Love & Light pyramid meditation center

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25/11/2023

*पत्री जी के उत्तर*

*Q. क्या आप वाक इन (walk in ) के बारे में बता सकते हैं?*

पत्री जी : यह एक अदभुत प्रक्रिया है| वाक इन में एक आत्मा शरीर को छोड़ देती है और दूसरी उच्च आत्मा उस शरीर में प्रवेश करती है| रुथ मोंटगोमरी की 'स्ट्रेंजर्स अमंग अस' इस विषय पर एक अच्छी पुस्तक है| उस में वाक इन के बारे में काफी अच्छी जानकारी है|

24/11/2023

*पत्री जी के उत्तर*

*Q. क्या आपका कोई सपना है?*

पत्री जी : मैं उस दिन का स्वप्न देख रहा हूँ जब सारा विश्व एक साथ एक समय पर ध्यान करेगा| यह मेरा दिव्य स्वप्न है जो पूरा होकर रहेगा| एक वक़्त आएगा जब विश्व की पूरी जनसंख्या ध्यानी बनेगी| मैं उस वक़्त का सपना देख रहा हूँ और आने वाले 10 साल में यह होकर ही रहेगा| आप करोड़ों लोगो को एक साथ ध्यान करते देखेंगे|

24/11/2023

*ब्रह्मविहार*

गौतम बुद्ध द्वारा निर्देशित सूत्र ब्रह्मज्ञानी समाज में संचार करने की रीति समझाते हैं -
(१) आर्थिक रूप से हमसे उच्च स्तर में रहने वालों के साथ 'मैत्री'|
(२) आर्थिक रूप से हमसे निम्न स्तर में रहने वालों के साथ 'करुणा'|
(३) आध्यात्मिक रूप से हमसे उच्च स्तर में रहने वालों के साथ 'मुदिता'|
(४) आध्यात्मिक रूप से हमसे निम्न स्तर में रहने वालों के साथ 'उपेक्षा'|

किसी भी लोक अथवा किसी भी काल में, बुद्ध जन और आत्मज्ञानी लोग एक ही तरह रहते हैं| उनकी आचरण पद्धति ही ब्रह्मविहार है|

~ ब्रह्मर्षि पितामह पत्री जी

23/11/2023

*पत्री जी के उत्तर*

*Q. क्या वॉक इन के बाद आपके रिश्तेदार आपको समझ पाए?*

पत्री जी : मेरे रिश्तेदार मुझे समझ नहीं सकते कि मैं क्या हूँ ? उनकी सोच शरीर तक सीमित है और आत्मा की बात नहीं समझते इसलिए मेरे रिश्तेदार मुझसे दूर होते चले गए| क्यूंकि शरीर में आने वाली उच्च आत्मा (walk in) का जाने वाली (walk out) आत्मा के साथ अनुबंध होता है कि वह केवल उसके करीबी परिवार का ध्यान रखेंगे|

22/11/2023

*पत्री जी के उत्तर*

*Q. आपने दूसरों को ध्यान सिखाना कब शुरू किया? क्या यह आपकी आत्मजागृति के बाद शुरू हुआ?*

पत्री जी : मैंने 1979 में ध्यान सिखाना प्रारंभ किया जब मुझे अनुभूति हुई कि मुझमें एक उच्च आत्मा ने प्रवेश (walk in) किया है| मेरा जन्म 1947 में हुआ पर मुझमें उच्च आत्मा ने 1979 में प्रवेश किया और तभी से मैंने ध्यान सिखाना शुरू किया| उससे पहले ध्यान सिखाने का मुझे कोई स्मरण नहीं है|

22/11/2023

*मध्यमार्ग*

'गीता' सदा मध्यमार्ग का ही बोधन करते आ रही है| सीमित आहार, सीमित विहार, सीमित विधियुक्त धर्म, सीमित निद्रा से रहना चाहिए| हमेशा मध्यमार्ग को ही अपनाना चाहिए| मध्यमार्ग से ही दुःख का नाश होता है|

"युक्ताहार विहारस्य युक्त चेष्टस्य कर्मसु
युक्त स्वप्नव बोधस्य योगो भवति दुःखहा|" -(६-१७)

'अवबोधस्य' अर्थात ध्यान, ध्यान भी घंटो भर नहीं करना चाहिए| युक्त होना चाहिए, सीमित होना चाहिए| ध्यान नित्य कर्मों के लिए बाधा नहीं बनना चाहिए| "अति सर्वत्र वर्जयेत" ध्यान में भी 'अति' अनुपयुक्त है|

ब्रह्मचर्य अर्थात 'सांसारिक सुखों को सही खुराक में अनुभव करने वाला मध्यमार्ग' ही है|

*मध्यमार्ग, गौतम बुद्ध का प्रमुख आध्यात्मिक सूत्र है|*

~ ब्रह्मर्षि पितामह पत्री जी

21/11/2023

*पत्री जी के उत्तर*

*Q. क्या आपके जीवन में भी चुनौतियां हैं?*

पत्री जी : मेरे जीवन में मेरे स्तर की चुनौतियां हैं जैसे किस तरह ध्यान का और प्रचार-प्रसार करना है, लोगो को कैसे ध्यान विज्ञान की शिक्षा देनी है, मुझे अपना कौशल और कैसे बढ़ाना है वगैरह-वगैरह| 1992 में मैंने अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया था तब अपने परिवार का पालन-पोषण करने के लिए लोगों से उधार मांगना मेरी चुनौती थी; फिर सत्य को समझना मेरे लिए एक चुनौती थी; पिरामिड ऊर्जा के संपर्क में आने के बाद मैंने इस विषय पर अनेक किताबें पढ़ी; जब मैंने ध्यान के लिए पिरामिड का उपयोग करना शुरू किया और इसके अदभुत लाभ को जाना तो फिर सभी के लिए एक ध्यान पिरामिड बनाना मेरी चुनौती थी और पिरामिड बनाने के लिए पैसों की आवश्यकता थी तो पिरामिड के लिए पैसे एकत्र करना मेरी अगली बड़ी चुनौती थी| सबकी अपनी-अपनी चुनौतियां होती हैं|

