Acharya Krishna Mishra

Acharya Krishna Mishra श्री महर्षि सांदीपनि राष्ट्रीय‌ वेद वेदांग विद्यालय (उज्जैन) मप्र ।
गुरुकुल शुक्ल यजुर्वेद अध्यापक

ll लग्न और राशि: इनका क्या अर्थ है क्या अंतर है?llवैदिक ज्योतिष में रुचि है लेकिन राशि और लग्न के बीच का अंतर थोड़ा जटिल...
05/05/2026

ll लग्न और राशि: इनका क्या अर्थ है क्या अंतर है?ll
वैदिक ज्योतिष में रुचि है लेकिन राशि और लग्न के बीच का अंतर थोड़ा जटिल हो सकता है।

ज्योतिष को समझने की बात करें तो , यह विषय इतना गहन और जटिल है कि अनगिनत लोगों का ध्यान आकर्षित कर चुका है। यह एक विशाल विषय है जिसमें सूर्य राशि, चंद्र राशि, ज्योतिषीय भाव, लग्न राशि , ग्रह और बहुत कुछ शामिल हैं, जिसका अर्थ यह है कि जब लोग प्रासंगिक प्रश्न लेकर ज्योतिषी के पास आते हैं तो उनके पास विश्लेषण और जाँच करने के लिए बहुत कुछ होता है।

ज्योतिषशास्त्र के कई महत्वपूर्ण कारकों में से लग्न और राशि संभवतः दो सबसे महत्वपूर्ण कारक हैं। वैदिक ज्योतिष के अनुसार , बारह भाव होते हैं और पहले भाव को लग्न कहा जाता है। वहीं, राशि वह राशि है जिसमें चंद्रमा स्थित होता है।

राशि और लग्न के बीच अंतर जानने से पहले, आइए पहले यह जान लें कि वे क्या हैं।

#लग्न #क्या #है?
लग्न, जिसे असेंडेंट भी कहा जाता है, को 'जीवन का प्रवेश द्वार' माना जा सकता है। यह जन्म के समय और जन्मस्थान पर व्यक्ति की लग्न राशि होती है। लग्न वह पहली राशि है जो जन्म के समय पूर्वी क्षितिज पर दिखाई देती है। लग्न और नक्षत्र जन्म के समय पूर्वी क्षितिज पर सूर्य और तारों की सटीक स्थिति को दर्शाते हैं । लग्न को आत्मा और पृथ्वी पर उसके नए जीवन के बीच संपर्क के पहले क्षण के रूप में सबसे अच्छी तरह परिभाषित किया जा सकता है। लग्न हर दो घंटे में बदलता है, जिसका अर्थ है कि जन्म के समय असेंडेंट केवल दो घंटे के लिए ही रहता है। जन्म कुंडली में लग्न स्वामी का प्रतिनिधित्व करने वाला ग्रह सबसे अनुकूल और शक्तिशाली ग्रह होता है। जन्म कुंडली में असेंडेंट राशि पहला भाव और प्राथमिक संदर्भ बिंदु होता है।

चाहे आप इसे लग्न कहें या आरोही राशि, आपको यह जानना चाहिए कि यह आपकी जन्म कुंडली का एक महत्वपूर्ण पहलू है। आरोही राशि आपको स्वयं को बेहतर ढंग से समझने में मदद करती है, क्योंकि यह आपके गुणों को निर्धारित करती है और आपके सांसारिक व्यक्तित्व को दर्शाती है। लग्न राशि रूप-रंग से लेकर चरित्र और आत्मविश्वास तक सब कुछ दर्शाती है। यह आपके सामाजिक व्यक्तित्व को निर्धारित करती है। आपकी पहचान बनाने में आपका आरोही बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, क्योंकि यह आपको यह समझने में मदद करता है कि आप क्या चाहते हैं और आप किन लोगों के साथ सहजता से रह सकते हैं। आपकी लग्न राशि आपके व्यवहार और शारीरिक बनावट को निर्धारित करती है। आपकी आरोही राशि आपके शारीरिक कद-काठी और जीवन के उतार-चढ़ावों का सामना करने की आपकी क्षमता को दर्शाती है।

आपका लग्न समाज में आपकी प्रसिद्धि और प्रतिष्ठा का पूर्वानुमान लगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह आपके सांसारिक दृष्टिकोण को दर्शाता है और आपके जीवन के बारे में जानकारी प्रकट करता है। आपकी सफलता के मापदंड, यानी आप जीवन में कितनी सफलता प्राप्त करेंगे, आपके लग्न पर आधारित होते हैं। यदि आपका लग्न कमजोर है, तो आपको जीवन में बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है, लेकिन यदि आपका लग्न मजबूत है, तो आप किसी भी स्थिति को आसानी से संभाल सकते हैं। अपना लग्न देखें।

राशि क्या है?
सरल शब्दों में कहें तो, वैदिक ज्योतिष में राशि चंद्रमा की राशि होती है । यह व्यक्ति के जन्म के समय चंद्रमा की स्थिति से निर्धारित होती है। किसी व्यक्ति की राशि जानने के लिए, उसे अपनी जन्म तिथि, जन्म स्थान और जन्म समय का पूरा ज्ञान होना आवश्यक है। जन्म कुंडली में राशि एक महत्वपूर्ण संदर्भ बिंदु है। वैदिक ज्योतिष में बारह राशियाँ होती हैं, इसलिए किसी व्यक्ति की राशि बारह प्रकारों में से एक हो सकती है। ये राशियाँ हैं: मेष, वृषभ, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुंभ और मीन।

आपकी राशि या चंद्र राशि, यह निर्धारित करती है कि कोई व्यक्ति अपने जीवन में कैसा व्यवहार करेगा और उसका व्यक्तित्व कैसा होगा। यह दर्शाती है कि कोई व्यक्ति अपने जीवन में होने वाली घटनाओं और परिस्थितियों पर कैसी प्रतिक्रिया देगा। यह आपकी भावनाओं और आंतरिक मनोदशा को दर्शाती है। यह किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व, व्यवहार, स्वभाव और अंतर्निहित गुणों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी प्रकट कर सकती है।

यह आपके भाग्य को निर्धारित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है ताकि आप सही जीवन पथ पर चल सकें। आपकी राशि अन्य चंद्र राशियों के अंतर्गत जन्मे लोगों के साथ आपकी अनुकूलता जानने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है और लोगों के साथ सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखने में आपकी मदद करती है। आपके कर्म आपके जन्म के समय चंद्रमा की स्थिति से निर्धारित होते हैं।

