वैदिक संस्कार संचार

वैदिक संस्कार संचार Vedic Sanskar Sanchar

19/04/2026
अक्षय तृतीया समीक्षा🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹********************** #अक्षय तृतीया********************** #वैशाख शुक्ल पक्ष 3 सोमवार दिनांक ...
19/04/2026

अक्षय तृतीया समीक्षा🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹
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#अक्षय तृतीया
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#वैशाख शुक्ल पक्ष 3 सोमवार दिनांक 20 अप्रैल 2026 सोमवार, रोहिणी के योग में जो कि धर्म शास्त्रों ने दिव्य संयोग माना है , अक्षय तृतीया मनाई जाएगी*। इस दिन तृतीया उदय व्यपनी हैं ,जो चतुर्थी के संयोग में है, इसको मनाने के लिए धर्मशास्त्र अत्यंत प्रशंसा करते हैं और द्वितीया युक्त तृतीया में अक्षय तृतीया मनाने का प्रबल विरोध करते हैं। *अतः अक्षय तृतीया सोमवार 20 अप्रैल 2026 को ही मनाना धर्मशास्त्र संगत है*। क्योंकि 19 अप्रैल 2026 रविवार को तृतीया द्वितीय के वेध से युक्त है जो सर्वथा वर्जित है । धर्मशास्त्र उसका पूर्णतया निषेध करता है , देखें प्रमाण वचन-
वैशाखस्य तृतीयाम्
य: पूर्व विद्धा करोति वै। हव्यं दैवा न गृहन्ति कव्यं पितरं तथा ।‌
गरुड़ पुराण का प्रमाण वचन जो कि ज्योतिर्निबंध प्रष्ठ क्रमांक 261 पर प्राप्त है। जिसका अनुवाद सरल है द्वितीया युक्त तृतीया में जो अक्षय तृतीया मनाता है उसमें हवन करने से देवता हविशष्य ग्रहण नहीं करते, श्राद्ध करने से पितृ श्राद्ध को ग्रहण नहीं करते हैं। यही अग्रिम वचन महर्षि नारद का प्राप्त है -
पूर्व विद्धा दिने दत्तम्
पितृणा नोपतिष्ठति ।
नैव गृहाति वैकुंण्ठ:
पूजातद्दिन संभवाम् ।।
अक्षय तृतीया के निर्णय में उपरोक्त वचनों का जो की गरुड़ पुराण से प्राप्त हैं नारद पुराण से प्राप्त हैं, सभी धर्मशास्त्र कारों ने आदर किया है तदनुसार उदय व्यापानी तृतीया को अक्षय तृतीया मनाने के लिए आदेश किया है, निर्णय सिंधु ,पुरुषार्थ चिंतामणि ,भट्टू जी दीक्षित का तिथि निर्णय, राजन मिश्र का तिथि निर्णय ,स्मृति कोष्तुभ, कालसार ,भगवंत भास्कर, निर्णयामृत,जितने भी धर्म ग्रंथ हैं वह सब केवल उदय व्यापानी तृतीया को ही महत्व देते हैं।(इदम् उदय व्यापिनी ग्राह:) केवल धर्म सिंधुकार ने 2 दिन त्रिमूहूर्त व्यापिनी का उल्लेख किया है, जो आदर करने योग्य नहीं है क्योंकि धर्म सिंधुकार का वचन स्वयं में अपने आप में अनिर्णायक एवं भ्रांत वचन है। धर्म सिंधु कारने प्रथम परिक्ष्छेद में द्वितीया का तृतीया में वेध माना है और अक्षय तृतीया निर्णय में मध्यान्ह व्यापिनी भी कहा है और त्रिमूहूर्त व्यापिनी भी कहा है, जहां निषेध का पालन बिल्कुल नहीं किया है, जब कि विधि के साथ निषेध का पालन होना चाहिए अथवा विधि का भले ही पालन न हो निषेध का पूरा पालन होना चाहिए। अतः इस वर्ष कुछ पंचांग कारों ने धर्म सिंधु के वचन के अनुसार 19 अप्रैल 2026 को अक्षय तृतीया लगाई है।और जिन पंचांग कारों ने धर्म सिंधु के वचनों का आदर नहीं किया है, शेष धर्म ग्रंथो के निर्णय का स्वागत किया है, उन्होंने 20 अप्रैल 2026 को अक्षय तृतीया लगाई है, जो धर्मशास्त्र संगत है।
अक्षय तृतीया के दिन हवन करने से भगवान श्री हरि एवं देवता प्रसन्न होते हैं। अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। अक्षय तृतीया के दिन श्राद्ध करने से पितरों की अक्षय तृप्ति होती है। अक्षय तृतीया के दिन जल का घटदान करना, प्याऊ लगाना, यव के द्वारा भगवान श्री हरि का पूजन करना,यव से हवन करना अक्षय पुण्य कारक होता है।
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🔥*होलिका पूजन दहन मुहूर्त*🔥*पूर्णिमा तिथि प्रारम्भ -* २ मार्च २०२६ को सायं ५:५५*पूर्णिमा तिथि समाप्त -* ३ मार्च २०२६ को ...
25/02/2026

🔥*होलिका पूजन दहन मुहूर्त*🔥

*पूर्णिमा तिथि प्रारम्भ -* २ मार्च २०२६ को सायं ५:५५
*पूर्णिमा तिथि समाप्त -* ३ मार्च २०२६ को सायं ५:०७

🌕फाल्गुन शुक्ल चतुर्दशी/पूर्णिमा *२ मार्च २०२६* सोमवार

🔥*होलिका पूजन मुहूर्त*
दोपहर ३:३८ से सायं ७:५५ तक
🔥*होलिका दहन मुहूर्त*
सायं ५.३९ से रात्रि ८.४० तक व भद्रा पश्चात ३ मार्च को सुबह ५:२८ से ६:४५ तक शुभ है

