Music of Durgesh

Music of Durgesh His approach to Pragya Geet honors the devotional tradition... Dr. Durgesh K. Dr. Durgesh has completed his MA in Clinical Psychology and D.Phil.
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Durgesh Upadhyay's singing style is a balanced blend of Indian classical rigor and folk warmth, marked by emotional depth, precise execution, and community orientation. Upadhyay is an Assistant Professor in the Department of Psychology, Mahatma Gandhi Kashi Vidyapith, Varanasi since 2018. Dr. Upadhyay is also the Assistant Dean of Faculty of Students’ Welfare and Visit ing Faculty at Centre for Women Studies, University of Lucknow, Lucknow. Prior to this, he has served Amity University Lucknow Campus for more than 7.5 years as an Assistant Professor. in Psychology in the area of Music Psychology from Department of Psychology, University of Allahabad, Allahabad. He is certified Music Therapist and Vocalist. Recipient of Srimati Radha Sairam Memorial Award for Creative Music Therapist - 2020, NADA Award of Excellence (NCMT, Chennai) and SEMPRE Conference Award (UK), Dr. Durgesh has represented India in several international conferences held in Spain, United Kingdom, Germany, USA and Sri Lanka. Dr. Durgesh has published a pioneer book in the area of Music Psychology titled ‘Psychosocial Dispositions of Creative Musicians.’ Also, he has published an edited volume on Youth, Mental Health, Well-being, and Development Issues. He has published more than a dozen research articles in journals of international repute indexed in Web of Science, SCOPUS and UGC notified journals. Dr. Durgesh is an active member of editorial and reviewer boards in several Web of Science, SCOPUS and UGC notified journals namely Psychology of Music, Frontiers in Psychiatry, HSSS, JIAAP, IJSSR, JHBDI, etc. He has developed ‘Music Preference Scale’ to measure music preferences of young adults. His areas of research interests are as follows: music education, music therapy, music preferences, creativity in music, music elicitation in qualitative research, health and well-being, music perception, perception of emotion, personality, Indian Psychology.

Shout out to my newest followers! Excited to have you onboard! Satyendra Singh, Shailesh Shukla, Vivek Tiwari, Ramashray...
06/03/2026

Shout out to my newest followers! Excited to have you onboard! Satyendra Singh, Shailesh Shukla, Vivek Tiwari, Ramashray Yadav, Abhimanyu Kumar, Mani Ram Yadav, Subham Kumar, Saumitra Gupta, चन्दन कुमार, Rajneeti Vishwakarma, विनोद पाण्डेय, Rajbali Yadav, Prabhat Dubey, Dileep Yadav, Sudarshan Roy Sudarshan Roy, Ashok Mishra, Raman Singh, Bharat Bhushan Bhojak, Sanjay Kumar, Sonu Verma, Rajababu Jha, Shakti Chandra Bharti, Mamta Singh, Naveen Tripathi, Mahi Yadav, Deependra Gohibar DK, Bijay Singh, Bajrangi Pandey, Anand Kumar, Santosh Rai, Ajay Singh, Jitendra Tripathi, Avineesh Bhatt, Ramesh P. Singh Rajput, Arvind Pathak, Adv Jitendra Pal, Sarita Devi, Shubhanshu Kushwaha, Aashu Kumar, Bibhuti Thakur, Sarjan Mishra, Amitesh Kumar, Vijay Kumar Raghuvanshi Raghuvanshi, Shivnath Dwivedi, पं.अतुल द्विवेदी मृदुल, Chanchal Kumar, Manoj Kumar, Manraj Tiwari, Santosh Singh, Laukesh Mishra

यह गीत श्री ओम प्रकाश तिवारी ‘व्यास’ (©®) द्वारा रचित एक सामाजिक चेतना से भरा भोजपुरी गीत है। इसमें बाल-विवाह के विरोध औ...
06/03/2026