कुल मिलाकर, चंद्र राशि किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व के लक्षणों को निर्धारित करती है। ज्योतिषी आपकी राशि के आधार पर आपके जीवन की दिन-प्रतिदिन की परिस्थितियों और आपके जीवन के भविष्य की भविष्यवाणी करते हैं। अपनी राशि जानें।

लग्न और राशि: इन दोनों में क्या अंतर है?
राशि और लग्न के बीच का अंतर समझना थोड़ा मुश्किल हो सकता है; हालांकि, इस लेख में हम इसे सरल बनाने का प्रयास करेंगे।

लग्न हर दो घंटे में बदलता है, यानी जन्म के समय का लग्न किसी राशि में केवल दो घंटे ही रहता है। लग्न का निर्धारण जन्म के समय और जन्म स्थान से होता है। वहीं, राशि वह राशि है जिसमें जन्म के समय चंद्रमा स्थित होता है। चंद्रमा ढाई दिन तक किसी राशि में रहता है। सूर्य पूरे एक महीने तक रहता है। यही कारण है कि लोगों की चंद्र राशि और सूर्य राशि एक जैसी होती हैं, लेकिन लग्न एक जैसा होना बहुत दुर्लभ है।

राशि और लग्न के बीच एक और महत्वपूर्ण अंतर यह है कि लग्न को व्यक्ति के संपूर्ण शरीर का प्रतीक माना जाता है, जबकि राशि व्यक्ति के मन और आत्मा का प्रतिनिधित्व करती है।

राशि जीवन की विभिन्न परिस्थितियों के प्रति व्यक्ति की प्रतिक्रियाओं और उनसे निपटने के तरीके को नियंत्रित करती है। वहीं, ज्योतिषी जीवन की किसी भी महत्वपूर्ण घटना से पहले व्यक्ति के लग्न का विश्लेषण करते हैं। यह वह निर्णायक कारक है जो आपको गृह प्रवेश, विवाह आदि जैसे शुभ अवसरों की शुरुआत का समय निर्धारित करने में सक्षम बनाता है। लग्न यह निर्धारित करने में मदद कर सकता है कि आपके जीवन की महत्वपूर्ण घटनाएं सफल होंगी या असफल। यही कारण है कि विवाह से पहले हमेशा लग्न की जाँच की जाती है। लग्न आपको बता सकता है कि आपका वैवाहिक जीवन सफल होगा या नहीं, आपके जीवनसाथी के साथ आपका रिश्ता कैसा रहेगा, और भी बहुत कुछ। विवाह के अलावा , निवेश संबंधी निर्णय लेने से पहले व्यावसायिक उद्यमों में सफलता का निर्धारण करने के लिए भी इसकी जाँच की जाती है। शुभ आरंभ के लिए सही लग्न का चुनाव आपको सौभाग्य, समृद्धि और खुशहाली प्रदान कर सकता है।

#निष्कर्ष: राशि और लग्न को महत्वपूर्ण क्यों माना जाता है?
अधिकांश लोग सोचते हैं कि महत्वपूर्ण निर्णय लेते समय लग्न और राशि का ध्यान रखना उतना ज़रूरी नहीं है। वे अक्सर इन्हें एक ही मानते हैं और कुंडली देखते समय इन्हें देखना भूल जाते हैं। हालांकि, यह सच से बहुत दूर है, क्योंकि ज्योतिष में लग्न और राशि का बहुत महत्व है। लग्न और राशि एक दूसरे से जुड़े होते हैं और जीवन के विभिन्न पड़ावों और क्षणों में इनका बहुत महत्व होता है। ये दोनों मिलकर किसी व्यक्ति के वास्तविक स्वभाव और जीवन को समझने में मदद कर सकते हैं।

आपकी राशि और लग्न का विश्लेषण आपके चरित्र, स्वभाव, भावनाओं, खूबियों और कमियों को समझने के लिए अत्यंत आवश्यक है। ये किसी व्यक्ति के आंतरिक जगत और गुणों को परिभाषित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनका महत्व तब और भी बढ़ जाता है, जब विवाह जैसे शुभ अवसरों से पहले इनका विश्लेषण किया जाता है। यही कारण है कि दूल्हा और दुल्हन की कुंडली का विश्लेषण और मिलान करके उनकी अनुकूलता का निर्धारण किया जाता है।

लग्न और राशि का ज्ञान आपको अपनी कुंडली या जन्मपत्री के आधार पर होने वाली घटनाओं को सटीक रूप से समझने और भविष्यवाणी करने में मदद कर सकता है। इसलिए, भविष्यवाणियां करने के लिए लग्न और राशि की जांच करना अत्यंत आवश्यक है। यदि आप अपने भाग्य में क्या लिखा है

Acharya Krishna Mishra



वैदिक ज्योतिष में नवमांश कुण्डली  का क्या महत्व है ?1. कुण्डली में नवमांश, यानि 'भाग्य का भी भाग्य' :कुंडली के फलादेश के...
04/05/2026

वैदिक ज्योतिष में नवमांश कुण्डली का क्या महत्व है ?
1. कुण्डली में नवमांश, यानि 'भाग्य का भी भाग्य' :
कुंडली के फलादेश के समय नवमांश कुंडली का उल्लेख आप ने कई बार सुना होगा। तब यह प्रश्न आता है, कि नवमांश कुंडली क्या है ? कुंडली में नवें भाव को भाग्य भाव कहा गया है। इसी प्रकार 'भाग्य का भी भाग्य' देखा जाता है, जिसके लिए नवमांश कुंडली की आवश्यकता होती है। एक अच्छा ज्योतिषी फलादेश से पहले, नवमांश पर भी दृष्टि अवश्य डालता है। नवमांश का अध्य्यन किये बिना भविष्य कथन में चूक की संभावनाएं अधिक होती हैं। ग्रह का बलाबल व उसके फलित होने की संभावनाएं नवमांश से ही ज्ञात होती हैं। लग्न कुंडली में बलवान ग्रह यदि नवमांश कुंडली में कमजोर हो जाता है, तो उसके द्वारा दिए जाने वाले लाभ में संशय हो जाता है। इसी प्रकार, लग्न कुंडली में कमजोर दिख रहा ग्रह यदि नवमांश में बली हो रहा है, तो उसका फल बेहतर हो जाता है।