🎉*गैर/गमी की होली*🫟
३ मार्च २०२६ मंगलवार को चन्द्रग्रहण की सूतक रहेगी परंतु रंग डालना/गैर/गमी की होली भी सूतक का ही काम है जिसे सूतक काल में किया जा सकता है ।
🌙*चंद्रग्रहण की सूतक प्रातः ९:२९ से सायं ६:४७ तक रहेगी। 🌚ग्रहण काल सायं ६:२९ से ६:४७ तक रहेगा।*
*वैदिक संस्कार संचार सीहोर*
*ज्योतिष एवं कर्मकाण्ड*
*8319039823*

चिरकुंवारी नर्मदा की अधूरी प्रेम-कथा〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️कहते हैं नर्मदा ने अपने प्रेमी शोणभद्र से धोखा खाने के बाद आजीवन ...
04/02/2026

चिरकुंवारी नर्मदा की अधूरी प्रेम-कथा
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कहते हैं नर्मदा ने अपने प्रेमी शोणभद्र से धोखा खाने के बाद आजीवन कुंवारी रहने का फैसला किया लेकिन क्या सचमुच वह गुस्से की आग में चिरकुवांरी बनी रही या फिर प्रेमी शोणभद्र को दंडित करने का यही बेहतर उपाय लगा कि आत्मनिर्वासन की पीड़ा को पीते हुए स्वयं पर ही आघात किया जाए। नर्मदा की प्रेम-कथा लोकगीतों और लोककथाओं में अलग-अलग मिलती है लेकिन हर कथा का अंत कमोबेश वही कि शोणभद्र के नर्मदा की दासी जुहिला के साथ संबंधों के चलते नर्मदा ने अपना मुंह मोड़ लिया और उलटी दिशा में चल पड़ीं। सत्य और कथ्य का मिलन देखिए कि नर्मदा नदी विपरीत दिशा में ही बहती दिखाई देती है।

कथा 1👉 नर्मदा और शोण भद्र की शादी होने वाली थी। विवाह मंडप में बैठने से ठीक एन वक्त पर नर्मदा को पता चला कि शोण भद्र की दिलचस्पी उसकी दासी जुहिला(यह आदिवासी नदी मंडला के पास बहती है) में अधिक है। प्रतिष्ठत कुल की नर्मदा यह अपमान सहन ना कर सकी और मंडप छोड़कर उलटी दिशा में चली गई। शोण भद्र को अपनी गलती का एहसास हुआ तो वह भी नर्मदा के पीछे भागा यह गुहार लगाते हुए' लौट आओ नर्मदा'... लेकिन नर्मदा को नहीं लौटना था सो वह नहीं लौटी।

अब आप कथा का भौगोलिक सत्य देखिए कि सचमुच नर्मदा भारतीय प्रायद्वीप की दो प्रमुख नदियों गंगा और गोदावरी से विपरीत दिशा में बहती है यानी पूर्व से पश्चिम की ओर। कहते हैं आज भी नर्मदा एक बिंदू विशेष से शोण भद्र से अलग होती दिखाई पड़ती है। कथा की फलश्रुति यह भी है कि नर्मदा को इसीलिए चिरकुंवारी नदी कहा गया है और ग्रहों के किसी विशेष मेल पर स्वयं गंगा नदी भी यहां स्नान करने आती है। इस नदी को गंगा से भी पवित्र माना गया है।

मत्स्यपुराण में नर्मदा की महिमा इस तरह वर्णित है -‘कनखल क्षेत्र में गंगा पवित्र है और कुरुक्षेत्र में सरस्वती। परन्तु गांव हो चाहे वन, नर्मदा सर्वत्र पवित्र है। यमुना का जल एक सप्ताह में, सरस्वती का तीन दिन में, गंगाजल उसी दिन और नर्मदा का जल उसी क्षण पवित्र कर देता है।’ एक अन्य प्राचीन ग्रन्थ में सप्त सरिताओं का गुणगान इस तरह है।

गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती।
नर्मदा सिन्धु कावेरी जलेSस्मिन सन्निधिं कुरु।।

कथा 2👉 इस कथा में नर्मदा को रेवा नदी और शोणभद्र को सोनभद्र के नाम से जाना गया है। नद यानी नदी का पुरुष रूप। (ब्रह्मपुत्र भी नदी नहीं 'नद' ही कहा जाता है।) बहरहाल यह कथा बताती है कि राजकुमारी नर्मदा राजा मेखल की पुत्री थी। राजा मेखल ने अपनी अत्यंत रूपसी पुत्री के लिए यह तय किया कि जो राजकुमार गुलबकावली के दुर्लभ पुष्प उनकी पुत्री के लिए लाएगा वे अपनी पुत्री का विवाह उसी के साथ संपन्न करेंगे। राजकुमार सोनभद्र गुलबकावली के फूल ले आए अत: उनसे राजकुमारी नर्मदा का विवाह तय हुआ।

नर्मदा अब तक सोनभद्र के दर्शन ना कर सकी थी लेकिन उसके रूप, यौवन और पराक्रम की कथाएं सुनकर मन ही मन वह भी उसे चाहने लगी। विवाह होने में कुछ दिन शेष थे लेकिन नर्मदा से रहा ना गया उसने अपनी दासी जुहिला के हाथों प्रेम संदेश भेजने की सोची। जुहिला को सुझी ठिठोली। उसने राजकुमारी से उसके वस्त्राभूषण मांगे और चल पड़ी राजकुमार से मिलने। सोनभद्र के पास पहुंची तो राजकुमार सोनभद्र उसे ही नर्मदा समझने की भूल कर बैठा। जुहिला की ‍नियत में भी खोट आ गया। राजकुमार के प्रणय-निवेदन को वह ठुकरा ना सकी। इधर नर्मदा का सब्र का बांध टूटने लगा। दासी जुहिला के आने में देरी हुई तो वह स्वयं चल पड़ी सोनभद्र से मिलने।

वहां पहुंचने पर सोनभद्र और जुहिला को साथ देखकर वह अपमान की भीषण आग में जल उठीं। तुरंत वहां से उल्टी दिशा में चल पड़ी फिर कभी ना लौटने के लिए। सोनभद्र अपनी गलती पर पछताता रहा लेकिन स्वाभिमान और विद्रोह की प्रतीक बनी नर्मदा पलट कर नहीं आई।

