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16/05/2023
11/09/2022

#पितृ_पूजा_या_पितर_कर्म_क्यों_करना_चाहिए ?

शास्त्रों में देवताओं के कार्य की अपेक्षा पितरों के कार्य को विशिष्ट माना गया है; इसलिए देवताओं की पूजा से पहले पितरों का कार्य करना चाहिए ।

पितरों के कार्य को ही ‘ #श्राद्ध_कर्म’, ‘ #पितृ_कर्म’, ‘पितृ पूजा’ या ‘पितर पूजा’ कहते हैं । पितरों के निमित्त तर्पण और श्राद्ध आदि करना ‘पितृ यज्ञ’ कहलाता है ।

यह ध्रुव सत्य है कि जीवन की समाप्ति मृत्यु से ही होती है । जीवात्मा इतना सूक्ष्म होता है कि जब वह शरीर से निकलता है, उस समय कोई भी मनुष्य अपने खुले नेत्रों से उसे देख नहीं सकता है । मनुष्य की मृत्यु के बाद उस प्राणी के उद्धार की जिम्मेदारी उसके पुत्र और पौत्रों की होती है । इसीलिए कहा गया है—‘पुं नाम नरकात् त्रायते इति पुत्र: ’ अर्थात् ‘नरक से जो रक्षा करता है, वही पुत्र है ।’ यदि पिता नरक में पहुंच गया है तो नरकों से उसका उद्धार (श्राद्ध तर्पण आदि द्वारा) करके पिता को सद्गति प्राप्त करा देना, पुत्र का कर्तव्य है; इसीलिए उसे ‘पुत्र’ कहा जाता है ।

पितृ पूजा या पितृ कर्म क्यों करने चाहिए ?

भारतीय संस्कृति में पितृ ऋण से मुक्त होने के लिए अपने माता-पिता तथा परिवार के अन्य मृत प्राणियों के निमित्त श्राद्ध करना अनिवार्य माना गया है । इसका कारण यह माना गया है कि—

सामान्य प्राणी से जीवन में पाप और पुण्य दोनों होते हैं । पुण्य का फल स्वर्ग और पाप का फल नरक माना गया है । स्वर्ग-नरक भोगने के बाद जीव पुन: संसार की भवाटवी अर्थात् चौरासी लाख योनियों में भटकने लगता है । उस समय पुण्यात्मा लोगों को मनुष्य योनि या देवयोनि मिलती है और पापात्मा जीव पशु-पक्षी, कीड़े-मकोड़े आदि तिर्यक योनि प्राप्त करते हैं । मनुष्य की मृत्यु के बाद उस प्राणी के उद्धार के लिए पुत्र-पौत्रों का कर्तव्य होता है कि वे शास्त्रों में बताए गए कुछ ऐसे कर्म करें जिससे प्राणी को परलोक में या अन्य योनियों में भी सुख की प्राप्ति हो सके ।

शास्त्रों में मनुष्य का मरणकाल निकट आने पर उसके कल्याण के लिए विभिन्न प्रकार के दान आदि किए जाने वाले कर्मों का वर्णन मिलता है । साथ ही मृत्यु के बाद और्ध्वदैहिक संस्कार, पिण्ड दान, एकादशाह, सपिण्डीकरण, तर्पण, श्राद्ध आदि करने का विधान है ।

प्रश्न यह है कि मरे हुए जीव तो अपने कर्मानुसार शुभ-अशुभ गति को प्राप्त होते हैं; फिर श्राद्धकाल में वे अपने पुत्र के घर कैसे पहुंच जाते हैं—

इसका उत्तर यह है कि जो लोग यहां मरते हैं, उनमें से कितने ही इस लोक में जन्म ग्रहण करते हैं, कितने ही पुण्यात्मा स्वर्गलोक में निवास करते हैं और पापात्मा जीव यमलोक के निवासी हो जाते हैं । यमलोक या स्वर्गलोक में रहने वाले पितरों को भी तब तक भूख-प्यास अधिक होती है, जब तक कि वे माता या पिता से तीन पीढ़ी के अंतर्गत रहते हैं—जब तक वे श्राद्धकर्ता पुरुष के मातामह, प्रमातामह या वृद्धप्रमातामह और पिता, पितामह या प्रपितामह पद पर रहते हैं । तब तक श्राद्धभाग ग्रहण करने के लिए उनमें भूख-प्यास की अधिकता होती है।

जो पितर स्वर्गलोक में निवास करते हैं, वे भी वहां भूख-प्यास का अत्यंत कष्ट उठाते हैं; क्योंकि स्वर्ग में देवताओं को भूख-प्यास का कष्ट नहीं होता है । वहां कोई खाता-पीता नहीं दिखाई देता है । देवता तो अनेक प्रकार के भोगों से संपन्न होकर प्रसन्नचित्त रहते हैं । जब स्वर्गलोकवासी पितरों को भूख-प्यास का कष्ट सताता है तो वे नंदनवन के वृक्षों से फलों को तोड़ते हैं; परंतु फल वृक्ष की डाली से अलग ही नहीं होते हैं । प्यास से पीड़ित होकर जब वे देवनदी का जल हाथ में उठाते हैं तो उस जल का हाथ से स्पर्श ही नहीं होता है । इस प्रकार जिनके वंशज उनके लिए तर्पण या श्राद्ध नहीं करते, वे पितर चाहें स्वर्ग में रहें या यमलोक में; वे भूख-प्यास से व्याकुल रहते हैं।

अमावस्या के दिन वंशजों से श्राद्ध और पिण्ड पाकर पितरों को एक मास तक तृप्ति बनी रहती है। पितृपक्ष में श्राद्ध करने से पितरों को एक वर्ष तक तृप्ति रहती है और जो मनुष्य गया में जाकर एक बार भी श्राद्ध कर दे तो उसके सभी पितर सदा के लिए तृप्त हो जाते हैं।

श्राद्ध से केवल मनुष्य की और पितरों की ही संतुष्टि नहीं होती है; वरन् श्राद्ध करने वाला ब्रह्मा से लेकर तृण (घास-फूंस) तक समस्त सृष्टि को संतुष्ट कर देता है । श्राद्ध द्वारा तृप्त हुए पितर मनुष्य को मनोवांछित भोग प्रदान करते हैं । पितरों की पूजा से मनुष्य को पुष्टि, आयु, वीर्य, और लक्ष्मी की प्राप्ति होती है।

यही कारण है कि पितृ कर्म को अत्यंत कल्याणकारी मानते हुए देवताओं की पूजा से भी पहले करना चाहिए।

ध्यान रखने वाली बात यह है कि पितृ कार्य करते समय शुद्धता बहुत आवश्यक है । चाहे वह वाणी की हो या कर्म की अर्थात् श्राद्ध करते समय न तो किसी से बुरा बोलें और न ही अपवित्र रहे । श्राद्ध की क्रियाएं अत्यंत सूक्ष्म होती हैं; अत: इन्हें करते समय अत्यंत सावधानी रखनी चाहिए।

 #याद_रखिये......कभी भगवान की पीठ को न देखें और न ही प्रणाम या प्रार्थना करें ! मंदिर में परिक्रमा ( प्रदक्षिणा) लेते सम...
01/08/2022

#याद_रखिये......

