Samarthguru Tarn Taran

Samarthguru Tarn Taran This page promotes Samarthguru programs conducted by Acharyas all over the world. www.oshodhara.org.in
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Samarthguru dhara is a live mystery school which provides yog and wisdom programs both on online and offline mode www.samarthgurusiddharth.org.in

03/04/2026

आज 2 अप्रैल,26 को संसद सदस्य श्री रामचंद्र जांगड़ा और उनके सुपुत्र श्री अरुण जांगड़ा ने समर्थगुरु सिद्धार्थ औलिया रचित श्री भगवद्गीता और श्री सिद्धार्थ रामायण भारत के माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी को भेंट किया। पूरी समर्थगुरु धारा को ढेर सारी बधाइयाँ व शुभकामनायें।
-समर्थगुरू

08/03/2026

🧡

हमारे यहां संस्कृति का मापदंड क्या है? 'यत्र नार्यस्तु पूज्यंते,रमन्ते तत्र देवता।' जहां नारी को सम्मान दिया जाता है,वहां देवता रमण करते हैं।तो नारी का सम्मान हमारे देश में,हमारी संस्कृति में यह बहुत ही मूल्य रखता है।
-Samarthguru Siddharth Aulia Ji 💛

04/03/2026
04/03/2026

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30/01/2026

❤️‍🔥मेरे गुरुदेव- मेरा जीवन❤️‍🔥

प्यारे मित्रो,
गुरुदेव समर्थ गुरु सिद्धार्थ औलिया जी की असीम कृपा से मेरे जीवन में एक पवित्र क्षण का प्रादुर्भाव हुआ है। उसी कृपा के फलस्वरूप यह पुस्तक अस्तित्व में आई है, जिसका शीर्षक है —
“मेरे गुरुदेव – मेरा जीवन”।
📿📿

यह पुस्तक उन अनमोल क्षणों का विनम्र वर्णन है, जब-जब जीवन की राह कठिन हुई, जब-जब मैं स्वयं से भी दूर होती चली गई—तब-तब गुरुदेव ने मेरा हाथ थामा, मुझे संभाला और मुझे प्रकाश की ओर ले चले।
🌕🌕

हालांकि, इस पुस्तक का आरम्भ मेरी introduction से होता है लेकिन इसका गंतव्य गुरुदेव हैं
🍁🍁
गुरुदेव की कृपा से ही मैं इस कृति को आज social media पर आप सभी के साथ साझा कर पा रही हूँ।
🌹🌹
गुरु-ऋण से न तो कभी मुक्त हुआ जा सकता है और न ही उनकी अनंत कृपाओं का पूर्ण वर्णन संभव है। शब्द वहाँ मौन हो जाते हैं, जहाँ गुरु की महिमा प्रारंभ होती है।
🍀🍀
यह रचना उसी मौन को शब्द देने का मेरा एक अत्यंत छोटा, विनम्र और श्रद्धाभाव से भरा प्रयास है—कि शायद इन पंक्तियों के माध्यम से मैं अपने गुरुदेव की महिमा का थोड़ा-सा भी गुणगान कर सकूँ।

🌺🌸
गुरुदेव को कोटि-कोटि नमन। 🙏

🪷Ma monika 🪷

30/01/2026

🎊मेरे गुरुदेव- मेरा जीवन🎊

अध्याय 1 : आत्मा की अंधेरी रात (1999–2007)

सन 2000 — रात का कोरा सन्नाटा है। ठंडी हवा कड़कड़ाती हुई बह रही है।✨️

मैं, उन्नीस वर्ष की एक लड़की, अपने घर की छत पर बैठी हूँ।

अंधेरे को देख रही हूँ… पर ऐसा लगता है जैसे वह अंधेरा बाहर नहीं, मेरे भीतर फैला हुआ है।
सत्य यही है कि अब तक के जीवन में मैंने ख़ुशी नहीं जानी।
अधिकतर लोग अपने बचपन को स्वर्णिम समय के रूप में याद करते हैं लेकिन मैंने बचपन से एक रिक्तता अपने भीतर हमेशा महसूस की। 🍁

जैसे मैं यहाँ पर फेंक दी गयी होऊं एक ऐसी दुनिया में , जहाँ कोई अपना नहीं , जैसे अपना घर कहीं और हो , जैसे I dont belong here.
🍁🍁🍁
मेरे भीतर के हालात कुछ ऐसे हैं:

रोज़ रूखी रूखी सी ज़िन्दगी जीनी
जैसे पत्ता कोई पेड़ से झड़ गया हो
और अपने वजूद से अलग हो गया हो 🍁
और गिर पड़ा हो ऐसे अंतहीन तहखाने में🍁
जहाँ रोशनी की कोई किरण नहीं आती🪾
अकेला पड़ा वह बस यही विचार करता है 🪾
कि क्या यही जीवन है ??🍂

Jesus ने इस अवस्था का वर्णन “dark night of the soul” के नाम से किया है। 🪹
यह वह अवस्था होती है जब साधक भीतर से पूरी तरह खाली, अकेला, खोया हुआ और मार्गहीन महसूस करता है।🪹

जैसे भीतर की सारी रोशनी बुझ गई हो, जैसे ईश्वर, कृपा, दिशा — सब दूर हो गए हों। लेकिन वास्तव में यह एक गहन आध्यात्मिक रूपांतरण की अवस्था है।🌕
इस अंधकार के बाद ही साधक की चेतना नये प्रकाश के लिए तैयार होती है।💫
मैं इसी dark night of the soul से गुज़र रही थी।लेकिन उस समय ऐसा कोई ख्याल मेरे भीतर नहीं है , बस मैं यही जानती हूँ कि जीवन गहन अन्धकार है ।🌑

लेकिन उस रात छत पर बैठी मैं, महसूस कर रही हूँ — कि इस साल कुछ बहुत गहरा होने वाला है। जीवन किसी अदृश्य ढंग से बदलने वाला है। एक देजा वू अपने भीतर महसूस कर रही हूँ।🌟

क्रमश:....