अब इस कथा का भौगोलिक सत्य देखिए कि जैसिंहनगर के ग्राम बरहा के निकट जुहिला (इस नदी को दुषित नदी माना जाता है, पवित्र नदियों में इसे शामिल नहीं किया जाता) का सोनभद्र नद से वाम-पार्श्व में दशरथ घाट पर संगम होता है और कथा में रूठी राजकुमारी नर्मदा कुंवारी और अकेली उल्टी दिशा में बहती दिखाई देती है। रानी और दासी के राजवस्त्र बदलने की कथा इलाहाबाद के पूर्वी भाग में आज भी प्रचलित है।

कथा 3👉 कई हजारों वर्ष पहले की बात है। नर्मदा जी नदी बनकर जन्मीं। सोनभद्र नद बनकर जन्मा। दोनों के घर पास थे। दोनों अमरकंट की पहाड़ियों में घुटनों के बल चलते। चिढ़ते-चिढ़ाते। हंसते-रुठते। दोनों का बचपन खत्म हुआ। दोनों किशोर हुए। लगाव और बढ़ने लगा। गुफाओं, पहाड़‍ियों में ऋषि-मुनि व संतों ने डेरे डाले। चारों ओर यज्ञ-पूजन होने लगा। पूरे पर्वत में हवन की पवित्र समिधाओं से वातावरण सुगंधित होने लगा। इसी पावन माहौल में दोनों जवान हुए। उन दोनों ने कसमें खाई। जीवन भर एक-दूसरे का साथ नहीं छोड़ने की। एक-दूसरे को धोखा नहीं देने की।

एक दिन अचानक रास्ते में सोनभद्र ने सामने नर्मदा की सखी जुहिला नदी आ धमकी। सोलह श्रृंगार किए हुए, वन का सौन्दर्य लिए वह भी नवयुवती थी। उसने अपनी अदाओं से सोनभद्र को भी मोह लिया। सोनभद्र अपनी बाल सखी नर्मदा को भूल गया। जुहिला को भी अपनी सखी के प्यार पर डोरे डालते लाज ना आई। नर्मदा ने बहुत कोशिश की सोनभद्र को समझाने की। लेकिन सोनभद्र तो जैसे जुहिला के लिए बावरा हो गया था।

नर्मदा ने किसी ऐसे ही असहनीय क्षण में निर्णय लिया कि ऐसे धोखेबाज के साथ से अच्छा है इसे छोड़कर चल देना। कहते हैं तभी से नर्मदा ने अपनी दिशा बदल ली। सोनभद्र और जुहिला ने नर्मदा को जाते देखा। सोनभद्र को दुख हुआ। बचपन की सखी उसे छोड़कर जा रही थी। उसने पुकारा- 'न...र...म...दा...रूक जाओ, लौट आओ नर्मदा।

लेकिन नर्मदा जी ने हमेशा कुंवारी रहने का प्रण कर लिया। युवावस्था में ही सन्यासिनी बन गई। रास्ते में घनघोर पहाड़ियां आईं। हरे-भरे जंगल आए। पर वह रास्ता बनाती चली गईं। कल-कल छल-छल का शोर करती बढ़ती गईं। मंडला के आदिमजनों के इलाके में पहुंचीं। कहते हैं आज भी नर्मदा की परिक्रमा में कहीं-कहीं नर्मदा का करूण विलाप सुनाई पड़ता है।

नर्मदा ने बंगाल सागर की यात्रा छोड़ी और अरब सागर की ओर दौड़ीं। भौगोलिक तथ्य देखिए कि हमारे देश की सभी बड़ी नदियां बंगाल सागर में मिलती हैं लेकिन गुस्से के कारण नर्मदा अरब सागर में समा गई।

नर्मदा की कथा जनमानस में कई रूपों में प्रचलित है लेकिन चिरकुवांरी नर्मदा का सात्विक सौन्दर्य, चारित्रिक तेज और भावनात्मक उफान नर्मदा परिक्रमा के दौरान हर संवेदनशील मन महसूस करता है। कहने को वह नदी रूप में है लेकिन चाहे-अनचाहे भक्त-गण उनका मानवीयकरण कर ही लेते है। पौराणिक कथा और यथार्थ के भौगोलिक सत्य का सुंदर सम्मिलन उनकी इस भावना को बल प्रदान करता है और वे कह उठते हैं।

नमामि देवी नर्मदे...।
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 #कार्तिक में दीपदान〰️〰️🌼🌼〰️〰️इन पाँच दिन जरूर जरूर करें दीपदान〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️महापुण्यदायक तथा मोक्षदायक कार्तिक ...
28/10/2025

#कार्तिक में दीपदान
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इन पाँच दिन जरूर जरूर करें दीपदान
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महापुण्यदायक तथा मोक्षदायक कार्तिक के मुख्य नियमों में सबसे प्रमुख नियम है दीपदान। दीपदान का अर्थ होता है आस्था के साथ दीपक प्रज्वलित करना। कार्तिक में प्रत्येक दिन दीपदान जरूर करना चाहिए।

#दीपदान कैसे करें
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मिट्टी, ताँबा, चाँदी, पीतल अथवा सोने के दीपक लें। उनको अच्छे से साफ़ कर लें। मिटटी के दीपक को कुछ घंटों के लिए पानी में भिगो कर सुखा लें। उसके पश्च्यात प्रदोषकाल में अथवा सूर्यास्त के बाद उचित समय मिलने पर दीपक, तेल, गाय घी, बत्ती, चावल अथवा गेहूँ लेकर मंदिर जाएँ। घी में रुई की बत्ती तथा तेल के दीपक में लाल धागे या कलावा की बत्ती इस्तेमाल कर सकते हैं। दीपक रखने से पहले उसको चावल अथवा गेहूं अथवा सप्तधान्य का आसन दें। दीपक को भूल कर भी सीधा पृथ्वी पर न रखें क्योंकि कालिका पुराण का कथन है।