यह गीत श्री ओम प्रकाश तिवारी ‘व्यास’ (©®) द्वारा रचित एक सामाजिक चेतना से भरा भोजपुरी गीत है। इसमें बाल-विवाह के विरोध और बेटियों की शिक्षा व संरक्षण के पक्ष में संदेश दिया गया है। कवि ने लोकभाषा और लोकजीवन के प्रतीकों के माध्यम से समाज को जागरूक करने का प्रयास किया है।

“मम्मी पापा दूनों के परत बानी पईयाँ लरिकईयां बाटे,
होई सगईया बूड़ी दुनो कुल के नईया लरिकईयां बाटे।”

इस पद में एक छोटी बच्ची अपने माता-पिता से विनती करती हुई दिखाई देती है। वह कहती है कि वह अभी बचपन की अवस्था में है, इसलिए उसके विवाह की बात करना उचित नहीं है। यदि इतनी छोटी उम्र में उसकी सगाई या विवाह कर दिया जाएगा, तो यह दोनों परिवारों (कुलों) के लिए भी कठिनाई का कारण बन सकता है। यहाँ कवि यह संकेत देता है कि बाल-विवाह केवल बच्चे के जीवन को ही नहीं, बल्कि पूरे परिवार के भविष्य को प्रभावित करता है।

“बेटी के पढ़ाईं औरू बेटी के बचाईं,
बेटा होलें राम बेटी होलीं सिया माई,
खेले खाये के अबहीं बाटे समईया लरिकईयां बाटे।”

इस पद में कवि समाज को प्रेरित करते हुए कहते हैं कि बेटियों को पढ़ाना और उनकी रक्षा करना आवश्यक है। वे बताते हैं कि जैसे बेटा राम के समान होता है, वैसे ही बेटी सीता माता के समान पूजनीय और आदरणीय होती है। इसलिए बेटियों के साथ भेदभाव नहीं करना चाहिए। अभी बच्ची की उम्र खेलने-कूदने और सीखने की है, न कि विवाह जैसी जिम्मेदारी उठाने की।

कवि बाल-विवाह के दुष्परिणामों को रूपक के माध्यम से बताते हैं। यदि कम उम्र में विवाह कर दिया जाए, तो बच्चा मानो बैल की तरह जल्दी काम में जोत दिया जाता है। इससे जीवन की गाड़ी बीच रास्ते में ही उलझ सकती है। कवि माता-पिता से आग्रह करते हैं कि वे जल्दबाज़ी में कोई ऐसा कदम न उठाएँ जिससे बच्ची का जीवन कष्ट और संघर्ष से भर जाए।

जीवन की तुलना पानी की धारा और पौधे से की गई है। कवि कहते हैं कि बच्ची के जीवन की धारा को गलत दिशा में मत मोड़िए। उसे फलने-फूलने और विकसित होने का अवसर दीजिए। यदि कम उम्र में विवाह कर दिया गया, तो उसका विकास रुक जाएगा। वह अभी इतनी छोटी है कि गृहस्थ जीवन की जिम्मेदारियाँ निभाने में सक्षम नहीं है।

अंतिम पद में कवि स्पष्ट रूप से बाल-विवाह की समस्या को सामने रखते हैं। वे कहते हैं कि इसका दर्द किसी न किसी पर अवश्य पड़ता है। समाज में कुछ लोग अभी भी इस कुप्रथा को बढ़ावा देते हैं, मानो वे अज्ञानता की आग में जल रहे हों। कवि ‘तिवारी’ यह संकल्प लेते हैं कि बाल-विवाह के विरुद्ध यह संघर्ष जारी रहेगा, क्योंकि यह बच्चों के अधिकारों और उनके उज्ज्वल भविष्य से जुड़ा प्रश्न है।

