Dr. Mahesh Mawliya

Dr. Mahesh Mawliya Ayushman Hospital, Near New Nagar Parishad, Rani Sati Road, Sikar

23/11/2025


गुर्दे की पथरी, जिसे किडनी स्टोन भी कहा जाता है, छोटे, कठोर खनिज जमा होते हैं जो गुर्दे के अंदर बनते हैं जब मूत्र में पानी, लवण और अन्य पदार्थों का असंतुलन होता है।

लक्षण

गुर्दे की पथरी के लक्षणों में शामिल हैं:

1. पीठ, पक्ष या निचले पेट में गंभीर दर्द (रेनल कॉलिक)
2. दर्दनाक मूत्र (डिस्यूरिया)
3. मूत्र में रक्त (हेमाटुरिया)
4. नाक और उल्टी
5. बार-बार या दर्दनाक मूत्र
6. बुखार और ठंड (यदि संक्रमण हो)
7. मूत्र जो बादल, दुर्गंधयुक्त या गहरा हो

कारण

गुर्दे की पथरी के कारणों में शामिल हैं:

1. निर्जलीकरण
2. आहार में ऑक्सालेट, नमक या पशु प्रोटीन का अधिक सेवन
3. जेनेटिक्स (परिवार का इतिहास)
4. चिकित्सा स्थितियाँ जैसे कि गुर्दे की बीमारी, गाउट या इंफ्लैमेटरी बाउल डिजीज
5. कुछ दवाएं जैसे कि मूत्रवर्धक या कैल्शियम सप्लीमेंट
6. मोटापा
7. खनिज असंतुलन (कैल्शियम, ऑक्सालेट या यूरिक एसिड)

गुर्दे की पथरी से बचाव के लिए:

1. हाइड्रेटेड रहें (बहुत सारा पानी पिएं)
2. संतुलित आहार लें
3. नमक का सेवन कम करें
4. कैल्शियम का सेवन संतुलित रखें
5. पशु प्रोटीन सीमित करें
6. अधिक विटामिन सी और डी सप्लीमेंट्स से बचें
7. स्वस्थ वजन बनाए रखें

ईलाज

गुर्दे की पथरी का इलाज पत्थर के आकार, स्थान और प्रकार पर निर्भर करता है। विकल्पों में शामिल हैं:

1. दर्द प्रबंधन और हाइड्रेशन (छोटे पत्थरों के लिए)

2. मेडिकल एक्सपल्शन थेरेपी (पत्थर को पारित करने के लिए दवाएं)

3. एक्स्ट्राकोर्पोरियल शॉक वेव लिथोट्रिप्सी (ESWL)

4. यूरेटेरोस्कोपी (न्यूनतम इनवेसिव प्रक्रिया)

5. पर्क्यूटेनियस नेफ्रोलिथोटॉमी (PCNL) (सर्जिकल प्रक्रिया)

डॉक्टर आपके पत्थर के प्रकार और चिकित्सा इतिहास के आधार पर सर्वोत्तम उपचार योजना निर्धारित करेंगे।

16/11/2025


हैपटाइटिस सी एक वायरल इन्फेक्शन है जो लिवर को प्रभावित करता है। यह हेपटाइटिस सी वायरस (HCV) के कारण होता है और यह एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या हो सकती है अगर इसका इलाज न किया जाए।

हैपटाइटिस सी के लक्षण आमतौर पर धीरे-धीरे विकसित होते हैं और कई वर्षों तक दिखाई नहीं दे सकते हैं। कुछ आम लक्षण हैं:

- थकान और कमजोरी
- पीला पीलिया (येलो स्क्लेरा और त्वचा)
- गाढ़ा मूत्र
- भूख न लगना
- वजन कम होना
- पेट में दर्द
- जोड़ों में दर्द
- त्वचा पर लाल धब्बे

कुछ लोगों में कोई लक्षण नहीं होते हैं, इसलिए नियमित जांच करवाना महत्वपूर्ण है अगर आप उच्च जोखिम वाले समूह में हैं।

हैपटाइटिस सी के मुख्य कारण हैं:

- *संक्रमित रक्त के संपर्क में आना*: सुई साझा करना, रक्त आधान, या संक्रमित रक्त के संपर्क में आने से हेपटाइटिस सी हो सकता है।
- *असुरक्षित यौन संबंध*: हेपटाइटिस सी से संक्रमित व्यक्ति के साथ असुरक्षित यौन संबंध बनाने से यह वायरस फैल सकता है।
- *जन्म के दौरान माँ से बच्चे को संक्रमण*: हेपटाइटिस सी से संक्रमित माँ से बच्चे को जन्म के दौरान यह वायरस फैल सकता है।
- *संक्रमित टैटू या पियर्सिंग*: असंतुलित या संक्रमित टैटू या पियर्सिंग उपकरणों के उपयोग से हेपटाइटिस सी हो सकता है।
- *संक्रमित दवाओं का उपयोग*: संक्रमित दवाओं का उपयोग करने से हेपटाइटिस सी हो सकता है।

हैपटाइटिस सी से बचाव के लिए कुछ महत्वपूर्ण बातें हैं:

- *सुई और सर्जिकल उपकरणों का उपयोग सावधानी से करें*: सुई और सर्जिकल उपकरणों को हमेशा स्टेरिलाइज करें और उनका उपयोग सावधानी से करें।
- *असुरक्षित यौन संबंध न बनाएं*: हेपटाइटिस सी से संक्रमित व्यक्ति के साथ असुरक्षित यौन संबंध न बनाएं।
- *टैटू और पियर्सिंग के लिए सुरक्षित स्थान चुनें*: टैटू और पियर्सिंग के लिए सुरक्षित और स्वच्छ स्थान चुनें।
- *रक्त आधान के लिए सुरक्षित रक्त का उपयोग करें*: रक्त आधान के लिए सुरक्षित और परीक्षण किया हुआ रक्त का उपयोग करें।
- *हाथों को साफ रखें*: हाथों को नियमित रूप से साबुन और पानी से धोएं।
- *हैपटाइटिस सी के लिए परीक्षण करवाएं*: अगर आप उच्च जोखिम वाले समूह में हैं तो हैपटाइटिस सी के लिए परीक्षण करवाएं।

ईलाज

हैपटाइटिस सी का इलाज आमतौर पर एंटीवायरल दवाओं के साथ किया जाता है। इलाज का उद्देश्य वायरस को नियंत्रित करना और लिवर को होने वाले नुकसान को रोकना है।

- *डायरेक्ट-एक्टिंग एंटीवायरल (DAA) दवाएं*: ये दवाएं वायरस को सीधे निशाना बनाती हैं और इसकी वृद्धि को रोकती हैं।
- *इंटरफेरॉन और रिबाविरिन*: ये दवाएं भी वायरस को नियंत्रित करने में मदद करती हैं, लेकिन इनके अधिक दुष्प्रभाव हो सकते हैं।

इलाज की अवधि आमतौर पर 8-12 सप्ताह होती है, लेकिन यह व्यक्ति की स्थिति और वायरस के प्रकार पर निर्भर करती है।

15/11/2025


अस्थमा एक क्रोनिक श्वसन स्थिति है जो फेफड़ों में वायुमार्ग को प्रभावित करती है। जब अस्थमा वाला कोई व्यक्ति श्वास लेता है, तो उनके वायुमार्ग सूजन, संकुचित और श्लेष्म से भरे हो सकते हैं, जिससे हवा का गुजरना मुश्किल हो जाता है। इससे लक्षण जैसे कि:

सामान्य लक्षण:

1. _सीटी बजने जैसी आवाज_: श्वास छोड़ते समय सीटी बजने जैसी आवाज आना।
2. _सांस की कमी_: ऐसा महसूस होना कि आप अपनी सांस नहीं ले पा रहे हैं।
3. _छाती में तनाव_: छाती में दबाव या तनाव महसूस होना।
4. _खांसी_: विशेष रूप से रात में, व्यायाम के दौरान, या ट्रिगर्स के संपर्क में आने पर।
5. _श्वास लेने में कठिनाई_: ऐसा महसूस होना कि सांस लेना मुश्किल हो रहा है।

ये लक्षण व्यक्ति से व्यक्ति में भिन्न हो सकते हैं और हल्के से गंभीर तक हो सकते हैं।

ट्रिगर्स:

अस्थमा ट्रिगर्स वे चीजें हैं जो अस्थमा के लक्षणों को शुरू कर सकती हैं या खराब कर सकती हैं। सामान्य ट्रिगर्स में शामिल हैं:

1. _एलर्जी_: धूल के मिटे, पालतू जानवरों के बाल, पॉलन, और मोल्ड।
2. _वायु प्रदूषण_: धुआं, स्मॉग, और तेज गंध।
3. _श्वसन संक्रमण_: सर्दी और फ्लू।
4. _व्यायाम_: शारीरिक गतिविधि अस्थमा के लक्षणों को ट्रिगर कर सकती है।
5. _ठंडी हवा_: ठंडी हवा में सांस लेने से लक्षण ट्रिगर हो सकते हैं।
6. _तनाव_: भावनात्मक तनाव लक्षणों को ट्रिगर या खराब कर सकता है।
7. _कुछ दवाएं_: कुछ दवाएं अस्थमा के लक्षणों को ट्रिगर कर सकती हैं।

ट्रिगर्स की पहचान करना और उनसे बचना अस्थमा के लक्षणों को प्रबंधित करने में मदद कर सकता है।

सावधानियां:

अस्थमा के लक्षणों को रोकने में जीवनशैली में बदलाव और चिकित्सा प्रबंधन का संयोजन शामिल है। यहाँ कुछ रणनीतियाँ हैं:

1. _निर्धारित दवा का उपयोग करें_: सूजन को कम करने के लिए इनहेल्ड कॉर्टिकोस्टेरॉइड्स जैसी नियंत्रक दवाएं लें।
2. _ट्रिगर्स की पहचान करें और उनसे बचें_: जानें कि आपके लक्षणों को क्या ट्रिगर करता है और उनसे बचने की कोशिश करें।
3. _अपने लक्षणों की निगरानी करें_: पीक फ्लो मीटर के साथ अपने लक्षणों और फेफड़े के कार्य की निगरानी करें।
4. _अस्थमा एक्शन प्लान बनाएं_: लक्षणों के बिगड़ने पर क्या करना है, इसके लिए अपने स्वास्थ्य सेवा प्रदाता के साथ एक योजना विकसित करें।
5. _स्वस्थ रहें_: फ्लू और प्न्यूमोनिया के खिलाफ टीका लगवाएं, और एक स्वस्थ जीवनशैली बनाए रखें।
6. _धूम्रपान और सेकेंडहैंड धुएं से बचें_: धूम्रपान अस्थमा के लक्षणों को खराब कर सकता है और दवा की प्रभावशीलता को कम कर सकता है।

इन चरणों का पालन करके, आप अपने अस्थमा को प्रबंधित करने और लक्षणों की आवृत्ति और गंभीरता को कम करने में मदद कर सकते हैं।

चिकित्सा:

अस्थमा का इलाज आम तौर पर एक संयोजन होता है:

1. _दवाएं_:
- _नियंत्रक दवाएं_ (उदाहरण के लिए, इनहेल्ड कॉर्टिकोस्टेरॉइड्स) सूजन को कम करने और लक्षणों को रोकने के लिए।
- _रिलीवर दवाएं_ (उदाहरण के लिए, ब्रोन्कोडायलेटर्स) अस्थमा के हमले के दौरान वायुमार्ग को जल्दी से खोलने के लिए।
2. _इनहेलर्स_: उपकरण जो सीधे फेफड़ों में दवा पहुंचाते हैं।
3. _जीवनशैली में बदलाव_: ट्रिगर्स से बचना, स्वस्थ वजन बनाए रखना, और शारीरिक रूप से सक्रिय रहना।
4. _अस्थमा एक्शन प्लान_: लक्षणों को प्रबंधित करने और हमलों को रोकने के लिए एक व्यक्तिगत योजना।

चिकित्सा योजनाएं अक्सर व्यक्ति की अस्थमा की गंभीरता और विशिष्ट ट्रिगर्स को ध्यान में रखते हुए व्यक्तिगत होती हैं। नियमित निगरानी और चिकित्सा योजना में समायोजन लक्षणों को नियंत्रण में रखने में मदद कर सकते हैं।

15/11/2025


डायबिटीज एक ऐसी बीमारी है जिसमें आपके शरीर में ब्लड शुगर (ग्लूकोज) का स्तर बढ़ जाता है। आमतौर पर, पैनक्रियास नामक ग्रंथि इंसुलिन नामक हार्मोन बनाती है, जो ब्लड शुगर को नियंत्रित करने में मदद करता है। लेकिन डायबिटीज में, शरीर या तो पर्याप्त इंसुलिन नहीं बनाता है या इंसुलिन का सही से उपयोग नहीं कर पाता है, जिससे ब्लड शुगर बढ़ जाता है।