कभी भगवान की पीठ को न देखें और न ही प्रणाम या प्रार्थना करें !

मंदिर में परिक्रमा ( प्रदक्षिणा) लेते समय भगवान या देवी की पीठ को प्रणाम करने का चलन बहुत हो गया है!

किसी भी भगवान या देवी देवताओं की पीठ को प्रणाम करने से समस्त पुण्यों का नाश हो जाता है!

इसका प्रमाण भागवत कथा में एक प्रसंग में इस प्रकार बताया गया है कि जरासंध के साथ युद्ध के समय एक काल यवन नाम का राक्षस जरासंध की तरफ से युद्ध करने के लिए युद्ध स्थल में श्री कृष्ण भगवान जी से युद्ध करने आ गया!

काल यवन भयानक राक्षस के अलावा सत्कर्म करने वाला भी था।

श्री कृष्ण भगवान जी इस राक्षस के वध के पहले इसके समस्त सत्कर्मों को नष्ट करना चाहते थे। सत्कर्म नष्ट होने से सिर्फ इस दुष्ट को दुष्टता के कर्मफल मिलें व उसका वध किया जा सके!

इसलिये श्री कृष्ण भगवान जी मैदान छोड़ कर भागने लग गये! भगवान आगे आगे राक्षस काल यवन पीछे - पीछे भाग रहे हैं!

इससे राक्षस काल यवन को भगवान की पीठ दीखती रही और उसके सभी सत्कर्मों का नाश होता रहा!

भगवान श्रीकृष्ण की इस युक्ति के पीछे यह राज था कि राक्षस काल यवन के अर्जित सत्कर्मों का नाश हो जाये ताकि दुष्ट को दुष्टता का फल मिले
व उसे मारा जा सके!

जब काल यवन के समस्त सत्कर्म भगवान श्री कृष्ण के पीछे-पीछे दौड़कर पीठ देखने के कारण नष्ट हो गए उसके बाद ही उसका वध संभव हो सका!

इसलिए कृपया किसी मंदिर की (फेरी )परिक्रमा लेते समय देवी - देवताओं की पीठ को प्रणाम न करें और न ही पीठ को देखें! बल्कि उनके सम्मुख हाथों को जोड़कर प्रार्थना,अर्चना व आराधना करें।

इस अज्ञानता को खत्म करने को ज्यादा से ज्यादा सज्जनों तक यह कथा पहुचाने में सहयोगी बने ! ताकि सबके सत्कर्मों को क्षीण होने से बचाया जा सके!

जय श्री कृष्णा

ज्योतिष उस विद्या को कहते हैं जिसमें मनुष्य तथा पृथ्वी पर, ग्रहों और तारों के शुभ तथा अशुभ प्रभावों का अध्ययन किया ....

हवन_करते_समय_अग्नि_में_आहूति_किस_स्थान_में__डालें ??*~~ सर्वकार्यप्रसिद्धयर्थं  जिह्वायां   तत्र   होमयेत् ।  चक्षुः   क...
15/07/2022

हवन_करते_समय_अग्नि_में_आहूति_किस_स्थान_में__डालें ??*

~~ सर्वकार्यप्रसिद्धयर्थं जिह्वायां तत्र होमयेत् ।
चक्षुः कर्णादिकं ज्ञात्वा होमयेद्देशिकोत्तमः ।।
अग्निकर्णे हुतं यस्तु कुर्याच्चेद् व्याधितो भयम् ।
नासिकायां महद्दुःखं चक्षुषोर्नाशनं भवेत् ।।
केशे दारिद्रयदं प्रोक्तंतस्माज्जिह्वासु होमयेत् ।।
यत्र काष्ठं तत्र श्रोते यत्र धूमस्तु नासिके ।।
यत्राल्पज्वलनं नेत्रं यत्र भस्म तु तच्छिरः ।
यत्र न ज्वलितो वह्निस्तत्र जिह्वा प्रकीर्तिता ।। "

🌹 समस्त कार्यों की सिद्धि के लिए अग्नि की जिह्वा में होम करना चाहिए -- श्रेष्ठ आचार्य चक्षु - कर्ण - नासिका - सिर आदि की पहचान कर हवन करें ---

अग्नि के कान में यदि हवन करें तो उसे व्याधि से भय होता है -- नासिका में हवन करें तो महादुःख होता है -- नेत्रों में हवन करें तो विनाश होता है -- केशों में किया गया हवन दारिद्र्यप्रद कहा गया है -- इसलिए जिह्वाओं में हवन करना चाहिए ---

जहाँ काष्ठ है वहाँ अग्नि के कान कहे गये हैं --
जहाँ धुआं है वहाँ अग्नि की नासिका कही गई है -- जहाँ अग्नि कम जलती है वहाँ अग्नि के नेत्र कहे गये हैं -- जहाँ भस्म है वहाँ अग्नि का सिर कहा गया है -- और जहाँ अग्नि ज्वालायुक्त है वहाँ अग्नि की जिह्वा कही गई है - अतः जिह्वा में ही हवन श्रेष्ठ कहा गया है ।
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*🌹जय माँ कामाख्या🌹

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भूत-प्रेत-तंत्र बाधा से मुक्ति के अचूक एवं सरल उपाय🌹-🌹-🌹-🌹-🌹-🌹-🌹    आधुनिक युगमे ये विषय तर्क वितर्क ओर श्रद्धा अंधश्रद्...
07/07/2022

भूत-प्रेत-तंत्र बाधा से मुक्ति के अचूक एवं सरल उपाय
🌹-🌹-🌹-🌹-🌹-🌹-🌹

आधुनिक युगमे ये विषय तर्क वितर्क ओर श्रद्धा अंधश्रद्धा का हो सकता है । क्योंकि भौतिक विज्ञानसे सिद्ध हो तब ही आजकी पीढ़ी स्वीकार करती है । पर जिसे अनुभव किया हो या पीड़ा भुगत रहे हो उनका कोई इलाज भी आधुनिक विज्ञान के पास नही है ये भी पूर्ण सत्य है । हालांकि पश्चात विज्ञान भी आधुनिक उपकरणों से इस विषय के संशोधनमे लग गया है ।

अक्सर ऐसे मामले सुननेमें आते हैं जिनमे व्यक्ति किसी बाहरी बाधा ,भूत प्रेत ,किये कराये ,टोने टोटके से परेशान होता है । कुछ परेशानियां तो घर परिवार ,आर्थिक समस्या ,उन्नति ,अवनति ,घटना दुर्घटनाओं अथवा रोग बीमारी की होती हैं किन्तु कुछ मामले ऐसे भी होते हैं जिनमे कोई शक्ति जैसे भूत प्रेत व्यक्ति से सीधे संपर्क करता है ,किसी से सीधे सम्पर्क में रहता है । कभी वह बातें करता है तो कभी वह शरीर भी छूता है ,कभी कभी तो यह शक्तियाँ या प्रेत प्रेतनी स्त्री या पुरुष से शारीरिक सम्बन्ध भी बनाते हैं । कुछ मामलों में एक दो बार तो कुछ मामलों में कई बार पीड़ित इन्हें समझ भी नहीं पाता क्योंकि उसे अक्सर कोई दिखाई नहीं देता किन्तु नाजुक गुप्त अंगों पर हरकत और क्रियाएं होती हैं । कभी कभी किसी किसी स्त्री या पुरुष को किसी अदृश्य शक्ति के गुप्तांग या जनन अंग या शरीर के किसी अंग के स्पर्श की भी अनुभूति होती है । ऐसे मामले होते तो कम हैं किन्तु किसी किसी के साथ यह होता है । अक्सर इन मामलों से स्त्री और युवतियां अधिक पीड़ित होती हैं जबकि कोई कोई पुरुष भी इनसे प्रभावित होता है |