यह गीत समाज को यह संदेश देता है कि बेटियाँ भी उतनी ही मूल्यवान हैं जितने बेटे। उन्हें शिक्षा, सुरक्षा और स्वतंत्र रूप से विकसित होने का अवसर मिलना चाहिए। बाल-विवाह एक सामाजिक कुरीति है, जो बच्चों के जीवन और भविष्य को नष्ट कर सकती है। इसलिए समाज को जागरूक होकर इस प्रथा के विरुद्ध खड़ा होना चाहिए और बच्चों के अधिकारों की रक्षा करनी चाहिए।

#भोजपुरी #लोकगीत #लोकरस

यह गीत श्री ओम प्रकाश तिवारी ‘व्यास’ (©®) द्वारा रचित एक सामाजिक चेतना से भरा भोजपुरी गीत है। इसमें बाल-विवाह के विर.....

06/03/2026

यह गीत श्री ओम प्रकाश तिवारी ‘व्यास’ (©®) द्वारा रचित एक सामाजिक चेतना से भरा भोजपुरी गीत है। इसमें बाल-विवाह के विरोध और बेटियों की शिक्षा व संरक्षण के पक्ष में संदेश दिया गया है। कवि ने लोकभाषा और लोकजीवन के प्रतीकों के माध्यम से समाज को जागरूक करने का प्रयास किया है।

“मम्मी पापा दूनों के परत बानी पईयाँ लरिकईयां बाटे,
होई सगईया बूड़ी दुनो कुल के नईया लरिकईयां बाटे।”

इस पद में एक छोटी बच्ची अपने माता-पिता से विनती करती हुई दिखाई देती है। वह कहती है कि वह अभी बचपन की अवस्था में है, इसलिए उसके विवाह की बात करना उचित नहीं है। यदि इतनी छोटी उम्र में उसकी सगाई या विवाह कर दिया जाएगा, तो यह दोनों परिवारों (कुलों) के लिए भी कठिनाई का कारण बन सकता है। यहाँ कवि यह संकेत देता है कि बाल-विवाह केवल बच्चे के जीवन को ही नहीं, बल्कि पूरे परिवार के भविष्य को प्रभावित करता है।

“बेटी के पढ़ाईं औरू बेटी के बचाईं,
बेटा होलें राम बेटी होलीं सिया माई,
खेले खाये के अबहीं बाटे समईया लरिकईयां बाटे।”

इस पद में कवि समाज को प्रेरित करते हुए कहते हैं कि बेटियों को पढ़ाना और उनकी रक्षा करना आवश्यक है। वे बताते हैं कि जैसे बेटा राम के समान होता है, वैसे ही बेटी सीता माता के समान पूजनीय और आदरणीय होती है। इसलिए बेटियों के साथ भेदभाव नहीं करना चाहिए। अभी बच्ची की उम्र खेलने-कूदने और सीखने की है, न कि विवाह जैसी जिम्मेदारी उठाने की।

कवि बाल-विवाह के दुष्परिणामों को रूपक के माध्यम से बताते हैं। यदि कम उम्र में विवाह कर दिया जाए, तो बच्चा मानो बैल की तरह जल्दी काम में जोत दिया जाता है। इससे जीवन की गाड़ी बीच रास्ते में ही उलझ सकती है। कवि माता-पिता से आग्रह करते हैं कि वे जल्दबाज़ी में कोई ऐसा कदम न उठाएँ जिससे बच्ची का जीवन कष्ट और संघर्ष से भर जाए।

जीवन की तुलना पानी की धारा और पौधे से की गई है। कवि कहते हैं कि बच्ची के जीवन की धारा को गलत दिशा में मत मोड़िए। उसे फलने-फूलने और विकसित होने का अवसर दीजिए। यदि कम उम्र में विवाह कर दिया गया, तो उसका विकास रुक जाएगा। वह अभी इतनी छोटी है कि गृहस्थ जीवन की जिम्मेदारियाँ निभाने में सक्षम नहीं है।