दो मुख्य प्रकार के डायबिटीज हैं:
1. *टाइप 1 डायबिटीज*: इसमें शरीर इंसुलिन नहीं बनाता है।
2. *टाइप 2 डायबिटीज*: इसमें शरीर इंसुलिन का सही से उपयोग नहीं कर पाता है।

कारण

टाइप 1 डायबिटीज के कारण अभी तक पूरी तरह से स्पष्ट नहीं हैं, लेकिन यह एक ऑटोइम्यून बीमारी है, जिसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली इंसुलिन बनाने वाली कोशिकाओं पर हमला करती है।

टाइप 2 डायबिटीज के कारणों में शामिल हैं:
- *जेनेटिक्स*: परिवार में किसी को डायबिटीज होना
- *वजन*: अधिक वजन या मोटापा
- *शारीरिक गतिविधि की कमी*: कम शारीरिक गतिविधि
- *आहार*: असंतुलित आहार
- *उम्र*: 45 साल से अधिक उम्र
- *पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम (PCOS)*: महिलाओं में हार्मोनल असंतुलन

लक्षण

डायबिटीज के लक्षणों में शामिल हैं:
- *ज्यादा प्यास और मूत्र*: बार-बार पेशाब आना
- *वजन कम होना*: बिना किसी कारण वजन कम होना
- *थकान*: हमेशा थकान महसूस करना
- *धुंधली दृष्टि*: आंखों की दृष्टि में समस्या
- *सुन्नता या झुनझुनी*: हाथों और पैरों में सुन्नता या झुनझुनी
- *धीमी गति से घाव भरना*: घावों का धीमी गति से भरना
- *बार-बार संक्रमण*: बार-बार संक्रमण होना

बचाव

डायबिटीज से बचाव के लिए कुछ उपाय:
- *स्वस्थ आहार*: फल, सब्जियां, साबुत अनाज और लीन प्रोटीन खाएं
- *नियमित व्यायाम*: कम से कम 30 मिनट प्रतिदिन व्यायाम करें
- *वजन नियंत्रण*: स्वस्थ वजन बनाए रखें
- *धूम्रपान और शराब से बचें*: धूम्रपान और शराब का सेवन न करें
- *तनाव कम करें*: योग, मेडिटेशन या अन्य तनाव-निवारक तकनीकों का उपयोग करें
- *नियमित जांच*: नियमित रूप से ब्लड शुगर जांच करवाएं

डायबिटीज का ईलाज:

- *टाइप 1 डायबिटीज*: इंसुलिन थेरेपी

- *टाइप 2 डायबिटीज*: जीवनशैली में बदलाव, दवाएं, इंसुलिन थेरेपी

- *जीवनशैली में बदलाव*: स्वस्थ आहार, नियमित व्यायाम, वजन नियंत्रण

- *दवाएं*: ब्लड शुगर को नियंत्रित करने के लिए दवाएं

- *इंसुलिन थेरेपी*: इंसुलिन इंजेक्शन या पंप के माध्यम से इंसुलिन देना

15/11/2025


Lumbar radiculopathy, also known as sciatica or lumbar radiculitis, is a condition that affects the lower back and legs. It occurs when a nerve root in the lumbar spine becomes compressed, irritated, or inflamed, leading to pain, numbness, tingling, or weakness in the lower back, buttocks, thighs, legs, or feet.

Common symptoms of lumbar radiculopathy include:

1. *Sharp or shooting pain*: Often radiating from the lower back down to the legs.
2. *Numbness or tingling*: Sensations in the legs, feet, or toes.
3. *Muscle weakness*: Weakness or loss of reflexes in the affected leg.
4. *Pain aggravation*: Pain worsens with certain movements, like bending or lifting.
5. *Limited mobility*: Difficulty standing, walking, or performing daily activities.
6. *Pain distribution*: Pain can follow specific nerve pathways, such as the sciatic nerve.