सामान्य लोग और परिवार के लोग इसे समझ नहीं पाते और इसे मानसिक बीमारी कह सकते हैं किन्तु जिसके साथ होता है वह इसे पूरा महसूस करता है भौतिक रूप से भी
जब कोई पुरुष या महिला अकाल मृत्यु से मरता है तब वह प्रेत -प्रेतनी या भूत चुड़ैल बनता है |मृत्यु के समय शारीरिक स्थिति अच्छी होने पर इच्छाए और कामनाएं अधिक होती हैं ,इन्ही में से एक कामना शारीरिक सुख प्राप्ति की भी होती है । मृत्यु बाद भी आत्मा की इच्छाएं उसके साथ रहती हैं किन्तु उसके पास शरीर नहीं होता |सामान्यतया तो कम शक्ति होने से वह किसी के शरीर को प्रभावित नहीं कर पाते किन्तु किसी किसी में इतनी शक्ति हो जाती है की वह किसी जीवित पुरुष या स्त्री के शरीर को भी प्रभावित कर सकें । इन आत्माओं को प्रेत कहते हैं । कभी यह खुद किसी के शरीर को प्रभावित करते हैं तो कभी किसी अन्य के शरीर में प्रवेश करके अपनी अतृप्त इच्छाओं की पूर्ती का प्रयास करते हैं । यही कारण होता है की यह किसी किसी से शारीरिक सम्बन्ध भी बनाने की कोशिश करते हैं और अपनी इच्छा पूर्ण करने का प्रयास करते हैं |

जब कोई आत्मा या भूत प्रेत ,प्रेतनी चुड़ैल आदि किसी को प्रभावित करते हैं तो ऐसे व्यक्ति या स्त्री का स्वास्थ्य भी प्रभावित होता है और मानसिक स्थिति भी । प्रेत की शक्ति पर निर्भर करता है की वह कितना और किस रूप में प्रभावित करना चाहता है । यदि प्रेत या प्रेतनी किसी पर आसक्त हो जाएँ तो वह अधिकतर शारीरिक तुष्टि चाहते हैं उस व्यक्ति से । चूंकि उनके पास भौतिक शरीर नहीं होता अतः सामान्यतया तो वह शरीर नहीं छू पाते किन्तु यदि उनकी शक्ति अधिक हो तो वह शरीर छूने लगते हैं और तब व्यक्ति या पीड़ित युवती या स्त्री को ऐसा लगता है कोई उसे छू रहा या कोई शारीरिक सम्बन्ध बनाने की कोशिस कर रहा । इस तरह के प्रेत या प्रेतनी कभी घर -परिवार या रिश्तेदारी के भी हो सकते हैं तो कभी बाहर आते जाते रास्ते से लग गए हुए भी होते हैं ।

कभी कभी कुछ लोग किसी किसी पर प्रेत भेज देते हैं तब भी ऐसा हो सकता है । इसे किसीने कराया तांत्रिक प्रयोग भी कहते है । या कभी किसी ऐसे स्थान पर मूत्र त्याग या अशुद्ध क्रिया करने से भी यह व्यक्ति के साथ लग जाते हैं जहाँ प्रेत रहते हों |कभी कभी भरी दोपहरी में या रात में तेज परफ्यूम आदि लगाकर अकेले निकलने पर भी प्रेत या प्रेतनी आकृष्ट हो जाते हैं |

जब कोई किसी को मारने के उद्देश्य से प्रेत भेजता है तो ऐसे प्रेत शारीरिक कष्ट तो देते हैं किन्तु शारीरिक सम्बन्ध बनाने की कोशिश नहीं करते किन्तु यदि उन्हें मारने का निर्देश न हो मात्र किसी को जाकर पीड़ित करने का उद्देश्य हो तो वह हर तरह के कष्ट देते हैं और वह फिर शरीर का सम्पर्क भी कर सकते हैं ।

जब कोई इस तरह के किसी प्रेत या प्रेतनी का शिकार होता है तो उसका दाम्पत्य जीवन तबाह हो जाता है यदि वह विवाहित है तो । यदि अविवाहित है तो उसके विवाह में अनेक अडचने आने लगती है । विवाहित स्थिति में अक्सर जीवन साथी को कष्ट होने लगता है और यह प्रेत प्रेतनी नहीं चाहते की पीड़ित से उसका पति या पत्नी सम्बन्ध बनाये |कुछ ऐसे भी मामले आते हैं जबकि प्रेत में अधिक शक्ति हो तो वह पति या पत्नी में प्रवेश करके या उनका रूप लेकर भी शारीरिक सम्बन्ध बनाता है । अविवाहित मामलों में विवाह की इच्छा कम होने लगती है |अनचाहे ऐसी क्रियाएं और काम होते हैं की शरीर कमजोर पड़ने लगता है |विवाहित या अविवाहित दोनों मामलों में पीड़ित का स्वस्थ्य अच्छा नहीं रहता और वह अनमना ,ऊर्जा विहीन ,चिडचिडा हो जाता है । एकांत पसंद आता है ,खुद पर से विश्वास कम होने लगता है ,लोगों से दूर रहने की कोशिश करता है |

यदि कोई प्रेत किसी पर भेजा गया हो तो उसे सामान्य पूजा पाठ से न तो समाप्त किया जा सकता है न ही वापस भेजा जा सकता है या हटाया जा सकता है क्योंकि वह अपनी इच्छा से नहीं जा सकता ,वह वचन बद्ध होता है । या तो जिसने भेजा है वह बुलाये तभी वह जा सकता है या फिर उसे जला दिया जाए तब वह खत्म होगा । कोई शक्तिशाली साधक उन्हें हटाकर दूर समशनमे बिदा कर सकता है । यदि यह जिन्न या ब्रह्म राक्षस आदि हुआ तो जलाया भी नहीं जा सकता और हटाने की कोशिश करने वाले के ही जान के लाले पड़ जाते हैं । इन्हें मात्र मनाया ही जा सकता है की वह पीड़ित को छोड़ दें । अगर साधक शक्तिशाली हो तो उन्हें बिदा कर सकता है । कुछ ऐसे भी मामले देखने में आये हैं की ३० -४० वर्ष से किसी को कोई प्रेत या जिन्न पीड़ित कर रहा है और उसे कहीं का कोई तांत्रिक नहीं हटा पाया ,अंततः वह तभी हटा जब व्यक्ति की मृत्यु हो गयी |इनके शक्ति की कोई सीमा नहीं क्योंकि जो तांत्रिक आज हटाने की कोशिश कर रहे कभी कभी उनसे भी अधिक इनकी शक्ति होती है । जब कोई कर्मकांडी या उच्च साधक ब्राह्मण अकाल मृत्यु को प्राप्त हो जाए या कोई उच्च स्तर का तांत्रिक अकाल मृत्यु को प्राप्त हो तो वह ऐसा प्रेत या ब्रह्म राक्षस बनता है जो किसी भी साधक ,तांत्रिक या पंडित तक को मार सकता है । अतः किस्मे कितनी शक्ति है यही उसे हटाने या हटने की स्थिति के लिए उत्तरदाई होता है |

