपा के हैं। प्रश्न था कि क्या भाजपा हिंदुओं की एकमात्र प्रतिनिधि है।

नहीं है, पर और कोई दिखता है क्या किसी को? चलो, एक बार को मान लिया कि राम सबके हैं। पर क्या सब राम के हैं?

प्रश्न था कि क्या राम मंदिर के भूमिपूजन, शिलान्यास, प्राणप्रतिष्ठा और ध्वजारोहण के लिए मोदी और संघ के भागवत ही अधिकारी हैं। मेरा प्रतिप्रश्न है कि और कौन था अधिकारी? आज राममंदिर हिंदुओं के मन से निकलकर भौतिक स्वरूप में आँखों के सामने है तो संघ के कारण, विहिप के कारण। संघ ने कार्य किया तो उसके प्रतिनिधि के रूप में उनके मुखिया से अधिक उपयुक्त कौन होता? और मोदी और भले कुछ हों या न हों, भारत देश के मुखिया हैं। लोकतांत्रिक रूप से चुने गए शासक हैं, नागरिकों के प्रतिनिधित्व के लिए प्रधानमंत्री से बेहतर और कौन होगा?

मंदिर निर्माण हेतु हवन में हव्य डालता हुआ, बालक राम की आरती उतारता हुआ, रामलला के चरणों में पुष्प चढ़ाता हुआ वह हाथ, धर्मध्वजा को प्रणाम करता हुआ वह कपकपाता हुआ हाथ मेरा ही था। मैं वहाँ नहीं हो सकता था, मेरे जैसे लाखों-करोड़ों लोग नहीं हो सकते थे, इसलिए वहाँ हमारा प्रतिनिधि था।

बाकी,
मस्त रहें, मर्यादित रहें, महादेव सबका भला करें।]
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अजीत
2 दिसम्बर 25

ये बदलाव सचमुच दिमाग हिला देने वाला है अमेरिकी शहर फ़ीनिक्स Waymo टेक्सी का असली ग्राउंड जीरो बन गया है। वहाँ Waymo की f...
02/12/2025

ये बदलाव सचमुच दिमाग हिला देने वाला है अमेरिकी शहर फ़ीनिक्स Waymo टेक्सी का असली ग्राउंड जीरो बन गया है।
वहाँ Waymo की fleet इतनी बड़ी हो गई है (हजारों गाड़ियाँ) कि थैंक्सगिविंग, क्रिसमस जैसे पीक टाइम में भी वे मैनेज कर लेती हैं, जबकि मानव ड्राइवरों वाली Uber/Lyft की प्राइस 3-4 गुना तक surge हो जाती है।
“मैनुअल Uber करनी महंगी पड़ने लगी” ये अब वहाँ की नॉर्मल शिकायत बन गई है।
लोग कहते हैं: “Waymo wait 8-10 मिनट का है, लेकिन 60-70% सस्ती और बिल्कुल साफ-सुथरी, तो इंतज़ार भी कर लेंगे।”
कुछ ताज़ा आँकड़े (नवंबर 2025 तक) ये कहते हैं कि Waymo अब Phoenix, San Francisco, Los Angeles और Austin में पूरी तरह ऑपरेशनल है।
Phoenix में तो 700+ sq miles कवर कर चुकी है, लगभग पूरा मेट्रो एरिया।
हर हफ्ते Waymo अकेले US में 2 लाख से ज्यादा paid rides दे रही है (ये Uber के शुरुआती दिनों से भी तेज़ ग्रोथ है)।
Uber ऐप में अब Waymo का ऑप्शन डिफ़ॉल्ट दिखता है कई शहरों में और 70-80% यूज़र्स उसे ही चुन रहे हैं जब उपलब्ध हो।
Cruise (GM की) रोबोटेक्सी भी वापस आ गई है Phoenix और Houston में, और Zoox (Amazon की) ने भी Las Vegas में कमर्शियल सर्विस शुरू कर दी है।
और सबसे मज़ेदार बात लोग अब ड्राइवर वाली गाड़ी में बैठते ही uncomfortable feel करने लगे हैं। सोशल मीडिया पर मीम्स चल रहे हैं “Drivered Uber में बैठा तो डर लगा कि कहीं पूछ न ले ‘किधर से आया भाई’”
“Waymo में अकेले बैठकर नेटफ्लिक्स देख रहा हूँ, उबर में ड्राइवर के साथ awkward silence”
वहाँ की बेटियां खास तौर पर कह रही हैं कि रात में प्राइवेसी और सेफ्टी के हिसाब से Waymo ही लेंगी, क्योंकि कोई ड्राइवर नहीं जो पीछे से घूरे या बातें करने की कोशिश करे।
हर गाड़ी में कैमरा है, लेकिन वो सिर्फ़ सेफ्टी के लिए, रिकॉर्डिंग बाहर जाती है कंपनी को, ड्राइवर को कुछ नहीं मिलता क्योंकि ड्राइवर है ही नहीं।
पता नही भारत में कब आएगा ये सब? क्योंकि Waymo ने अभी तक सिर्फ़ US पर फोकस किया है, लेकिन Tesla FSD v13 और Robotaxi प्लान के साथ 2026-27 में ऑस्ट्रिन, चीन के बाद भारत में भी एंट्री की बात चल रही है।
Ola-Krutrim भी अपनी robotaxi बना रहा है, लेकिन अभी 3-4 साल दूर लग रहे हैं।
फिलहाल अमेरिका में तो ये साफ़ हो गया है जैसे ही driverless option उपलब्ध होता है, लोग मानव ड्राइवर को अलविदा कह देते हैं।
और वो भी बिना किसी बड़े विरोध के (हालाँकि वहाँ की टैक्सी ड्राइवर यूनियन्स चिल्ला रही हैं, लेकिन ग्राहक वोट पैसे और सुविधा से दे रहा है)।

एक समय था दुकानों पर लिखा होता था ग्राहक ही भगवान है. भले ही असल में माने या न माने पर इससे व्यापारी के ऊपर कहीं न कहीं ...
02/12/2025

एक समय था दुकानों पर लिखा होता था ग्राहक ही भगवान है. भले ही असल में माने या न माने पर इससे व्यापारी के ऊपर कहीं न कहीं मानसिक दबाव रहता ही था कि ग्राहक को संतुष्ट करना उसका परम धर्म है.

