07/05/2026
एक नई कविता " परजीवी "
कुछ इंसान और पौधे जन्म से ही परजीवी होते हैं ,
कुछ कीट -पतंगें और मानुष तक ,
इनके भ्रम जाल में फंस कर मारे जाते हैं !
जैसे / पीचर प्लांट ( पौधा ) जिसकी शरण -कीट -पतंगे
पौधा समझ कर लेते हैं ,
उन्हें भी हजम कर लेता है !
इसी तरह कुछ पेरासाइट कीड़े और जीवाणु
शरीर में घुसपैठ कर मनुष्य का
रक्त शोषण कर , परजीवी होकर पनपते हैं ।
राजनेता, साहित्यकार और कुछ चाटुकार -पत्रकार भी
परजीवी होकर जीते हैं !
इनके डी -एन -ए में ही, परजीवी के गुण सूत्र छिपे होते हैं ।
इनका एक मात्र ध्येय होता है --
देश मे नफरत फैल कर दंगें करवा कर,
साम्प्रदायिकता का परचम लहराना
हर दिन, हर वक्त और हर जगह
ये परजीवी , देश भक्ति की लार टपकते हैं , जबकि
रात के अंधेरों में
मदिरा के साथ धूम्रपान करते हैं ,
इनकी कोई जाति न धर्म , बस इनके भीतर
नफरत का जहरीला अजगर छिपा होता है ।
शोषण कर दूसरों को , यही इनके जीने का मकसद,
यही इनके चेहरों का नकाब होता है ।