सामान्यतया ऐसे प्रेतों को हटाने के लिए हमने जो युक्ति कारगर पाई है उसमे सबसे बेहतर खुद की शक्ति बढ़ाना ही है । बिना यह कहे की हम किसी को हटाना चाहते हैं यदि काली आदि की साधना उपासना की जाय तो धीरे धीरे इनसे राहत मिलती है । प्रेत या प्रेतनी अक्सर भगवती काली की उपासना में बाधा नहीं डालते क्योंकि काली ही उनकी भी आराध्य होती हैं । अतः काली उपासना इस तरह हो की हम अपने घर परिवार और खुद की ख़ुशी के लिए उपासना कर रहे तो बाधा कम आती है और कुछ समय में खुद की शक्ति बढने पर प्रेत प्रकोप कम होने लगता है । कभी कभी ऐसा भी होता है की यह कोई पूजा पाठ करने ही नहीं देते तथा पूजा पाठ पर और अधिक परेशानियां घर परिवार में होने लगती हैं किन्तु अधिकतर ऐसा तब होता है जब कोई प्रेत घर परिवार पर भेजा गया हो या अनिष्ट के उद्देश्य से भेजा गया हो । आसक्त या कामुक प्रेत प्रेतनी पूजा पाठ नहीं रोकते । काली की उपासना पूजा के साथ भगवती काली या प्रत्यंगिरा देवी का कवच यदि किसी अच्छे साधक से बनवाकर धारण किया जाय तो शरीर से प्रेत के लिए अवरोध उत्पन्न हो जाता है और वह उतनी मनमानी नहीं कर सकता जितना सामान्य अवस्था में करता है । कम शक्ति का हुआ तो शरीर से हट जाएगा ,अधिक शक्ति का हुआ तब भी उसे अवरोध अवश्य महसूस होगा और उसे कष्ट तो होगा ही शरीर स्पर्श पर । किसी को भोजन न मिले तो कोई कितने दिन भूखा रहेगा यही तकनीक काम करती है ताबीज ,कवच धारण में । भूत प्रेत शरीर को पीड़ित करने में ताबीज से अवरोध महसूस करते हैं अतः हटने लगते हैं । खुद की साधना की शक्ति इन्हें और अधिक दूर कर व्यक्ति को इनसे मुक्त कर देती है ।

महाकाली पूजा :-

संकल्प :-

अध्यदिने में --------------- मेरी ओर मेरे परिवार की रक्षा हेतू एवं धर्म अर्थ काम मोक्ष प्राप्ति अर्थे भगवती महाकाली माताजी का यथा मति अनुसार पूजन , मंत्रजाप , स्तोत्र पाठ करिष्ये ।

चमच का जल भगवती के चरणों के पास छोड़ दीजिए ।

चौरंगी पर लाल आसान बिछाकर महाकाली माताजी की मूर्ति या फोटो स्थापित कीजिये । प्रथम गुरु , गणपति ओर कुलगोत्र देवी देवताओं का स्मरण कीजिये । महाकाली माताजी को आह्वाहन कीजिये । पंचोपचार पूजन , स्नान , तिलक , धूप , दिप , प्रसाद कीजिये । आरती कीजिये ।
पूजन के बाद प्रथम महाकाली मंत्र :-

" ॐ क्लीं कालिकायै नमः "

इस मंत्र की पांच माला जाप कीजिये । मंत्र जाप के बाद स्तोत्रपाठ कीजिये ।

विनियोग :-

ॐ अस्य श्रीदक्षिणकाल्या हृदयस्तोत्रमन्त्रस्य श्रीमहाकाल ऋषिः ।
उष्णिक्छन्दः । श्रीदक्षिणकालिका देवता ।
क्रीं बीजं । ह्रीं शक्तिः । नमः कीलकं ।
सर्वत्र सर्वदा जपे विनियोगः ।

अथ हृदयादिन्यासः :-

ॐ क्रां हृदयाय नमः ।
ॐ क्रीं शिरसे स्वाहा ।
ॐ क्रूं शिखायै वषट् ।
ॐ क्रैं कवचाय हुं ।
ॐ क्रौं नेत्रत्रयाय वौषट् ।
ॐ क्रः अस्त्राय फट् ॥

दक्षिणाकाली हृदय स्तोत्रम्

॥ श्रीगणेशाय नमः ॥

॥ श्रीउमामहेश्वराभ्यां नमः ॥

श्रीमहाकाल उवाच ।

महाकौतूहलस्तोत्रं हृदयाख्यं महोत्तमम् ।
श‍ृणु प्रिये महागोप्यं दक्षिणायाः सुगोपितम् ॥
अवाच्यमपि वक्ष्यामि तव प्रीत्या प्रकाशितम् । अन्येभ्यः कुरु गोप्यं च सत्यं सत्यं च शैलजे ॥

श्रीदेव्युवाच ।

कस्मिन् युगे समुत्पन्नं केन स्तोत्रं कृतं पुरा ।
तत्सर्वं कथ्यतां शम्भो दयानिधे महेश्वर ॥

श्रीमहाकाल उवाच ।

पुरा प्रजापतेः शीर्षच्छेदनं कृतवानहम् ।
ब्रह्महत्याकृतैः पापैर्भैरवत्वं ममागतम् ॥
ब्रह्महत्याविनाशाय कृतं स्तोत्रं मया प्रिये ।
कृत्याविनाशकं स्तोत्रं ब्रह्महत्यापहारकम् ॥

ॐ ध्यायेत्कालीं महामायां त्रिनेत्रां बहुरूपिणीम् ।
चतुर्भुजां ललजिह्वां पूर्णचन्द्रनिभाननाम् ॥ १॥

नीलोत्पलदलप्रख्यां शत्रुसङ्घविदारिणीम् ।
नरमुण्डं तथा खड्गं कमलं वरदं तथा ॥ २॥

बिभ्राणां रक्तवदनां दंष्ट्रालीं घोररूपिणीम् ।
अट्टाट्टहासनिरतां सर्वदा च दिगम्बराम् ॥ ३॥

शवासनस्थितां देवीं मुण्डमालाविभूषिताम् ।
इति ध्यात्वा महादेवीं ततस्तु हृदयं पठेत् ॥ ४॥

ॐ कालिका घोररूपाढया सर्वकामफलप्रदा ।
सर्वदेवस्तुता देवी शत्रुनाशं करोतु मे ॥ ५॥

ह्रींह्रींस्वरूपिणी श्रेष्ठा त्रिषु लोकेषु दुर्लभा ।
तव स्नेहान्मया ख्यातं न देयं यस्य कस्यचित् ॥ ६॥

