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Kansya Wellness ...  Fascitis # Arthritis  Disorders  ...Ayurveda se hi hoga.
16/12/2025

Kansya Wellness ... Fascitis # Arthritis Disorders ...Ayurveda se hi hoga.

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30/11/2025
18/07/2025

Yoga Se Hi Hoga
🪷 **योगा सूत्र साधना**
🕉️ *समाधि पाद – सूत्र 1.7*

# # # 📜 **प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रमाणानि**

👉 *प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम – ये तीन प्रमाण (सत्य ज्ञान के स्रोत) हैं।*

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# # # 🪔 **संक्षिप्त व्याख्या:**

पतंजलि बताते हैं कि **सत्य ज्ञान** (प्रमाण) तीन माध्यमों से प्राप्त होता है:

1. **प्रत्यक्ष** – जो इंद्रियों द्वारा सीधा अनुभव किया जाए (देखना, सुनना आदि)
2. **अनुमान** – किसी ज्ञात संकेत से अज्ञात का बौद्धिक अंदाजा (logic & inference)
3. **आगम** – गुरु, ग्रंथ और योग्य प्रमाणिक व्यक्तियों से प्राप्त ज्ञान (श्रुति, परंपरा)

👉 इन तीनों से प्राप्त ज्ञान **प्रमाण** कहलाता है, और योग साधना में विश्वसनीय ज्ञान का आधार बनता है।

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# # # 🌟 **उदाहरण 1 (प्रत्यक्ष):**

आपने सूरज को उदय होते देखा —
यह इंद्रियों द्वारा मिला प्रत्यक्ष अनुभव है।

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# # # 🌟 **उदाहरण 2 (अनुमान):**

आपको कहीं से धुआँ उठता दिखा —
आप अनुमान लगाते हैं कि वहाँ आग लगी होगी।
यह ज्ञान अनुमान से मिला।

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# # # 🌟 **उदाहरण 3 (आगम):**

गुरु या वेद बताते हैं कि आत्मा अविनाशी है —
आपने उसे प्रत्यक्ष नहीं देखा, पर शास्त्र और संतों के वचनों पर विश्वास करके जाना —
यह है आगम प्रमाण।

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# # # 📖 **भगवद्गीता से सम्बंध:**

**अध्याय 4, श्लोक 34:**

> *"तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया..."*
> 👉 इस श्लोक में श्रीकृष्ण कहते हैं:
> *“ज्ञान को समझो गुरु के पास जाकर, विनम्रता और सेवा से प्रश्न करो”*
> यह **आगम प्रमाण** को ही महत्व देता है।

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📍 *Yoga Se Hi Hoga...From Pooja

17/07/2025

🪷 योगा सूत्र साधना
🕉️ समाधि पाद – सूत्र 1.6

📜 प्रमाण विपर्यय विकल्प निद्रा स्मृतयः
👉 चित्त की पाँच वृत्तियाँ हैं – प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति।

🪔 संक्षिप्त व्याख्या:
यह सूत्र 1.5 का विस्तार है।
पतंजलि यहाँ बता रहे हैं कि चित्त में पाँच प्रकार की वृत्तियाँ (मानसिक गतिविधियाँ) होती हैं:

प्रमाण (सत्य ज्ञान) – जैसे प्रत्यक्ष अनुभव, तर्क, और शास्त्र से मिला ज्ञान
विपर्यय (गलत ज्ञान) – किसी चीज़ को गलत समझना
विकल्प (कल्पना) – शब्दों से बनी धारणाएँ जिनका यथार्थ में अस्तित्व नहीं
निद्रा (नींद) – अविद्या की विशेष अवस्था
स्मृति (स्मरण) – पूर्व अनुभवों का मानसिक रूप से पुनरावर्तन
👉 इन सभी वृत्तियों में मन उलझा रहता है — योग का अभ्यास इनको शांत करता है।

