योग प्रशिक्षण संस्थान

योग प्रशिक्षण संस्थान Yoga is a group of physical, mental, and spiritual practices or disciplines which originated in ancient India.

26/09/2025

#अति आवश्यक, पढ़े और शेयर करे
आम तौर पर चिता जब शांत हो जाती है तब मुखाग्नि देने वाला व्यक्ति चिता भस्म पर 94 लिखता है।

यह सभी को नहीं मालूम है। खांटी बनारसी लोग या अगल बगल के लोग ही इस परम्परा को जानते हैं। बाहर से आये शवदाहक जन इस बात को नहीं जानते।

जीवन के शतपथ होते हैं। 100 शुभ कर्मों को करने वाला व्यक्ति मरने के बाद उसी के आधार पर अगला जीवन शुभ या अशुभ प्राप्त करता है। 94 कर्म मनुष्य के अधीन हैं। वह इन्हें करने में समर्थ है पर 6 कर्म का परिणाम ब्रह्मा जी के अधीन होता है।हानि-लाभ, जीवन-मरण, यश- अपयश ये 6 कर्म विधि के नियंत्रण में होते हैं।

अतः आज चिता के साथ ही तुम्हारे 94 कर्म भस्म हो गये। आगे के 6 कर्म अब तुम्हारे लिए नया जीवन सृजित करेंगे।
अतः 100 - 6 = 94 लिखा जाता है।

गीता में भी प्रतिपादित है कि मृत्यु के बाद मन अपने साथ 5 ज्ञानेन्द्रियों को लेकर जाता है। यह संख्या 6 होती है। मन और पांच ज्ञान इन्द्रियाँ।
अगला जन्म किस देश में कहाँ और किन लोगों के बीच होगा यह प्रकृति के अतिरिक्त किसी को ज्ञात नहीं होता है। अतः 94 कर्म भस्म हुए 6 साथ जा रहे हैं।
विदा यात्री। तुम्हारे 6 कर्म तुम्हारे साथ हैं।

आपके लिए इन 100 शुभ कर्मों का विस्तृत विवरण दिया जा रहा है जो जीवन को धर्म और सत्कर्म की ओर ले जाते हैं एवं यह सूची आपके जीवन को सत्कर्म करने की प्रेरणा देगी......

100 शुभ कर्मों की गणना
धर्म और नैतिकता के कर्म-
1.सत्य बोलना
2.अहिंसा का पालन
3.चोरी न करना
4.लोभ से बचना
5.क्रोध पर नियंत्रण
6.क्षमा करना
7.दया भाव रखना
8.दूसरों की सहायता करना
9.दान देना (अन्न, वस्त्र, धन)
10.गुरु की सेवा
11.माता-पिता का सम्मान
12.अतिथि सत्कार
13.धर्मग्रंथों का अध्ययन
14.वेदों और शास्त्रों का पाठ
15.तीर्थ यात्रा करना
16.यज्ञ और हवन करना
17.मंदिर में पूजा-अर्चना
18.पवित्र नदियों में स्नान
19.संयम और ब्रह्मचर्य का पालन
20.नियमित ध्यान और योग
सामाजिक
और पारिवारिक कर्म
21.परिवार का पालन-पोषण
22.बच्चों को अच्छी शिक्षा देना
23.गरीबों को भोजन देना
24.रोगियों की सेवा
25.अनाथों की सहायता
26.वृद्धों का सम्मान
27.समाज में शांति स्थापना
28.झूठे वाद-विवाद से बचना
29.दूसरों की निंदा न करना
30.सत्य और न्याय का समर्थन
31.परोपकार करना
32.सामाजिक कार्यों में भाग लेना
33.पर्यावरण की रक्षा
34.वृक्षारोपण करना
35.जल संरक्षण
36.पशु-पक्षियों की रक्षा
37.सामाजिक एकता को बढ़ावा देना
38.दूसरों को प्रेरित करना
39.समाज में कमजोर वर्गों का उत्थान
40.धर्म के प्रचार में सहयोग
आध्यात्मिक.और.व्यक्तिगत.कर्म
41.नियमित जप करना
42.भगवान का स्मरण
43.प्राणायाम करना
44.आत्मचिंतन
45.मन की शुद्धि
46.इंद्रियों पर नियंत्रण
47.लालच से मुक्ति
48.मोह-माया से दूरी
49.सादा जीवन जीना
50.स्वाध्याय (आत्म-अध्ययन)
51.संतों का सान्निध्य
52.सत्संग में भाग लेना
53.भक्ति में लीन होना
54.कर्मफल भगवान को समर्पित करना
55.तृष्णा का त्याग
56.ईर्ष्या से बचना
57.शांति का प्रसार
58.आत्मविश्वास बनाए रखना
59.दूसरों के प्रति उदारता
60.सकारात्मक सोच रखना
सेवा.और.दान.के.कर्म
61.भूखों को भोजन देना
62.नग्न को वस्त्र देना
63.बेघर को आश्रय देना
64.शिक्षा के लिए दान
65.चिकित्सा के लिए सहायता
66.धार्मिक स्थानों का निर्माण
67.गौ सेवा
68.पशुओं को चारा देना
69.जलाशयों की सफाई
70.रास्तों का निर्माण
71.यात्री निवास बनवाना
72.स्कूलों को सहायता
73.पुस्तकालय स्थापना
74.धार्मिक उत्सवों में सहयोग
75.गरीबों के लिए निःशुल्क भोजन
76.वस्त्र दान
77.औषधि दान
78.विद्या दान
79.कन्या दान
80.भूमि दान
नैतिक.और.मानवीय.कर्म
81.विश्वासघात न करना
82.वचन का पालन
83.कर्तव्यनिष्ठा
84.समय की प्रतिबद्धता
85.धैर्य रखना
86.दूसरों की भावनाओं का सम्मान
87.सत्य के लिए संघर्ष
88.अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाना
89.दुखियों के आँसू पोंछना
90.बच्चों को नैतिक शिक्षा
91.प्रकृति के प्रति कृतज्ञता
92.दूसरों को प्रोत्साहन
93.मन, वचन, कर्म से शुद्धता
94.जीवन में संतुलन बनाए रखना
विधि के अधीन.
6 कर्म
95.हानि
96.लाभ
97.जीवन
98.मरण
99.यश
100.अपय