अथ ध्यानं प्रवक्ष्यामि निशामय परात्मिके ।
यस्य विज्ञानमात्रेण जीवन्मुक्तो भविष्यति ॥ ७॥

नागयज्ञोपवीताञ्च चन्द्रार्द्धकृतशेखराम् ।
जटाजूटाञ्च सञ्चिन्त्य महाकालसमीपगाम् ॥ ८॥

एवं न्यासादयः सर्वे ये प्रकुर्वन्ति मानवाः ।
प्राप्नुवन्ति च ते मोक्षं सत्यं सत्यं वरानने ॥ ९॥

यन्त्रं श‍ृणु परं देव्याः सर्वार्थसिद्धिदायकम् ।
गोप्यं गोप्यतरं गोप्यं गोप्यं गोप्यतरं महत् ॥ १०॥

त्रिकोणं पञ्चकं चाष्टकमलं भूपुरान्वितम् ।
मुण्डपङ्क्तिं च ज्वालां च कालीयन्त्रं सुसिद्धिदम् ॥ ११॥

मन्त्रं तु पूर्वकथितं धारयस्व सदा प्रिये ।
देव्या दक्षिणकाल्यास्तु नाममालां निशामय ॥ १२॥

काली दक्षिणकाली च कृष्णरूपा परात्मिका ।
मुण्डमाला विशालाक्षी सृष्टिसंहारकारिका ॥ १३ ॥

स्थितिरूपा महामाया योगनिद्रा भगात्मिका ।
भगसर्पिःपानरता भगोद्योता भगाङ्गजा ॥ १४ ॥

आद्या सदा नवा घोरा महातेजाः करालिका ।
प्रेतवाहा सिद्धिलक्ष्मीरनिरुद्धा सरस्वती ॥ १५॥

एतानि नाममाल्यानि ये पठन्ति दिने दिने ।
तेषां दासस्य दासोऽहं सत्यं सत्यं महेश्वरि ॥ १६॥

ॐ कालीं कालहरां देवी कङ्कालबीजरूपिणीम् ।
कालरूपां कलातीतां कालिकां दक्षिणां भजे ॥ १७॥

कुण्डगोलप्रियां देवीं खयम्भूकुसुमे रताम् ।
रतिप्रियां महारौद्रीं कालिकां प्रणमाम्यहम् ॥ १८॥

दूतीप्रियां महादूतीं दूतीयोगेश्वरीं पराम् ।
दूतोयोगोद्भवरतां दूतीरूपां नमाम्यहम् ॥ १९॥

क्रींमन्त्रेण जलं जप्त्वा सप्तधा सेचनेन तु ।
सर्वे रोगा विनश्यन्ति नात्र कार्या विचारणा ॥ २०॥

क्रींस्वाहान्तैर्महामन्त्रैश्चन्दनं साधयेत्ततः ।
तिलकं क्रियते प्राज्ञैर्लोको वश्यो भवेत्सदा ॥ २१॥

क्रीं हूं ह्रीं मन्त्रजप्तैश्च ह्यक्षतैः सप्तभिः प्रिये ।
महाभयविनाशश्च जायते नात्र संशयः ॥ २२॥

क्रीं ह्रीं ह्रूं स्वाहा मन्त्रेण श्मशानाग्निं च मन्त्रयेत् ।
शत्रोर्गृहे प्रतिक्षिप्त्वा शत्रोर्मृत्युर्भविष्यति ॥ २३॥

ह्रूं ह्रीं क्रीं चैव उच्चाटे पुष्पं संशोध्य सप्तधा ।
रिपूणां चैव चोच्चाटं नयत्येव न संशयः ॥ २४॥

आकर्षणे च क्रीं क्रीं क्रीं जप्त्वाऽक्षतान् प्रतिक्षिपेत् ।
सहस्रयोजनस्था च शीघ्रमागच्छति प्रिये ॥ २५॥

क्रीं क्रीं क्रीं ह्रूं ह्रूं ह्रीं ह्रीं च कज्जलं शोधितं तथा ।
तिलकेन जगन्मोहः सप्तधा मन्त्रमाचरेत् ॥ २६॥

हृदयं परमेशानि सर्वपापहरं परम् ।
अश्वमेधादियज्ञानां कोटिकोटिगुणोत्तरम् ॥ २७॥

कन्यादानादिदानानां कोटिकोटिगुणं फलम् ।
दूतीयागादियागानां कोटिकोटिफलं स्मृतम् ॥ २८॥

गङ्गादिसर्वतीर्थानां फलं कोटिगुणं स्मृतम् ।
एकधा पाठमात्रेण सत्यं सत्यं मयोदितम् ॥ २९॥

कौमारीस्वेष्टरूपेण पूजां कृत्वा विधानतः ।
पठेत्स्तोत्रं महेशानि जीवन्मुक्तः स उच्यते ॥ ३०॥

रजस्वलाभगं दृष्ट्वा पठेदेकाग्रमानसः ।
लभते परमं स्थानं देवीलोके वरानने ॥ ३१॥

महादुःखे महारोगे महासङ्कटके दिने ।
महाभये महाघोरे पठेतस्तोत्रं महोत्तमम् ।
सत्यं सत्यं पुनः सत्यं गोपायेन्मातृजारवत् ॥ ३२॥

इति कालीरहस्ये श्रीकालीहृदयं
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*🌹वेदमूर्ति डॉ अनिल कुमार पाण्डेय🌹*

*शनिपीड़ा से मुक्ति के लिए करें इन तीन नामों का जाप*गाधिश्च कौशिकश्चैव पिप्पलादो महामुनि: ।शनैश्चर कृतां पीडां नाशयन्ति ...
30/04/2022

*शनिपीड़ा से मुक्ति के लिए करें इन तीन नामों का जाप*

गाधिश्च कौशिकश्चैव पिप्पलादो महामुनि: ।
शनैश्चर कृतां पीडां नाशयन्ति स्मृतास्त्रय: ।। (शिवपुराण, शतरुद्रसंहिता 25।20)

अर्थात्—मुनि गाधि, कौशिक और पिप्पलाद—इन तीनों का नाम स्मरण करने से शनिग्रह की पीड़ा दूर हो जाती है ।

मुनि पिप्पलाद के नाम-स्मरण से क्यों दूर होती है शनिपीड़ा ?