🌟 उदाहरण 1 (प्रमाण):
आप आग को छूते हैं और जलन का अनुभव करते हैं —
यह प्रत्यक्ष अनुभव है → प्रमाण।

🌟 उदाहरण 2 (विपर्यय):
रस्सी को साँप समझ लेना —
यह गलत धारणा है → विपर्यय।

🌟 उदाहरण 3 (विकल्प):
आप कल्पना करते हैं कि कोई आपसे नाराज़ है, जबकि सच्चाई कुछ और है —
यह विकल्प की वृत्ति है — शब्दों और धारणाओं पर आधारित।

🌟 उदाहरण 4 (निद्रा):
गहरी नींद जिसमें कोई स्वप्न नहीं —
चित्त में "कुछ न जानने की धारणा" चल रही होती है → यह भी एक वृत्ति है।

🌟 उदाहरण 5 (स्मृति):
कभी कोई पुरानी बात याद आ जाए और मन उसी में उलझ जाए —
यह स्मृति की वृत्ति है।

📖 भगवद्गीता से सम्बंध:
अध्याय 6, श्लोक 6:

"उद्धरेदात्मनात्मानं..."
👉 मन ही मित्र है और वही शत्रु भी — यह इस बात को दर्शाता है कि
मन की वृत्तियाँ ही जीवन की दिशा तय करती हैं।
📍 Yoga From Pooja
📞 7990628900

15/07/2025

🪷 योगा सूत्र साधना
🕉️ समाधि पाद – सूत्र 1.5

📜 वृत्तयः पञ्चतय्यः क्लिष्टाः अक्लिष्टाः
👉 चित्त की वृत्तियाँ पाँच प्रकार की होती हैं — क्लिष्ट (कष्टदायक) और अक्लिष्ट (कष्टरहित)।

🪔 संक्षिप्त व्याख्या:
यह सूत्र चित्त में उठने वाली वृत्तियों (मानसिक गतिविधियों) को पाँच श्रेणियों में विभाजित करता है।
साथ ही बताता है कि ये वृत्तियाँ दो प्रकार की हो सकती हैं:

क्लिष्ट वृत्तियाँ – जो अज्ञान, राग, द्वेष, मोह, अहंकार से प्रेरित होती हैं और दुख का कारण बनती हैं।
अक्लिष्ट वृत्तियाँ – जो ज्ञान, विवेक, निष्कामता, ध्यान से प्रेरित होती हैं और आत्मिक उन्नति में सहायक होती हैं।
👉 यह सूत्र अगले पाँच सूत्रों (1.6–1.11) की भूमिका है, जिनमें इन पाँच वृत्तियों का वर्णन विस्तार से किया जाएगा।

🌟 उदाहरण 1:
आप पढ़ाई कर रहे हैं —
यदि लक्ष्य सिर्फ नंबर या सफलता है → क्लिष्ट वृत्ति।
यदि लक्ष्य आत्मज्ञान या सेवा भाव है → अक्लिष्ट वृत्ति।

🌟 उदाहरण 2:
आप पूजा कर रहे हैं —
यदि दिखावे या स्वार्थ के लिए कर रहे हैं → क्लिष्ट वृत्ति।
यदि श्रद्धा व आत्मिक जुड़ाव से कर रहे हैं → अक्लिष्ट वृत्ति।

🌟 उदाहरण 3:
आप किसी की मदद करते हैं —
यदि बदले में कुछ चाहते हैं → क्लिष्ट वृत्ति।
यदि नि:स्वार्थ भाव से करते हैं → अक्लिष्ट वृत्ति।

📖 भगवद्गीता से सम्बंध:
अध्याय 3, श्लोक 30:

"मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्य... निर्वैरः सर्वभूतेषु..."
👉 अपने कर्म भगवान को समर्पित करके, फल की अपेक्षा किए बिना कर्म करने वाला व्यक्ति अक्लिष्ट भाव में होता है।
यह भाव वृत्तियों की शुद्धता की ओर इशारा करता है — जो पतंजलि के इस सूत्र का केंद्र है।