अंतिम पद में कवि स्पष्ट रूप से बाल-विवाह की समस्या को सामने रखते हैं। वे कहते हैं कि इसका दर्द किसी न किसी पर अवश्य पड़ता है। समाज में कुछ लोग अभी भी इस कुप्रथा को बढ़ावा देते हैं, मानो वे अज्ञानता की आग में जल रहे हों। कवि ‘तिवारी’ यह संकल्प लेते हैं कि बाल-विवाह के विरुद्ध यह संघर्ष जारी रहेगा, क्योंकि यह बच्चों के अधिकारों और उनके उज्ज्वल भविष्य से जुड़ा प्रश्न है।

यह गीत समाज को यह संदेश देता है कि बेटियाँ भी उतनी ही मूल्यवान हैं जितने बेटे। उन्हें शिक्षा, सुरक्षा और स्वतंत्र रूप से विकसित होने का अवसर मिलना चाहिए। बाल-विवाह एक सामाजिक कुरीति है, जो बच्चों के जीवन और भविष्य को नष्ट कर सकती है। इसलिए समाज को जागरूक होकर इस प्रथा के विरुद्ध खड़ा होना चाहिए और बच्चों के अधिकारों की रक्षा करनी चाहिए।

#भोजपुरी #लोकगीत #लोकरस

सुनीं सभे...
05/03/2026

सुनीं सभे...

प्रस्तुत गीत जीवन-दर्शन पर आधारित एक गहरा #दार्शनिक #भोजपुरी गीत है। इसमें #जीवन की #अस्थिरता, #सुख- #दुख के #संतुलन और ....

05/03/2026

प्रस्तुत गीत जीवन-दर्शन पर आधारित एक गहरा #दार्शनिक #भोजपुरी गीत है। इसमें #जीवन की #अस्थिरता, #सुख- #दुख के #संतुलन और जीवन की #रहस्यमय #प्रकृति को बहुत सरल शब्दों में व्यक्त किया गया है।

“केतना केतना कहानी जिनिगिया के बा
देखीं गजबे रवानी जिनिगिया के बा”

जीवन अपने भीतर #असंख्य कहानियाँ समेटे हुए है। हर व्यक्ति की अपनी अलग #कहानी, #अनुभव और #संघर्ष होते हैं। साथ ही जीवन में एक #अद्भुत #प्रवाह (रवानी) भी है—समय लगातार आगे बढ़ता रहता है और जीवन भी उसी गति से चलता रहता है।

“फूल खुसियन के हाथे घड़ी दू घड़ी
आँख में ढेर पानी जिनिगिया के बा”

यहाँ जीवन के सुख और दुख के संतुलन को दर्शाया गया है। खुशी के फूल जीवन में थोड़ी देर के लिए आते हैं, लेकिन दु:ख और आँसू अक्सर अधिक समय तक साथ रहते हैं। यह जीवन का यथार्थ है कि सुख क्षणिक और दुख अपेक्षाकृत अधिक होते हैं।

“दूर धरती हकीकत के सउसे भईल
ख़्वाब सब आसमानी जिनगिया के बा”

इस पंक्ति में जीवन के #सपनों और #वास्तविकता के अंतर को बताया गया है। वास्तविकता ( #धरती) बहुत दूर लगती है और इंसान अक्सर #आसमान जैसे बड़े-बड़े सपने देखता है। जीवन में सपने बहुत ऊँचे होते हैं, लेकिन उन्हें #हासिल करना कठिन होता है।

“सांस पूछे बिना अनवरत बा चलत् s
बस एतने असानी जिनगिया के बा”

यहाँ जीवन की सरल परंतु गहरी #सच्चाई बताई गई है। हमारी #साँस बिना पूछे लगातार चलती रहती है—यही जीवन है। वास्तव में जीवन का अस्तित्व बहुत #साधारण है: जब तक साँस चलती है, जीवन चलता है।

“कब चली आ रुकी केहु जानेला ना
एतना गुण खानदानी जिनगिया के बा”

इस अंतरे में जीवन की #अनिश्चितता को बताया गया है। किसी को नहीं पता कि जीवन कब शुरू होगा और कब समाप्त हो जाएगा। यही जीवन की सबसे बड़ी #विशेषता (गुण) है कि यह रहस्यमय और अनिश्चित है।