🚩🚩🚩🚩🕉️🚩🚩🚩🚩प्रणायाम करते समय नाड़ी की अहम भूमिका होती है,हमारे शरीर मे 72000 नाड़ी है, इनमे से तीन नाड़ी प्रमुख है, तो आइये ...
21/09/2021

🚩🚩🚩🚩🕉️🚩🚩🚩🚩
प्रणायाम करते समय नाड़ी की अहम भूमिका होती है,हमारे शरीर मे 72000 नाड़ी है, इनमे से तीन नाड़ी प्रमुख है, तो आइये जानते है नाड़ी से सबंधित कुछ जानकारी...
कई योगाचार्य १० नाड़ियों को प्रमुख मानते हैं। इनमें भी तीन का उल्लेख बार-बार मिलता है - ईड़ा, पिंगला और सुषुम्ना।

ईड़ा ऋणात्मक ऊर्जा का वाह करती है। ईड़ा द्वारा उत्पादित ऊर्जा को चन्द्रमा के सदृश्य मानता है अतः इसे चन्द्रनाड़ी भी कहा जाता है। इसकी प्रकृति शीतल, विश्रामदायक और चित्त को अंतर्मुखी करनेवाली मानी जाती है। इसका उद्गम मूलाधार चक्र माना जाता है - जो मेरुदण्ड के सबसे नीचे भाग में स्थित है।

पिंगला धनात्मक ऊर्जा का संचार करती है। इसको सूर्यनाड़ी भी कहा जाता है। यह शरीर में जोश, श्रमशक्ति का वहन करती है और चेतना को बहिर्मुखी बनाती है।

पिंगला का उद्गम मूलाधार के दाहिने भाग से होता है जबकि ईडां का बाएँ भाग से।

नाड़ियों में इंगला, पिगला और सुषुम्ना तीन प्रधान हैं. इनमें भी सुषुम्ना सबसे मुख्य है। सुषुम्ना नाड़ी जिससे श्वास, प्राणायाम और ध्यान विधियों से ही प्रवाहित होती है। सुषुम्ना नाड़ी से श्वास प्रवाहित होने की अवस्था को ही 'योग' कहा जाता है। योग के सन्दर्भ में नाड़ी वह रास्ता है जिसके द्वारा शरीर की ऊर्जा का परिवहन होता है।

सुषुम्ना नाड़ी मूलाधार से आरंभ होकर यह सिर के सर्वोच्च स्थान पर अवस्थित सहस्रार तक आती है। सभी चक्र सुषुम्ना में ही विद्यमान हैं।अधिकांश लोग इड़ा और पिंगला में जीते और मरते हैं और मध्य स्थान सुषुम्ना निष्क्रिय बना रहता है। परन्तु सुषुम्ना मानव शरीर-विज्ञान का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। जब ऊर्जा सुषुम्ना नाड़ी में प्रवेश करती है, असल में तभी से यौगिक जीवन शुरू होता है।

🚩🚩🙏जय श्री राम🙏🚩

🚩🚩🚩🚩🙏🚩🚩🚩🚩प्राणायम में पूरक, कुंभक और रेचक क्रिया बहुत महत्वपूर्ण है। वैसे तो हम हर पल पूरक और रेचक क्रिया करते ही रहते ह...
21/09/2021

🚩🚩🚩🚩🙏🚩🚩🚩🚩
प्राणायम में पूरक, कुंभक और रेचक क्रिया बहुत महत्वपूर्ण है।
वैसे तो हम हर पल पूरक और रेचक क्रिया करते ही रहते हैं। पूरक का अर्थ है श्वास लेना और रेचक का अर्थ है श्वास छोड़ना। हम जन्म से लेकर मृत्यु तक पूरक और रेचक क्रिया करते रहते हैं।

श्वास लेने और छोड़ने के बीच हम कुछ क्षण के लिए रुकते हैं। इस रुकने की क्रिया को ही कुंभक कहते हैं। जब श्वास लेकर हम अंदर रुकते हैं तो उसे आभ्यांतर कुंभक कहते हैं और जब बाहर रुकते हैं तो उसे बाह्य कुंभक कहते हैं।

प्रणायाम में श्वास छोड़े और लें। छोड़ते वक्त तब तक श्वास छोड़ते रहें जब तक छोड़ सकते हैं और फिर तब तक श्वास दोबारा न लें जब तक उसे रोकना मुश्किल होने लगे। फिर श्वास तब तक लेते रहें जब तक पूर्ण न हो जाएं और फिर श्वास को सुविधानुसार अंदर ही रोककर रखें। इस तरह पूरक, रेचक और कुंभक का अभ्यास करें।