30/01/2026

🌟मेरे गुरुदेव- मेरा जीवन🌟

🪾अध्याय 2 - भीतर की टूटन🪾

वर्ष 2001 ।नया साल। मैं चंडीगढ़ आई हूँ — अपनी छह महीने की इंडस्ट्रियल ट्रेनिंग के लिए। बाहर सब सामान्य है, पर भीतर कुछ टूट रहा है। ऐसा लगता है — यह मेरे जीवन का सबसे अंधकारमय समय है।🌑

कुछ भी बुरा नहीं हो रहा, पर भीतर खालीपन है, एक गहरी पीड़ा है।
⚡⚡
क्योंकि जब हम जीवन का केंद्र बाहर खोजते हैं, तो दुख आना स्वाभाविक है — यह लगभग नियम है।🌩️

जो भी लोग अपने जीवन का अर्थ बाहर ढूँढते हैं, वे कभी तृप्त नहीं हो सकते।
क्योंकि जो भी सार्थक है, वह भीतर से आता है। मैं दुखी हूँ — जीना चाहती हूँ, खुश रहना चाहती हूँ —
पर कैसे? यह नहीं जानती।
🧩🧩
इन्हीं विचारों में खोई, मैं एक दिन सड़क पर चल रही हूँ। एक बुकस्टॉल पर नज़र पड़ी — वहाँ ओशो की एक किताब रखी है।
कवर पर उनकी आँखें हैं… ऐसी आँखें, जैसी मैंने पहले कभी नहीं देखी
💓💓
वो आँखें मुझे पुकार रही हैं — जैसे उन्हें मैं जन्म-जन्म से जानती हूँ।
जैसे कोई अधूरा रिश्ता पूरा होना चाहता हो।❤️‍🔥

मैंने वह किताब ख़रीदी और घर ले आई।
पहला ही वाक्य पढ़ा — “हम सबने मुखौटे पहने हुए हैं।”
ओशो लिखते हैं —
घर में एक चेहरा, दफ़्तर में दूसरा, मंदिर में तीसरा, दोस्तों के बीच चौथा… पर असली चेहरा कहाँ है?
वो शब्द बिजली की तरह भीतर उतर गए।🧿
मैं सोचने लगी — मेरा असली चेहरा क्या है? मैं कौन हूँ?
और तभी जान गई — मैंने भी एक मुखौटा पहना हुआ है।📿

क्रमशः .....

30/01/2026

📿मेरे गुरुदेव - मेरा जीवन 📿

📿अध्याय 3: अपने ही हाथों सन्यास💮
धीरे-धीरे ओशो की किताबें पढ़ना एक जुनून बन गया।
❤️‍🔥❤️‍🔥
हर शब्द भीतर उतरता —और भीतर तक मौन कर देता।
जब भी पढ़ती, कुछ क्षणों के लिए भीतर का कोलाहल थम जाता, और मैं अपनी आत्मा से जुड़ जाती — बिना यह जाने कि आत्मा क्या है।
🧩🧩
एक निस्तब्धता उनके शब्दों के माध्यम से मेरे भीतर उतर जाती है—जैसे कोई अदृश्य शांति अपने हल्के स्पर्श से मेरी सारी हलचल, सारी बेचैनी को थाम लेती हो। उनकी वाणी मानो बाहरी शोर को चुप कर मेरे भीतर एक नया, पवित्र शून्य रच देती है… जहाँ केवल अनुभूति रहती है, और मैं—अपने आप से साक्षात्कार करती हूँ।
🪷🪷
यह अनुभव क्षणभंगुर है, पर बेहद मूल्यवान मालूम पड़ता है। । ऐसा लगता है जैसे किसी पूर्व जन्म की स्मृति फिर से जीवित हो रही हो। इस समय ओशो को जानने का एकमात्र माध्यम उनकी किताबें ही हैं। धीरे-धीरे मुझे पता चला कि उनका आश्रम पुणे में है। पर लोग उन्हें “संभोग से समाधि” जैसी बातों से ही जानते हैं।
📿📿🙌
और ऐसे बदनाम गुरु के पास —जिनका देह-त्याग भी हो चुका है — उनके पास जाने की सामर्थ्य मुझमें नहीं है।
न मेरे पास पैसे हैं, न ही इतना साहस कि अपने माता-पिता से कह सकूँ
कि मैं ओशो के पास जाना चाहती हूँ।
❤️‍🔥❤️‍🔥
तो मैं अपनी उस प्रबल इच्छा को अपने ही भीतर दबा देती हूँ। शायद यही तो लड़कियों को सिखाया जाता है — कि अपनी इच्छाओं को चुपचाप भीतर ही दफना दो।
💓💓
पर भीतर जो जल रहा है — वह कैसे बुझेगा?
वह अग्नि धीमी सही, पर निरंतर जल रही है।
💥💥
मेरे जो सामर्थ्य में है, वो मैं करती हूँ। मैं एक रुद्राक्ष की माला खरीदती हूँ और उसे अपने गले में स्वयं ही पहन लेती हूँ। इस तरह, अपने ही हाथों से मैं सन्यास धारण करती हूँ— बिना किसी दीक्षा, बिना किसी विधि-विधान के
🧿🧿
बस एक गहरी पुकार है भीतर से, कि अब यही मेरा मार्ग है।
और इसी क्षण — बिना जाने, बिना समझे — मैं ओशो की परंपरा में स्वयं ही संन्यासिन हो जाती हूँ।
📿📿

क्रमश...

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