समय बदला कॉर्पोरेट आए. भारत जैसे देश में जहाँ फुटपाथ पर सो रहे लोगों पर गाड़ी चढ़ा कर मार देने जैसे अपराध में कोई सजा नहीं होती, ग्राहक के साथ धोखे में तो सजा भूल ही जाओ. इसके बावजूद कहीं न कहीं भारतीय उद्योग पति टाटा बिड़ला अंबानी आदि ने भी ग्राहकों के प्रति उदार रवैया रखा और उनकी संतुष्टि को प्राथमिकता दी. नतीजा यह है कि यह कंपनियां साल दर साल बढ़ी.

पर इसी बीच लाचार सिस्टम का फ़ायदा उठाने ओला जैसी कंपनियां आ गईं. Ola Electric जैसी फ्रॉड कंपनी कहीं अमेरिका जैसे देश में होती तो इसका मालिक कब का जेल पहुँच गया होता. 21 वी सदी में परफ़ेक्ट फ्रॉड स्कीम से ईवी स्कूटी बेचना आरम्भ किया. सेल्स में खूब पैसा खर्च किया. एक बार वेबसाइट विजिट कर लीजिये दिन में दस फ़ोन आयेंगे.

और जिस दिन आपने पेमेंट कर दी अब भूल जाइए. स्कूटी की डिलीवरी भी तब तक न मिलेगी जब तक आप स्टोर पर लाठी लेकर न पहुँचे. और जब डिलीवरी मिलेगी तो जो मिले वो रख लो. हो सकता है स्कूटी चलती न हो, पर जो मिल रहा है ले लो नहीं तो जो कर पाओ कर लो. आफ्टर सेल्स सर्विस सेंटर कोई हैं नहीं. और जो हैं भी एकाध वहाँ हर प्रॉब्लम के लिए आपकी गाड़ी तीन महीने जमा करने को बोला जाएगा. स्टाफ़ में बाउंसर होते हैं आए दिन मार पीट घटनाएँ कॉमन हैं.

ओला इलेक्ट्रिक अभी भी भारत को नब्बे का भारत सोच रही थी. ग्राहक है कुछ भी पकड़ा दो. स्कूटी आदमी ज़िन्दगी में एक बार लेता है ख़राब भी दे दो एनीवे उसे कौन सा दूसरा लेनी है.

पर यह ग्राहक हैं इक्कीसवीं सदी के. जो सोशल मीडिया में लिख पाये उन्होंने सोशल मीडिया में लिखा, नहीं तो जैसा इन भाई साहब ने किया, स्कूटी पर इस तरह के बोर्ड लगा कर टहलने लगे. कुछेक लोगों ने तो अपनी स्कूटी शो रूम के बाहर ले जाकर जला तक दी.

नतीजा सामने है. इस क्वार्टर की सेल्स के नतीजे आए हैं. ओला इलेक्ट्रिक की सेल बढ़ने के बजाय आधी हो गई है. शेयर प्राइज ऐतिहासिक कम हैं. कंपनी किसी भी समझदार ग्राहक को एक स्कूटी नहीं बेच पा रही है. कंपनी के मालिक ग्राहकों को बेवक़ूफ़ बनाने के लिए क्लाउड के नए बिजनेस में चले गए हैं, जहाँ उन्हें उम्मीद है कि नए ग्राहक बनायेंगे उनसे वसूलेंगे और जब तक नाम ख़राब हो आगे बढ़ जाएँगे.

पर बात वही कि ऐसी हर स्कीम हर कंपनी का भांडा फुट ही जाता है. वैसे ही जैस ओला इलेक्ट्रिक का इस समय हुआ. बस एक साल पहले अपने क्षेत्र में जिस कंपनी का सिक्स्टी परसेंट शेयर था अब वह कंपनी गिर कर चौथे नंबर पर है.

ओला इलेक्ट्रिक, जो कभी भारत के ईवी दोपहिया बाजार में 50% से ज्यादा मार्केट शेयर के साथ लीडर था, अब तेजी से गिरावट का सामना कर रहा है। 2021 में लॉन्च होने के बाद कंपनी ने आक्रामक मार्केटिंग, सस्ते दामों और डिजिटल बुकिंग से शुरुआती सफलता हासिल की, लेकिन 2024-25 में उत्पाद की गुणवत्ता, सर्विस नेटवर्क और वित्तीय दबावों ने इसे पीछे धकेल दिया। नवंबर 2025 तक, ओला की बिक्री 7.4% मार्केट शेयर तक सिमट गई, जबकि TVS, Bajaj, Hero और Ather जैसे प्रतिस्पर्धी आगे निकल गए।

दरअसल ओला S1 सीरीज स्कूटरों में जब बार-बार शिकायतें आईं थी तभी से ही इनके ग़ुब्बारे की हवा निकल गई थी फ्रंट सस्पेंशन ब्रेकेज (जिससे एक्सीडेंट का खतरा), बैटरी फायर, मोटर फेलियर, सॉफ्टवेयर ग्लिच, कम रेंज (वायदे से 30-40% कम), हेडलाइट/नॉइज इश्यू और हार्डवेयर मालफंक्शन।