महर्षि दधीचि और उनकी पत्नी सुवर्चा महान शिभक्त थे । शिवजी के ही आशीर्वाद से महर्षि दधीचि की अस्थियां वज्र के समान हो गयी थीं । महर्षि और उनकी पत्नी की शिवभक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने उनके यहां ‘पिप्पलाद’ नाम से अवतार धारण किया ।

वृत्तासुर आदि दैत्यों से पराजय के बाद देवतागण महर्षि दधीचि के आश्रम पर उनकी अस्थियां मांगने गए क्योंकि उनकी अस्थियां शिवजी के तेज से युक्त थी जिससे वे वज्र का निर्माण कर दैत्यों को हराना चाहते थे । उन्होंने किसी कार्य के बहाने उनकी पत्नी सुवर्चा को दूसरे आश्रम में भेज दिया । महर्षि ने ब्रह्माण्ड की रक्षा के लिए अपने प्राणों को खींचकर शिवतेज में मिला दिया और देवताओं ने उनकी अस्थियों से वज्र बनाकर दैत्यों पर विजय प्राप्त की । चारों तरफ सुख-शान्ति छा गयी ।

महर्षि की पत्नी जब आश्रम वापिस आईं तो सारी बात जानकर सती होने लगीं तब आकाशवाणी हुई—‘तुम्हारे गर्भ में महर्षि दधीचि का ब्रह्मतेज है जो भगवान शंकर का अवतार है । उसकी रक्षा आवश्यक है ।’

आकाशवाणी सुनकर सुवर्चा पास ही में एक पीपल के वृक्ष के नीचे बैठ गयीं और एक दिव्य बालक को जन्म दिया । सुवर्चा ने शिवावतार उस बालक की स्तुति करते हुए कहा—

‘हे परमेश्वर ! तुम इस पीपल के वृक्ष के नीचे चिरकाल तक स्थित रहो और सभी प्राणियों के लिए सुखदाता होओ ।’ ऐसा कहकर वे सती हो गयीं।

सभी देवताओं ने साक्षात् शिव का अवतार जानकर उस बच्चे के संस्कार किए और ब्रह्माजी ने उसका नाम रख दिया ‘पिप्पलाद’ ।

*पिप्पलाद’ का अर्थ*

शिव का अवतार यह बालक पीपल वृक्ष के नीचे अवतरित हुआ, माता की आज्ञा से पीपल वृक्ष के नीचे रहा, पीपल के पत्तों का ही भोजन किया तथा पीपल वृक्ष के मूल में रहकर तपस्या की । इसलिए इनके जीवन में पीपल वृक्ष का ही प्रमुख स्थान रहा ।

पिप्पलाद के कष्टमय बचपन का कारण शनिपीड़ा

महामुनि पिप्पलाद ने देवताओं से पूछा कि क्या कारण है कि मेरे जन्म से पूर्व ही मेरे पिता दधीचि मुझे छोड़कर चले गए और जन्म होते ही माता भी सती हो गयीं ?

देवताओं ने मुनि पिप्पलाद को बताया कि उनके बाल्यकाल के कष्टों का कारण शनि की क्रूर दृष्टि (प्रकोप) है । शनिग्रह की दृष्टि के कारण ही उनके बचपन में ऐसा कुयोग बना था ।

पिप्पलाद को यह बात चुभ गई कि शनि में इतना अंहकार है कि वह नवजात शिशुओं तक को नहीं छोड़ते, इसका दंड तो शनि को भुगतना पड़ेगा । घोर तपस्वी पिप्पलाद ने तीनों लोकों में शनि को ढूंढना प्रारम्भ कर दिया । एक दिन अकस्मात् उन्हें पीपल वृक्ष पर शनि के दर्शन हो गए । मुनि ने तुरन्त अपना ब्रह्मदण्ड उठाया और उसका प्रहार शनि पर कर दिया । शनि यह भीषण प्रहार सहन करने में असमर्थ थे और वे नक्षत्र-मण्डल (आकाश) से गिर गए । वह भागने लगे किंतु कही मार्ग ही न मिलता था । ब्रह्मदण्ड ने उनका तीनों लोकों में पीछा करना शुरू किया । जहां जाते ब्रह्मदण्ड आता दिख जाता । तब शनिदेव ब्रह्माजी के पास गए । ब्रह्माजी ने सुझाव दिया कि भगवान शिव ही इससे रक्षा कर सकते हैं । शनिदेव ने भागकर शिवजी की शरण ली ।

भगवान शिव ने पिप्पलाद को समझाया—शनि ने सृष्टि के नियमों का पालन किया है, इसमें शनि का कोई दोष नहीं है । शिवजी के कहने पर पिप्पलाद ने शनि को क्षमा कर दिया । पिप्पलाद ने ब्रह्मदण्ड की मारक क्षमता कम कर दी और ब्रह्मदण्ड शनि के पैर पर प्रहार करके लौट गया । शनिदेव नक्षत्र-मण्डल में पहले की तरह स्थित हो गए । उस दिन से शनिदेव पिप्पलाद से भयभीत रहने लगे ।

शनिपीड़ा की शांति के लिए पीपल क्यों उपयोगी है ?

शनि ने वचन दिया कि वह चौदह वर्ष तक की आयु के जातकों को अपनी साढ़ेसाती से मुक्त रखेंगे ।

पिप्पलाद ने कहा—जो व्यक्ति इस कथा का ध्यान करते हुए पीपल के नीचे शनिदेव की पूजा करेगा, उसके शनिजन्य कष्ट दूर हो जाएंगे ।

इसलिए मुनि पिप्पलाद के नाम-स्मरण करने (जो भगवान शंकर का ही रूप है) तथा पीपल का पूजन करने से शनि की पीड़ा दूर हो जाती है ।

पिप्पलाद ने राजा अनरण्य की पुत्री पद्मा से विवाह किया । शिवपुराण में कहा गया है—

पिप्पलादस्य चरितं पद्माचरित संयुतम् ।
य: पठेच्छृणुयाद् वापि सुभक्त्या भुवि मानव: ।।
शनिपीड़ा विनाशार्थमेतच्चरितमुत्तमम् । (शिवपुराण शतरुद्रसंहिता 25।21-22)

अर्थात—जो मनुष्य महामुनि पिप्पलाद तथा उनकी पत्नी पद्मा के चरित्र का श्रद्धापूर्वक पाठ करता है उसकी शनि की पीड़ा का नाश हो जाता है ।

शनिपीड़ा से मुक्ति पाने के लिए पीपल की उपासना

पीपल की उपासना शनिजन्य कष्टों से मुक्ति पाने के लिए की जाती है । प्रमुख उपाय है—

पिप्पलेश्वर महादेव की अर्चना शनिजनित कष्टों से मुक्ति दिलाती है।

शिवपुराण में कह गए इस पिप्पलाद श्लोक का या केवल इन तीन नामों (पिप्पलाद, गाधि, कौशिक) को जपने से शनि की पीड़ा शान्त हो जाती है ।

पीपल की सेवा प्रत्येक शनिवार करने से शनिदेव प्रसन्न होते हैं । शनि की साढ़ेसाती और ढैया के प्रभाव से बचने के लिए हर शनिवार को पीपल के पेड़ पर गुड़, दूध मिश्रित जल चढ़ाएं । फिर पीपल की सात बार परिक्रमा करें । शाम को सरसों के तेल का दीपक जलाएं । ये नियम करने से शनि के सभी दोषों से मुक्ति मिलती है ।

शनिवार की अमावस्या को पीपल वृक्ष की पूजा और 7 परिक्रमा करके काले तिल से युक्त सरसों के तेल के दीपक को जलाकर छायादान करने से शनि की पीड़ा से मुक्ति मिलता है।
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*🌹वेदमूर्ति डॉ अनिल पाण्डेय🌹*