"दातव्यो न तु भूमौ कदाचन।
सर्वसहा वसुमती सहते न त्विदं द्वयम्।।
अकार्यपादघातं च दीपतापं तथैव च।
तस्माद् यथा तु पृथ्वी तापं नाप्नोति वै तथा।।"

अर्थात👉 सब कुछ सहने वाली पृथ्वी को अकारण किया गया पदाघात और दीपक का ताप सहन नही होता।

उसके बाद एक तेल का दीपक शिवलिंग के समक्ष रखें और दूसरा गाय के घी का दीपक श्रीहरि नारायण के समक्ष रखें। उसके बाद दीपक मंत्र पढ़ते हुए दोनों दीप प्रज्वलित करें। दीपक को प्रणाम करें। दारिद्रदहन शिवस्तोत्र तथा गजेन्द्रमोक्ष का पाठ करें।

#पुराणों में वर्णन मिलता है।
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"हरिजागरणं प्रातःस्नानं तुलसिसेवनम्।
उद्यापनं दीपदानं व्रतान्येतानि कार्तिके।।“
पद्मपुराण, उत्तरखण्ड, अध्याय –११५

“ स्नानं च दीपदानं च तुलसीवनपालनम्।
भूमिशय्या ब्रह्मचर्य्यं तथा द्विदलवर्जनम्।।
विष्णुसंकीर्तनं सत्यं पुराणश्रवणं तथा।
कार्तिके मासि कुर्वंति जीवन्मुक्तास्त एव हि।।”

स्कन्दपुराण, वैष्णवखण्ड, कार्तिकमासमाहात्म्यम, अध्याय 03

पद्मपुराण उत्तरखंड, अध्याय 121 में कार्तिक में दीपदान की तुलना अश्वमेघ यज्ञ से की है।

"घृतेन दीपको यस्य तिलतैलेन वा पुनः।
ज्वलते यस्य सेनानीरश्वमेधेन तस्य किम्।।"

अर्थात 👉 कार्तिक में घी अथवा तिल के तेल से जिसका दीपक जलता रहता है, उसे अश्वमेघ यज्ञ से क्या लेना है।

#अग्निपुराण के 200वें अध्याय के अनुसार
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"दीपदानात्परं नास्ति न भूतं न भविष्यति"

अर्थात 👉 दीपदान से बढ़कर न कोई व्रत है, न था और न होगा ही।

#स्कंदपुराण, वैष्णवखण्ड के अनुसार
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"सूर्यग्रहे कुरुक्षेत्रे नर्मदायां शशिग्रहे।।
तुलादानस्य यत्पुण्यं तदत्र दीपदानतः।।"

अर्थात 👉 कुरुक्षेत्र में सूर्यग्रहण के समय और नर्मदा में चन्द्रग्रहण के समय अपने वजन के बराबर स्वर्ण के तुलादान करने का जो पुण्य है वह केवल दीपदान से मिल जाता है।

कार्तिक में दीपदान का एक मुख्य उद्देश्य पितरों का मार्ग प्रशस्त करना भी है।

"तुला संस्थे सहस्त्राशौ प्रदोषे भूतदर्शयोः
उल्का हस्ता नराः कुर्युः पितृणाम् मार्ग दर्शनम्।।"

पितरों के निमित्त दीपदान जरूर करें।

पद्मपुराण, उत्तरखंड, अध्याय 123 में महादेव कार्तिक में दीपदान का माहात्म्य सुनाते हुए अपने पुत्र कार्तिकेय से कहते हैं।

"शृणु दीपस्य माहात्म्यं कार्तिके शिखिवाहन।
पितरश्चैव वांच्छंति सदा पितृगणैर्वृताः।।
भविष्यति कुलेऽस्माकं पितृभक्तः सुपुत्रकः।
कार्तिके दीपदानेन यस्तोषयति केशवम्।।"

अर्थात 👉 “मनुष्य के पितर अन्य पितृगणों के साथ सदा इस बात की अभिलाषा करते हैं कि क्या हमारे कुल में भी कोई ऐसा उत्तम पितृभक्त पुत्र उत्पन्न होगा, जो कार्तिक में दीपदान करके श्रीकेशव को संतुष्ट कर सके।"

#दीपदान कहाँ करें
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देवालय (मंदिर) में, गौशाला में, वृक्ष के नीचे, तुलसी के समक्ष, नदी के तट पर, सड़क पर, चौराहे पर, ब्राह्मण के घर में, अपने घर में।

#अग्निपुराण के 200वे अध्याय के अनुसार
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"देवद्विजातिकगृहे दीपदोऽब्दं स सर्वभाक्"

जो मनुष्य देवमन्दिर अथवा ब्राह्मण के गृह में दीपदान करता है, वह सबकुछ प्राप्त कर लेता है। पद्मपुराण के अनुसार मंदिरों में और नदी के किनारे दीपदान करने से लक्ष्मी जी प्रसन्न होती हैं। दुर्गम स्थान अथवा भूमि पर दीपदान करने से व्यक्ति नरक जाने से बच जाता है।

जो देवालय में, नदी के किनारे, सड़क पर दीप देता है, उसे सर्वतोमुखी लक्ष्मी प्राप्त होती है। कार्तिक में प्रतिदिन दो दीपक जरूर जलाएं। एक श्रीहरि नारायण के समक्ष तथा दूसरा शिवलिंग के समक्ष।

#पद्मपुराण के अनुसार
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"तेनेष्टं क्रतुभिः सर्वैः कृतं तीर्थावगाहनम्।
दीपदानं कृतं येन कार्तिके केशवाग्रतः।।"

अर्थात👉 जिसने कार्तिक में भगवान् केशव के समक्ष दीपदान किया है, उसने सम्पूर्ण यज्ञों का अनुष्ठान कर लिया और समस्त तीर्थों में गोता लगा लिया।

ब्रह्मवैवर्त पुराण में कहा गया है जो कार्तिक में श्रीहरि को घी का दीप देता है, वह जितने पल दीपक जलता है, उतने वर्षों तक हरिधाम में आनन्द भोगता है। फिर अपनी योनि में आकर विष्णुभक्ति पाता है; महाधनवान नेत्र की ज्योति से युक्त तथा दीप्तिमान होता है।