एक नजर रेचक पर ध्यान दें : पूरक, रेचक और कुंभक के अच्छे से अभ्यास के बाद सिर्फ रेचक क्रिया ही करें। श्वास छोड़ने की प्रक्रिया को ही रेचक कहते हैं और जब इसे थोड़ी ही तेजी से करते हैं तो इसे कपालभाती प्राणायाम कहते हैं।

अतिरिक्त: सिर्फ 10 मिनट के लिए श्वास लेने और छोड़ने का एनर्जी वॉल्यूम खड़ा कर दें। ऐसा वॉल्यूम जो आपकी बॉडी और माइंड को झकझोर दे। फिर चीखें, चिल्लाएं,योगिंग जॉगिंग कूदें और हंसें। यह रेचक प्रक्रिया के अंतर्गत आते है।

लाभ : इस क्रिया से सारा स्ट्रेस बाहर आ जाता है। ‍अनावश्यक चर्बी घटकर बॉडी फिट रहती है और भीतर जो भी दूषित वायु तथा विकार है, उसके बाहर निकलने से चेहरे और शरीर की चमक बढ़ जाती है। इसे करने के बाद 10 मिनट का ध्यान करें।

इससे आपका तन, मन और प्राण तरोताजगी और रिफ्रेश हो जाएगा। यह शरीर को स्वस्थ रखने में सक्षम है। हालांकि इसका अभ्यास किसी योग चिकित्सक के सलाह लेकर पूछकर ही करना चाहिए।

🚩🚩🙏जय श्री राम🙏🚩🚩

वज्रासन के लाभ।।।।।।।
12/08/2021

वज्रासन के लाभ।।।।।।।

योग का सम्पूर्ण परिचय:-आज के समय में योग पुरे संसार में अत्यधिक प्रचलित है, लेकिन फिर भी ज्यादातर लोग योग को केवल शारीरि...
18/02/2021

योग का सम्पूर्ण परिचय:-

आज के समय में योग पुरे संसार में अत्यधिक प्रचलित है, लेकिन फिर भी ज्यादातर लोग योग को केवल शारीरिक व्यायाम के तौर पर ही अपनाये हुए है जिस से कि वे योग के वास्तविक लाभ से अनजान रहते है|इसके लिए जरुरी है कि पहले जाने कि “योग क्या है?” “योग की उत्पत्ति कैसे हुई व् कब हुई?”, “योग की परम्परा और इतिहास क्या है?”, “योग का विकास कैसे हुआ?”, “योग का वर्तमान में क्या स्वरुप है?” आदि|

संस्कृत व्याकरण के अनुसार “योग” शब्द की व्युत्पत्ति “युज्” धातु से हुई जिसका अर्थ है: – “ जोड़ना या मिलना”|

जैसे उच्त्तम स्तर पर शिव तत्व का शक्ति से मिलन / आत्मा का परमात्मा से मिलन योग है |

योग की विभिन्न परिभाषाओं को ध्यान से देखने और समझने पर योग जीवन के हर क्षण, समय व परिपेक्ष में दिखाई देता है, इसीलिए योग को जीवन जीने की कला भी कहा जाता है, उदहारण के तौर पर –

⦁ महर्षि पतंजलि ने योग को अनुशासन कहा है (अथ योगानुशासनम्) और जीवन में भी अनुशासन सबसे महत्वपूर्ण है, अनुशाषित जीवन ही आपको जीवन में सुख और आनंद दे सकता है|

⦁ पतंजलि ने योग को परिभाषित करते हुए कहा है (योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः) – चित्तवृत्तियों अर्थात मन में उठने वाले भाव और विचार ही हमे जीवन में परेशान करते है और यदि हम इन पर ही नियंत्रण/निरोध सिख ले तो स्वयं जीवन आनंदमय हो जाएगा और इसी अवस्था को पतंजलि ने योग कहा है|

⦁ भगवद गीता में योग को कर्मो की कुशलता (योगः कर्मसु कौशलम्) कहा गया है, अर्थात यदि हम जीवन के हर क्षेत्र में योग्य व् उचित कर्मो को कुशलता अर्थात अपनी पूरी योग्यता और सकारात्मक ऊर्जा के साथ करें तो अवश्य ही हम जीवन में सफलता प्राप्त करके आनंद और सुख के साथ जीवन व्यतीत कर पाएंगे|

⦁ भगवद्गीता में योग की एक और परिभाषा में कहा गया है कि (समत्वं योग उच्यते) जीवन में सुख-दुःख, लाभ-हानि, जय-पराजय, अनुकूल-प्रतिकूल हर परिस्थिति में समान बने रहना, बैलेंस बनाके रहना ही योग है|

उपर्लिखित योग की परिभाषाएं, योग की महत्ता किसी एक काल में नहीं अपितु हर काल में आवश्यक है, चाहे वह आदिकाल हो या आधुनिक काल| वर्तमान में मनुष्य के जीवन की बढ़ती समस्याओं को देखते हुए केवल “योग” ही एकमात्र उपाय नजर आता है जो आज के मनुष्य की हर समस्या को हल करने में सक्षम है|

अब एक नज़र डालते है – योग का इतिहास क्या है?, योग का उद्गम और विकास कैसे हुआ? यह जानना भी जरुरी है ताकि हम जान सके योग की शक्ति को, योग की महत्ता को, योग के स्वरुप को|