Common causes of lumbar radiculopathy include:

1. *Herniated discs*: When the disc's soft center bulges out, compressing nearby nerves.
2. *Degenerative disc disease*: Wear and tear on spinal discs, leading to nerve compression.
3. *Spinal stenosis*: Narrowing of the spinal canal, putting pressure on nerves.
4. *Spondylolisthesis*: Misalignment of vertebrae, compressing nerves.
5. *Osteoarthritis*: Joint inflammation and bone spurs can compress nerves.
6. *Trauma or injury*: Sudden impact or strain on the spine.
7. *Age-related changes*: Spinal degeneration over time.

These causes can lead to nerve root compression, irritation, or inflammation, resulting in lumbar radiculopathy symptoms.

To help prevent lumbar radiculopathy:

1. *Maintain good posture*: Proper lifting techniques and sitting posture.
2. *Exercise regularly*: Strengthen core and back muscles.
3. *Stay flexible*: Stretch regularly to maintain spinal mobility.
4. *Manage weight*: Healthy weight reduces strain on the spine.
5. *Lift correctly*: Bend at knees, lift with legs, not back.
6. *Take breaks*: Regular breaks when sitting or performing repetitive tasks.
7. *Strengthen core*: Core muscles support the spine.

By adopting these habits, you can reduce the risk of developing lumbar radiculopathy.

Treatment for lumbar radiculopathy typically involves a combination of:

# # # Conservative Methods
1. *Physical therapy*: Exercises to strengthen muscles, improve flexibility, and reduce pain.
2. *Pain management*: Medications like NSAIDs, muscle relaxants, or oral steroids.
3. *Chiropractic care*: Spinal manipulation and adjustments.
4. *Lifestyle modifications*: Maintaining a healthy weight, improving posture, and regular exercise.

# # # Minimally Invasive Procedures
1. *Epidural steroid injections*: Reducing inflammation and pain.
2. *Nerve blocks*: Targeted injections to numb specific nerves.

# # # Surgical Options
1. *Discectomy*: Removing herniated disc material.
2. *Laminectomy*: Relieving pressure on nerves by removing part of the vertebra.
3. *Spinal fusion*: Stabilizing the spine by fusing vertebrae.

A healthcare professional can help determine the best treatment plan based on individual needs and condition severity.

24/10/2025

20/10/2025
12/10/2025


डायबिटीज एक मेडिकल स्थिति है जिसमें आपके रक्त में शुगर (ग्लूकोज) का स्तर बढ़ जाता है। यह तब होता है जब आपका शरीर इंसुलिन का सही से उपयोग नहीं कर पाता है या पर्याप्त मात्रा में इंसुलिन नहीं बना पाता है। इंसुलिन एक हार्मोन है जो पैंक्रियाज द्वारा बनाया जाता है और यह रक्त शर्करा के स्तर को नियंत्रित करने में मदद करता है।

डायबिटीज मुख्य रूप से दो प्रकार का होता है:

1. *टाइप 1 डायबिटीज*: इसमें पैंक्रियाज इंसुलिन नहीं बना पाता है, इसलिए मरीज़ को इंसुलिन इंजेक्शन लेना पड़ता है।

2. *टाइप 2 डायबिटीज*: इसमें शरीर इंसुलिन का सही से उपयोग नहीं कर पाता है या पर्याप्त इंसुलिन नहीं बना पाता है। यह अधिक आम है और अक्सर जीवनशैली और आहार में बदलाव से नियंत्रित किया जा सकता है।

डायबिटीज के लक्षण व्यक्ति के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन आम लक्षणों में शामिल हैं:

1. *अधिक प्यास लगना*: रक्त में शुगर के उच्च स्तर के कारण शरीर में पानी की कमी हो सकती है, जिससे प्यास बढ़ जाती है।
2. *बार-बार पेशाब आना*: जब रक्त में शुगर का स्तर बढ़ता है, तो गुर्दे अधिक शुगर को निकालने के लिए अधिक पेशाब बनाते हैं।
3. *थकान*: उच्च रक्त शुगर के कारण शरीर की कोशिकाओं को ऊर्जा नहीं मिल पाती, जिससे थकान महसूस हो सकती है।
4. *धुंधली दृष्टि*: उच्च रक्त शुगर के कारण आंखों के लेंस में बदलाव आ सकता है, जिससे दृष्टि धुंधली हो सकती है।
5. *धीरे-धीरे घाव भरना*: उच्च रक्त शुगर के कारण शरीर की घाव भरने की क्षमता प्रभावित हो सकती है।
6. *बार-बार संक्रमण होना*: उच्च रक्त शुगर के कारण शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो सकती है, जिससे संक्रमण होने का खतरा बढ़ जाता है।
7. *वजन कम होना*: टाइप 1 डायबिटीज में अक्सर वजन कम होने लगता है क्योंकि शरीर इंसुलिन की कमी के कारण ऊर्जा के लिए वसा और मांसपेशियों को तोड़ने लगता है।
8. *मुंह में सूखापन और त्वचा का सूखापन*: उच्च रक्त शुगर के कारण त्वचा और मुंह में सूखापन आ सकता है।