डच स्टार्टअप Etergo के अधिग्रहण के बाद स्कूटर को जल्दबाजी में लॉन्च किया गया, जो यूरोपीय मौसम के लिए डिजाइन था, न कि भारतीय गर्मी के लिए। थर्मल मैनेजमेंट और सस्पेंशन में 75-250% सेफ्टी मार्जिन का दावा किया गया, लेकिन रियल-वर्ल्ड टेस्टिंग की कमी से फेलियर रेट हाई रहा।

इनके सभी सर्विस सेंटर्स ओवरलोडेड हैं हर महीने 1 लाख+ शिकायतें, लेकिन पार्ट्स की कमी से मरम्मत में 15-20 दिन से 10 महीने तक लग जाते हैं।
महाराष्ट्र (जो कि भारत का सबसे बड़ा ई-स्कूटर बाजार) में इनके 450 शोरूम्स में से 90% बंद होने की कगार पर हैं।
कस्टमर केयर रिस्पॉन्स नहीं देता, और मरम्मत के इंतजार में वारंटी भी एक्सपायर हो जाती है।

शुरुआत में ओला के सस्ते दामों (₹1 लाख से कम) से बिक्री बूम हुई, लेकिन TVS iQube, Bajaj Chetak, Hero Vida और Ather 450X जैसे मॉडल्स ने बेहतर क्वालिटी, वाइड डीलर नेटवर्क (Bajaj ने 100 से 500+ डीलरशिप बढ़ाईं) और रिलायबल सर्विस से ओला को पछाड़ दिया।

अप्रैल 2024 में 25%+ शेयर से नवंबर 2025 में 7.4% पर आ गया। बिक्री आधी से भी कम हो गई।
रही सही कसर होन्डा की आने वाली इलेक्ट्रिक एक्टिवा से और पूरी हो जाएगी ओला बैटरी स्टोरेज (Ola Shakti) में डायवर्सिफाई कर रही है और सर्विस सुधारने का दावा कर रही है, लेकिन क्वालिटी कंट्रोल और कस्टमर फीडबैक पर फोकस न किया तो रिकवरी मुश्किल।

अगर आप भी ओला खरीदने की सोच रहे हैं, तो पहले यूजर रिव्यूज चेक करें या Ather/TVS जैसे विकल्प देखें।

ओला की कहानी सिखाती है कि हाइप से ज्यादा रिलायबिलिटी मायने रखती है।

एथर एनर्जी, जो 2013 में आईआईटी मद्रास के दो पूर्व छात्रों तरुण मेहता और स्वप्निल जैन ने शुरू की थी, भारत के इलेक्ट्रिक टू-व्हीलर मार्केट में एक प्रीमियम ब्रांड के रूप में उभरी है। 2025 तक, कंपनी ने 5 लाख से ज्यादा स्कूटर बेचे हैं, मार्केट शेयर लगभग 12-30% तक पहुंचा है (नए सेल्स में), और रेवेन्यू 54% सालाना बढ़कर 8.99 बिलियन रुपये हो गया। यह सफलता ओला जैसी कंपनियों की गिरावट के बीच चमक रही है, जहां एथर ने क्वालिटी, इनोवेशन और कस्टमर ट्रस्ट पर फोकस किया।

‘Gorji Vita’ मिनरल वॉटर की भारत में कीमत अभी तक आधिकारिक तौर पर घोषित नहीं की गई है।यह ब्रांड रूस की कंपनी Holding Aqua ...
22/11/2025

‘Gorji Vita’ मिनरल वॉटर की भारत में कीमत अभी तक आधिकारिक तौर पर घोषित नहीं की गई है।
यह ब्रांड रूस की कंपनी Holding Aqua ने विशेष रूप से भारतीय बाजार के लिए विकसित किया है।
पहला शिपमेंट नवंबर 2025 में रवाना हो चुका है और दिसंबर 2025 के अंत तक भारत के स्टोर्स में उपलब्ध होने की उम्मीद है।
चूंकि यह अभी लॉन्च होने वाला है और प्रीमियम नेचुरल मिनरल वॉटर (काकेशस पर्वत से, सिलिकॉन युक्त) की कैटेगरी में आएगा, इसलिए इसकी कीमत अन्य इम्पोर्टेड प्रीमियम वॉटर्स (जैसे Evian, Fiji, San Pellegrino आदि) के आसपास होने की संभावना है

दुनिया में पानी के दस महंगे ब्रांड ये है 😄
1. Beverly Hills 90H2O (Diamond Edition) – करीब ₹85 लाख प्रति बोतल
2. Acqua di Cristallo Tributo a Modigliani – करीब ₹51 लाख प्रति 750 ml बोतल
3. Fillico Jewelry Water (लिमिटेड एडिशन) – ₹3.4 लाख से ₹8.5 लाख तक प्रति बोतल
4. Bling H2O (The Ten Thousand) – ₹1.7 लाख से ₹3.4 लाख तक प्रति बोतल
5. Svalbarði Iceberg Water – ₹10,000 से ₹17,000 तक प्रति 750 ml
6. Nevas Cuvée Edition – ₹15,000 से ₹85,000+ तक प्रति बोतल
7. Ōra King (लिमिटेड) – ₹42,000 से ₹1.7 लाख तक प्रति बोतल
8. Kona Nigari – ₹34,000 से ₹1.7 लाख तक प्रति बोतल
9. Berg Iceberg Water – ₹8,500 से ₹42,000 तक प्रति 750 ml
10. ROI Mineral Water – ₹8,500 से ₹25,000 तक प्रति लीटर

शायद ये कीमतें भी ज्यादातर इनके बोतल के ज्वेलरी जैसे डिज़ाइन (सोना, हीरा, स्वारोवस्की क्रिस्टल) की वजह से इतनी ज़्यादा हैं, पानी की नहीं।
असल में पानी की कीमत तो ₹500–₹2000 प्रति लीटर से ज़्यादा नहीं होती इनमें भी। 😅💧