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Aaj ka Patanjali Yog Sutra🪷 योगा सूत्र साधना🕉️ समाधि पाद – सूत्र 1.3📜 तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्👉 तब द्रष्टा (आत्मा) ...
14/07/2025

Aaj ka Patanjali Yog Sutra
🪷 योगा सूत्र साधना
🕉️ समाधि पाद – सूत्र 1.3

📜 तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्
👉 तब द्रष्टा (आत्मा) अपने वास्तविक स्वरूप में स्थित हो जाता है।

🪔 संक्षिप्त व्याख्या:
जब चित्त की वृत्तियाँ शांत हो जाती हैं (जैसा कि सूत्र 1.2 में बताया गया),
तब आत्मा (द्रष्टा) अपने शुद्ध, शांत और अपरिवर्तनीय स्वरूप में स्थित हो जाती है।
यह योग की सिद्धि है — जब आत्मा स्वयं को पहचान लेती है।

🌟 उदाहरण 1:
झील का पानी यदि स्थिर और स्वच्छ हो,
तो हम उसमें अपनी छवि (प्रतिबिंब) साफ देख सकते हैं।
चित्त = जल | आत्मा = प्रतिबिंब | योग = जल को शांत और स्वच्छ करना

🌟 उदाहरण 2:
एक धूल भरा दर्पण अपने प्रतिबिंब को नहीं दिखाता।
लेकिन जब दर्पण साफ कर दिया जाता है,
तो व्यक्ति स्वयं को उसमें देख सकता है।
चित्त = दर्पण | आत्मसाक्षात्कार = दर्पण की सफाई से

🌟 उदाहरण 3:
बचपन से हमें कहा गया: “तुम छात्र हो”, “तुम बेटा हो”, “तुम सफल या असफल हो” —
इन सारी पहचानों से परे, जब हम विचारहीन अवस्था में जाते हैं,
तो हमारे "होने" का अनुभव होता है — वही आत्मा है।

📖 भगवद्गीता से सम्बंध:
अध्याय 2, श्लोक 13:

"देहिनोऽस्मिन यथा देहे..."
👉 जैसे आत्मा बाल्य, युवा, वृद्ध शरीरों से गुजरती है,
लेकिन स्वयं अपरिवर्तनीय रहती है।
यह श्लोक आत्मा के शुद्ध स्वरूप की पुष्टि करता है —
जो सूत्र 1.3 का भाव है — द्रष्टा अपने स्वरूप में स्थित होता है।

📍 Yoga From Dr Pooja Sharma
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🪷Aaj kar Patanjali Yog Sutra योगा सूत्र साधना🕉️ समाधि पाद – सूत्र 1.2📜 योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः👉 योग चित्त की वृत्तियों के...
13/07/2025

🪷Aaj kar Patanjali Yog Sutra योगा सूत्र साधना
🕉️ समाधि पाद – सूत्र 1.2

📜 योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः
👉 योग चित्त की वृत्तियों के निरोध (रोकने) का नाम है।

🪔 संक्षिप्त व्याख्या (उदाहरण सहित):
यह पतंजलि योग दर्शन का मूल आधार सूत्र है।
यह बताता है कि योग का उद्देश्य है – चित्त में उठती विचारों, स्मृतियों, कल्पनाओं, मोह, भय आदि की लहरों को रोकना।

चित्त = मन का समुद्र | वृत्तियाँ = लहरें | योग = स्थिरता

🌟 उदाहरण 1:
मान लीजिए आपका मन एक झील है।
यदि सतह पर लहरें (वृत्तियाँ) हैं, तो नीचे की गहराई (आत्मा) नहीं दिखेगी।
जब लहरें शांत हों, तब झील का तल स्पष्ट होता है — ठीक वैसे ही शांत मन आत्मा को प्रकट करता है।