डायबिटीज के कारण व्यक्ति के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन मुख्य कारणों में शामिल हैं:

*टाइप 1 डायबिटीज के कारण:*

1. *आनुवंशिकता*: परिवार में टाइप 1 डायबिटीज का इतिहास होने से जोखिम बढ़ जाता है।
2. *ऑटोइम्यून प्रतिक्रिया*: शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली पैंक्रियाज की इंसुलिन बनाने वाली कोशिकाओं पर हमला करती है, जिससे इंसुलिन की कमी हो जाती है।

*टाइप 2 डायबिटीज के कारण:*

1. *आनुवंशिकता*: परिवार में टाइप 2 डायबिटीज का इतिहास होने से जोखिम बढ़ जाता है।
2. *मोटापा*: अधिक वजन या मोटापा होने से इंसुलिन प्रतिरोध बढ़ जाता है।
3. *शारीरिक गतिविधि की कमी*: नियमित व्यायाम न करने से इंसुलिन प्रतिरोध बढ़ जाता है।
4. *आहार*: उच्च शुगर और वसा वाले आहार का सेवन करने से इंसुलिन प्रतिरोध बढ़ जाता है।
5. *उम्र*: 45 वर्ष से अधिक आयु के लोगों में टाइप 2 डायबिटीज का जोखिम बढ़ जाता है।
6. *उच्च रक्तचाप और उच्च कोलेस्ट्रॉल*: ये दोनों स्थितियां टाइप 2 डायबिटीज के जोखिम को बढ़ा सकती हैं।

*गर्भावस्था संबंधी डायबिटीज (गेस्टेशनल डायबिटीज) के कारण:*

1. *हार्मोनल परिवर्तन*: गर्भावस्था के दौरान हार्मोनल परिवर्तन इंसुलिन प्रतिरोध को बढ़ा सकते हैं।
2. *आनुवंशिकता*: परिवार में डायबिटीज का इतिहास होने से जोखिम बढ़ जाता है।
3. *मोटापा*: अधिक वजन या मोटापा होने से जोखिम बढ़ जाता है।

डायबिटीज से बचाव के लिए कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाए जा सकते हैं:

*स्वस्थ जीवनशैली अपनाएं:*

1. *नियमित व्यायाम करें*: शारीरिक गतिविधि इंसुलिन संवेदनशीलता को बढ़ाती है और रक्त शर्करा के स्तर को नियंत्रित करने में मदद करती है।
2. *स्वस्थ आहार लें*: फल, सब्जियां, साबुत अनाज और लीन प्रोटीन जैसे पौष्टिक खाद्य पदार्थों का सेवन करें।
3. *वजन प्रबंधन करें*: स्वस्थ वजन बनाए रखने से टाइप 2 डायबिटीज के जोखिम को कम किया जा सकता है।

*आहार में बदलाव करें:*

1. *शुगर और वसा का सेवन कम करें*: उच्च शुगर और वसा वाले खाद्य पदार्थों से बचें।
2. *फाइबर युक्त खाद्य पदार्थ खाएं*: फाइबर रक्त शर्करा के स्तर को नियंत्रित करने में मदद करता है।
3. *पर्याप्त पानी पिएं*: हाइड्रेटेड रहने से रक्त शर्करा के स्तर को नियंत्रित करने में मदद मिलती है।

*नियमित जांच कराएं:*

1. *रक्त शर्करा की जांच कराएं*: यदि आपकी उम्र 45 वर्ष से अधिक है या आपको जोखिम है, तो नियमित रूप से रक्त शर्करा की जांच कराएं।
2. *स्वास्थ्य जांच कराएं*: नियमित स्वास्थ्य जांच से डायबिटीज के शुरुआती लक्षणों का पता लगाया जा सकता है।