#स्कन्दपुराण माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड के अनुसार
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"ये दीपमालां कुर्वंति कार्तिक्यां श्रद्धयान्विताः॥
यावत्कालं प्रज्वलंति दीपास्ते लिंगमग्रतः॥
तावद्युगसहस्राणि दाता स्वर्गे महीयते॥"

अर्थात 👉 जो कार्तिक मास की रात्रि में श्रद्धापूर्वक शिवजी के समीप दीपमाला समर्पित करता है, उसके चढ़ाये गए वे दीप शिवलिंग के सामने जितने समय तक जलते हैं, उतने हजार युगों तक दाता स्वर्गलोक में प्रतिष्ठित होता है।

#लिंगपुराण के अनुसार
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"कार्तिके मासि यो दद्याद्धृतदीपं शिवाग्रतः।
संपूज्यमानं वा पश्येद्विधिना परमेश्वरम्।।"

अर्थात 👉 जो कार्तिक महिने में शिवजी के सामने घृत का दीपक समर्पित करता है अथवा विधान के साथ पूजित होते हुए परमेश्वर का दर्शन श्रद्धापूर्वक करता है, वह ब्रह्मलोक को जाता है।

"यो दद्याद्धृतदीपं च सकृल्लिंगस्य चाग्रतः।
स तां गतिमवाप्नोति स्वाश्रमैर्दुर्लभां रिथराम्।।"

अर्थात 👉 जो शिव के समक्ष एक बार भी घृत का दीपक अर्पित करता है, वह वर्णाश्रमी लोगों के लिये दुर्लभ स्थिर गति प्राप्त करता है।

"आयसं ताम्रजं वापि रौप्यं सौवर्णिकं तथा।
शिवाय दीपं यो दद्याद्विधिना वापि भक्तितः।।
सूर्यायुतसमैः श्लक्ष्णैर्यानैः शिवपुरं व्रजेत्।।"

अर्थात 👉 जो विधान के अनुसार भक्तिपूर्वक लोहे, ताँबे, चाँदी अथवा सोने का बना हुआ दीपक शिव को समर्पित है, वह दस हजार सूर्यों के सामान देदीप्यमान विमानों से शिवलोक को जाता है।

#अग्निपुराण के 200वे अध्याय के अनुसार
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👉जो मनुष्य देवमन्दिर अथवा ब्राह्मण के गृह में एक वर्ष दीपदान करता है, वह सबकुछ प्राप्त कर लेता है।

👉 कार्तिक में दीपदान करने वाला स्वर्गलोक को प्राप्त होता है।

👉 दीपदान से बढ़कर न कोई व्रत है, न था और न होगा ही।

👉 दीपदान से आयु और नेत्रज्योति की प्राप्ति होती है।

👉 दीपदान से धन और पुत्रादि की प्राप्ति होती है।

👉 दीपदान करने वाला सौभाग्ययुक्त होकर स्वर्गलोक में देवताओं द्वारा पूजित होता है।

👉 एकादशी को दीपदान करने वाला स्वर्गलोक में विमान पर आरूढ़ होकर प्रमुदित होता है।

#पाँच दिन जरूर जरूर करें दीपदान
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अगर किसी विशेष कारण से कार्तिक में प्रत्येक दिन आप दीपदान करने में असमर्थ हैं तो पांच विशेष दिन जरूर करें।

पद्मपुराण, उत्तरखंड में स्वयं महादेव कार्तिकेय को दीपावली, कार्तिक कृष्णपक्ष के पाँच दिन में दीपदान का विशेष महत्व बताते हैं:

"कृष्णपक्षे विशेषेण पुत्र पंचदिनानि च
पुण्यानि तेषु यो दत्ते दीपं सोऽक्षयमाप्नुयात्"

अर्थात 👉 बेटा! विशेषतः कृष्णपक्ष में 5 दिन ( रमा एकादशी से दीपावली तक ) बड़े पवित्र हैं। उनमें जो भी दान किया जाता है, वह सब अक्षय और सम्पूर्ण कामनाओं को पूर्ण करने वाला होता है।

"तस्माद्दीपाः प्रदातव्या रात्रावस्तमते रवौ
गृहेषु सर्वगोष्ठेषु सर्वेष्वायतनेषु च
देवालयेषु देवानां श्मशानेषु सरस्सु च
घृतादिना शुभार्थाय यावत्पंचदिनानि च
पापिनः पितरो ये च लुप्तपिंडोदकक्रियाः
तेपि यांति परां मुक्तिं दीपदानस्य पुण्यतः"

रात्रि में सूर्यास्त हो जाने पर घर में, गौशाला में, देववृक्ष के नीचे तथा मन्दिरों में दीपक जलाकर रखना चाहिए। देवताओं के मंदिरों में, शमशान में और नदियों के तट पर भी अपने कल्याण के लिए घृत आदि से पाँच दिनों तक दीप जलाने चाहिए। ऐसा करने से जिनके श्राद्ध और तर्पण नहीं हुए हैं, वे पापी पितर भी दीपदान के पुण्य से परम मोक्ष को प्राप्त होते हैं।
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*वैदिक संस्कार संचार सीहोर*
*ज्योतिष एवं कर्मकाण्ड*
*8319039823*

 #दीपावली तिथि मुहूर्त एवं महत्व_इस वर्ष दीपावली की तिथि को लेकर लोगों के मन में भ्रम की स्थिति बनी हुई है कि आखिरकार दी...
18/10/2025

#दीपावली तिथि मुहूर्त एवं महत्व

_इस वर्ष दीपावली की तिथि को लेकर लोगों के मन में भ्रम की स्थिति बनी हुई है कि आखिरकार दीवाली कब मनाई जाए। लगातार लोगों के मन में संशय बना हुआ है कि इस बार दीपावली 20 अक्टूबर को मनाई जाए या फिर 21 अक्टूबर को। दीपावली की तारीख को लेकर भ्रम की स्थिति इसलिए बनी हुई है क्योंकि इस वर्ष कार्तिक अमावस्या की तिथि एक दिन के बजाय दो दिन पड़ रही है। दीपावली की डेट को लेकर आपके मन में चल रही दुविधा को दूर करने के लिए अनुभवी, विद्वान ज्योतिषाचार्यों और देशभर के प्रमुख ज्योतिष और संस्कृत संस्थानों से बात करके आपको जानकारी दे रहे हैं।_

