Shree Madan Gopal Ayurvedic Aushdhalaya

Shree Madan Gopal Ayurvedic Aushdhalaya आयुर्वेद से जुड़ी नित नई जानकारी प्रा?

31/10/2025

जय आयुर्वेद जय धन्वंतरि
आज हम च्यवनप्राश के निर्माण में प्रयुक्त होने वाली विभिन्न जड़ी बूटियां का पिछले कुछ दिनों से अध्ययन कर रहे हैं एवं जानकारी प्राप्त कर रहे हैं इसी कड़ी में आज हम जिस औषधि के बारे में जानकारी ले रहे हैं यह एक बहुमूल्य औषधि है जिसका बहुत ही मुख्य प्रयोग या कह सकते हैं की बहुत ही मुख्य इसका उपयोग च्यवनप्राश के निर्माण में किया जाता रहा है बिना इसके उपयोग के चवनप्राश का निर्माण सार्थक नहीं माना जाता है इसलिए इसकी उपस्थित अनिवार्य मानी गई है तो आज हम जिस औषधि के बारे में जानेंगे उसका नाम है
हरड़ इसके बारे में आयुर्वेद के कुछ जानकारी यह बताते हैं की कुछ ग्रन्थ में यह तक वर्णन मिलता है कि अगर किसी बालक के पास माता ना हो और उसको पास हरण हो तो भी यह जीवन की नैया को पार कर जाता है क्योंकि हरण हमारे उधर रोगों के लगभग सभी व्याधियों में कारगर है और यह शरीर को शोध कर आयु को चिरायु बनता है इसलिए कहा जाता है कि बालक के पास माता हो या न हो लेकिन हरण होना अति आवश्यक है इसके उपरांत हम शास्त्रोक्त विधि द्वारा च्यवनप्राश का निर्माण देखेंगे जिस्म की केसर स्वर्ण वर्क रजत वर्ग शुद्ध वंशलोचन शुद्ध दालचीनी शुद्ध पीपल का प्रयोग करके जिसका निर्माण किया जाएगा
(12)हरड़
हरीतकी (Haritaki or Kadukka podi) त्रिफला के तीन फलों में एक होता है। आयुर्वेद में हरीतकी औषधि के लिए बहुत इस्तेमाल किया जाता है। हरीतकी न सिर्फ औषधि के लिए नहीं बल्कि सेहत और सौन्दर्य के लिए भी बहुत लाभकारी होता है। हरीतकी का फल,जड़ और छाल सबका उपयोग किया जाता है। चलिये हरीतकी के फायदों और गुणों ( Harad ke benefits) के बारे में विस्तार से जानते हैं।
हरीतकी को हरड़ भी कहते हैं। निघण्टुओं में सात प्रकार की हरीतकी का वर्णन मिलता है। स्वरूप के आधार पर इसकी सात जातियाँ हैं-1. विजया, 2. रोहिणी, 3. पूतना, 4. अमृता, 5. अभया, 6. जीवन्ती तथा 7. चेतकी लेकिन वर्तमान में यह तीन प्रकार की ही मिलती है। जिसको लोग अवस्था भेद से एक ही वृक्ष के फल मानते हैं। वैसे तो हरीतकी सभी जगह मिल जाता है। शायद आपको पता नहीं कि हरड़ बहुत तरह के गुणों वाला औषधीय वृक्ष होता है। हरड़ 24-30 मी तक ऊँचा, मध्यम आकार का, शाखाओं वाला पेड़ होता है। इसके पत्ते सरल, चमकदार, अण्डाकार और भाला के आकार होते हैं। इसके फल अण्डाकार अथवा गोलाकार, 1.8-3.0 सेमी व्यास या डाइमीटर के और पके हुए अवस्था में पीले से नारंगी-भूरे रंग के होते हैं। फलों के पीछले भाग पर पांच रेखाएं पाई जाती हैं।