योग की परम्परा अत्यंत प्राचीन है, इसमें कोई शंका नहीं है लेकिन प्रश्न है कि योग की परम्परा कितनी प्राचीन है?, योग का प्रारम्भ किसने व कब किया?, इनके सम्बन्ध में वेदो में, उपनिषदों में, श्रीमद्भगवद्गीता जैसे विभिन्न प्राचीनतम् ग्रंथो में उल्लेख मिलते हैं, जैसे गीता के चतुर्थ अध्याय में स्वयं श्री कृष्ण भगवान अर्जुन से कहते हैं कि

“मैंने इस योग का उपदेश सृष्टि के आरम्भ में सूर्य देवता को दिया था और आज मैं यह रहस्य पुनः तुम्हारे सामने प्रकट कर रहा हूँ|”
इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्।
विवस्वान् मनवे प्राह... (भ.गी. 4/1,2,3)

योग विधा सृष्टि के आरम्भ से ही विधमान थी, इसका उल्लेख ऋग्वेद में, याज्ञवल्क्य स्मृति में, महृषि व्यास जी द्वारा महाभारत में भी मिलता है | योग ग्रन्थ हठप्रदीपिका में योगी स्वात्माराम ने आदिनाथ भगवान् शिव को हठ-योग का प्रवक्ता माना है|

लेकिन मनुष्य ने योग का प्रयोग कब किया? – इस प्रश्न का उत्तर इन उल्लेखों में नहीं मिलता लेकिन यह तो साबित होता है कि इतिहास की पहुँच जहाँ तक जा सकती है, उस काल में भी योग विद्यमान था|

योग इतिहास को पांच खण्डों में बाँट सकते है –

(1) श्रुतिकाल

-(आदिकाल से 2300 ई. पू.) – वेदो से लेकर भगवान बुद्ध के बाद लगभग दो शताब्दी तक का काल श्रुतिकाल माना जाता है| इस काल में वेदों, उपनिषदों व् अन्य श्रुतियो की रचना हुई जिनमे योग के सम्बन्ध में अनेक उल्लेख मिलते है| इससे स्पष्ट होता है कि योग के शारीरिक, मानसिक तथा आध्यात्मिक पक्ष को भली प्रकार से जानने वाले और योग के अंतिम लक्ष्ण को अपने जीवन में प्रत्यक्ष अनुभव करने वाले सिद्ध लोग भारतवर्ष में थे|

(2) दर्शनों का काल –

-(2000 ई. पू.) योग के सभी तथ्यों एवं संकल्पनाओं का संग्रह करके, योग का एक स्वतंत्र शास्त्र व् दर्शन “योग-दर्शन” महर्षि पतंजलि द्वारा ई. पू. दूसरी शताब्दी के आस-पास लिखा गया और इसके साथ ही योग के इतिहास का दूसरा कालखंड प्रारम्भ हुआ| इस काल में अनेक दर्शन शास्त्रों की रचना हुई, जिनमे से अधिकाँश दर्शनों में योग की चर्चा हुई है| “योग-सूत्र” के अतिरिक्त “योग-वशिष्ट” और “याग्वल्क्य स्मृति” आदि की रचना भी इसी काल में हुई जिनमे योग का मुख्या रूप से उल्लेख मिलता है|

जैन तथा बौद्ध सम्प्रदाय का योग साहित्य भी इसी काल में लिखा गया|

(3) टीकाकाल –

-(1500-1200 ई. पू.) इस काल में “योग-सूत्र” पर व्यास भाष्य की रचना और अन्य टिकाएं लिखी गयी, जिनमे योग के सिद्धांतों और मान्यताओं की सविस्तार चर्चा पायी जाती है| योग का प्रचार और अनुसंधान भी इस काल में किये गए|
(4) भक्ति एवं हठयोग का उत्कर्ष काल –

– (6th – 2nd शताब्दी ई. पू.) इस काल में नाथ सम्प्रदाय का प्रसार हुआ, जिनकी मुख्य विशेषता थी “शारीरिक क्रियाओं द्वारा मन को वश में करना”| भक्ति सम्प्रदाय का विकास और हठयोग व् तंत्रयोग के अनेक ग्रंथो की रचना भी इसी काल में की गयी|

(5) आधुनिक काल –

– (15th – 18th शताब्दी )

योग परम्परा को आगे बढ़ाने में इसी काल में महर्षि रमण, श्री अरविन्द, स्वामी शिवानंद और स्वामी कैवल्यानंद जी, महर्षि महेशयोगी और स्वामी धीरेन्द्र ब्रह्मचारी का महत्वपूर्ण योगदान है| स्वामी धीरेन्द्र ब्रह्मचारी ने केंद्रीय विद्यालयों में योग को पाठ्यक्रम के रूप में मान्यता दिलाई|

योग का जन्म या उत्पत्ति सृष्टि के आरम्भ से ही है और इसके साथ ही गर्व की बात है कि इस महान् विधा का “योग” जन्म भारत में ही हुआ ऐसे तथ्य प्राचीन वेदो और ग्रंथो में मिलते है| प्राचीन समय से आधुनिक समय तक का योग का सफर बड़ा ही विस्मणीय रहा लेकिन योग का महत्व किसी भी काल समय में कम नहीं हुआ अपितु बढ़ता ही रहा| योग के पिता के रूप में महर्षि पतंजलि को जाना जाता है क्यूंकि पतंजलि ने ही सर्वप्रथम “योग-सूत्र” के रूप में योग का एक स्वतंत्र शास्त्र विश्व को दिया जिसने योग को हर मनुष्य के लिए उपलब्ध कराया, क्यूंकि इस से पूर्व योग सन्यासियों अथवा एकांतवास करने वाले साधुओं के लिए ही उपयोगी माना जाता था|