_सनातन धर्म में वैदिक पंचांग के आधार पर तिथियों और व्रत-त्योहारों की गणनाएं की जाती हैं। पंचांग के अनुसार प्रति वर्ष कार्तिक माह की अमावस्या तिथि पर प्रकाश पर्व दीपावली मनाई जाती है, किन्तु इस बार अमावस्या तिथि दो दिन है जिसकी वजह से दीपावली की तारीख को लेकर भ्रम की स्थिति बनी हुई। यानी कार्तिक अमावस्या तिथि 20 अक्तूबर को भी है और 21 अक्टूबर को भी है।_

_सनातन धर्म में तिथियों का विशेष महत्व होता है और इनमें उदया तिथि का तो और भी अधिक महत्व होता है। सनातन धर्म में व्रत-त्योहार उदया तिथि के आधार पर ही मनाया जाता है। उदया तिथि से तात्पर्य दिन में सूर्योदय के समय जो तिथि होती है उसको ही महत्व दिया जाता है। इस तरह से कुछ लोग उदया तिथि को महत्व देते हुए दीपावली 21 अक्टूबर को मनाना ज्यादा अच्छा समझ रहे हैं। वहीं कुछ लोगों का तर्क है कि दीपावली पर लक्ष्मी पूजन सदैव प्रदोष काल से लेकर मध्य रात्रि के बीच में पड़ने वाली कार्तिक अमावस्या के दौरान मनाया जाता है, इसलिए दीपावली 20 अक्टूबर को ही मनाया जाना चाहिए। आइए इन दोनों तर्कों को ज्योतिष और मुहूर्त शास्त्र के नियमों की कसौटी में रखकर देखते हैं।_

_*क्या हैं वैदिक शास्त्र के नियम*_

_शास्त्रों में दीपावली पर लक्ष्मी पूजन सदैव अमावस्या तिथि के रहने पर और प्रदोष काल यानी सूर्यास्त के बाद से लेकर देर रात तक करने का विधान होता है अर्थात अमावस्या तिथि, प्रदोष काल और निशिताकाल के मुहूर्त में दीपावली मनाना शुभ माना गया है। इस कारण से ज्योतिष शास्त्र के ज्यादातर पंडितों और विद्वानों का मनाना है कि जिस दिन कार्तिक महीने की अमावस्या तिथि रहें तो प्रदोष काल से लेकर आधी रात को लक्ष्मी पूजन करना और दीपावली मनाना ज्यादा शुभ व शास्त्र सम्मत रहता है।_

_ऐसी धार्मिक मान्यता है कि मां लक्ष्मी का प्रादुर्भाव प्रदोष काल में ही हुआ था, जिसके चलते निशीथ काल में मां लक्ष्मी की पूजा और उनसे जुड़ी सभी प्रकार की साधनाएं आदि करना विशेष महत्व का होता है।_

#वैदिक पंचांग के अनुसार इस वर्ष अमावस्या तिथि 20 अक्टूबर को दोपहर 3 बजकर 44 मिनट पर प्रारम्भ हो जाएगी, जो 21अक्टूबर की शाम तक रहेगी। इस तरह से दीपावली पर सभी प्रकार की वैदिक स्थितियां 20 अक्तूबर के दिन लागू रहेगी जबकि 21 अक्टूबर 2025 को अमावस्या तिथि सूर्योदय के दौरान रहेगी लेकिन समाप्ति शाम को 05 बजकर 54 मिनट पर हो जाएगी।_

_व्रत-त्योहारों की तारीखों को लेकर ज्यादातर मामलों में उदया तिथि का विशेष महत्व दिया जाता है, लेकिन कुछ विशेष परिस्थितियों में अन्य चीजों और मुहूर्तों को ध्यान में रखते हुए मिलने वाली तिथि का अधिक महत्व दिया जाता है।_

_इस वजह से जिस रात्रि को प्रदोष काल से लेकर मध्य रात्रि के बीच व्याप्त रहने वाली अमावस्या तिथि को ध्यान में रखते हुए दीपावली का पर्व 20 अक्टूबर को अधिकतर विद्वान और पंडित मनाने की सलाह दे रहे हैं। इस प्रकार लक्ष्मी पूजन के साथ दीपावली 20 अक्टूबर को मनाएं।_

#लक्ष्मी पूजन मुहूर्त

_पंचांग के अनुसार प्रति वर्ष कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की प्रदोषव्यापिनी अमावस्या तिथि पर दीपावली का त्योहार मनाया जाता है। 20 अक्टूबर को लक्ष्मी-गणेश पूजन के लिए पहला शुभ मुहूर्त प्रदोष काल में ही प्राप्त हो रहा है।_

_20 अक्टूबर को प्रदोष काल शाम 05 बजकर 40 मिनट लेकर 08 बजकर 16 मिनट तक रहेगा। वहीं वृषभ लग्न (दिल्ली के समयानुसार) शाम 08 बजकर 11 मिनट से लेकर रात को 10 बजकर 07 मिनट तक रहेगा। ऐसे में गृहस्थ लोग इस समय के दौरान लक्ष्मी पूजन करें।_