जो फल कच्ची अवस्था में गुठली पड़ने से पहले तोड़ लिए जाते हैं, वही छोटी हरड़ के नाम से जानी जाती है। इनका रंग स्याह पीला होता है। जो फल आधे पके अवस्था में तोड़ लिए जाते हैं, उनका रंग पीला होता है। पूरे पके अवस्था में इसके फल को बड़ी हरड़ कहते हैं। प्रत्येक फल में एक बीज होता है। फरवरी-मार्च में पत्तियां झड़ जाती हैं। अप्रैल-मई में नए पल्लवों के साथ फूल लगते हैं तथा फल शीतकाल में लगते हैं। पक्व जनवरी से अप्रैल महीने में पके फल मिलते हैं। इसके बीज कठोर, पीले रंग के, बड़े आकार के, हड्डियों के समान और कोणीय आकार के होते हैं।

हरीतकी मधुर और कड़वा होने से पित्त; कड़वा व कषाय होने से कफ तथा अम्ल, मधुर होने से वात दोष को नियंत्रित करने में मदद करती है। इस प्रकार देखा जाय तो यह तीनों दोषो को कम करने में सहायता करती है। यह रूखी, गर्म, भूख बढ़ाने वाली, बुद्धि को बढ़ाने वाली, नेत्रों के लिए लाभकारी, आयु बढ़ाने वाली, शरीर को बल देने वाली तथा वात दोष को हरने वाली है।
यह कफ, मधुमेह, बवासीर (अर्श), कुष्ठ, सूजन, पेट का रोग, कृमिरोग, स्वरभंग, ग्रहणी(Irritable bowel syndrome), विबंध (कब्ज़), आध्मान (Flatulance), व्रण(अल्सर या घाव), थकान, हिचकी, गले और हृदय के रोग, कामला (पीलिया), शूल (दर्द), प्लीहा व यकृत् के रोग, पथरी, मूत्रकृच्छ्र और मूत्रघातादि (मूत्र संबंधी) रोगों को दूर करने में मदद करती है।
हरड़ का फल अल्सर के लिए हितकारी और प्रकृति से गर्म होती है। हरीतकी का फल सूजन, कुष्ठ, अम्ल या एसिडिटी तथा आंखों के लिए लाभकारी होती है। हरड़ में पांचों रस हैं लेकिन तब भी सेहत के लिए गुणकारी होती है। इसलिए एक ही हरीतकी को विभिन्न तरह के रोगों के लिए प्रयोग किया जाता है।
आयुर्वेद में हरड़ या हरीतकी का बहुत महत्व है। छोटे से हरड़ में सेहत के बहुत फायदे बंद होते हैं। चलिये जानते हैं कि हरीतकी या हरड़ कितने रोगों में फायदेमंद है।

हरड़ का सेवन करने का तरीका हर रोगों के लिए अलग-अलग होता है। हरड़ को उबालकर खाने से दस्त होना बंद होता है तो भूनकर खाने से त्रिदोषहर, भोजन के साथ हरड़ खाने से बुद्धि बढ़ती है, भोजन के बाद सेवन करने से खाने से जो पेट संबंधी समस्याएं होती है उससे राहत मिलती है।
श्रेष्ठ हरीतकी के लक्षण-जो हरीतकी नई, मधुर, पुष्ट, गोल, भारी, जल में डूबने वाली लाल रंग की, तोड़ने में गुड़ के समान टूटने वाली, थोड़ी-सी कड़वी, अधिक रस वाली, मोटी छाल वाली, स्वयं पक कर गिरने वाली तथा लगभग 22-25 ग्राम (2 कर्ष) वजन की होती है, वह हरीतकी ही श्रेष्ठ मानी जाती है।

अप्रशस्त हरीतकी-जो हरीतकी कीड़ों के द्वारा खाई हुई, आग से जली हुई, पानी या कीचड़ में पड़ी हुई, ऊसर भूमि या बंजर भूमि में पैदा होती है। यह हरीतकी फटी हुई होती है। अप्रशस्त हरीतकी का सेवन या इस्तेमाल नहीं करनी चाहिए।
आजकल के तनावभरी जिंदगी में सिरदर्द आम बीमारी हो गई है। हरड़ की गुठली को पानी के साथ पीस कर सिर में लेप लगाने से आधा सिर दर्द से छुटकारा दिलाने में फायदेमंद होता है।
शायद आपको पता नहीं कि रूसी होने के कारण भी बाल झड़ते हैं। हरड़ को इस तरह से प्रयोग करने पर रूसी आना रोक सकते हैं। आम बीज चूर्ण और छोटी हरीतकी चूर्ण को समान मात्रा में लेकर दूध में पीसकर सिर पर लगाने से रूसी कम हो जाती है
अक्सर दिन भर कंप्यूटर पर काम करने से आँखों में जलन और दर्द जैसी समस्याएं होने लगती है। रोज हरड़ का इस तरह से इस्तेमाल करने पर आँखों को आराम मिलता है। हरड़ को रातभर पानी में भिगोकर सुबह पानी को छानकर आँखें धोने से आंखों को शीतलता मिलती है तथा आँख संबंधी बीमारियों से राहत मिलती है।
उम्र बढ़ने के साथ मोतियाबिंद की समस्या से सब परेशान होते हैं। हरड़ का इस्तेमाल इस तरह से करने पर मोतियाबिंद के परेशानी से आराम मिलता है।