 #प्राकृतिक_न्याय सुप्रसिद्ध रिसर्चर Praveen Kumar Makwana की विचारणीय पोस्ट के साथ साथ रोहिणी आचार्य की घंटे भर पहले की...
16/11/2025

#प्राकृतिक_न्याय

सुप्रसिद्ध रिसर्चर Praveen Kumar Makwana की विचारणीय पोस्ट के साथ साथ रोहिणी आचार्य की घंटे भर पहले की फोटो में दो पोस्ट पढ़िए
ये वही रोहिणी है जो लालू की वही बेटी हैं जिन्होंने लालू को अपनी किडनी दान की थी

प्रकृति अपने तरीके से न्याय करती है। वह बच्चा-बूढ़ा, स्त्री-पुरुष, राजा-रंक, जात-पात नहीं देखती। प्रकृति जब न्याय करती है, तो न प्रधानमंत्री बच पाते हैं और न ही मुख्यमंत्री।

लालू जब मुख्यमंत्री थे, तब उन्हें लगता था कि उनके राज का कभी सूर्यास्त नहीं होगा। यह बादशाही यूं ही चलेगी। उनकी चौखट पर न्याय की याचना करने गई कई बच्चियों का शीलभंग हुआ। लालू के विरुद्ध जो बोला, मृत पाया गया। जंगलराज ... वीभत्स, घृणित।

हमारे यहाँ कोई मुँह में तिनका लेकर कह दे कि " मैं आपकी गाय हूं, मुझे माफ कर दो।" ऐसे लोगों को हमारा जनमानस माफ करता आया है।

लालू उसी गाय का तिनका खा गए; गाय का चारा चबा गए।

समय पलटा। लालू जेल गए; मेरा मानना है कि उन्हें अपने किए का पर्याप्त दंड नहीं मिला। जब कानून से नहीं संभला, तो मामला प्रकृति ने संभाला। सबसे पहले उन्हें अपने बेटे को परिवार से दूर करना पड़ा।

अब समाचार आ रहे कि उनकी बेटी को पीटकर निकाल दिया गया। लालू की बिटिया रोहिणी ने कहा कि अब उसका कोई परिवार नहीं। यह वही बेटी है, जिसने लालू को अपनी किडनी दी थी। रोहिणी को घर से निकालने वाला उसका अपना भाई। उस भाई के साथ एक मुसलमान दोस्त भी।

अपने घर की पंचायती एक मुसलमान से करवा रहे; इससे अधिक लालू का बुरा क्या ही हो सकेगा ?

लालू यह सब अपनी आँखों से होता देख रहे हैं, लेकिन वो अक्षम हैं, असमर्थ हैं।

कर्मफल मिलता है। इस कलियुग में, इसी जन्म में मिलता है।

जिन्हें अपनी कुर्सी का अधिक अहंकार हो, उन्हें लालू के हाल देख लेने चाहिए। समय कभी एक सा नहीं रहता। इसलिए राजस्थानी में एक दोहा है -

हाथाँ परबत तौलता, समदां घूंट भरेह।
वे जोधा भी रह्या नहीं, थूं क्यूं गरब करेह।।

( जो कभी हाथों से पर्वत तौल दिया करते थे, जो एक घूंट में सम्पूर्ण समुद्र पी जाते थे; वे योद्धा भी चले गए, तो तुम किस बात का घमंड कर रहे ? )

~ प्रवीण कुमार मकवाणा

कबीर बाबा कहते हैमरते मरते जग मुआ, मूवे न जाना कोए।  ऐसा हो के ना मुआ, जो बहुरि न मरना होए।।"मरते-मरते जग मुआ, मूवे न जा...
24/10/2025

कबीर बाबा कहते है

मरते मरते जग मुआ, मूवे न जाना कोए।
ऐसा हो के ना मुआ, जो बहुरि न मरना होए।।

"मरते-मरते जग मुआ, मूवे न जाना कोए" में भाव है कि बार-बार मरते हुए पूरा संसार मर चुका है, लेकिन मरा कौन है ये जान न पाया।
"ऐसा हो के ना मुआ, जो बहुरि न मरना होए" –
ऐसा हो के नही मरा जिससे मृत्यु ही न हो, जिससे फिर कभी मरना न पड़े।

संसार माया(भ्रम या अविद्या) का जाल है, जो आत्मा को आवरित किए रखता है।
उपनिषदों (बृहदारण्यक उपनिषद् १.३.२८) और भगवद्गीता (अध्याय २, श्लोक १२–१३) में कहा गया है कि आत्मा अमर है – "न जायते म्रियते वा विपश्चिन्नायमकर्ता भूयः" (न तो जन्म लेती है, न मरती है; यह नाशरहित है) लेकिन अहंकार (अविद्या से उपजा 'मैं' का भ्रम) के कारण जीव बार-बार जन्म-मृत्यु के चक्र (संसार) में फँसता रहता है।

"मरते मरते जग मुआ"
"जग" से तात्पर्य संसार के भौतिक रूप, इच्छाओं और अहंकार से है, जब साधक “अविद्या का नाश” करता है (जैसे रामानुजाचार्य या पूज्य आदि शंकराचार्य जी के अनुसार, ज्ञान-योग से), तो यह 'मृत्यु' होती है अहंकार की मृत्यु।
पूरा 'जगत्' (भ्रम का संसार) मर जाता है, क्योंकि यह ब्रह्म (सत्य) के सामने मिथ्या सिद्ध हो जाता है। लेकिन "मूवे न जाना कोए" सांसारिक लोग इस 'मृत्यु' (ज्ञानोदय) को पहचानते ही नहीं, क्योंकि वे माया में लिप्त हैं। यह अविद्या की घनघोरता ही है, जहाँ जीव अपनी अमरता भूलकर मृत्यु को ही सत्य मान लेता है।