2. क्या है नवमांश ? :
षोडश वर्ग में सभी वर्ग महत्वपूर्ण होते है, लेकिन लग्न कुंडली के बाद नवमांश कुंडली का विशेष महत्व है। नवमांश एक राशि के नवम भाव को कहते है, जो 3 अंश 20 कला का होता है। नौ नवमांश इस प्रकार होते है जैसे, मेष में पहला नवमांश मेष का, दूसरा नवमांश वृष का, तीसरा नवमांश मिथुन का, चौथा नवमांश कर्क का, पाचवां नवमांश सिंह का, छठा कन्या का, सातवाँ तुला का, आठवाँ वृश्चिक का और नवा नवमांश धनु का होता है। नवम नवमांश में मेष राशि की समाप्ति होती है और वृष राशि का प्रारम्भ होता है। वृष राशि में पहला नवांश मेष राशि के आखरी नवांश से आगे होता है। इसी तरह वृष में पहला नवमांश मकर का, दूसरा कुंभ का, तीसरा मीन का, चौथा मेष का, पाचवा वृष का, छठा मिथुन का, सातवाँ कर्क का, आठवाँ सिंह का और नवम नवांश कन्या का होता है। इसी तरह, आगे राशियों के नवमांश ज्ञात किए जाते है। नवमांश कुंडली से मुख्य रूप से वैवाहिक जीवन का विचार किया जाता है। इसके अतिरिक्त भी नवमांश कुंडली का परिक्षण लग्न कुंडली के साथ-साथ किया जाता है।

यदि बिना नवमांश कुंडली देखे, केवल लग्न कुंडली के आधार पर ही फल कथन किया जाए, तो फल कथन में त्रुटिया रह सकती है। ग्रहो की नवमांश कुंडली में स्थिति क्या है ? नवमांश कुंडली में ग्रह कैसे योग बना रहे है, यह देखना अत्यंत आवश्यक है। तभी ग्रहो के बल आदि की ठीक जानकारी प्राप्त होती है। अन्य वर्ग कुण्डलिया भी अपना विशेष महत्व रखते है, लेकिन नवमांश इन वर्गों में अति महत्वपूर्ण वर्ग है।

3. लग्न और नवमांश कुंडली परीक्षण :
यदि लग्न और नवमांश लग्न वर्गोत्तम हो तो ऐसे जातक मानसिक और शारीरिक रूप से बलबान होते है।वर्गोत्तम लग्न का अर्थ है, लग्न और नवमांश दोनों कुंडलियो का लग्न एक ही होना, अर्थात् जो राशि लग्न कुंडली के लग्न में हो, वही राशि नवमांश कुंडली के लग्न में हो तो यह स्थिति वर्गोत्तम लग्न कहलाती है। इसी तरह, जब कोई ग्रह लग्न कुंडली और नवमांश कुंडली में एक ही राशि में हो, तो वह ग्रह वर्गोत्तम होता है। वर्गोत्तम ग्रह अति शुभ और बलबान होता है। जैसे सूर्य लग्न कुंडली में धनु राशि में हो और नवमांश कुंडली में भी धनु राशि में हो, तो सूर्य वर्गोत्तम होगा। वर्गोत्तम होने के कारण, ऐसी स्थिति में सूर्य अति शुभ फल देगा।

वर्गोत्तम ग्रह भाव स्वामी की स्थिति के अनुसार भी अपने अनुकूल भाव में बेठा हो, तो अधिक श्रेष्ठ फल करता है। शुभ राशियों में वर्गोत्तम ग्रह आसानी से शुभ परिणाम देता है और क्रूर राशियों में वर्गोत्तम ग्रह कुछ संघर्ष भी करा सकता है। जब कोई ग्रह लग्न कुण्डली में अशुभ स्थिति में हो पीड़ित हो, निर्बल हो या अन्य प्रकार से उसकी स्थिति ख़राब हो, लेकिन नवमांश कुंडली में वह ग्रह शुभ ग्रहो के प्रभाव में हो, शुभ और बलबान हो, तब वह ग्रह शुभ फल ही देता है, अशुभ फल नही देता। इसी तरह जब कोई ग्रह लग्न कुंडली में अपनी नीच राशि में हो और नवमांश कुंडली में वह ग्रह अपनी उच्च राशि में हो, तो उसे बल प्राप्त हो जाता है,

जिस कारण वह शुभ फल देने में सक्षम होता है। ग्रह की उस स्थिति को नीचभंग भी कहते है। चंद्र और चंद्र राशि से जातक का स्वभाव का अध्ययन किया जाता है। लग्न कुंडली और नवमांश कुंडली में चंद्र जिस राशि में हो तथा यदि नवमांश कुंडली के चंद्रराशि का स्वामी लग्न कुंडली के चंद्रराशि से अधिक बली हो और चंद्रमा भी लग्न कुंडली से ज्यादा नवमांश कुंडली में बली हो, तो जातक का स्वभाव नवमांश कुंडली के अनुसार होगा। ऐसे में जातक के मन पर नवमांश कुंडली के चंद्र की स्थिति का प्रभाव अधिक पड़ेगा।

यदि नवमांश कुंडली का लग्न, लग्नेश बली हो और नवमांश कुंडली में राजयोग बन रहा हो और ग्रह बली हो तो जातक को राजयोग प्राप्त होता है। नवमांश कुंडली मुख्यरूप से विवाह और वैवाहिक जीवन के लिए देखी जाती है यदि लग्न कुंडली में विवाह होने की या वैवाहिक जीवन की स्थिति ठीक न हो, अर्थात् योग न हो लेकिन नवमांश कुंडली में विवाह और वैवाहिक जीवन की स्थिति शुभ और अनुकूल हो, विवाह के योग हो तो वैवाहिक जीवन का सुख प्राप्त होता है।

4. नवमांश कुंडली का निर्माण कैसे होता है, व नवमांश में ग्रहों को कैसे रखा जाता है :
हम जानते हैं, कि एक राशि अथवा एक भाव 30 डिग्री का विस्तार लिए हुए होता है। अतः एक राशि का नवमांश अर्थात 30 का नवां हिस्सा यानी 3. 2 डिग्री। इस प्रकार, एक राशि में नौ राशियों नवमांश होते हैं।

5. वैदिक ज्योतिष में D9 चार्ट एक वर्ग कुंडली है, जो कुण्डली के फलादेश को और स्पष्ट करने में सहायता करती है। परंतु सबसे पहले जन्म कुंडली, फिर चंद्र कुंडली, सूर्य कुंडली देखना चाहिए। नवमांश कुंडली का महत्व यह है कि यह व्यक्ति के विवाह, कर्मफल, और आध्यात्मिक गुणों के बारे में जानकारी देती है।

6. पर, बहुत से ज्योतिषी यह नहीं जानते, कि नवमांश कुण्डली केवल वैवाहिक जीवन नहीं, कुल मिलकर, व्यक्ति का भाग्य और जीवन की उपलब्धियां भी बताती है। अगर जन्म कुण्डली बताती है, कि आम के पेड़ पर 'बौर' कितना आएगा, जबकि नवमांश कुण्डली यह बताती है, कि 'खाने लायक आम' कितने मिलेंगे !