_*स्थिर लग्न और प्रदोष काल में लक्ष्मी पूजन का महत्व*_

_मां लक्ष्मी का प्रादुर्भाव प्रदोष काल में हुआ था और स्थिर लग्न में मां लक्ष्मी की पूजन करने से महालक्ष्मी स्थिर रहती हैं। ऐसे में दीपावली पर प्रदोष काल में पड़ने वाले वृषभ लग्न में ही महालक्ष्मी और भगवान गणेश का पूजन करना अति उत्तम रहेगा। पंचांग के अनुसार 20 अक्टूबर को वृषभ लग्न शाम को 8:11 से लेकर रात्रि 10:07 तक रहेगा। साथ ही इस समय प्रदोष काल भी मिल जाएगा। प्रदोषकाल, वृषभ लग्न और चौघड़ियां का ध्यान रखते हुए लक्ष्मी पूजन के लिए 20 अक्टूबर की शाम को 7:12 से लेकर 9:08 के बीच का समय सर्वोत्तम रहेगा। कुल मिलाकर 1 घण्टा 56 मिनट का यह मुहूर्त लक्ष्मी पूजन के लिए सर्वश्रेष्ठ रहेगा।_

_*🪷 "जय जय श्री राधे कृष्ण" 🪷*_

12/10/2025

अहोई अष्टमी तिथि पर राधाकुंड स्नान का महत्व

_*निसंतान दंपति के लिए संतान प्राप्ति हेतु स्नान विधि एवं मुहूर्त:-*_

_अहोई अष्टमी के दिन मथुरा के गोवर्धन में स्थित राधा कुंड में स्नान करने का विशेष महत्व माना गया है। राधा कुंड गोवर्धन परिक्रमा का एक महत्वपूर्ण भाग है। अहोई अष्टमी के दिन शादीशुदा जोड़े इस कुंड में डुबकी लगाते हैं और राधा रानी से संतान की कामना करते हैं। ऐसे में जानते हैं कि इस वर्ष राधा कुंड में स्नान का शुभ मुहूर्त क्या रहने वाला है।_

_*राधा कुंड स्नान शुभ मुहूर्त:-*_

_कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 13 अक्टूबर को दोपहर 12 बजकर 24 मिनट पर शुरू हो रही है। वहीं इस तिथि का समापन 14 अक्टूबर को सुबह 11 बजकर 9 मिनट पर होगा। ऐसे में उदया तिथि के राधा अनुसार कुंड स्नान मुहूर्त - रात 11 बजकर 41 मिनट से रात 12 बजकर 30 मिनट तक राधा कुंड स्नान सोमवार‌ 13 अक्टूबर को किया जाएगा।_

_*इस तरह करें स्नान:-*_

_संतान प्राप्ति की मनोकामना के लिए स्नान करने वाले जोड़े पूरे दिन व्रत करते हैं और मध्य रात्रि यानी निशिता काल में कुंड में स्नान करते हैं। इस दौरान कच्चा सफेद कद्दू जिसे पेठा कहा जाता है, को एक लाल कपड़े में बांधकर अपने हाथों में रखते हैं। राधा रानी का ध्यान करते हैं और मनोकामना पूर्ति की कामना करते हैं। इसके बाद यह पेठा राधा रानी को अर्पित किया जाता है।_

_*जय श्री राधे कृष्ण...🙏*_

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12/10/2025

🪷 अहोई अष्टमी महत्व एवं कथा 🪷

नारदपुराण के अनुसार सभी मासों में श्रेष्ठ कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को कर्काष्टमी नामक व्रत का विधान बताया गया है।

इसे लोकभाषा में अहोई आठें या अहोई अष्टमी भी कहा जाता है। अहोई का शाब्दिक अर्थ है-अनहोनी को होनी में बदलने वाली माता।

इस संपूर्ण सृष्टि में अनहोनी या दुर्भाग्य को टालने वाली आदिशक्ति देवी पार्वती हैं, इसलिए इस दिन माता पार्वती की पूजा-अर्चना अहोई माता के रूप में की जाती है। *अहोई अष्टमी का व्रत कल 13 अक्टूबर, सोमवार के दिन रखा जाएगा।* इस बार अहोई अष्टमी की पूजा पर्व आद्रा व पुनर्वसु नक्षत्र के शुभ संयोग में मनाया जाएगा
इस व्रत को कार्तिक माह में करवा चौथ के चौथे दिन और दीपावली से आठ दिन पहले किया जाता है।

अहोई अष्टमी पूजा मुहूर्त: शाम 05:53 बजे से 07:08 बजे तक, (अवधि - 01 घण्टा 15 मिनट्स)
तारों को देखने के लिए संध्या का समय: शाम 06:17 बजे
अहोई अष्टमी पर चन्द्रोदय समय: रात्रि 11:20 बजे
अष्टमी तिथि प्रारम्भ - 13 अक्टूबर को दोपहर 12:24 बजे से
अष्टमी तिथि समाप्त - 14 अक्टूबर को सुबह 11:09 बजे तक

*अहोई अष्टमी व्रत का महत्व*

अहोई अष्टमी व्रत का महत्व बहुत ही विशेष माना गया है। इस व्रत को करने से आपकी संतान खुशहाल होने के साथ ही दीर्घायु भी होती हैं। हर प्रकार के रोगों से उनकी रक्षा होता है और स्‍याऊं माता बच्‍चों का भाग्‍य बनाती हैं और उनको हर बुरी नजर से बचाती हैं। इस व्रत को करने से आपके घर में सुख समृद्धि बढ़ती हैं और आपके घर में बच्‍चे करियर में खूब तरक्‍की करते हैं। यह व्रत सूर्योदय से लेकर सूर्यास्‍त तक रखा जाता है और बिना अन्‍न जल ग्रहण तारों को जल अर्पित करने के बाद ही यह व्रत खोला जाता है।

*अहोई अष्टमी पूजाविधि*

अहोई अष्टमी की पूजा का विधान सांयकाल प्रदोष वेला में करना श्रेष्ठ रहता है। दिन भर उपवास रखने के बाद संध्याकाल में सूर्यास्त होने के उपरांत जब आसमान में तारों का उदय हो जाए तभी पूजा आरंभ करें और रात्रि में चंद्रोदय होने पर चन्द्रमा को अर्घ्यदान करना चाहिए। इस दिन व्रत रखने वालों को सुबह जल्दी उठकर स्नान करना चाहिए। इसके बाद घर की एक दीवार को अच्छे से साफ करें और इस पर अहोई माता की तस्वीर बनाएं। इस तस्वीर को बनाने के लिए गेरू या कुमकुम का उपयोग करें। इसके बाद घी का दीपक अहोई माता की तस्वीर के सामने जलाएं। फिर पकवान जैसे हलवा, पूरी, मिठाई, आदि को भोग अहोई माता को लगाएं। इसके बाद अहोई माता की कथा पढ़ें और उनके मंत्रों का जप करते हुए उनसे प्रार्थना करें कि अहोई माता आपके बच्चों की हमेशा रक्षा करें।