"ऐसा हो के ना मुआ, जो बहुरि न मरना होए"
ये जीते जी “मोक्ष” (मुक्ति) की कामना है। ज्ञानी के लिए मोक्ष वह अवस्था है जहाँ जीव ब्रह्म में लीन हो जाता है यानी"तत्वमसि" (तू वही है) का बोध।
एक बार यह 'मृत्यु' (अहंकार का विलय) हो जाए, तो जन्म-मृत्यु का चक्र समाप्त होकर फिर "बहुरि न मरना" – कोई पुनर्जन्म नहीं, क्योंकि आत्मा ब्रह्मरूप हो चुकी है।
आदि शंकराचार्य जी के “विवेकचूड़ामणि” (श्लोक ३१) में कहा गया: "बंधमुक्तौ एकरूपत्वात्" बंधन और मुक्ति एक ही हैं, बस ज्ञान का प्रश्न। बाबा कबीर यहाँ वेदांतिक “सहज समाधि” की बात कर रहे हैं, जहाँ जीवंत रहते हुए ही 'मृत्यु' हो जाती है (जैसे तुकाराम या मीरा की भक्ति में)।

ज्ञानसाधना के मार्ग में विवेक (सत्य-असत्य का भेद), वैराग्य (संसार से विरक्ति) और ध्यान से यह प्राप्ति संभव है गीता (४.३०) कहती है: "मुक्तसंगोऽनहंवादी..." – अहंकार-रहित होकर कर्म करो, तो मोक्ष सुलभ है
कबीर निर्गुण भक्ति के माध्यम से ज्ञानमार्ग को सरल बनाते हैं बिना शास्त्रों की भाषाई जटिलता के, सीधे हृदय से बता रहे है कि सच्ची 'मृत्यु' अहंकार की है, जो अमरता का द्वार खोलती है।

श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के राग आसां में अंग 441 में गुरु अमर दास जी फ़रमाते हैं “ਮਨ, ਤੂੰ ਜੋਤਿ ਸਰੂਪੁ ਹੈ, ਆਪਣਾ ਮੂਲੁ ਪਛਾਣੁ...
22/10/2025

श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के राग आसां में अंग 441 में गुरु अमर दास जी फ़रमाते हैं

“ਮਨ, ਤੂੰ ਜੋਤਿ ਸਰੂਪੁ ਹੈ, ਆਪਣਾ ਮੂਲੁ ਪਛਾਣੁ ॥
ਮਨ, ਹਰਿ ਜੀ ਤੇਰੈ ਨਾਲਿ ਹੈ, ਗੁਰਮਤੀ, ਰੰਗੁ ਮਾਣੁ ॥
{ਅੰਗ 441}”

“मन, तू ज्योति स्वरूप है, अपना मूल पहचान ॥
मन, हरि जी तेरे नाल है, गुरमत, रंग मान ॥
{अंग 441}”

दीपावली हमें प्रतिवर्ष आत्मचिंतन का ये अवसर प्रदान करती है कि हमारे हृदय में छाए अंधकार (अज्ञान) पर प्रकाश (ज्ञान) की ओर अग्रसर करेगी
आत्मचिंतन की दृष्टि से दीपावली केवल बाहरी दीयों का उत्सव नहीं, अपितु सम्पूर्ण आंतरिक “आत्म-ज्योति” को जगाने का पर्व है, जैसा कि उपनिषदों की प्रार्थना “तमसो मा ज्योतिर्गमय” (अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो) में कहा गया है।

“मन, तू ज्योति स्वरूप है,”

"मन" यानी अहंकार या चित्त जो माया के भ्रम में उलझा रहता है। "ज्योत सरूप" अर्थात प्रकाशमय चेतना (आत्मा) का स्वरूप है जो निष्कलंक है यानी अनंत ब्रह्म है।
आत्मा ही ज्योतिर्मय है (बृहदारण्यक उपनिषद्), जो अज्ञानाधंकार को नष्ट करती है।

“अपना मूल पहचान ॥”

"मूल" अर्थात मूल सत्ता यानी हमारा सच्चिदानन्द घन स्वरूप जिसको विवेक द्वारा मनरूपी माया के आवरण से ऊपर उठकर अपने सच्चे स्वरूप यानी परम तत्त्व को पहचान।

“मन, हरि जी तेरे नाल है, गुरमत, रंग मान”

मन हरि (परमात्मा) हमेशा तेरे अंग संग है तू गुरमत के अनुसार रंग यानी आनंद मान
अर्थात, मन भक्ति और प्रेम से परिपूर्ण होकर ज्ञान द्वारा अनंत आनंद प्राप्त करता है।

मन अविद्या (अज्ञान) के कारण जीव को ब्रह्म से अलग लगता है, लेकिन वास्तव में “तत्वमसि” (तू वही है) यानी आत्मा और ब्रह्म अभिन्न हैं।
गुरु अमर दास जी यहाँ जीव को याद दिलाते हैं कि तूं यानी आत्मज्योति है, न कि शरीर-मन रूपी अविद्या है “विवेकचूड़ामणि” में आदि शंकराचार्य जी कहते हैं अविद्या के पाप-कर्मों की "काली परतें" (जैसे काम, क्रोध) मन को ढक लेती हैं, लेकिन श्रवण-मनन-निदिध्यासन से आवरण हटता है, और आत्म-ज्योति प्रकट होती है।
उनकी पावन वाणी अहं ब्रह्मास्मि(मैं ब्रह्म हूँ) का सरल रूप है जो मन को अपने मूल (ब्रह्म) में लीन होने का उपदेश देती है प्रेम और सुख कहकर गुरुदेव आनंदमय कोष(पांच कोषों में अंतिम) को इंगित करते प्रतीत होते है मगर उनका गहन भाव हमारा सत चित्त आनन्द रूप ही है जहाँ जीव परम सुख प्राप्त करता है।