7. एक अत्यंत महत्वपूर्ण बात :
षोडशवर्गीय चार्ट, जैसे सप्तमांश, नवमांश, दशमांश, (D-7,9,10) आदि, लग्न कुण्डली को स्पष्ट करने में सहायक होते हैं, अपने-आप में इनका कोई अस्तित्व, या अर्थ, जन्म कुण्डली के बिना नहीं होता।

Acharya Krishna Mishra



ll कुंडली में ग्रहों की युती और फल llवैदिक ज्योज्योतिष के अनुसार हमारी कुंडली में 12 घर,12 राशियां और 9 ग्रह होते हैं ! ...
02/05/2026

ll कुंडली में ग्रहों की युती और फल ll
वैदिक ज्योज्योतिष के अनुसार हमारी कुंडली में 12 घर,12 राशियां और 9 ग्रह होते हैं ! हमारे जीवन की हर छोटी से छोटी घटना इन 12 घरों, 12 राशियों और 9 ग्रहों से जुड़ी होती हैं ! ऐसे कुछ लक्षण हैं जिन्हें देखकर ही हमारे मन में आशंका जागृत होती है कि हमारा काम बनेगा अथवा नहीं बनेगा। काम में गतिरोध या रोड़ा आने का संकेत देने वाले कुछ संकेतों को हम ग्रहों की युति कहकर संबोधित करते हैं। भारतीय ज्योतिष शास्त्र में ग्रहों की युति के बारे में हमें विस्तृत रूप से जानकारी मिलती है। इस लेख के माध्यम से हम अपने पाठकों को लाभांवित करने हेतु विभिन्न ग्रहों की युति से जुड़े विभिन्न परिस्थितियों का वर्णन कर रहे हैं।

प्रायः व्यवहारिक ज्योतिष के नियम के अनुसार --शनि ,राहु एवं केतु जन्मांग के दूसरे,तीसरे,छटे ,नवें ,दसवें तथा ग्यारहवें भावों में शुभ फल देते हैं । जिन व्यक्तियों के केंद्र में सूर्य के साथ मंगल हो उस व्यक्ति के माता पिता ही उसे श्रेष्ठ ज्ञान के दाता होते हैं ! जिस व्यक्ति के लग्नेश छठे भाव में और शुक्र बैठा हैं, उस व्यक्ति के पारिवारिक लोग ही ज्यादा शत्रु होते हैं ! उसके बावजूद वह व्यक्ति शिखर पर पहुंचता है ! इसी प्रकार से जिस व्यक्ति के जन्म स्थान से एकादश भाव में राहु बैठा हुआ है, वह व्यक्ति धनवान होता है, कई प्रकार के सुख सुविधाएं प्राप्त करता है, जीवन सुखी रहता है ! एकादश भाव में राहु बैठा है तो पंचम भाव में केतु बैठेगा, केतु ज्ञानवान,विजवान और ज्योतिषी बनाता है ! सामने वाला व्यक्ति क्या कहना चाहता है उसकी बात को वह पहले ही जान लेता है ! यहां हम जानते हैं कि कौनसा ग्रह जातक के जीवन में कितने समय के लिए महादशा के रूप में आता है।

ग्रह-
ग्रह- लिंग विम्शोतरी दशा (वर्ष)
सूर्य पुल्लिंग 6 वर्ष
चंद्र स्त्रीलिंग 10 वर्ष
मंगल पुल्लिंग 7 वर्ष
बुध नपुंसक 17 वर्ष
बृहस्पति पुल्लिंग 16 वर्ष
शुक्र स्त्रीलिंग 20 वर्ष
शनि पुल्लिंग 19 वर्ष
राहु पुल्लिंग 18 वर्ष

केतु पुल्लिंग 7 वर्ष जानिये कुंडली में दो ग्रहों की युति और उसका फल- जातक की कुंडली में सूर्य और चंद्रमा के साथ जब अन्य ग्रहों की युति होती है तो निम्न फलों की संभावना बनती है। तो आईए इन ग्रहों की युतियों के सामान्य फल को जानते हैं।

●सूर्य+चन्द्रमा- राजकीय ठाठ - बाठ , अधिकार, पद, उत्तम राजयोग , डॉक्टर , दो विवाह , गृहस्थ जीवन हल्का , स्त्रीयों द्वारा विरोध, बुढ़ापा उत्तम इसके साथ ही उस व्यक्ति के जीवन की उत्तरावस्था उत्तम रहने की संभावना बनती है।

● सूर्य+ मंगल- साहसी , अग्नि से सम्बंधित कामों में सफलता , सर्जन , डॉक्टर , अधिकारी , सर में चोट, का निशान , दुर्घटना , खुद का मकान बनाये और इससे बचपन में कष्ट की संभावना बनती है।

● सूर्य+बुध- विद्या , बुद्धि देता है, सरकारी नौकरी, ज्योतिष , अपने प्रयास से धनवान , बचपन में कष्ट, इस युति के कारण व्यक्ति को स्वयं की मेहनत से जीवन में सफलता मिलती है।

● सूर्य+गुरू- मान-मर्यादा , श्रेष्टता , उच्च पद तथा यश में वृद्धि करता है, स्वयं की मेहनत से सफलता और यह युति पिता के लिए शुभ नहीं मानी जाती।

● सूर्य+शुक्र- कला, साहित्य, यांत्रिक कला का ज्ञान , क्रोध, प्रेम सम्बन्ध , बुरे, गृहस्थ बुरा , संतान में देरी , तपेदिक , पिता के लिए अशुभ इसके साथ ही इस युति के कारण पत्नी का स्वास्थ्य भी कमजोर रहता है।