*अहोई अष्टमी के मंत्र*
अहोई अष्टमी से 45 दिनों तक 'ॐ पार्वतीप्रियनंदनाय नमः' का 11 माला जाप करने से संतान से संबंधित सारे कष्ट मिट जाते हैं।

*अहोई अष्टमी व्रत की कथा*

अहोई अष्टमी पर्व से सम्बंधित विभिन्न पौराणिक कथाएँ प्रचलित हैं। पूजा करते समय स्त्रियाँ एक दूसरे को कथाएँ सुनाती हैं। अहोई अष्टमी से सम्बंधित प्रचलित दो कथाएँ निम्नलिखित हैं:

*कथा 1:-* प्राचीन काल में एक साहूकार था, जिसके सात बेटे और सात बहुएँ थीं। इस साहूकार की एक बेटी भी थी जो दीपावली के अवसर पर ससुराल से मायके आई थी। दीपावली पर घर को लीपने के लिए सातों बहुएँ मिट्टी लाने जंगल में गईं तो ननद भी उनके साथ जंगल की ओर चल पड़ी। साहूकार की बेटी जहाँ से मिट्टी ले रही थी उसी स्थान पर स्याहु (साही) अपने सात बेटों से साथ रहती थी। मिट्टी खोदते हुए गलती से साहूकार की बेटी की खुरपी से स्याहू का एक बच्चा मर गया। स्याहू इस पर क्रोधित होकर बोली मैं तुम्हारी कोख बाँधूँगी।

स्याहू की यह बात सुनकर साहूकार की बेटी अपनी सातों भाभियों से एक एक करके विनती करती हैं कि वह उसके बदले अपनी कोख बंधवा लें। सबसे छोटी भाभी ननद के बदले अपनी कोख बंधवाने के लिए तैयार हो जाती है। इसके बाद छोटी भाभी के जो भी बच्चे थे वह सभी सात दिन बाद मर जाते हैं। सात पुत्रों की इस प्रकार मृत्यु होने के बाद उसने पंडित को बुलवाकर इसका कारण पूछा। पंडित ने सुरही गाय की सेवा करने की सलाह दी।

सुरही सेवा से प्रसन्न होती है और उसे स्याहु के पास ले जाती है। रास्ते में थक जाने पर दोनों आराम करने लगते हैं। अचानक साहूकार की छोटी बहू की नजर एक ओर जाती है। वह देखती है कि एक सांप गरूड़ पंखनी के बच्चे को डंसने जा रहा है और इसलिए वह साँप को मार देती है। इतने में गरूड़ पंखनी वहाँ आ जाती है और खून बिखरा हुआ देखकर उसे लगता है कि छोटी बहू ने उसके बच्चे को मार दिया है। इस पर वह छोटी बहू को चोंच मारना शुरू कर देती है। छोटी बहू इस पर कहती है कि उसने तो उसके बच्चे की जान बचाई है। गरूड़ पंखनी इस पर खुश होती है और सुरही सहित उन्हें स्याहु के पास पहुँचा देती है।

स्याहु छोटी बहू की सेवा से प्रसन्न होकर उसे सात पुत्र और सात बहुएँ होने का अशीर्वाद देती है। स्याहु के आशीर्वाद से छोटी बहू का घर पुत्र और पुत्र की वधुओं से हरा भरा हो जाता है। अहोई अष्टमी का अर्थ एक प्रकार से यह भी होता है “अनहोनी को होनी बनाना” जैसे साहूकार की छोटी बहू ने कर दिखाया।

*कथा 2:-* दंतकथा के अनुसार एक बार एक औरत अपने 7 पुत्रों के साथ एक गाँव में रहती थी। एक दिन कार्तिक महीने में वह औरत मिट्टी खोदने के लिए जंगल में गई। वहाँ पर उसने गलती से एक पशु के शावक की अपनी कुल्हाड़ी से हत्या कर दी।

उस घटना के बाद उस औरत के सातों पुत्र एक के बाद एक मृत्यु को प्राप्त हो गए। इस घटना से दुखी हो कर उस औरत ने अपनी कहानी गाँव की हर एक औरत को सुनाई। एक बड़ी औरत ने उस औरत को यह सुझाव दिया की वह माता अहोई अष्टमी की आराधना करे। पशु के शावक की सोते हुए हत्या के पश्चाताप के लिए उस औरत ने शावक का चित्र बनाया और माता अहोई अष्टमी के चित्र के साथ रख कर उनकी पूजा करने लगी। उस औरत ने 7 वर्षों तक अहोई अष्टमी का व्रत रखा और आखिर में उसके सातों पुत्र फिर से जीवित हो गए।

*अहोई अष्टमी की आरती*

जय अहोई माता जय अहोई माता ।

तुमको निसदिन ध्यावत हरी विष्णु धाता ।।

ब्रम्हाणी रुद्राणी कमला तू ही है जग दाता ।

जो कोई तुमको ध्यावत नित मंगल पाता ।।

तू ही है पाताल बसंती तू ही है सुख दाता ।

कर्म प्रभाव प्रकाशक जगनिधि से त्राता ।।

जिस घर थारो वास वही में गुण आता ।

कर न सके सोई कर ले मन नहीं घबराता ।।

तुम बिन सुख न होवे पुत्र न कोई पता ।

खान पान का वैभव तुम बिन नहीं आता ।।

शुभ गुण सुन्दर युक्ता क्षीर निधि जाता ।

रतन चतुर्दश तोंकू कोई नहीं पाता ।।

श्री अहोई माँ की आरती जो कोई गाता ।

उर उमंग अति उपजे पाप उतर जाता ।।

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