ज्ञानज्योति का आंतरिक उत्सव दीपावली प्रकट में तो दीपोत्सव है जहाँ बाहरी दीप अंधकार मिटाते प्रतीत होते हैं, लेकिन विचार की दृष्टि से यह ज्ञान-ज्योति द्वारा आत्म-ज्योति को जगाने का पर्व है।
राम की अयोध्या वापसी मात्र कथा नहीं, बल्कि आत्मा के स्वरूप में लौटने का प्रतीक है
रावण (यानी अहंकार/अज्ञान) का वध और राम (यानी आत्मा/ब्रह्म) की उस पर विजय का पर्व है
दीपावली पर जलाए जाने वाले दीप आत्मा की ज्योति का बाह्य रूप हैं आंतरिक स्वरूप तो यहाँ कि "मेरे मन के अंधकमल में ज्योतिर्मय उतरो"
हर दीपावली मन को संकल्प देती है कि तू स्वयं ज्योति है, बाहरी प्रकाश से ऊपर उठकर आंतरिक प्रकाश (ब्रह्मचैतन्य) को पहचान।

अपना मूल पहचान यानी अंधकार (अविद्या) पर प्रकाश (विवेक) की विजय करो
गुरुजी की यह पंक्ति दीपावली के इस संदेश को पूर्ण करती है कि मूल (आत्मा) पहचानते ही माया का भ्रम ठीक उसी प्रकार मिट जाता है, जैसे दीप जलते ही रात्रि विलीन हो जाती है।

रंग मान यानी समृद्धि भाव कि बाह्य दीपावली लक्ष्मी-पूजा के साथ समृद्धि लाती प्रतीत होती है, लेकिन ज्ञानी के लिए यह आध्यात्मिक सुख है हरि-भक्ति से मन "प्रेम का पुर" बनता है। यह तमसो मा ज्योतिर्गमय को चरितार्थ करता है, जहाँ प्रेम और सुख ब्रह्म में लय होते हैं।

दीपावली पर हर दीप जलाते हुए इस चिंतन में हम रह सकें कि मन को अविद्या की "काली परतों" से मुक्त कर ज्योति की ओर मोड़ना ही परम पुरुषार्थ है
ध्यान में चिंतन करें—मैं कौन हूँ? (शुद्ध चैतन्य।) इससे न केवल बाहरी उत्सव, बल्कि आंतरिक एकत्व का अनुभव होगा
रामकृष्ण परमहंस कहते थे: "दीपावली आत्मा के दीपक को प्रज्वलित करने का अवसर है।"
हम सब बाहरी ज्योति से प्रेरित होकर आंतरिक ज्योति (ब्रह्म) को पहचान सकें सदा ज्ञानरूपी प्रकाशमय जीवन जी सकें यही मंगलकामना है

दीपावली की शुभकामनाएँ

10/10/2025

“कउनु मूआ रे कउनु मूआ”

गुरु ग्रंथ साहिब जी की वाणी है, जो मृत्यु के भ्रम (माया) को नकारते हुए आत्मा की अमरता और ब्रह्म के साथ एकत्व पर प्रकाश डालती है।
मृत्यु की मिथ्यता यानी अविद्या या अज्ञान से उत्पन्न भ्रम) और आत्मा-ब्रह्म की अभेदता यानी (अद्वैत) को उजागर करता है।
शरीर और संसार माया का परिणाम है
जन्म-मृत्यु केवल नाम-रूप के स्तर पर घटित होते हैं,
किंतु आत्मा (अत्मन्) तो नित्य, अविनाशी और ब्रह्म से अभिन्न है।
उपनिषद् कहते हैं: "न जायते म्रियते वा विपश्चिन्" (न तो वह जन्म लेता है, न मरता है)। गुरु नानक जी इसी सत्य को सरल भाषा में व्यक्त करते हैं—मृत्यु का रोना व्यर्थ है, क्योंकि "कोई मरा ही नहीं"।

पवनै महि पवनु समाइआ।।
जोती महि जोति रलि जाइआ।।
माटी माटी होई एक।।
रोवनहारे की कवन टेक।।

संसार नाम-रूप का भेद (विविधता) माया से उत्पन्न है,
किंतु मूलतः सब कुछ एक ब्रह्म में लीन हो जाता है।
जैसे वायु (पवन) पृथ्वी (महि) में विलीन हो जाती है, ज्योति (जोति) ज्योति में मिश्रित हो जाती है, और माटी (मिट्टी) माटी में एकाकार हो जाती है
इसी प्रकार शरीर (देह) मृत्यु पर पंचमहाभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि आदि) में विलीन हो जाता है।
लेकिन रोने वाले (मोहग्रस्त के ) शोक का आधार क्या है? अविद्या (अज्ञान) ही तो है, जो भेदभाव (द्वैत) पैदा करता है।
उपनिषद् (छांदोग्य) कहते हैं: "सर्वं खल्विदं ब्रह्म" (सब कुछ ब्रह्म है)—इसलिए मृत्यु में रोना माया का जाल है, सच्चा ज्ञान तो एकत्व में आनंद है।

अगली किछु खबरि न पाई।।
रोवनहारु भि ऊठि सिधाई।।
भरम मोह के बांधे बंध।।
सुपनु भइआ भखलाए अंध।।