● सूर्य+शनि- पिता-पुत्र में बिगाड़ अथवा जुदाई। युवावस्था में संकट, राज दरबार बुरा। स्वास्थ कमजोर। पिता की मृत्यु , गरीबी। घरेलू अशांति। पत्नी का स्वास्थ कमजोर।

● सूर्य+राहू- सरकारी नौकरी में परेशानी। चमड़ी पर दाग , खर्च हो। घरेलू अशांति , परिवार की बदनामी का डर। श्वसुर की धन की स्थिति कमजोर और सूर्य से राहु की युति के कारण सूर्य को ग्रहण भी लग जाता है।

● सूर्य+केतू- सरकारी काम अथवा सरकारी नौकरी में उतार-चढ़ाव। संतान का फल बुरा और संतान विषयक शुभ परिणाम में भी कमी देखने को मिलती है।

● चन्द्रमा+मंगल- मन की स्थिति डांवाडोल। दुर्घटना। साहसिक कामों से धन लाभ' उत्तम धन और यह युति जातक को उत्तम धन प्रदान करती है।

● चन्द्र+बुध- उत्तम वक्ता। बुद्धिमत्ता। लेखन शक्ति। गहन चिंतन। स्वास्थ में गड़बड़। दो विवाह योग। मानसिक असंतुलन और दो विवाहों के योग की संभावना के साथ ही मानसिक स्थिरता में भी कमी कर सकती है।

● चन्द्र+गुरू- उत्तम स्थिति। धन प्राप्ति। बैंक में अधिकारी। उच्च पद। मान-सम्मान। धनी। यदि पाप दृष्टी हो तो विद्द्या में रूकावट ! यदि इस युति पर पाप ग्रहों की दृष्टि हो तो जातक की उच्च शिक्षा में थोड़ी रुकावट देखने को मिल सकती है।

● चन्द्र+शुक्र- दो विवाह योग। अन्य स्त्री से सम्बन्ध। विलासी। शान-शौकत का प्रेमी। रात का सुख। इस युति में अन्य स्त्रियों से भी आसक्ति, भोग विलास से युक्त जीवन, शान- शौकत, जीवन में कई लोगों से प्रेम और कुछ परिस्थितियों में दो विवाहों की भी संभावना बनती है।
● चन्द्र+शनि- दुःख। मानसिक तनाव। नज़र की खराबी। माता तथा धन के लिए ठीक नहीं। हर काम में रूकावट। गरीबी। शराबी। उदास ,सन्यासी। स्त्री सुख में कमी। जीवन की उत्तरावस्था में संन्यास की ओर झुकाव के साथ ही स्त्री सुख में भी यह युति कमी करती है।

●चन्द्र+राहू- पानी से डर। शरीर पर दाग। विदेश यात्रा। जिस भाव में स्थित हो उसकी हानी। यह युति जातक की कुंडली के जिस भाव में होगी उस भाव के शुभ फलों में कमी करती है।

● चन्द्र+केतू- विद्या में रूकावट। मूत्र वीकार। जोड़ों में दर्द। केमिस्ट बनाने के साथ ही मूत्र विकार को भी यह युति बढ़ा सकती है।

● ज्योतिष के अनुसार इन ग्रहों की युतियों का इस प्रकार से सामान्य फल देखने को मिलता है लेकिन, इन ग्रहों के उच्च, नीच, स्थान आदि बल के साथ ही राशि, नवमांश और नक्षत्र की स्थिति को भी देख लेना आवश्यक होता है।

Acharya Krishna Mishra



23/04/2026

|| शनि का नीचभंग राजयोग ||                                                 नीचभंग राजयोग ग्रह की स्थिति को राजयोग सम्बन्...
23/04/2026

|| शनि का नीचभंग राजयोग || नीचभंग राजयोग ग्रह की स्थिति को राजयोग सम्बन्ध शुभ फल देने की स्थिति में लाकर रख देता है।शनि एक ऐसा ग्रह है जिसका नीचभंग स्वयं के कारण न हो तब यह कभी भी शुभ फल नही देता है।शनि मेष राशि में नीच का होता है और नीचभंग किसी ग्रह का तब ही होता है जब नीच ग्रह के साथ उस नीच राशि में बैठे ग्रह का उच्चाधिपति साथ हो या उस राशि का स्वामी साथ बैठा हो।शनि मंगल की राशि मेष में नीच होता है ऐसी स्थिति में सूर्य का परम् शत्रु सूर्य मेष राशि में उच्च और मंगल बैठने पर ही शनि का नीचभंग होगा या मंगल शनि को देखेगा आदि तब शनि का नीचभंग होगा।लेकिन यहाँ इस स्थिति हुआ शनि का नीचभंग संघर्ष और दिक्कते ही करेगा क्योंकि मंगल शनि से शनि की शत्रुता है और दोनों ही शनि के विरोधी ग्रह है।अब नीच का शनि यदि मंगल सूर्य के द्वारा नीचभंग की स्थिति को प्राप्त करता मतलब शनि का नीचभंग होता है तब शनि मंगल या सूर्य का दास बन जाएगा और सूर्य मंगल शनि को अपना दास बनाकर फल देगे जो संघर्षशील और अशुभ होंगे जिससे जातक को कोई संतुष्टि नही मिलेंगी।जिन भी जातको का शनि कुंडली में नीच राशि में है तब शनि का यदि खुद के कारण नीचभंग होता है जैसे नवमांश कुंडली में शनि उच्च हो जाए, नीच नवमांश में वर्गोत्तम हो जाए या नीच शनि और मंगल का आपस में राशि परिवर्तन हो जैसे शनि मेष में है और मंगल मकर या कुम्भ में हो तब यह नीचभंग अच्छा फल देगा।लेकिन मंगल की युति या दृष्टि सम्बन्ध से हुआ शनि का नीचभंग किसी तरह से अनुकूल फल नही देगा, इसके आलावा यदि मेष राशि में बैठे हुए शनि को मंगल अपनी आठवीं दृष्टि से देखे तब भी यह नीचभंग सामान्य अच्छा फल देगा, अब यदि राशि परिवर्तन या मंगल की दृष्टि से शनि का नीचभंग हो जाए और शनि को शुक्र गुरु देखे तो नीचभंग हुए शनि के फल बहुत शानदार होंगे क्योंकि एक तो शनि का नीचभंग होगा जो शनि को बल देगा और दूसरी ओर शुभ ग्रहो की दृष्टि का बल शनि को मिलने से शनि के अंदर शुभता और बल मिलेगा ऐसी स्थिति में शनि के फल शुभ होंगे लेकिन अब शनि की कुण्डली में भाव स्थिति क्या है? कौसे भावो का स्वामी होकर कहा बैठा है आदि उसी अनुसार फल देगा।इस तरह से शनि का नीचभंग कुंडली में कैसे हो रहा है और किस तरह से इन सब पर शनि के नीचभंग के फल मिलेंगे और सबसे मुख्य बात राजयोग नीचभंग होने पर तब ही मिलेगा जब नीचभंग और नीचभंग करने वाले ग्रह की स्थिति भी शुभ होगी।