आधुनिक युग में न केवल भारत में अपितु विश्व भर में शोध कार्यो के आधार पर योग का अत्यधिक प्रचार हुआ है| अब यह सिद्ध हो चुका है कि योग जितना मोक्ष मार्ग पथिक के लिए उपयोगी है, उतना ही योग साधारण मनुष्य के लिए भी मूल्यवान है| आधुनिक युग में योग की उपयोगिता जीवन के हर क्षेत्र में उद्घाटित हुई है – जैसे स्वास्थ्य के क्षेत्र में योग, रोग-उपचार में योग, खेल-कूद में योग, शिक्षा में योग, औधोगिक में योग, वैज्ञानिक अनुसंधान में योग, सामाजिक और आध्यात्मिक क्षेत्र में भी योग की उपयोगिता है|

✍️ 🧘‍♂️ 🧘‍♀️ 🧘‍♂️

🏵️ *पंचभूत का शरीर पर संकेत -२?*🏵️    माघ का मास चल रहा है, इधर कई लोगों के शरीर में दर्द बढ़ चुका है, सुबह - सुबह उठने क...
08/02/2021

🏵️ *पंचभूत का शरीर पर संकेत -२?*🏵️

माघ का मास चल रहा है, इधर कई लोगों के शरीर में दर्द बढ़ चुका है, सुबह - सुबह उठने की इच्छा नहीं होती, जागकर कम्बल या रजाई में पड़े रहते है खासकर तब और देरी से उठते है जब छुट्टी या रविवार हो।
आजकल के बच्चे तो बिल्कुल सुबह नहीं उठाना चाहते, जब हम छोटे थे तो सुबह उठाना हमारी दिनचर्या का हिस्सा था, और आकर अलाव के पास बैठ जाते थे, हमें कोई मतलब नहीं कि आज छुट्टी का दिन है। त्योहार के दिन तो और भी जल्दी उठ जाते थे। पर हम खुद परेशान है कि आजकल के युवाओं के इस आदत से? गाँव में अपना हाथ फैलाने पर दिखायी नहीं पड़ता था, ऐसे समय में भी गन्ने पिराई (गुड़ बनाने वाले) जगह पहुँचकर बैलों को हाँकते थे। आलस था ही नही।

*शरीर के चिकित्सीय लक्षण -१*

पर जब हम बाहर जाते है, या छुट्टी के दिन घर पर होते है, या ज्यादा थके हुए होते हैं तो सुबह उठते समय हमारी मनोदशा व शारीरिक स्थति भिन्न होती है। कभी तो हम बड़े उत्साह के साथ उठते है, कभी हमें सुबह थकान सा अनुभव होता है, कभी दर्दयुक्त शरीर व अनबूझे मन से उठते है। कभी हम हल्के शरीर व चैतन्य मन से उठते है, ऐसा आपने भी अनुभव किया होगा। सुबह हमारे भीतर इस भाव व ऊर्जा के संचरण का बहुत बड़ा कारण होता है हमारी सोच व पंचभूत।
आपने देखा होगा जब हम एलार्म का प्रयोग नहीं करते थे, और सुबह तीन बजे, चार बजे उठकर हमें कहीं आना जाना होता था तो हम अपने बुजुर्गों को बोलते थे कि हमे इतने बजे जगा देना, तो वह जगा देते थे। या कई बार ऐसा हुआ है कि जब हमें सुबह पढ़ना होता था, या फिर किसी पर्व पर सूर्योदय के पूर्व स्नान करना होता या सुबह बस/गाड़ी से यात्रा करनी होती तो हम सीने पर हाथ रखकर बोलते हे प्रभु! मुझे इतने बजे जगा देना, कल मुझे इस कार्य के लिए जल्दी उठना है, हमारी यह संकल्प शक्ति इतनी मजबूत होती कि हम उस समय से पूर्व ही अपने आप जग जाया करते थे। यह संकल्प शक्ति इतनी प्रगाढ़ होती है कि जब भी हम सुबह उठते हैं बिना आलस्य के बिना खराब मनोदशा के हम उठ बैठते हैं। हममें एक जोश होता है, शरीर हल्का होता है। इस स्थति को मनोदशा की होती है।