मृत्यु स्वप्न-तुल्य यानी सपने जैसी है जैसे स्वप्न में घटनाएँ प्रतीत होती हैं, किंतु जागरण पर विलीन हो जाती हैं।
“अगली किछु खबरि न पाई" अर्थात् परलोक की कोई निश्चित खबर नहीं, क्योंकि वह भी माया का भाग है।
रोने वाले भी अंततः चले जाते हैं ("ऊठि सिधाई"), फिर उनका रोना व्यर्थ क्यों?
“भ्रम-मोह” (अविद्या और राग-द्वेष) ही बंधन है, जो अंधेरे (अंध) में भटकाता है।
शंकराचार्य जी कहते हैं: "ब्रह्म सत्यं जगन् मिथ्या" संसार सपना है, अतः मोह से मुक्त होकर आत्म-साक्षात्कार ही मुक्ति है।
गुरु नानक जी वेदांत की ज्ञान-मार्ग से जोड़ते हैं मोह त्यागो, गुरु-ज्ञान से जागो।

“इहु तउ रचनु रचिआ करतारि।।
आवत जावत हुकमि अपारि।।
नह को मूआ न मरणै जोगु।।
नह बिनसै अबिनासी होगु।।”

समस्त सृष्टि ईश्वर की लीला यानी (माया-शक्ति) है
“रचनु रचिआ करतारि" (सृष्टि रचयिता ने रची)।
जन्म-मृत्यु “हुकमि अपारि” (अपरिमित प्रभु-इच्छा) से होते हैं, किंतु ये केवल जनम मरण तो शरीर के लिए हैं।
आत्मा तो “अबिनासी” (अविनाशी) है
“नह को मूआ न मरणै जोगु" (कोई मरा नहीं, मरने योग्य नहीं)।
भगवद्गीता (अध्याय 2) में श्रीकृष्ण कहते हैं: "नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि, नैनं दहति पावकः" (आत्मा को न शस्त्र काटते, न अग्नि जलाती) यानी वह नष्ट नहीं होती।
ब्रह्म अविकारी है, संसारिक आवागमन केवल मिथ्या। इसलिए, मृत्यु का भय छोड़ो, प्रभु-हुकुम यानी (ईश्वर-कृपा) में लीन हो जाओ।

“जो इहु जाणहु सो इहु नाहि।।
जानणहारे कउ बलि जाउ।।
कहु नानक गुरि भरमु चुकाइआ।।
ना कोई मरै न आवै जाइआ।।

यह चरम अद्वैत का उद्घोष है
“जो इहु जाणहु सो इहु नाहि" (जो यह जानता है, वही 'यह' नहीं है) अर्थात् सच्चा ज्ञाता (ज्ञानी) द्वैत से ऊपर उठ जाता है, वह 'जानने वाला' और 'जानना' में अभेद हो जाता है।
वेदांत में यह “तत्त्वमसि यानी (तू वही है) का सूत्र है
ज्ञान से अहंकार (अहं) विलीन हो जाता है।
गुरु नानक जी कहते हैं गुरु-कृपा से “भरमु चुकाइआ यानी “भ्रम नष्ट” हो जाने के बाद न तो कोई मरता है, न आता-जाता है।
शंकराचार्य के अनुसार, यह विवेक-वैराग्य से प्राप्त मोक्ष है: आत्मा ब्रह्म है, संसार मिथ्या। इसलिए, "कउनु मूआ रे कउनु मूआ" किसका मृत्यु-शोक? यानी सब एक ही परमात्मा में लीन।

माया के भ्रम से ऊपर उठकर सत्-चित्-आनंद (सत्य-चेतना-आनंद) में स्थिर हो।
मृत्यु का रोना न करो, गुरु-ज्ञान से आत्म-साक्षात्कार करो।
जैसा कि उपनिषद् कहता है: "तद् एकं, न द्वितीयं अस्ति" (वह एक है, दूसरा नहीं)
सब कुछ ब्रह्म, मृत्यु मात्र भ्रम है जो ये समझ सका वो शोक को आनंद में बदल देता है।

08/10/2025

प्रहलाद सिंह जी टिपाणीयां को सुनिएगा इस भजन में आपका रोम रोम पुलकित हो उठेगा

ह्रदय मांहीं आरसी, और मुख देखा नहीं जाय
मुख तो तब ही देखिये, जब दिल की दुविधा जाय

थारा रंग महल में, अजब शहर में
आजा रे हंसा भाई, निर्गुण राजा पे, सिरगुण सेज बिछाई
यहाँ सिरगुण सेज बिछायी,

अरे हां रे भाई, देवलिया में देव नांहीं, झालर कूटे गरज कसी
अरे हां रे भाई, देवलिया में देव नांहीं, झालर कूटे गरज कसी

अरे हां रे भाई, बेहद की तो गम नांहि, नुगुरा से सेन कसी
अरे हां रे भाई, बेहद की तो गम नांहि, नुगुरा से सेन कसी

अरे हां रे भाई, अमृत प्याला भर पाओ
भाईला से भ्रांत कसी
अरे हां रे भाई, कहें कबीर विचार
सेण मांहीं सेण मिली

कबीरदास जी यहां ब्रह्म की एकता, जीवात्मा का परमात्मा से अभिन्न संबंध, माया की दुविधा और आत्म-साक्षात्कार की ओर संकेत कर रहे हैं

ब्रह्म को निर्गुण (गुणरहित, निराकार) कहा गया है, किंतु साधक के लिए सगुण (गुणयुक्त, साकार) रूप में उपासना की भी अनुमति है।
कबीर इसमें 'हंसा' को जीवात्मा का प्रतीक मानते हैं, जो माया के दूध-जल में से अमृत (ब्रह्म) को चुनकर अलग करने वाली विवेकशील शक्ति है। यानी बाहरी माया-मोह से ऊपर उठकर हृदय के 'अजब शहर' (आंतरिक चेतना) में प्रवेश कर निर्गुण ब्रह्म का साक्षात्कार करो।