हरड़ की मींगी को पानी में 3 पहर तक भिगोकर, घिसकर लगाने से मोतियाबिन्द में लाभ होता है।
हरड़ की छाल को पीसकर लगाने से आँखों से पानी का बहना बन्द होता है।
सभी प्रकार के रोगों में हरीतकी को घी में भूनकर आँखों के चारों ओर बाहर के भाग में लेप लगाया जाता है।
भोजन करने के पहले प्रतिदिन 3 ग्राम हरीतकी चूर्ण तथा 3 ग्राम मुनक्का पेस्ट को मिश्री, चीनी या मधु मिलाकर खाने से मोतियाबिंद में लाभ होता है
मौसम बदला की नहीं जुकाम से सबको परेशानी होने लगती है। हरीतकी जुकाम में बहुत लाभकारी होती है। प्रतिश्याय या जुकाम में हरीतकी का प्रयोग करने से सिरदर्द की परेशानी से आराम मिलता है।
मुँह और गले के रोगों में हरीतकी बहुत ही फायदेमंद होती है। हरीतकी का काढ़ा या चूर्ण मुँह के बीमारी में आराम मिलता है।

20-40 मिली हरीतकी के काढ़े में 3 से 12 मिली मधु मिलाकर पिलाने से गले के दर्द में आराम मिलता है।
हरीतकी के चूर्ण का मंजन करने से दांत साफ और निरोग हो जाते हैं।
10 ग्राम हरड़ को आधा ली पानी में उबालकर चतुर्थांश काढ़े में थोड़ी सी फिटकरी घोलकर गरारा करने से जल्दी ही मुँह और गले से होनी वाली ब्लीडिंग बंद हो जाती है
अगर लंबे समय से कफ से परेशान हैं तो हरीतकी का इस तरह से इस्तेमाल कर सकते हैं-

कफ को निकालने में हरड़ का चूर्ण बहुत अच्छा है। इस कारण हरड़ चूर्ण को 2-5 ग्राम की मात्रा में रोज सेवन करना चाहिए।
हरड़, अडूसा की पत्ती, मुनक्का, छोटी इलायची, इन सबसे बने 10-30 मिली काढ़े में मधु और चीनी मिलाकर दिन में तीन बार पीने से सांस फूलना, खांसी और रक्तपित्त रोग (नाक और कान से खून बहना) में लाभ होता है।
हरड़ और सोंठ को समान भाग लेकर चूर्ण बनाएं, इसे गुनगुने जल के साथ 2-5 ग्राम की मात्रा में सुबह शाम सेवन करने से खांसी, सांस फूलना और कामला (पीलिया) में लाभ होता है।
कभी-कभी लंबे बीमारी के कारण खाने की इच्छा कम हो जाती है। इस अवस्था में हरीतकी का सेवन करने से लाभ मिलता है।