दूसरी बात ~ आप सब जानते हैं कि हम श्वांस द्वारा वायु रूप में जो कुछ भी ग्रहण करते है या छोड़ते है उसमें हम वायु रूप में अन्य पंचभूतों को भी ग्रहण करते है। आप कहेंगे हम तो सिर्फ वायु रूप में आक्सीजन ग्रहण करते है, पर सत्य तो यह है जब हम साँस लेते है तो नाक के भीतर हमारा मर्म किसको जाने देना है, किसको नहीं काफी हद उसे भी नियंत्रित करता है। अन्यथा वायुमंडल में अनगिनत फैले जीवाणुओं के हम शिकार हो जायेंगे।
हर स्थान व हर ऋतुओं में यह पंचमहाभूत भिन्न - भिन्न होते सकते है। जैसे आप ऊँचे - ऊंचे पहाड़ों पर घूमने जाइये जैसे - जैसे शिखर की ऊंचाइयों पर जायेंगे, आपको वायु कम मिलेगी आकाश पंचभूत ज्यादा मिलेगा। साधना, ध्यान के लिये आकाश महाभूत सबसे अच्छा है, आप देखोगे योगियों में आकाश महाभूत सर्वाधिक होगा। आपने देखा होगा कि पहाड़ों पर सूर्योदय जल्दी निकलता है, पहाड़ों पर रहने वाले लोग जल्दी उठते है, या जिनके भीतर आकाश तत्व की प्रमुखता अधिक होगी उन्हें कितनी भी जल्दी उठना पड़े, शरीर भारी नहीं लगेगा, उनकी मनोदशा व शरीर हल्का होगा।
👉 आकाश का गुण है शब्द। आप शब्द से नाद और योग की उस अवस्था पर बढ़ेंगे जहाँ नाद उस योग की स्थति में उस स्पस्ट सुनाई पड़ता है उसे अनाहद नाद कहते है, वह एक अलग मार्ग है, अभी उधर नहीं चलना सिर्फ इतना समझ लें कि जब हमारे भीतर *आकाश तत्व* बढ़ जाता है तो शरीर में अजीब मदहोशी महसूस होती है, मन् के भीतर शांति महसूस होती है, अकेलेपन में रहने का मन् कहता है, जीवन आजादी चाहता है, व्यक्ति अलग - थलग रहता है। यह कुछ लक्षण आकाश तत्व के होते हैं।
यदि ऋतुओं की बात करूँ तो वर्षा ऋतु के बाद पृथ्वी पर वायु तत्व की न्यूनता सर्वाधिक होती है, उस समय अपनी शारीरिक स्थति का विश्लेषण कर सकते है, पर इसमे कई और भी कारण होते है।

*वायु तत्व प्रधान शरीर* वायु का गुण है शब्द और स्पर्श पर जब वायु तत्व के कारण सुबह उठेंगे तो हममें चंचलता, गतिशीलता अधिक होगी। व्यक्ति कन्फ्यूज्ड होगा, आशंकित रहेगा। कन्फ्यूजन में रहेगा। थोड़ा घबराया, डरा हुआ रहेगा, भावुकता (fluctuate of emotion) कभी अच्छे विचार कभी बुरे विचार बदलते रहेंगे। भविष्य को लेकर मन अनेक आशंकाएं घिरी रहेगी। कुछ लोग कहते हैं कि उनका बच्चा बच्चे हाइपर एक्टिव है, तो समझ लीजिए वायु तत्व बढ़ा हुआ है। इसे षटकोण (हेक्साजोनल) से प्रदर्शित करते है। आप ऋतुओं की बात करें तो शरद ऋतु के बाद यह स्थति अधिकांश लोगों में देखने को मिलेगी, या फिर जो फिर जो प्रकृति के उस भाग में रहते हैं जहाँ वायु तत्व सर्वाधिक होता हो। ऐसा व्यक्ति सुबह हर कार्य का जल्दबाजी में करने की कोशिश करेगा, वीपी भी बढ़ा हुआ हो सकता है, बार - बार नींद खुलेगी।

*अग्नि तत्व प्रधान-* अग्नि तत्व के गुण है शब्द, स्पर्श, रूप जिसमें दृश्य या रूप प्रमुख है। जब शरीर में अग्नि तत्व की प्रधानता बढ़ जाती है तो व्यक्ति सुबह के समय जब उठेगा तो शरीर गर्म होगा, मुँह थोड़ा कडुआ होगा, शरीर चिपचिपा, ऊर्जावान होगा। अग्नि तत्व की अधिकता में उस व्यक्ति में प्रतिस्पर्धा अधिक होगा, दूसरों से तुलना करेगा, गुस्सा जल्द आएगा, एक विषय को बड़ी गगराई से जजमेंट्स करेगा, उसमें वायलेंस भी दिखायी देगा। हो सकता है उठते ही भोजन भी माँग ले। ऋतुओं की बात करें तो आप इसे गर्मी का मौसम भी मान कर परीक्षण कर सकते है।

*जल तत्व -* जल तत्व के गुण है शब्द, स्पर्श, आकृति व स्वाद। जल तत्व अधिकता में व्यक्ति दूसरों से प्रेम अधिक करेगा वह थोड़ा धीरे उठेगा, शरीर में दर्द भी हो सकता है।
थोड़ा भारीपन महसूस होगा, हो सकता है वह एक बार में ना भी उठे। मुस्कराते हुए उठेगा, वह हर वस्तु को बड़े गौर से देखेगा, उसमें उसकी आसक्ति भी निर्मित होने लगे। थोड़ा लालच भी करे।
आपने देखा होगा समुद्र के किनारे जल महाभूत अधिक होता है आप उनके जीवन पर एक विश्लेषण कीजिये।

*पृथ्वी तत्व-* पृथ्वी तत्व के गुण है शब्द, स्पर्श, आकृति, स्वाद, गंध।
आपने देखा होगा कि वृक्ष सबसे अधिक पृथ्वी से जुड़े रहते है। उसमें गतिशीलता नहीं होती, एक जगह स्थिर होते है। यदि मनुष्य में पृथ्वी तत्व बढ़ जाये तो उसे उठते समय भारीपन महसूस होगा, हर कार्य को बहुत धीरे - धीरे, अटक - अटक कर करेगा, बार - बार याद दिलाना पड़ेगा। वह जल्द डिप्रेशन में चला जाता है।