*हनुमान जी का चित्र घर में कहाँ लगायें*🌹〰️🌹〰️🌹〰️🌹〰️〰️🌹〰️🌹〰️श्रीराम भक्त हनुमान साक्षात एवं जाग्रत देव हैं। हनुमानजी की भ...
28/04/2022

*हनुमान जी का चित्र घर में कहाँ लगायें*
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श्रीराम भक्त हनुमान साक्षात एवं जाग्रत देव हैं। हनुमानजी की भक्ति जितनी सरल है उतनी ही कठिन भी। कठिन इसलिए की इसमें व्यक्ति को उत्तम चरित्र और मंदिर में पवित्रता रखना जरूरी है अन्यथा इसके दुष्परिणाम भुगतने होते हैं

हनुमानजी की भक्ति से चमत्कारिक रूप से संकट खत्म होकर भक्त को शांति और सुख प्राप्त होता है। विद्वान लोग कहते हैं कि जिसने एक बार हनुमानजी की भक्ति का रस चख लिया वह फिर जिंदगी में अपनी बाजी कभी हारता नहीं। जो उसे हार नजर आती है वह अंत में जीत में बदल जाती है। ऐसे भक्त का कोई शत्रु नहीं होता।

आपने हनुमानजी के बहुत से चित्र देखे होंगे। *जैसे- 🌹पहाड़ उठाए हनुमानजी 🌹 उड़ते हुए हनुमानजी 🌹 पंचमुखी हनुमानजी 🌹 रामभक्ति में रत हनुमानजी 🌹 छाती चिरते हुए 🌹 रावण की सभा में अपनी पूंछ के आसन पर बैठे हनुमानजी 🌹लंका दहन करते हनुमान 🌹 सीता वाटिका में अंगुठी देते हनुमानजी 🌹गदा से राक्षसों को मारते हनुमानजी, 🌹विशालरूप दिखाते हुए हनुमानजी 🌹 आशीर्वाद देते हनुमानजी 🌹 राम और लक्षमण को कंधे पर उठाते हुए हनुमानजी 🌹 रामायण पढ़ते हनुमानजी 🌹 सूर्य को निगलते हुए हनुमानजी🌹 बाल हनुमानजी 🌹 समुद्र लांगते हुए हनुमानजी 🌹श्रीराम-हनुमानजी मिलन 🌹 सुरसा के मुंह से सूक्ष्म रूप में निकलते हुए हनुमानजी 🌹 पत्थर पर श्रीराम नाम लिखते हनुमानजी 🌹 लेटे हुए हनुमानजी 🌹 खड़े हनुमानजी 🌹 शिव पर जल अर्पित करते हनुमानजी 🌹 रामायण पढ़ते हुए हनुमानजी 🌹 अखाड़े में हनुमानजी शनि को पटकनी देते हुए 🌹 ध्यान करते हनुमानजी 🌹 श्रीकृष्ण रथ के उपर बैठे हनुमानजी 🌹 गदा को कंधे पर रख एक घुटने पर बैठे हनुमानजी 🌹 पाताल में मकरध्वज और अहिरावण से लड़ते हनुमानजी 🌹 हिमालय पर हनुमानजी 🌹 दुर्गा माता के आगे हनुमानजी 🌹 तुलसीदासजी को आशीर्वाद देते हनुमानजी 🌹 अशोक वाटिका उजाड़ते हुए हनुमानजी 🌹 श्रीराम दरबार में नमस्कार मुद्रा में बैठे हनुमानजी आदि।*

जिस घर में हनुमानजी का चित्र होता है वहां मंगल, शनि, पितृ और भूतादि का दोष नहीं रहता। हनुमानजी के भक्त हैं तो घर में हनुमानजी के चित्र कहां और किस प्रकार के लगाएं यह जानना जरूरी है। आओ आज हम आपको बताते हैं श्रीहनुमानजी के चित्र लगाने के कुछ नियम.

किस दिशा में लगाएं हनुमानजी का चित्र :
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वास्तु के अनुसार हनुमानजी का चित्र हमेशा दक्षिण दिशा की ओर देखते हुए लगाना चाहिए। यह चित्र बैठी मुद्रा में लाल रंग का होना चाहिए।

दक्षिण दिशा की ओर मुख करके हनुमानजी का चित्र इसलिए अधिक शुभ है क्योंकि हनुमानजी ने अपना प्रभाव सर्वाधिक इसी दिशा में दिखाया है। हनुमानजी का चित्र लगाने पर दक्षिण दिशा से आने वाली हर बुरी ताकत हनुमानजी का चित्र देखकर लौट जाती है। इससे घर में सुख और समृद्धि बढ़ती है।

*शयनकक्ष में न लगाएं हनुमान चित्र👉* शास्त्रों के अनुसार हनुमानजी बाल ब्रह्मचारी हैं और इसी वजह से उनका चित्र शयनकक्ष में न रखकर घर के मंदिर में या किसी अन्य पवित्र स्थान पर रखना शुभ रहता है। शयनकक्ष में रखना अशुभ है।

*भूत, प्रेत आदि से बचने हेतु👉* यदि आपको लगता है कि आपके घर पर नकारात्मक शक्तियों का असर है तो आप हनुमानजी का शक्ति प्रदर्शन की मुद्रा में चित्र लगाएं। आप चाहे तो पंचमुखी हनुमानजी का चित्र मुख्य द्वारा के ऊपर लगा सकते हैं या ऐसी जगह लगाएं जहां से यह सभी को नजर आए। ऐसा करने से घर में किसी भी तरह की बुरी शक्ति प्रवेश नहीं करेगी।

*पंचमुखी हनुमान👉* वास्तुविज्ञान के अनुसार पंचमुखी हनुमानजी की मूर्ति जिस घर में होती है वहां उन्नति के मार्ग में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं और धन संपत्ति में वृद्घि होती है।

*जलस्रोत दोष👉* यदि भवन में गलत दिशा में कोई भी जल स्रोत हो तो इस वास्तु दोष के कारण परिवार में शत्रु बाधा, बीमारी व मन मुटाव देखने को मिलता है। इस दोष को दूर करने के लिए उस भवन में ऐसे पंचमुखी6 हनुमान का चित्र लगाना चाहिए। जिनका मुख उस जल स्रोत की ओर देखते हुए दक्षिण पाश्चिम दिशा की तरफ हो।

*बैठक रूप में👉* बैठक रूम में आप श्रीराम दरबार का फोटो लगाएं, जहां हनुमानजी प्रभु श्रीरामजी के चरणों में बैठे हुए हैं। इसके अलावा बैठक रूम में पंचमुखी हनुमानजी का चित्र, पर्वत उठाते हुए हनुमानजी का चित्र या श्रीराम भजन करते हुए हनुमानजी का चित्र लगा सकते हैं। ध्यान रखें कि उपरोक्त में से कोई एक चित्र लगा सकते हैं।

*पर्वत उठाते हुए हनुमान का चित्र👉* यदि यह चित्र आपके घर में है तो आपमें साहस, बल, विश्‍वास और जिम्मेदारी का विकास होगा। आप किसी भी परिस्‍थिति से घबराएंगे नहीं। हर परिस्थिति आपके समक्ष आपको छोटी नजर आएगी और तुरंत ही उसका समाधान हो जाएगा।