2 ग्राम हरड़ तथा 1 ग्राम सोंठ को गुड़ अथवा 250 मिग्रा सेंधानमक के साथ मिलाकर सेवन करने से भूख बढ़ती है।
हरड़ का मुरब्बा खाने की इच्छा बढ़ाती है।
हरड़, सोंठ तथा सेंधानमक के 2-5 ग्राम चूर्ण को ठंडे जल के साथ सेवन करें, परन्तु दोपहर और शाम भोजन थोड़ी मात्रा में खाएं।
हरड़, पिप्पली तथा चित्रक को समान मात्रा में लेकर मिश्रण बना लें। 1 से 2 ग्राम की मात्रा में जल के साथ सेवन करने से खाने की इच्छा बढ़ने लगती है
जिस रोगी को अतिसार हो अथवा थोड़ा-थोड़ा, रुक-रुक कर दर्द के साथ मल निकलता हो उसे बड़ी हरड़ तथा पिप्पली के 2-5 ग्राम चूर्ण को सुहाते (गुनगुने) गर्म जल के साथ सेवन करने से लाभ मिलता है।
अगर लंबे समय से कब्ज से परेशान हैं तो हरीतकी का सेवन इस तरह से करने पर राहत मिलती है।

–हरड़, सनाय और गुलाब के गुलकन्द की गोलियां बनाकर खाने से कब्ज की परेशानी कम होती है।

-हरड़ और साढे तीन ग्राम दालचीनी या लौंग को 100 मिली जल में 10 मिनट तक उबालकर, छानकर सुबह पिलाने से विरेचन (पेट साफ) हो जाता है।
आजकल के भागदौड़ भरी जिंदगी में सबसे ज्यादा खान-पान पर ही असर पड़ता है। पीलिया में हरीतकी उपचारस्वरुप काम करती है।लौह भस्म, हरड़ तथा हल्दी इनको समान मात्रा में मिलाकर 500 मिग्रा से 1 ग्राम मात्रा में लेकर घी एवं मधु से अथवा केवल 1 ग्राम हरड़ को गुड़ और मधु के साथ मिलाकर दिन में दो से तीन बार सेवन करने से कामला में लाभ होता है
मूत्र संबंधी बहुत तरह की समस्याएं होती है जैसी देर से पेशाब आना या रूक-रूक कर आना, कम मात्रा में पेशाब होना, पेशाब करते वक्त जलन या दर्द होना आदि। इन सब समस्याओं में हरीतकी बहुत काम आती है। हरीतकी, गोखरू, धान्यक, यवासा तथा पाषाण-भेद को समान मात्रा में लेकर 500 मिली जल में उबालें, 250 मिली रहने पर उतार लें। अब इस काढ़े में मधु मिलाकर सुबह, दोपहर तथा शाम 10-30 मिली मात्रा में सेवन करने से मूत्र त्याग में कठिनाई, मूत्र मार्ग की जलन आदि रोगों में लाभ होता है।
हाइड्रोसील की परेशानी में हरीतकी बहुत गुणकारी होती है। 5 ग्राम हरड़ तथा 1 ग्राम बनाएं को 50 मिली एरंड तेल और 50 मिली गोमूत्र में पकायें।जब सिर्फ तेल शेष रह जाय तो छानकर, गुनगुने गर्म जल के साथ सुबह शाम थोड़ी-थोड़ी मात्रा में लेने से हाइड्रोसील कम होने में मदद मिलती है।
कुष्ठ रोग के परेशानी को कम करने के लिए हरीतकी का इस्तेमाल ऐसे करना चाहिए।

-20-50 मिली गोमूत्र को 3-6 ग्राम हरड़ चूर्ण के साथ सुबह शाम सेवन करने से फायदा मिलता है।

-हरड़, गुड़, तिल तैल, मिर्च, सोंठ तथा पीपल को समान मात्रा में पीसकर 2-4 ग्राम की मात्रा में लेकर एक महीने तक सुबह शाम सेवन करने से कुष्ठ रोग में लाभ होता है।
अगर किसी बीमारी के कारण या कमजोरी के वजह से बेहोशी महसूस हो रही है तो हरीतकी का ऐसे सेवन करें। हरड़ के काढ़ा से पके हुए घी का सेवन करने से मद और बेहोशी मिटती है।
अगर मौसम के बदलने के वजह से बार-बार बुखार आता है तो हरीतकी का प्रयोग उपचारस्वरुप ऐसे कर सकते हैं-