*तनाव प्रबंधन करें:*

1. *ध्यान और योग करें*: तनाव को कम करने के लिए ध्यान और योग जैसी तकनीकों का अभ्यास करें।
2. *पर्याप्त नींद लें*: पर्याप्त नींद लेने से रक्त शर्करा के स्तर को नियंत्रित करने में मदद मिलती है।

डायबिटीज का इलाज एक दीर्घकालिक प्रक्रिया है जिसमें जीवनशैली में बदलाव, आहार, व्यायाम और दवाएं शामिल हो सकती हैं। यहाँ कुछ उपचार विकल्प दिए गए हैं:

*जीवनशैली में बदलाव:*

1. *स्वस्थ आहार*: फल, सब्जियां, साबुत अनाज और लीन प्रोटीन जैसे पौष्टिक खाद्य पदार्थों का सेवन करें।
2. *नियमित व्यायाम*: शारीरिक गतिविधि इंसुलिन संवेदनशीलता को बढ़ाती है और रक्त शर्करा के स्तर को नियंत्रित करने में मदद करती है।
3. *वजन प्रबंधन*: स्वस्थ वजन बनाए रखने से रक्त शर्करा के स्तर को नियंत्रित करने में मदद मिलती है।

*दवाएं:*

1. *ओरल दवाएं*: मेटफोर्मिन, सल्फोनिल्यूरिया और मेग्लिटिनाइड्स जैसी दवाएं रक्त शर्करा के स्तर को नियंत्रित करने में मदद करती हैं।
2. *इंसुलिन थेरेपी*: टाइप 1 डायबिटीज और कुछ मामलों में टाइप 2 डायबिटीज के लिए इंसुलिन इंजेक्शन की आवश्यकता होती है।

*नियमित जांच:*

1. *रक्त शर्करा की जांच*: नियमित रूप से रक्त शर्करा की जांच कराने से उपचार की प्रभावशीलता का मूल्यांकन किया जा सकता है।
2. *स्वास्थ्य जांच*: नियमित स्वास्थ्य जांच से डायबिटीज संबंधी जटिलताओं का पता लगाया जा सकता है।

डायबिटीज के इलाज के लिए एक व्यक्तिगत योजना बनाना महत्वपूर्ण है जो आपकी विशिष्ट आवश्यकताओं और स्वास्थ्य लक्ष्यों को ध्यान में रखती है। अपने डॉक्टर से परामर्श करके एक प्रभावी उपचार योजना तैयार करें।

29/09/2025


डेंगू बुखार एक वायरल बीमारी है जो मच्छरों के काटने से फैलती है, विशेष रूप से एडीज मच्छर जो दिन के समय सक्रिय होते हैं।

कारण:-

डेंगू बुखार के कारण इस प्रकार हैं:
- *वायरस*: डेंगू बुखार डेंगू वायरस के कारण होता है, जो फ्लेविविरिडे परिवार से संबंधित है। यह वायरस चार अलग-अलग सीरोटाइप (DEN-1, DEN-2, DEN-3 और DEN-4) में आता है।
- *मच्छर*: डेंगू वायरस एडीज मच्छरों द्वारा फैलाया जाता है, विशेष रूप से एडीज एजिप्टी और एडीज एल्बोपिक्टस। ये मच्छर दिन के समय सक्रिय होते हैं और स्वच्छ और स्थिर पानी में प्रजनन करते हैं।
- *मच्छर के काटने*: जब एक संक्रमित मच्छर किसी स्वस्थ व्यक्ति को काटता है, तो वह वायरस को उस व्यक्ति के शरीर में पहुंचा देता है, जिससे वह व्यक्ति संक्रमित हो जाता है।

इन कारणों को समझने से डेंगू बुखार की रोकथाम और नियंत्रण में मदद मिल सकती है।

लक्षण:-

डेंगू बुखार के लक्षण इस प्रकार हैं:
- *तेज बुखार*: अचानक शुरुआत और उच्च तापमान
- *सिरदर्द*: गंभीर और कष्टदायक
- *मांसपेशियों और जोड़ों में दर्द*: अत्यधिक दर्द और असहजता
- *त्वचा पर चकत्ते*: लाल धब्बे या दाने जो शरीर के विभिन्न भागों पर दिखाई दे सकते हैं
- *भूख न लगना और उल्टी आना*: सामान्य लक्षण जो बीमारी को और बढ़ा सकते हैं
- *थकान और कमजोरी*: बीमारी के दौरान सामान्य थकान और कमजोरी महसूस होना
- *आंखों के पीछे दर्द*: कुछ मामलों में आंखों के पीछे दर्द महसूस हो सकता है