यह गीत जीवन के तीन प्रमुख पक्षों को प्रस्तुत करता है:
जीवन एक कहानी है जिसमें अनेक अनुभव हैं। सुख और दुख दोनों जीवन का हिस्सा हैं। जीवन अनिश्चित और रहस्यमय है, इसलिए इसे समझना आसान नहीं है। कुल मिलाकर यह गीत जीवन की #गहराई, उसके #संघर्ष, #सपनों और #अस्थिरता को बहुत #सुंदर भोजपुरी भाषा में व्यक्त करता है।

©® आकृति विज्ञा 'अर्पण'

Music by Durgesh Upadhyay Music of Durgesh Durgesh K. Upadhyay #लोकगीत_सी_लड़की #लोकस्वर

Happy Holi 🫟💐💐
04/03/2026

Happy Holi 🫟💐💐

🚩 हर हर महादेव 🚩 Music of Durgesh Durgesh K. Upadhyay Music by Durgesh Upadhyay
02/03/2026

🚩 हर हर महादेव 🚩

Music of Durgesh Durgesh K. Upadhyay Music by Durgesh Upadhyay

01/03/2026

लागेला खेतवा में सोना फरल बा
फगुनवा में सरसो लहके गजब के

खेतिहर कहेलें सरसो बिकाई
घरौती कहेली तेल पेराई
जेके लागे लगन ऊ बुकुआ जोहत हे
फगुनवा......

जोखु कहत हैं अधिया दियाई
मलकिन कहेली घरवे पिटाई
सरसौंटा के आगि मोट रोटी जमत है
फगुनवा में सरसो लहके गजब के
फगुनवा......

®© आकृति विज्ञा 'अर्पण' #लोकगीत_सी_लड़की #लोकस्वर #होली #फगुआ Music of Durgesh आकृति विज्ञा 'अर्पण'

28/02/2026

पढ़ ललमुनिया तोरे पढ़ले घोर अन्हारे दीप जरी ।
बढ़ ललमुनिया तोरे बढ़ले एक दुनिया के डेग बढ़ी ।

हँस ललमुनिया तोरे हँसले तिमिर कलश में भोर भरी।
घोर अन्हारे दीप जरी....। एक दुनिया के डेग बढ़ी ।

©® आकृति विज्ञा 'अर्पण' आकृति विज्ञा 'अर्पण'
#लोकगीत_सी_लड़की #भोजपुरी

#लोकसाहित्य में स्त्री-स्वर की परंपरा मूलतः उस मौन इतिहास की अभिव्यक्ति है जिसे लिखित साहित्य ने लंबे समय तक स्थान नहीं दिया। घर, आँगन, खेत, नदी, पर्व-त्योहार और जीवन के #संस्कारों से जुड़े #लोकगीतों में स्त्री ने अपने सुख-दुःख, विरह, श्रम, दमन, प्रेम, स्वप्न और प्रतिरोध को स्वर दिया। “लोकगीत-सी लड़की” इसी परंपरा का आधुनिक विस्तार है, जहाँ #ललमुनिया केवल एक बेटी नहीं बल्कि उस सामूहिक स्त्री-चेतना का प्रतीक बन जाती है जो पीढ़ियों से गाती रही है। जैसे #कजरी, #सोहर, #विदाई- #गीत, #जँतसार या #कुम्हरौटी में स्त्री अपने जीवन की अस्मिता को व्यक्त करती है, वैसे ही यहाँ उसकी #शिक्षा और आगे बढ़ना पूरे समाज के उजाले से जुड़ जाता है। इस प्रकार यह कविता #लोकस्वर को करुणा से निकालकर चेतना और परिवर्तन के स्वर में रूपांतरित करती है।