3-6 ग्राम हरीतकी चूर्ण में 1 मिली तिल तेल, 1 ग्राम घी तथा 2 ग्राम मधु मिलाकर सेवन करने से जलन, बुखार,खाँसी, नाक और कान से खून बहना, सांस फूलना तथा उल्टी आदि के परेशानी से राहत मिलती है।
25 मिली मुनक्के के काढ़े में 3 ग्राम हरीतकी चूर्ण मिलाकर सुबह शाम पीने से बुखार से राहत मिलती है।
3 से 6 ग्राम हरीतकी चूर्ण का सेवन करने से बुखार के लक्षणों से राहत मिलती है।
5 ग्राम षट्पल घी को 10-30 मिली हरीतकी काढ़े के साथ सेवन करने से मलेरिया रोग में लाभ होता है
हरीतकी का गुण रक्तपित्त से राहत दिलाने में बहुत लाभप्रद साबित होता है।

3-6 ग्राम हरीतकी चूर्ण को वासा का रस, समान भाग पिप्पली का चूर्ण तथा द्विगुण मधु में मिलाकर सेवन करने से रक्तपित्त में लाभ होता है।
3-6 ग्राम हरीतकी चूर्ण में शहद मिलाकर सेवन करने से रक्तपित्त, मलेरिया तथा दर्द से मुक्ति मिलती है।
3-6 ग्राम हरीतकी चूर्ण को समान भाग किशमिश के साथ सुबह शाम सेवन करने से रक्तपित्त, खुजली, पुराना बुखार आदि से राहत मिलने में मदद मिलती है
अगर किसी बीमारी के लक्षण स्वरुप हाथ और पैरों में सूजन आ गई है तो हरीतकी का सेवन निम्नलिखित प्रकार से करने पर फायदा मिलता है-

सूजन से पीड़ित व्यक्ति को यदि सख्त मलत्याग हो रहा हो तो हरीतकी चूर्ण में समान मात्रा में गुड़ मिलाकर (प्रत्येक 2-2 ग्राम) खाना चाहिए।
गोमूत्र के साथ केवल हरीतकी चूर्ण (Kadukka podi) का सेवन करने से भी सूजन कम होती है।
2-4 ग्राम कंसहरीतकी का सुबह शाम सेवन करने से सूजन तथा दर्द से राहत मिलती है।
हरीतकी, सोंठ तथा देवदारु चूर्ण को समान मात्रा में लेकर या त्रिसमा गुटिका (हरीतकी, सोंठ, गुड़ समभाग) को गुनगुने गर्म पानी के साथ सेवन करने से शोथ (सूजन) दूर होती है।
हरीतकी चूर्ण (2-5 ग्राम) में गुड़ मिलाकर सेवन करने से सूजन में लाभ होता है।
हरड़, सोंठ और हल्दी को समान मात्रा में लेकर काढ़ा बनाकर 10-30 मिली की मात्रा में सुबह-शाम पीने से बुखार के बाद जो सूजन की परेशानी होती है उसमें फायदा पहुँचता है
किसी भी औषधि को प्रयोग करने से पहले वैद्यों से सलाह जरूर लें
आयुर्वेदिक फार्मासिस्ट रजिस्टर्ड
निखिल कुमार

30/10/2025

जय धन्वंतरि जय आयुर्वेद आज हम आयुर्वेद के खजाने से जिस बहुमूल्य जड़ी के बारे में जानकारी लेंगे इसका प्रयोग चवनप्राश के निर्माण में विशेष रूप से किया जाता है इस औषधि का प्रयोग अन्य कई बीमारियों में भी किया जाता है वर्तमान में हम सभी च्यवनप्राश के निर्माण में प्रयोग होने वाली औषधियां के बारे में जानकारी प्राप्त कर रहे हैं इसी कड़ी में इस औषधि के बारे में हम जानकारी लेंगे उसके उपरांत सभी कास्ट औषधीय की जानकारी पूर्ण होने के उपरांत हम शास्त्रोक्त विधि द्वारा च्यवनप्राश का निर्माण भी देखेंगे जिसमें अष्ट वर्ग केसर स्वर्ण वर्क रजत वर्क और शुद्ध देसी गाय के घी के प्रयोग से जिसका निर्माण किया जाएगा
(11) गिलोय
गिलोय एक प्रकार की बेल है जो आमतौर पर जगंलों-झाड़ियों में पाई जाती है। प्राचीन काल से ही गिलोय को एक आयुर्वेदिक औषधि के रुप में इस्तेमाल किया जाता रहा है। गिलोय के फायदों (Giloy ke fayde) को देखते हुए ही हाल के कुछ सालों से अब लोगों में इसके प्रति जागरुकता बढ़ी है और अब लोग गिलोय की बेल अपने घरों में लगाने लगे हैं। हालांकि अभी भी अधिकांश लोग गिलोय की पहचान ठीक से नहीं कर पाते हैं। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि गिलोय की पहचान करना बहुत आसान है। इसकी पत्तियों का आकार पान के पत्तों के जैसा होता है और इनका रंग गाढ़ा हरा होता है। आप गिलोय को सजावटी पौधे के रुप में भी अपने घरों में लगा सकते हैं।