🌟 उदाहरण 2:
मान लीजिए आपका मन एक कैमरा है।
जब वह हिल रहा होता है, तब चित्र धुँधला आता है।
जैसे ही कैमरा स्थिर होता है, चित्र स्पष्ट हो जाता है।
योग = कैमरे को स्थिर करना ताकि जीवन का असली चित्र दिख सके।

🌟 उदाहरण 3:
रेडियो में यदि कई चैनलों की आवाजें एक साथ मिल जाएँ, तो कुछ भी स्पष्ट नहीं सुनाई देता।
लेकिन जब आप सही स्टेशन पर पहुँचते हैं — ध्वनि स्पष्ट होती है।
चित्त की वृत्तियाँ = शोर | योग = सही फ्रीक्वेंसी पर पहुँचने की साधना।

📖 भगवद्गीता से सम्बंध:
भगवद्गीता अध्याय 6, श्लोक 6:

"बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः।"
👉 जिसका चित्त (मन) वश में है, वही आत्मा का मित्र है।
🔗 यह श्लोक दर्शाता है कि मन को नियंत्रित करने वाला ही आत्मा के स्वरूप को समझ पाता है —
जो पतंजलि के इस सूत्र का भावार्थ भी है।

Yoga From Pooja
📞 7990628900

12/07/2025

🪷 **योगा सूत्र साधना**
🕉️ *समाधि पाद – सूत्र 1.1*

# # # 📜 **अथ योगानुशासनम्**

👉 *अब योग का अनुशासन प्रस्तुत किया जा रहा है।*

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# # # 🪔 **संक्षिप्त व्याख्या:**

महर्षि पतंजलि इस सूत्र से योगदर्शन की पवित्र शुरुआत करते हैं।
‘**अथ**’ का अर्थ होता है – *अब* – यह आत्मिक रूप से तैयार साधक के लिए संकेत है कि **अब समय है योग की ओर बढ़ने का।**

🔹 यह शब्द **गंभीरता**, **शुभारंभ** और **चेतना के जागरण** का सूचक है।

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# # # 🌟 **उदाहरण 1:**

गुरु कहे – “अब ध्यान से सुनो” –
👉 यह ‘अथ’ ठीक उसी चेतावनी की तरह है – अभ्यास आरम्भ हो रहा है।

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# # # 🌟 **उदाहरण 2:**

एक भटका हुआ व्यक्ति जीवन में कहता है –
“अब मैं कुछ बदलना चाहता हूँ।”
👉 यही आंतरिक बदलाव की शुरुआत है — *अथ योगानुशासनम्*।

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# # # 🌟 **उदाहरण 3:**

जैसे पवित्र ग्रंथों की शुरुआत होती है – ‘ॐ अथ…’ से –
👉 यह दिखाता है कि कुछ विशेष, आध्यात्मिक और गहन आरंभ होने जा रहा है।

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# # # 📖 **भगवद्गीता से सम्बंध:**

**श्लोक:**

> **"देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा।
> तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति॥"**
> *(भगवद्गीता – अध्याय 2, श्लोक 13)*

**हिंदी अर्थ:**
जैसे इस शरीर में जीवात्मा बाल्यावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था को प्राप्त होती है,
उसी प्रकार मृत्यु के बाद वह अन्य शरीर प्राप्त करती है।
बुद्धिमान व्यक्ति इस सत्य से मोहित नहीं होता।

👉 यह श्लोक भी यही सिखाता है कि जीवन निरंतर परिवर्तन है –
और 'अथ' शब्द इसी परिवर्तन को स्वीकार कर **आध्यात्मिक जीवन का पहला कदम** है।

📍 *Yoga From Dr Pooja ❤️*
From today we will start Patanjali Yoga Sutras Daliy.
If Any Doubt call 079906 28900

25/05/2025

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227 Pratham Residency Near Waghodia Road Vadidara
Vadodara
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