Acharya Krishna Mishra

वैदिक ज्योतिष में  विपरीत राजयोग निर्माण ज्योतिष के अनुसार, ग्रहों की नियुक्ति द्वारा बनाया गया एक विशेष संयोजन योग कहला...
21/04/2026

वैदिक ज्योतिष में विपरीत राजयोग निर्माण
ज्योतिष के अनुसार, ग्रहों की नियुक्ति द्वारा बनाया गया एक विशेष संयोजन योग कहलाता है। ऐसा माना जाता है कि कुंडली में योग विशेष शक्ति प्रदान करता है। कुंडली में कई तरह के राजयोग मौजूद होते हैं लेकिन विपरीत राजयोग का अपना ही अलग भेद है।

फलित ज्योतिष के मुताबिक, कुंडली में छठे, आठवें और बारहवें घर को दशाटन या दुष्ट घरों के रूप में चित्रित किया जाता है। माना जाता है कि इन घरों में से एक घर दूसरे घर में चला जाता है तो इस तरह के संयोजन से न केवल भावों के स्वामी पर बल्कि इन भावों में उपस्थित ग्रहों पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

कुंडली में विपरीत राजयोग निर्माण
जब 6 वें, 8 वें और 12 वें घर के स्वामी युति संबंध बनाते हैं तो विपरीत राजयोग का निर्माण होता है। यानी 6 वें घर के स्वामी को 8 वें या 12 वें घर रखा जाना या 12 वें घर के स्वामी को 6 या 8 वें में रखा जाना इस योग का निर्माण करता है। यह योग त्रिक भावों के स्वामी के अंतर्दशा के कारण बनता है, और बहुत शुभ माना जाता है। इस योग के निर्माण से व्यक्ति को भूमि, भवन और वाहन सुख की प्राप्ति होती है। इस योग का फल व्यक्ति को किसी की हानि या नुकसान होने पर ही प्राप्त होता है। इस योग की खास बात यह है कि इसका प्रभाव लंबे वक्त तक नहीं रहता है। फलित ज्योतिष में विपरीत राजयोग तीन प्रकार के होते हैं।

हर्ष विपरीत राज योग
त्रिक भाव के स्वामी एक दूसरे के घरों में रखे जाने पर हर्ष विपरीत राज योग, तीन प्रकार के विपरीत राजयोगों में से एक है।

हर्ष विपरीत राजयोग कैसे बनता है
कुंडली में जब 6 वें घर में एक पापी ग्रह रखा जाता है या 6 वें घर का स्वामी 6 वें, 8 वें या 12 वें घर में होता है, तो हर्ष विपरीत राज योग का निर्माण होता है।

हर्ष योग परिणाम

इस योग में, 6 वां घर 8 वें या 12 वें घर के साथ संबंध बनाता है, तो यह योग व्यक्ति को उसके शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने देता है। इस योग वाले व्यक्ति का शरीर मजबूत होता है, और वह धनवान भी होता है। वह समाज में प्रभावशाली व्यक्तित्व में से एक बन जाता है, और अच्छे दोस्तों, परिवार, जीवन साथी और बच्चों के साथ धन्य होता है।

विपरीत सरल राजयोग
सरल योग विपरीत राजयोगों में से एक है। यह व्यक्ति को बड़ी ताकत के साथ विपरीत परिस्थितियों से लड़ने की क्षमता देता है और वह संघर्षों से डरता नहीं है।

कैसे बनता है सरल योग

यदि कुंडली में 6 वें या 12 वें घर का स्वामी 8 वें घर में हो, या 8 वें घर का स्वामी 6 वें या 12 वें घर में हो तो सरल विपरीत राज योग बनता है।

सरल योग परिणाम

इस योग वाला व्यक्ति विद्वान होता है और अपने प्रयासों से धनवान बनता है। ऐसे योग वाला व्यक्ति संपत्ति का मालिक बन जाता है। व्यक्ति समाज में अच्छी तरह से जाना जाता है। वह अपने सिद्धांतों पर अडिग रहता है, और निर्णय लेने में कुशल है। इस योग वाले लोग आदर्शवादी होते हैं और अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त करते हैं।

विपरीत विमल राज योग

ऐसा कहा जाता है कि जब छठे, आठवें या बारहवें घरों के स्वामी ग्रह, बारहवें घर में हो तो या 12वें घर का स्वामी, 6ठें या 8वें घर में हो तो विमल विपरीत राजयोग का निर्माण होता है। एस्ट्रोलॉजर के अनुसार 12वें घर को व्यय भाव कहा जाता है इसलिए जब इस भाव की युति 6ठें और 8वें के साथ होती है तो यह विपरीत प्रभाव डालता है।

कैसे बनता है विमल योग

जिस व्यक्ति की कुंडली में यह योग होता है वह स्वतंत्र आत्मा का होता है। वह हमेशा खुश रहने की कोशिश करता है और धन संचय करने में अच्छा होता है। वह न्यायपूर्ण और पवित्र जीवन जीता है और समाज के लिए एक सराहनीय योगदान देता है।

आरूढ़ लग्न और विपरीत राजयोग

कुंडली में आरूढ़ लग्न और विपरीत राजयोग का संबंध बहुत अलग है। ज्योतिष के अनुसार, आरूढ़ लग्न से तीसरे और छठे भाव में बैठा शुभ ग्रह अगर कुंडली में बलशाली होता है तो यह जातक को धार्मिक और अध्यात्मिक सफलता दिलाता है। इसके विपरीत आरूढ़ लग्न से तीसरे या छठें स्थान में अशुभ ग्रह कमजोर स्थिति में होता है तो विपरीत पर्वतराजयोग का फल देता है।