इन लक्षणों की गंभीरता व्यक्ति की उम्र, स्वास्थ्य स्थिति और अन्य कारकों पर निर्भर करती है। कुछ मामलों में, डेंगू बुखार गंभीर रूप ले सकता है और डेंगू रक्तस्रावी बुखार या डेंगू शॉक सिंड्रोम का कारण बन सकता है, जो जानलेवा हो सकता है।

बचने के उपाय:-

डेंगू बुखार से बचाव के लिए निम्नलिखित उपाय अपनाए जा सकते हैं:
- *मच्छरों की आबादी को नियंत्रित करना*: घर के आसपास और घर के अंदर मच्छरों की आबादी को नियंत्रित करने के लिए नियमित रूप से साफ-सफाई करें और पानी जमा न होने दें।
- *मच्छरों के काटने से बचाव*: मच्छरों के काटने से बचने के लिए मच्छरदानी का उपयोग करें, मच्छर भगाने वाली क्रीम या स्प्रे लगाएं और पूरी आस्तीन के कपड़े पहनें।
- *स्वच्छता बनाए रखना*: घर और आसपास के क्षेत्र में स्वच्छता बनाए रखने से मच्छरों की आबादी को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।
- *पानी जमा न होने देना*: घर के आसपास और घर के अंदर पानी जमा न होने दें, क्योंकि मच्छर स्वच्छ और स्थिर पानी में प्रजनन करते हैं।
- *मच्छर भगाने वाले पौधे*: घर के आसपास मच्छर भगाने वाले पौधे जैसे कि तुलसी, लेमनग्रास और सिट्रोनेला लगाएं।
- *जागरूकता फैलाना*: डेंगू बुखार के बारे में जागरूकता फैलाने से लोगों को इसके लक्षणों और बचाव के तरीकों के बारे में पता चल सकता है।

इन उपायों को अपनाकर डेंगू बुखार के खतरे को कम किया जा सकता है।

ईलाज:-

डेंगू बुखार का इलाज इस प्रकार है:
- *आराम और तरल पदार्थ*: डेंगू बुखार के मरीजों को पर्याप्त आराम करने और तरल पदार्थ पीने की सलाह दी जाती है, जैसे कि पानी, नींबू पानी और इलेक्ट्रोलाइट युक्त पेय।
- *बुखार और दर्द निवारक*: बुखार और दर्द को कम करने के लिए पेरासिटामोल जैसी दवाएं दी जा सकती हैं। एस्पिरिन और इबुप्रोफेन जैसी दवाएं नहीं दी जानी चाहिए, क्योंकि वे रक्तस्राव के खतरे को बढ़ा सकती हैं।
- *मेडिकल निगरानी*: डेंगू बुखार के मरीजों की मेडिकल निगरानी आवश्यक है, खासकर यदि उन्हें गंभीर लक्षण हों या उनकी स्थिति खराब हो रही हो।
- *प्लेटलेट काउंट की निगरानी*: डेंगू बुखार के मरीजों के प्लेटलेट काउंट की निगरानी करना आवश्यक है, क्योंकि प्लेटलेट काउंट में कमी से रक्तस्राव का खतरा बढ़ सकता है।
- *गंभीर मामलों में अस्पताल में भर्ती*: गंभीर मामलों में, डेंगू बुखार के मरीजों को अस्पताल में भर्ती करने की आवश्यकता हो सकती है, जहां उन्हें उचित उपचार और निगरानी प्रदान की जा सकती है।

डेंगू बुखार का इलाज लक्षणों को कम करने और जटिलताओं को रोकने पर केंद्रित होता है।

Address

Ayushmann Hospital, Ashok Vihar, Near New Nagar Parishad, Rani Sati Road
Sikar
332001

Opening Hours

Monday 8am - 8pm
Tuesday 8am - 8pm
Wednesday 8am - 8pm
Thursday 8am - 8pm
Friday 8am - 8pm
Saturday 8am - 8pm
Sunday 8am - 2pm

Telephone

+919462000764

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