गिलोय को गुडूची (Guduchi), अमृता आदि नामों से भी जाना जाता है। आयुर्वेद के अनुसार गिलोय की बेल जिस पेड़ पर चढ़ती है उसके गुणों को भी अपने अंदर समाहित कर लेती है, इसलिए नीम के पेड़ पर चढ़ी गिलोय की बेल को औषधि के लिहाज से सर्वोत्तम माना जाता है। इसे नीम गिलोय के नाम से जाना जाता है।
गिलोय में गिलोइन नामक ग्लूकोसाइड और टीनोस्पोरिन, पामेरिन एवं टीनोस्पोरिक एसिड पाया जाता है। इसके अलावा गिलोय में कॉपर, आयरन, फॉस्फोरस, जिंक,कैल्शियम और मैगनीज भी प्रचुर मात्रा में मिलते हैं।
आयुर्वेद के अनुसार गिलोय की पत्तियां, जड़ें और तना तीनो ही भाग सेहत के लिए बहुत गुणकारी हैं लेकिन बीमारियों के इलाज में सबसे ज्यादा उपयोग गिलोय के तने या डंठल का ही होता है। गिलोय में बहुत अधिक मात्रा में एंटीऑक्सीडेंट पाए जाते हैं साथ ही इसमें एंटी-इंफ्लेमेटरी और कैंसर रोधी गुण होते हैं। इन्हीं गुणों की वजह से यह बुखार, पीलिया, गठिया, डायबिटीज, कब्ज़, एसिडिटी, अपच, मूत्र संबंधी रोगों आदि से आराम दिलाती है। बहुत कम औषधियां ऐसी होती हैं जो वात, पित्त और कफ तीनो को नियंत्रित करती हैं, गिलोय उनमें से एक है। गिलोय का मुख्य प्रभाव टॉक्सिन (विषैले हानिकारक पदार्थ) पर पड़ता है और यह हानिकारक टॉक्सिन से जुड़े रोगों को ठीक करने में असरदार भूमिका निभाती है।
गिलोय डायबिटीज, कब्ज़ और पीलिया समेत कई गंभीर बीमारियों के इलाज में उपयोगी है। गिलोय या गुडूची (Guduchi) के गुणों के कारण ही आयुर्वेद में इसका नाम अमृता रखा गया है जिसका मतलब है कि यह औषधि बिल्कुल अमृत समान है। आयुर्वेद के अनुसार पाचन संबंधी रोगों के अलावा गिलोय सांस संबंधी रोगों जैसे कि अस्थमा और खांसी से भी आराम दिलाने में काफी फायदेमंद है। इस लेख में हम आपको गिलोय के फायदों (Giloy ke fayde) के बारे में विस्तार से बता रहे हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार गिलोय हाइपोग्लाईसेमिक एजेंट की तरह काम करती है और टाइप-2 डायबिटीज को नियंत्रित रखने में असरदार भूमिका निभाती है। गिलोय जूस (giloy juice) ब्लड शुगर के बढे स्तर को कम करती है, इन्सुलिन का स्राव बढ़ाती है और इन्सुलिन रेजिस्टेंस को कम करती है। इस तरह यह डायबिटीज के मरीजों के लिए बहुत उपयोगी औषधि है।

खुराक और सेवन का तरीका : डायबिटीज के लिए आप दो तरह से गिलोय (Giloy in hindi) का सेवन कर सकते हैं।

गिलोय जूस : दो से तीन चम्मच गिलोय जूस (10-15ml) को एक कप पानी में मिलाकर सुबह खाली पेट इसका सेवन करें।