*उड़ते हुए हनुमान👉* यदि यह चित्र आपके घर में है तो आपकी उन्नती, तरक्की और सफलता को कोई रोक नहीं सकता। आपमें आगे बढ़ने के प्रति उत्साह और साहस का संचार होगा। निरंतर आप सफलता के मार्ग पर बढ़ते जाएंगे
श्रीराम भजन करते हुए हनुमान : यदि यह चित्र आपके घर में है तो आपमें भक्ति और विश्‍वास का संचार होगा। यह भक्ति और विश्‍वास ही आपके जीवन की सफलता का आधार है।
*वेदमूर्ति डॉ अनिल पाण्डेय*
*🌹जय बजरंग बली🌹*

कैसे हुआ बालि और सुग्रीव का जन्म तथा कैसे पड़ा ऋष्यमूक पर्वत का नाम🌹〰🌹〰🌹〰🌹〰🌹〰🌹〰🌹〰🌹आज इस लेख में हम आपको दो पौराणिक घटनाओं...
28/04/2022

कैसे हुआ बालि और सुग्रीव का जन्म तथा कैसे पड़ा ऋष्यमूक पर्वत का नाम
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आज इस लेख में हम आपको दो पौराणिक घटनाओं के बारे में बताएंगे-

1🌹ऋष्यमूक पर्वत का नाम कैसे पड़ा?
2🌹बालि और सुग्रीव का जन्म कैसे हुआ?

1. ऋष्यमूक पर्वत का नाम कैसे पड़ा?-

ऋष्यमूक पर्वत श्रेणियों के अन्तर्गत एक पर्वत पर एक विशाल बानर रहता था, जिसका नाम ऋक्षराज था ।किसी ने उससे पूछा कि इस पर्वत का नाम ऋष्यमूक क्यों पड़ा?

तो उसने कहा कि रावण के द्वारा सताए हुए कई ऋषि एक साथ एक जगह मूक (मौन) होकर रावण का विरोध में यज्ञ कर रहे थे।

रावण जब विश्व विजय के लिए वहाँ से निकला, तो उसने एक साथ लाखों ऋषियों को एक जगह एकत्र देख कर पूछा कि इतने सारे महात्मा लोग यहाँ क्या कर रहे हैं? तो राक्षसों ने जबाव दिया — महाराज ! यह आपके द्वारा सताए हुए ऋषि मूक होकर आपके विरोध स्वरूप यहाँ इकठ्ठे होकर आंदोलन कर रहे हैं । रावण ने कहा कि इनकी इतनी हिम्मत? मार डालो इन सभी को। रावण की आज्ञा से राक्षसों ने उन सभी ऋषियों को मार डाला ।उन्हीं के अस्थि अवशेषों से यह पहाड़ बन गया, जिससे इसका नाम ऋष्यमूक पर्वत पड़ गया ।


*2. बालि और सुग्रीव का जन्म कैसे हुआ?*

वह ऋक्षराज नाम का बानर बड़ा ही शक्तिशाली था। अपने बल के घमंड में इधर उधर विचरण करता रहता था ।उस पर्वत के पास में एक बड़ा ही सुंदर तालाब था, लेकिन उस तालाब की यह विशेषता थी कि जो उसमें स्नान करता, वह एक अत्यंत सुंदर स्त्री बन जाता। ऋक्षराज को यह बात मालूम नहीं थी। मस्ती में एक दिन वह उस तालाब में कूद पड़ा और जैसे ही बाहर आया तो उसने देखा कि वह एक बहुत ही सुंदर षोडशी स्त्री के रूप में परिणित हो चुका है।

यह देख कर उसे बहुत शर्म महसूस हुई, परंतु वह क्या कर सकता था? इतने में देवराज इन्द्र की दृष्टि उस स्त्री पर पड़ी। देखते ही उनका तेज स्खलित हो गया। वह तेज उस स्त्री के बालों पर गिरा। उसी से बालि की उत्पत्ति हुई । थोड़ी देर बाद सूर्योदय होने पर सूर्य की दृष्टि भी उस सुन्दरी पर पड़ी, तो सूर्यदेव भी उसकी सुन्दरता पर मोहित हो गये। उनका तेज भी स्खलित हो गया, जो उस स्त्री की ग्रीवा पर पड़ा।उससे जिस पुत्र का जन्म हुआ उसका नाम सुग्रीव पड़ा। क्योंकि ग्रीवा पर तेज गिरा था, इसीलिए वे सुग्रीव कहलाए।

दोनों ही सगे भाई थे। बड़ा भाई बालि इन्द्र का पुत्र और छोटा भाई सूर्य का पुत्र सुग्रीव था। बालों पर तेज गिरने से बालि और ग्रीवा पर तेज गिरने से सुग्रीव नाम पड़ा। दोनों का पालन पोषण उसी ऋक्षराज बानर से बनी हुई स्त्री ने किया और उसी ऋष्यमूक पर्वत को अपना निवास बनाया।
9795956363
ॐ विंध्यवासिन्यै नमः
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ज्योतिष उस विद्या को कहते हैं जिसमें मनुष्य तथा पृथ्वी पर, ग्रहों और तारों के शुभ तथा अशुभ प्रभावों का अध्ययन किया ....

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Our Story

ज्योतिष्य गुरु बाबा आपके सम्पूर्ण समस्या निवारण का केन्द्र है । ये सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के स्वर्ण पदक विजेता Ph.D ज्योतिष के द्वारा संचालित है । मंत्र सिद्धि , तंत्र साधना , पूजन इत्यादि हमारी सेवाओं में सम्मिलित है । कृपया पधारें अथवा फोन पर संपर्क करें ।

Vedmurti Dr. Anil Pandey ji, fondly called “GURU JI” by his friends and followers, was born on 28thJUNE 1960 in Varanasi, Uttar Pradesh. He is a renowned spiritual guide, Vedic Scholar and also the founder of “Daivagya Jyotish, Ta**ra, Vastu & Ved Sansthan” , which aims towards the wellbeing of Mind, Body, and Spirit. He spent his early years in the holy city of Varanasi and completed education -“ACHASRYA IN JYOTISH” also Doctorate in “JYOTISH FALIT” also “ACHARYA IN TANTRA-AGAM” and “VED NAIRUKTA” from the prestigious “SAMPURNANAND SANSKRIT UNIVERSITY” VARANASI .

He is Gold midlist during his education period, earned 5 Gold Medals at that time.

Guru ji, also has done 20 years Sadhna at “KAMAKHYA DHAM” at Guwahati, Assam and still going on. At the tender age of 12, he embarked upon a journey into the spiritual world for higher consciousness under the guidance of “SWAMI KARPATRI JI MAHARAJ”. He attained the light of knowledge after going through extreme levels of ‘Sadhana’. Guru ji is an authority on “DAIVAGYA YOG” (GOD LANGUAGE) and derives his energy and seeks one on one spiritual connection with his followers through this Technique. His spiritual solutions to lead a peaceful life have provided ‘life directions’ to the numerous followers in India and abroad. He does not preach blind adherence to meaningless rituals, instead, due to his educational background, he provides ‘live examples’ and current analogies to the complicated “Daivagya & Vedic theories”.