इस तरह हम सुबह उठते समय अपने शरीर व मनोदशा को आराम से देख सकते है। उसके अनुसार प्राणायम करके या कुछ विन्दुओं को उत्प्रेरित करके उन्हें ठीक भी कर सकते हैं।
आपसे प्रार्थना है इसे अनुभव करके इसमें सुधार करके हमारा भी मार्ग प्रशस्त करे।

धन्यवाद
🙏🌹🙏

प्रमोद मिश्र (आयुर्वेद व पंचतत्व)
ज्ञानस्य मूलम् धर्मम्


🏵️ *शरीर के लक्षण को पहचाने* 🏵️
🏵️ *शरीर के लक्षण* 🏵️

जब हम बीमार होते हैं, तो हमारा शरीर ही कुछ लक्षणों को इंगित करता है हमें निकट भविष्य में क्या समस्या आने वाली है। इन लक्षणों से पूर्व शरीर की सूक्ष्म इन्द्रियों को इसका आभास भी हो जाता है और मनुष्य के व्यवहार व स्वरूप मे वह परिलक्षित भी होने लगता है।
जैसे - किसी को जुकाम होना होता है तो उसके पहले नाक या कान में खुजली होनी शुरू हो जाती है, वहीं सूक्ष्म इन्द्रियों द्वारा उसकी प्यास अतृप्त हो जाती है, और वह बार - बार पानी भी पीने लगता है। गर्म पानी से उसकी प्यास नहीं बुझती है, जुकाम का यह लक्षण 36 से 48 घंटे पहले ही सुक्षिन्द्रियों को दृष्टिगोचर हो जाता है। एक और उदाहरण से समझें बीमार होने से पूर्व व्यक्ति की भूख बढ़ जाती है, प्रसन्नता बढ़ जाती है। जैसे - मरने से पूर्व व्यक्ति की एक बार समस्त चेतना वापस लौट आती है और वह सभी से बात करता है, हँसेगा भी है, चलेगा भी, भोजन भी माँग लेता है। और खाते खाते राम - राम सत्य। एक और उदाहरण से समझे जब आँतो में गर्मी बढ़ जाती है तो व्यक्ति बहुत अधिक खाने को माँगता है, बार - बार भूख का आभास होने लगता है, अपानवायु ज्यादा खुलने लगती है यही गति बनी रहने पर 24 से 36 घण्टो में उसे दस्त लग जाते है। माताएं कहती है अब खाना नहीं मिलेगा तेरा पेट खराब होने वाला है। वैसे यह लक्षण सभी में उत्पन्न नहीं होते, लेकिन स्वप्न व व्यवहार में परिवर्तन को आप समझ पाए तो बहुत अच्छी बात है।
चिकित्सक शरीर के कई लक्षणों, विकारों को बीमारी मानकर चिकित्सीय लैब में टेस्ट करके ज्ञात करने का प्रयास करते है, कई बार रिपोर्ट्स सही भी नहीं होती हैं या रिपोर्ट्स नॉर्मल आती हैं, "लेकिन उस व्यक्ति को तकलीफ वैसे के वैसे बनी रहती है।" कई बार दो अलग-अलग लैब की रिपोर्ट भी अलग-अलग आ जाती हैं। पर बीमारी वहीं के वहीं बनी रहती है, क्योंकि उस टेस्ट में व्यक्ति की मनोस्थति का आँकलन का जाँच नहीं किया जाता है, उसका कोई आधुनिक यंत्र नहीं ।
पहले के समय में लोग एक दूसरे से खूब बातचीत करते थे, एक दूसरे से आत्मीयता गहरी होती थी, इसलिए दूसरे की मनस्थति को आसानी से पढ़ लिया करते थे, पर आज संयुक्त परिवारों में भी इसका अभाव देखने को मिलता है। बूढ़े माँ - बाप को हंसते हुए जमाने गुजर चुके होते हैं। व्यक्ति अकेलेपन के अवसाद ग्रस्त हो जाता है, जिससे शरीर में अनेकानेक विकार उत्तपन्न होने लगते है। इनको वही व्यक्ति पढ़ सकता है जिसकी औरा शक्ति उसकी औरा शक्ति को प्रभावित कर सके।
आप किसी के घर पर प्रसन्नचित होकर बेटे या बेटी का शादी का कार्ड लेकर जाइये उस घर में पति - पत्नी में खूब लड़ाई- झगड़ा चल रहा हो, आप डोर बेल बजायेंगे तो वह झगड़ा बन्द करके मुस्काते हुए आपका स्वागत करने आएंगे।, लेकिन आपको 5 मिनट बाद ही आभास होने लगेगा कि यहाँ कुछ गड़बड़ है। गलती से उन्होंने चाय के लिए बोलकर बैठा दिया तो जिस पर कुछ देर पहले पति - पत्नी बैठकर झगड़ा कर रहे तो दो मिनट में ही आपकी प्रसन्नता अविछिन्न होने लगेगी, और आप में भी क्रोध का संचार शुरू हो जाएगा। यदि कोई साधु पुरुष यानि सतोगुणी होगा तो उसे दरवाजे पर कदम रखते ही यह आभास हो जायेगा कि यहाँ तो मेरी मनस्थति विकृति हो रही है।
तो यह सूक्ष्मन्द्रियों के विषय होते है जिसे आपकी सतोगुणी संवेदनशीलता आसानी से पकड़ लेती है। कई बार आपसे जिसकी आत्मीयता ज्यादा होती है उसकी फोन पर आवाज से ही पता कर लेते हैं कि यह कुछ बात अवश्य छिपा रहा है। तो यह तो संक्षेप में सुक्षिन्द्रियों का रहा विषय कहा ...
अब बात आती है शरीर की जिन्हें तमो व रजोगुणी संवेदनाये नहीं पकड़ पाती तो उनके विकार शरीर पर रोग के रूप प्रकट होने लगते हैं।

