29/12/2021
*रक्तदान महादान -5* आद्य गुरु भगवान शंकराचार्य कहते हैं... *आहार निद्रा भय मैथुनम च, सामान्यम एतत पशु भिन्नराणाम, धर्मो ही तेषाम आधिको विशेष, धर्मे न हिना पशु भित समानाम* आहार निद्रा भय और विषय इन चारो मे मनुष्य और पशुओ मे कोई भिन्नता नहीं हैं , क्यो की ये चारो गुण दोनो मे पाये जाते हैं फिर भी मनुष्य को सबसे श्रेष्ठ योनि कहा जाता हैं वो इस लिये की मानव के जीवन मे धर्म का पालन होता हैं जो की पशुओ मे नहीं पाया जाता. धर्म विहीन मनुष्य को तो शंकराचार्य पशुओ के समान कहते है. आइये अब धर्म के अर्थ को समझने का प्रयास करे. मंदिर मस्जिद गिरिजाघर गुरुद्वारा आदि पवित्र स्थान उपासना स्थल हैं जहाँ अपने अपने 141,107.45àq के लोग उपासना के लिये जाते हैं और अपने आराध्य के सम्मुख धर्म के पालन का संकल्प लेते हैं की यहाँ से बाहर जाकर दिन भर धर्म का पालन करेंगे. धर्म शब्द का एक अर्थ होता हैं गुण. जैसे अग्नि का धर्म हैं जलाने का और जल का भिगोने का. मानव का भी धर्म एक ही हैं चाहे वो किसी भी पंथ या उपासना पद्धती को मानने वाला क्यो न हो और ये हैं मानवीयता, मानवधर्म या इंसानियत. इस मानव धर्म को सरल भाव मे समझना हो तो हमारा आचरण या व्यवहार दुसरो के प्रति वैसा ही हो जैसा हम दुसरो से अपने प्रति चाहते हैं. गोसाई जी धर्म की बडी सुंदर व्याख्या करते हैं.. *परहित सहिस धरम नहीं भाई, परपीडा सम नहीं अधमाई* दुसरो का भला करे,सहायता करे, उनके कष्टो को दूर करे इस के समान कोई धर्म नहीं और दुसरो को कष्ट देने, अहित करने के समान कोई अधर्म नहीं. मानव योनि मे जन्म लेकर इस धराधाम पर आने का एक ही हेतु हैं की हम मानवीय धर्म का पालन करे, इंसानियत को अपनाये अन्यथा हम मानव कहलाने के योग्य ही नहीं हैं. *किसी के काम जो आये उसे इंसान कहते हैं, पराया दर्द अपनाये उसे इंसान कहते हैं. यु भरने को तो दुनिया में पशु भी पेट भरते हैं लेकिन जो बाट कर खाये उसे इंसान कहते हैं* प्रत्येक मानव का ये कर्तव्य हैं की वो मानव धर्म का पालन करे और अपने कर्तव्य का पालन किसी दुसरे पर एहसान या उपकार नहीं होता.