यहां हृदय को 'आरसी' (दर्पण) कहा गया है, जो आत्मा का प्रतिबिंब दिखाता है। लेकिन माया की 'दुविधा' (अज्ञान या द्वंद्व) के कारण सच्चा 'मुख' (आत्मरूप) दिखाई नहीं देता। शंकराचार्य जी कहते हैं 'अविद्या' (अज्ञान) ही यह दुविधा है, जो जीव को ब्रह्म से अलग दिखाती है। जब विवेक जागृत होता है, तो यह दुविधा नष्ट हो जाती है, और 'तत् त्वम् असि' (तू वही है) का बोध होता है। कबीर यहीं संकेत करते हैं कि बाहरी खोज व्यर्थ है; आंतरिक शुद्धि से ही ब्रह्म-दर्शन संभव है।

“थारा रंग महल में, अजब शहर में
आजा रे हंसा भाई, निर्गुण राजा पे, सिरगुण सेज बिछाई
यहाँ सिरगुण सेज बिछायी”

‘रंग महल' और 'अजब शहर' हृदय की आंतरिक चेतना को दर्शाते हैं, जो माया के रंगों से भरा लेकिन ब्रह्म का निवास है। 'हंसा भाई' जीवात्मा को संबोधित है
वेदांत में हंस ब्रह्म-विवेक का प्रतीक है, जो सत्य-असत्य को अलग करता है। 'निर्गुण राजा' निर्गुण ब्रह्म (निराकार परम सत्य) है, जिस पर 'सिरगुण सेज' (सगुण उपासना की सेज) बिछाई गई है। निर्गुण ब्रह्म की उपासना कठिन है, इसलिए सगुण रूप (जैसे राम या कृष्ण) से प्रारंभ कर निर्गुण तक पहुँचना चाहिए। कबीर जी कहते हैं आओ, जीवात्मा! इस आंतरिक महल में प्रवेश करो, जहाँ सगुण से निर्गुण का संगम है। यह 'अहं ब्रह्मास्मि' के बोध का आह्वान है।

“अरे हां रे भाई, देवलिया में देव नांहीं, झालर कूटे गरज कसी”

'आत्मबोध के राही के लिए देवलिया' (मंदिर) में 'देव नांहीं' यानी बाहरी दिखावटी कर्मकांडों की निंदा है।
यानी ब्रह्म सर्वव्यापी है, न कि मूर्तियों या मंदिरों तक सीमित। 'झालर कूटे गरज' (घंटी बजाने की गरज) व्यर्थ है, क्योंकि यह माया का दिखावा मात्र है।
शंकराचार्य जी ‘विवेकचूड़ामणि' में कहते है कि बाहरी पूजा से पहले आंतरिक शुद्धि आवश्यक है। कबीर यहीं अद्वैत का प्रतिपादन करते हैं: देव तो हृदय में है, बाहरी खोज मिथ्या है निर्गुण ब्रह्म की ओर लौटो।

“अरे हां रे भाई, बेहद की तो गम नांहि, नुगुरा से सेन कसी”

'बेहद' (अनंत, निर्गुण ब्रह्म) का कोई 'गम' (मार्ग) नहीं, क्योंकि यह सीमाओं से परे है। 'नुगुरा' (बिना गुरु के) 'सेन' (चिन्ह) दिखाना असंभव है।
यहां गुरु यानी आंतरिक विवेक है, जो 'अपरोक्षानुभूति' (प्रत्यक्ष अनुभव) कराता है। कबीर जी कहते हैं अनंत ब्रह्म तक पहुँचने का कोई बाहरी चिन्ह नहीं; केवल आंतरिक गुरु-कृपा से ही 'सत्-चित्-आनंद' का बोध होता है।
यह 'न निरोधः न चोत्पत्तिः' (न उत्पत्ति, न विनाश) के सिद्धांत को प्रतिबिंबित करता है यानी सगुण-सेज पर निर्गुण राजा का आश्रय लो।

“अरे हां रे भाई, अमृत प्याला भर पाओ
भाईला से भ्रांत कसी
अरे हां रे भाई, कहें कबीर विचार
सेण मांहीं सेण मिली”

'अमृत प्याला' ब्रह्म-ज्ञान का प्रतीक है, जो अमरत्व प्रदान करता है (उपनिषदों के अनुसार 'अमृत' = मोक्ष)।
कबीर जी कहते हैं इसे 'भाईला' (सहचरों) से छिपाओ मत, बाँटों क्योंकि सभी जीव एक ही ब्रह्म के अंश हैं। 'भ्रांत' (भ्रम) माया है, जो एकता को भेद दिखाती है। अंत में, 'सेण मांहीं सेण मिली’ यानी चिन्ह में ही चिन्ह है, अर्थात् बाहरी खोज व्यर्थ है केवल आंतरिक विवेक से ही सत्य मिलता है। यह 'नेति नेति' (न यह, न वह) की वेदांतिक प्रक्रिया है, जहाँ नकार से सकारात्मक बोध होता है। यहाँ भजन निर्गुण राजा के प्रति समर्पण पर विराम लेता है।

समग्र परिप्रेक्ष्य में यह जीव को माया की 'दुविधा' से मुक्त कर 'अजब शहर' (सहस्रार चक्र या चेतना का केंद्र) में ले जाता है, जहाँ निर्गुण ब्रह्म सगुण रूप धारण कर साधक का स्वागत करता है। कबीर का 'राम' यही निर्गुण सत्य है, जो सामाजिक भेदभाव से परे सभी को एक करता है। साधना का मार्ग विवेक, शुद्धि और भक्ति से होता हुआ आत्म-साक्षात्कार तक पहुंच जाता है यह भजन न केवल सुनने, बल्कि आंतरिक चिंतन वाले साधकों के लिए अमृत तुल्य है।

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Chak 3MJD नाथवाणा रोड़ ; रतनपुरा
Sangaria
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