हर आने वाले रोग या शरीर में होने वाले परिवर्तन को या तो स्वयं अपनी सूक्ष्मन्द्रियों से समझ लो अन्यथा शरीर के इन संकेतों को समझ लीजिए।
पर फिर भी कहूँगा कि शरीर से अधिक जरूरी है मनस्थति को समझना। शरीर एक आईना की तरह बीमारियों को परिलक्षित कर सकता है। पर ध्यान रहे रोग की स्थति में किसी भी लक्षण के जाँच के कई प्रकार के अन्य विकल्प भी होते है।

👉 *जिह्वा पर सफेद या भूरे रंग का मैल जमना* ~ पेट की खराबी इंगित करता है।

👉 *नथुनों का तेजी से फड़कना* ~ निमोनिया, प्लूरिसी आदि रोग की तरफ इंगित करता है।

👉 *आँखों के नीचे कालापन* ~ अधिक थकावट या पुराने कब्ज को इंगित करता है।

👉 *आँखों के चारो तरफ कालापन ~ कमजोरी, खून की कमी, ल्यूकोरिया (श्वेत-प्रदर) आदि की तरफ इंगित करता है।

👉 *आँखों के नीचे सूजन ~ किडनी के कार्य में रुकावट की तरफ इंगित करता है।

👉 *होठों के कोने पर सफेद छाले* ~ बुखार आने की तरफ इंगित करता है।

👉 *गालों ओर झाइयाँ* ~ पीरियड्स कम व आयरन आने की तरफ इंगित करता है।

👉 *रक्तार्भ कपोत* ~ फेफड़ों (lungs) में इन्फेक्शन की तरफ इंगित करते हैं।

👉 *शाम को एक डिग्री ताप बढ़ना* ~ टायफाइड की तरफ इंगित।

👉 *सोते समय दाँत किटकिटाना या बिस्तर पर पेशाब करना* ~ बच्चों के पेट में कीड़े की तरफ इंगित करते हैं।

👉 *नाक व मलद्वार में खुजली* ~ पेट में कीड़े होने होने के लक्षण इंगित करते है।

👉 *जीभ का सफेद रंग* ~ तिल्ली बढ़ने की तरफ इंगित करता है।

👉 *जीभ पर छाले व घाव* ~ आंतों और पेट के रोग की तरफ इंगित करता है।

👉 *चेहरे पर हल्के सफेद रंग के धब्बे* ~ पेट में कीड़े की तरफ इंगित करते है।

👉 *आँखों के सामने अंधेरा छा जाना* ~ निम्न रक्तचाप व खून की कमी होने का इंगित करता है।

👉 *हाथ की उंगलियों के पीछे कालापन* ~महिलाओं में यूट्रस (बच्चेदानी) में रोग की तरफ इंगित करता है।

👉 *हाथ पैर चेहरे पर सूजन* ~ रज दोष की तरफ इंगित करती है।

👉 *गालो का पिचकना* ~ अधिक वीर्यनाश की तरफ इंगित करता है।

👉 *ओंठ के फटने* ~ पेट के रोग या किसी लंबी बीमारी की तरफ इंगित करता है।

👉 *गले में सूजन* ~ हाइपोथायरॉइडिज्म (थाइरॉइड ग्लैंड का हार्मोन कम निकलना) की तरफ इंगित करता है।
👉 *नाखून पर सफेद धब्बे* ~ कैल्शियम की तरफ इंगित करता है।
👉 *जाँघों पर सूजन, हाथों का सुन्नपन्न* ~ हृदय बीमारी की तरफ इंगित करता है।

ऐसे अनेक लक्षण जो धातु विकारों, कमजोरी, यकृत की समस्या, साँस फूलने, पैरों में सुन्नपन्न, आदि आपको महसूस होते होंगे। आप भी अपने शरीर व मानसिक लक्षणों को इसमें जोड़िए।
धन्यवाद
🙏🌹🙏
प्रमोद मिश्र ( आयुर्वेद व पंचतत्व)

Yogasana Postures....
13/04/2020

Yogasana Postures....

योगासन चार्ट।।।।।।।
12/04/2020

योगासन चार्ट।।।।।।।

योग मुद्रा के फायदे।।।।।।।
12/04/2020

योग मुद्रा के फायदे।।।।।।।

भारतीय ऋषि मुनि।।।।।।
12/04/2020

भारतीय ऋषि मुनि।।।।।।

योग की परिभाषा और इसके महत्व।।।।।।।।
12/04/2020

योग की परिभाषा और इसके महत्व।।।।।।।।

योग, ध्यान और परिचर्चा का आदर्श टाइम- टेबल।।।।
12/04/2020

योग, ध्यान और परिचर्चा का आदर्श टाइम- टेबल।।।।

Address

Varanasi
221005

Opening Hours

Monday 9am - 5pm
Tuesday 9am - 5pm
Wednesday 9am - 5pm
Thursday 9am - 5pm
Friday 9am - 5pm
Saturday 9am - 5pm
Sunday 9am - 5pm

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when योग प्रशिक्षण संस्थान posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Share