Acharya Krishna Mishra

19/04/2026

Acharya Krishna Mishra

19/04/2026

"ॐ जामदग्न्याय विद्महे महावीराय धीमहि, तन्नो परशुराम: प्रचोदयात्।।

Acharya Krishna Mishra

वैदिक ज्योतिष में, कुंडली का निर्माणजन्म कुंडली का निर्माण करने के लिए, वैदिक ज्योतिष में, कुंडली का निर्माण नक्षत्र चिह...
18/04/2026

वैदिक ज्योतिष में, कुंडली का निर्माण
जन्म कुंडली का निर्माण करने के लिए, वैदिक ज्योतिष में, कुंडली का निर्माण नक्षत्र चिह्नों के आधार पर किया जाता है।

जन्म कुंडली के प्रमुख तत्व

जन्म कुंडली में बारह राशियाँ चार तत्वों में विभाजित की जाती हैं:

- अग्नि तत्व: मेष, सिंह, धनु

- पृथ्वी तत्व: वृषभ, कन्या, मकर

- वायु तत्व: मिथुन, तुला, कुंभ

- जल तत्व: कर्क, वृश्चिक, मीन

कुंडली के दो भाग

जन्म कुंडली को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है:

पहले भाग में, पहले घर से लेकर छठे घर तक की बात की जाती है:

- पहला घर: उपस्थिति और मुख्य व्यक्तित्व लक्षण

- दूसरा घर: धन, भौतिक संसाधन और परिवारिक मूल्य

- तीसरा घर: निकटतम वातावरण, भाई-बहन और सोचने के तरीके

- चौथा घर: परिवार, पैतृक संबंध और अचल संपत्ति

- पांचवां घर: रचनात्मकता, रोमांस और शौक

- छठा घर: दैनिक कार्य, स्वास्थ्य और जिम्मेदारियाँ

दूसरे भाग में, सातवें घर से लेकर बारहवें घर तक की बातें की जाती हैं:

- सातवां घर: विवाह, साझेदारियाँ और विरोधी

- आठवां घर: संकट, मृत्यु और विरासत

- नौवां घर: धर्म, उच्च शिक्षा और लंबी यात्राएँ

- दसवां घर: करियर, सामाजिक स्थिति और महत्वाकांक्षाएँ

- ग्यारहवां घर: मित्रता, आकांक्षाएँ और सामाजिक गतिविधियाँ

- बारहवां घर: गुप्त बातें, अकेलापन और रहस्यवाद

ग्रहों की दृष्टि

ग्रहों की दृष्टि उनके आपसी संबंधों को दर्शाती है। प्रमुख ग्रहों की दृष्टियाँ इस प्रकार हैं:

- सूर्य की दृष्टि: सूर्य की दृष्टि सातवें घर पर होती है।

- चंद्रमा की दृष्टि: चंद्रमा की दृष्टि सातवें घर पर होती है।

- मंगल की दृष्टि: मंगल की दृष्टि चौथे, सातवें और आठवें घर पर होती है।

- बृहस्पति की दृष्टि: बृहस्पति की दृष्टि पांचवें सातवें और नौवें घरपर होती है।

- शुक्र की दृष्टि: शुक्र की दृष्टि केवल सातवें घर पर होती है।

- शनि की दृष्टि: शनि की दृष्टि तीसरे, सातवें और दसवें घर पर होती है।

राहु-केतु की 7वीं दृष्टि के अलावा भी इनके कुछ अन्य दृष्टिकोण (Aspects) होते हैं, जिन्हें अक्सर कम लोग जानते हैं:

1. राहु: राहु की 5वीं और 9वीं दृष्टि भी मानी जाती है। यह 5वीं दृष्टि से अगले पांचवें भाव को और 9वीं दृष्टि से अगले नौवें भाव को प्रभावित करता है। राहु की ये दृष्टियाँ व्यक्ति के जीवन में अचानक और अप्रत्याशित परिवर्तन, भ्रम, लालसा, और इच्छाओं को दर्शाती हैं।

2. केतु: केतु भी 5वीं और 9वीं दृष्टि रखता है, जो मानसिक और आध्यात्मिक क्षेत्र में प्रभाव डालती है। यह दृष्टियाँ व्यक्ति के आंतरिक जागरूकता, मोक्ष की ओर झुकाव और रहस्यमय अनुभवों को प्रभावित करती हैं।

राहु-केतु की इन दृष्टियों का प्रभाव अक्सर अदृश्य रूप से होता है, लेकिन ये जीवन में गहरे और महत्वपूर्ण बदलाव ला सकते हैं।

व्यक्तित्व का आधार

व्यक्तित्व, स्वभाव और प्राथमिकताओं के मुख्य संकेतक जन्म कुंडली के सूर्य, चंद्रमा और लग्न की स्थिति द्वारा निर्धारित होते हैं। लग्न का चिन्ह, जिस घर में यह स्थित है, और उसकी दृष्टि भी महत्वपूर्ण होती है।

ग्रहों के तत्व

जन्म कुंडली में ग्रह चार प्रमुख तत्वों के अनुसार विभाजित होते हैं:

- अग्नि तत्व: मेष, सिंह, धनु

- पृथ्वी तत्व: वृषभ, कन्या, मकर

- वायु तत्व: मिथुन, तुला, कुंभ

- जल तत्व: कर्क, वृश्चिक, मीन

ग्रहों की स्थिति

ग्रहों की स्थिति और उनके दृष्टिकोण आपके व्यक्तित्व और जीवन की दिशा को प्रभावित करते हैं। शनि, जो कुंभ राशि का स्वामी है, व्यक्ति की कठिनाइयों और कड़ी मेहनत का प्रतीक होता है। बृहस्पति, जो मीन राशि का स्वामी है, समृद्धि और बुद्धि का प्रतिनिधित्व करता है।

व्यक्तिगत ग्रह

जन्म कुंडली में सूर्य, चंद्रमा, बुध, शुक्र और मंगल की विशेषताएँ महत्वपूर्ण होती हैं:

- सूर्य: चेतना, आत्म-पहचान और जीवन शक्ति का प्रतीक

- चंद्रमा: मातृ, भावनाएँ और दैनिक जरूरतें

- बुध: सोचने की क्षमता, संवाद और सीखने की प्रक्रिया

- शुक्र: प्रेम, सौंदर्य और धन के प्रति दृष्टिकोण

- मंगल: सक्रियता, आक्रामकता और जीवन शक्ति

इस प्रकार, जन्म कुंडली का विश्लेषण आपको अपने व्यक्तित्व और जीवन के विभिन्न पहलुओं को समझने में मदद करता है।