लोकसाहित्य में स्त्री-स्वर का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह रहा है कि वह प्रत्यक्ष विद्रोह नहीं करता, बल्कि प्रतीकों, रूपकों और सांकेतिक भाषा में अपनी बात कहता है। नदी, चिड़िया, दीप, भोर जैसे बिंब लोकगीतों में बार-बार आते हैं और स्त्री के जीवन से गहरे जुड़े होते हैं। इस कविता में भी यही परंपरा दिखाई देती है, किन्तु अंतर यह है कि यहाँ ये प्रतीक केवल सहनशीलता या त्याग के नहीं, बल्कि सृजन, ज्ञान और सामाजिक प्रगति के प्रतीक बनते हैं। “दबा गईल बोली” और “तरुणाई बुढ़ा गईल” जैसी पंक्तियाँ लोकगीतों में व्यक्त उस सामूहिक पीड़ा की याद दिलाती हैं जहाँ स्त्री का जीवन परिवार और व्यवस्था के बोझ तले समय से पहले ही थक जाता था। नई ललमुनिया का पढ़ना उस ऐतिहासिक मौन को तोड़ने जैसा है—यह लोक परंपरा के भीतर से ही उभरता हुआ परिवर्तन है।
भारतीय लोकसाहित्य में स्त्री का स्वर सदैव सामुदायिक रहा है; वह केवल अपने लिए नहीं गाती, बल्कि पूरे समाज के अनुभव को वहन करती है। सोहर में पुत्र जन्म का उल्लास हो या #बिदेसिया में पति-विरह का दुःख—इन सबमें स्त्री का व्यक्तिगत अनुभव सामूहिक अनुभव बन जाता है। इसी प्रकार इस कविता में लड़की का विकास “एक दुनिया के डेग बढ़ी” के रूप में सामने आता है, जो लोक परंपरा की उसी सामूहिक चेतना को आगे बढ़ाता है। यह #लोकनारीवाद का स्वर है, जिसमें स्त्री का सशक्तिकरण परिवार और समाज से अलग होकर नहीं, बल्कि उन्हें रूपांतरित करते हुए होता है।

लोकगीतों में स्त्री अक्सर स्मृति और परंपरा की वाहक होती है; वह पीढ़ियों को जोड़ती है। “आपन #सपना खुदे भुलवलस” वाली पंक्ति उन स्त्रियों की ओर संकेत करती है जिन्होंने अपने सपनों का विसर्जन कर दिया था, और नई पीढ़ी की शिक्षित लड़की उनकी आँखों में फिर से प्रकाश भरती है। यह लोकसाहित्य की उस जीवंत परंपरा को दर्शाता है जहाँ गीत केवल वर्तमान की अभिव्यक्ति नहीं होते, बल्कि अतीत की पीड़ा और भविष्य की आशा को भी साथ लेकर चलते हैं।

इस दृष्टि से यह कविता लोकसाहित्य में स्त्री-स्वर की परंपरा का आधुनिक रूप है—जहाँ करुणा चेतना में बदलती है, मौन भाषा बनता है, और सीमित आँगन से निकलकर स्त्री सभ्यता की निर्माता के रूप में सामने आती है। यह #लोकधर्मी संवेदना को बनाए रखते हुए नारी-अस्मिता, शिक्षा और सामाजिक परिवर्तन का नया आख्यान रचती है। यदि पारंपरिक लोकगीत स्त्री के अनुभव का भावात्मक दस्तावेज थे, तो यह कविता उसी परंपरा में स्त्री के आत्मविश्वास और ऐतिहासिक पुनर्जागरण का घोष बनकर उभरती है।

26/02/2026

आई गइलें फगुनवां फेर मितवा हो धूम मचल बा गलियन में...

©® श्री जितेंद्र नाथ सिंह ' जीत '

#होरी #फाग #भोजपुरी

25/02/2026

बीच आँगन फाग खेलें गोरी बीच आँगन...

©® प्रो. राम नारायण तिवारी
#भोजपुरी #होरी

23/02/2026

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Varanasi
221010

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