20/11/2023

*अष्टांग मार्ग*

गौतम बुद्ध द्वारा हमें दिया हुआ अष्टांग मार्ग इस प्रकार है-

(१) सम्यक मार्ग = सही दृष्टि
(२) सम्यक संकल्प = सही संकल्प
(३) सम्यक वाणी = सही वाक्
(४) सम्यक कर्म = सही कर्म
(५) सम्यक आजीविका = सही जीवनोपाय
(६) सम्यक व्यायाम = सही श्रद्धा
(७) सम्यक स्मृति = सही एकाग्रता
(८) सम्यक समाधि = सही ध्यान

अष्टांग मार्ग के अनुष्ठान द्वारा अविद्या दूर होकर तृष्णा मिटती है और तन्मूलक दुःख का निर्मूलन होता है|

अष्टांग मार्ग में प्रज्ञा, शील, समाधि से संबंधित शिक्षा है-
(१) "प्रज्ञा" यानि सही दृष्टि, सही संकल्प (इच्छाएँ )
(२) शील यानि सही वाक्, सही जीवनोपाय और सही कर्म
(३) समाधि यानि सही श्रद्धा, सही एकाग्रता और सही ध्यान

~ ब्रह्मर्षि पितामह पत्री जी

16/11/2023

*पत्री जी के उत्तर*

*Q. मास्टर बनने के लिए हमें ध्यान में सहायक वस्तुएं जैसे पिरामिड, क्रिस्टल, क्रॉप सर्किल आदि पर कितना निर्भर होना चाहिए? क्या यह एक नियमित ध्यानी और नए ध्यानी के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण है?*

पत्री जी : एक मास्टर को किसी चीज की जरुरत नहीं होती | हम सभी जानते हैं कि एक छोटे बच्चे, बूढ़े और नेत्रहीन को रास्ता पार करने के लिए किसी की सहायता की जरुरत होती है पर जब आप स्वस्थ और सक्षम हैं तो आपको किसी की जरुरत नहीं है, आप स्वयं रास्ता पार कर सकते हैं| इसी तरह एक मास्टर को किसी चीज की आवश्यकता नहीं है पर एक नए व्यक्ति को शुरुआत में कुछ समस्या हो सकती है और यह सभी चीजें सहायक होती हैं| सहायक चीज हो और आप प्रयोग न करना चाहें, यह आपकी इच्छा है| सहजता यह है कि जो कुछ आपकी सहायता के लिए उपलब्ध है, उसे आदर भाव से स्वीकार करें| इसी तरह आप पिरामिड ऊर्जा, सामूहिक ऊर्जा, पूर्णिमा ऊर्जा, प्रकृति ऊर्जा, क्रिस्टल ऊर्जा आदि की सहायता ले सकते हैं| यदि कोई समस्या है और आप मास्टर भी हैं तो भी आप इन चीजों की मदद ले सकते हैं| सहायक वस्तुएं सभी के लिए लाभप्रद हैं चाहे कोई मास्टर हो, ध्यानी हो या ना हो|

16/11/2023

*चार आर्य सत्य*

इन चार परम-सत्यों को गौतम बुद्ध ने समान लिया है -
(१) दुःख सर्वत्र है|
(२) तृष्णा ही दुःख का मूल कारण है|
(३) यह तृष्णा अविद्या से पैदा होती है|
(४) अष्टांग मार्ग ही अविद्या का विनाशक है|
अष्टांग मार्ग का अवलंबन करना ही शरणीय है| उसी से शाश्वत दुःख राहित्य उपलब्ध होता है|

'तृष्णा' अर्थात श्रुति से अधिक राग! 'तृष्णा' अर्थात लय से अधिक ताल! तृष्णा ही दुःख का प्रत्यक्ष कारन है| तृष्णा राहित्य से दुःख राहित्य उपलब्ध होता है| दुःख राहित्य ही निर्वाण है| निर्वाण, मुक्ति, निःश्रेयस या मोक्ष, अपवर्ग, चाहे किसी भी नाम से जानें, सभी एक हैं| वही दुःख राहित्य है|

*मध्यमार्ग को अपनाओ|*

~ ब्रह्मर्षि पितामह पत्री जी

15/11/2023
15/11/2023

*स्वाध्याय*

ध्यान जितना महत्वपूर्ण है, स्वाध्याय भी उतना ही महत्वपूर्ण है|
ध्यान के अनुभव जब पुस्तक रूप लेते हैं, तब वे सर्वोत्कृष्ट ग्रंथ होते हैं|
उन ग्रंथों का अध्ययन करना बहुत ही महत्वपूर्ण है|
स्वाध्याय मनुष्य के चौथे शरीर अर्थात विज्ञानमय कोश की शुद्धि करता है|
स्वाध्याय मनुष्य के विज्ञानमय कोश की अभिवृद्धि करता है|

~ ब्रह्मर्षि पितामह पत्री जी

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