Acharya Krishna Mishra

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार अत्याधिक सरल उपाय जो कि सभी जातको के अति महत्वपूर्ण है जिससे सभी को हमेशा सत प्रतिशत लाभ होगा ...
16/04/2026

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार अत्याधिक सरल उपाय जो कि सभी जातको के अति महत्वपूर्ण है जिससे सभी को हमेशा सत प्रतिशत लाभ होगा जिसमे कोई पूजा का भी विधान नही है केवल नवग्रह के कारकतत्व के अनुसार आचरण मे परिर्वतन लाने से उनकी कृपा एवं अनुकूलता निश्चित रूप से प्राप्त होगी जो कि इस प्रकार से है

● चन्द्रमा -

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार चन्द्रमा को मन एवं माता का कारक माना जाता है चन्द्र ग्रह की अनुकूलता के लिए माता या माता तुल्य महिलाओ की सेवा करे एवं आज्ञा का पालन करे उन्हे मन ,वचन एवं कर्म द्वारा कष्ट न पहुंचे आपका व्यवहार उन्हे प्रसन्नता देने वाला रहे , मन की शान्ति के लिए ध्यान या मेडिटेशन सर्वोच्च उपाय है से निश्चित रूप से चन्द्र ग्रह की सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है ।

● सूर्य-

ग्रहाधिपति सूर्य आत्मा ,मान, सम्मान, यश ,कीर्ति के कारक है की प्रसन्न्ता के लिए पिता या पिता तुल्य वृद्धजन का आशीर्वाद प्राप्त करे उनके द्वारा बताये गये सत मार्ग का अनुशरण करे अपने कारण उन्हे कष्ट न हो , इस बात का विशेष ध्यान रखने से जीवन मे आपको अपने कार्यो का उत्कृष्ट श्रेय या कैडिट मिलेगा साथ ही उत्तम रोग प्रतिरोधक क्षमता का विकास होगा ।

● मंगल-

जीवन मे साहस, पराक्रम, शक्ति, शत्रुओ पर विजय, भूमि लाभ का कारकतत्व मंगल ग्रह के अधिकार क्षेत्र मे है की अनुकूलता के लिए भाईयो से सप्रेम व्यवहार एवं सहयोग करे भाईयो से सलाह कर कार्य करे , धोखे एवं कुटिलता पूर्ण व्यवहार से दूरी बनाए रखने से मंगल ग्रह की कृपा प्राप्त होती है ।

● बुध -

वाणी , विद्वता , बुद्धि प्रखरता , निपुणता का प्रतिनिधित्व बुध ग्रह रखते है की अनुकूलता के मामा से मधुर संबंध रखे , किन्नरो का तिरस्कार भूल कर भी न करे उन्हे सम्मान एवं प्रसन्नता एवं खुश रखने से बुध ग्रह की अनुकूलता प्राप्त होगी ।

● गुरु -

ज्ञान , धन , संतान, धर्म, कर्तव्य के कारकतत्व गुरु ग्रह द्वारा प्रदत्त होता है जिसका जीवन मे विशेष महत्व है की कृपा प्राप्ति के लिए अपने शिक्षक , गुरुओ , विद्धानो का शुभ आशीर्वाद प्राप्त करे उनके वताये मार्ग का अनुशरण करने से सभी कार्यो रचनात्मक अनुकूलता प्राप्त होगी ।

● शुक्र-

भौतिक सर्व सुख, वैभव, सुख संपदा का कारकतत्व शुक्र ग्रह की कृपा से प्राप्त होता है जिसका जीवन मे विशेष महत्व है के लिए जीवन साथी का सम्मान करे उन्हे प्रसन्न रखने से शुक्र देव की असीम कृपा एवं ऐश्वर्य की प्राप्ति होगी ।

● शनि -

न्यायाधिपति - कर्म फल दाता , श्रम शक्ति के कारक है सभी के कर्मो का यथोचित फल प्रदान करते है की कृपा प्राप्ति के अपने अधीनस्थ व्यक्ति को खुश रखे , उनके पारिश्रमिक का समय पर भुगतान करे बूढे एवं लंगड़े व्यक्तियो का आदर करे ईमानदारी से अपने कार्य क्षेत्र मे मेहनत करे तो निश्चित रूप से शनि की अनुकम्पा प्राप्त होगी सर्व दुखो से मुक्ति एवं दीघ्र आयु प्राप्त होगी ।

● राहु-

राहु ग्रह नेतृत्व क्षमता , लीक से हटकर कार्य, परिवर्तन, भ्रम ,संशय के कारक है की अनुकूलता के लिए अनैतिक आचरण का त्याग, झूठा व्यवहार, असामाजिक गतिविधि, दुखदाई बचनो का त्याग के साथ दादा जी या पितामह का आशीर्वाद प्राप्त करने तथा विकलांगो की सेवा करने से आकस्मिक लाभ या फल की प्राप्त होगी ।

● केतु -

केतु मतिभ्रम , रोग , मुक्ति एवं मोक्ष के कारक है की अनुकूलता के लिए बीमार व्यक्ति की सेवा चिकित्सा , कोढी एवं कुष्ठ रोगीयो की उपचार सेवा , चोटिल या दुर्घटना ग्रस्त व्यक्तियो की सहायता दिव्यांग जनो का सहयोग , सभी प्रकार के नशायो का त्याग करने से केतु के शुभ परिणाम प्राप्त होगे ।

उपरोक्त अति सरल सहज व्यवहार परिवर्तन मात्र से ग्रहो के अनुकूल एवं शुभ फलदायी परिणाम प्राप्त कर सकते है यह देखने मे मालूमी जान पडते हो लेकिन अधिक कारगर शीघ्रता से कार्य करने वाले है बिहारी जी की सतसई के दोहो के समान है -

" सतसइया के दोहरा ज्यों नावक के तीर।

देखन मे छोटे लगैं घाव करैं गम्भीर ।।"

आशा है आपकी जिज्ञासा अनुरूप सार रूप मे जानकारी प्राप्त हुई होगी जिस ग्रह के कष्टदायक फल प्राप्ति हो रही हो व्यवहारिक परिर्वतन मात्र से अनुकूलता प्राप्त कर सकते है ग्रहो को अपने आचरण का हिस्सा मानकर कार्य करने से सर्व ग्रह शुभ फलदायी रहेगे ।

Acharya Krishna Mishra

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