गिलोय चूर्ण : आधा चम्मच गिलोय चूर्ण को पानी के साथ दिन में दो बार खाना खाने के एक से डेढ़ घंटे बाद लें।
डेंगू से बचने के घरेलू उपाय के रुप में गिलोय का सेवन करना सबसे ज्यादा प्रचलित है। डेंगू के दौरान मरीज को तेज बुखार होने लगते हैं। गिलोय में मौजूद एंटीपायरेटिक गुण बुखार को जल्दी ठीक करते हैं साथ ही यह इम्युनिटी बूस्टर की तरह काम करती है जिससे डेंगू से जल्दी आराम मिलता है।

खुराक और सेवन का तरीका : डेंगू होने पर दो से तीन चम्मच गिलोय जूस (Giloy juice) को एक कप पानी में मिलाकर दिन में दो बार खाना खाने से एक-डेढ़ घंटे पहले लें। इससे डेंगू से जल्दी आराम मिलता है।
अगर आप पाचन संबंधी समस्याओं जैसे कि कब्ज़, एसिडिटी या अपच से परेशान रहते हैं तो गिलोय आपके लिए बहुत फायदेमंद साबित हो सकती है। गिलोय का काढ़ा, पेट की कई बीमारियों को दूर रखता है। इसलिए कब्ज़ और अपच से छुटकारा पाने के लिए गिलोय का रोजाना सेवन करें।

खुराक और सेवन का तरीका : आधा से एक चम्मच गिलोय चूर्ण को गर्म पानी के साथ रात में सोने से पहले लें। इसके नियमित सेवन से कब्ज़, अपच और एसिडिटी आदि पेट से जुड़ी समस्याओं से जल्दी आराम मिलता है।
अगर कई दिनों से आपकी खांसी ठीक नहीं हो रही है तो गिलोय का सेवन करना फायदेमंद हो सकता है। गिलोय में एंटीएलर्जिक गुण होने के कारण यह खांसी से जल्दी आराम दिलाती है। खांसी दूर करने के लिए गिलोय के काढ़े का सेवन करें।

खुराक और सेवन का तरीका : खांसी से आराम पाने के लिए गिलोय का काढ़ा बनाकर शहद के साथ उसका सेवन करें। इसे दिन में दो बार खाने के बाद लेना ज्यादा फायदेमंद रहता है।
गिलोय या गुडूची (Guduchi) में ऐसे एंटीपायरेटिक गुण होते हैं जो पुराने से पुराने बुखार को भी ठीक कर देती है। इसी वजह से मलेरिया, डेंगू और स्वाइन फ्लू जैसे गंभीर रोगों में होने वाले बुखार से आराम दिलाने के लिए गिलोय के सेवन की सलाह दी जाती है।

खुराक और सेवन का तरीका : बुखार से आराम पाने के लिए गिलोय घनवटी (1-2 टैबलेट) पानी के साथ दिन में दो बार खाने के बाद लें।
बीमारियों को दूर करने के अलावा शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाना भी गिलोय के फायदे में शामिल है। गिलोय सत्व या गिलोय जूस (Giloy juice) का नियमित सेवन शरीर की इम्युनिटी पॉवर को बढ़ता है जिससे सर्दी-जुकाम समेत कई तरह की संक्रामक बीमारियों से बचाव होता है।

खुराक और सेवन का तरीका : गिलोय इम्युनिटी बूस्टर की तरह काम करती है। इम्युनिटी बढ़ाने के लिए दिन में दो बार दो से तीन चम्मच (10-15ml) गिलोय जूस का सेवन करें।
पीलिया के मरीजों को गिलोय के ताजे पत्तों का रस पिलाने से पीलिया जल्दी ठीक होता है। इसके अलावा गिलोय के सेवन से पीलिया में होने वाले बुखार और दर्द से भी आराम मिलता है। गिलोय स्वरस (Giloy juice) के अलावा आप पीलिया से निजात पाने के लिए गिलोय सत्व का भी इस्तेमाल कर सकते हैं।

खुराक और सेवन का तरीका : एक से दो चुटकी गिलोय सत्व को शहद के साथ मिलाकर दिन में दो बार नाश्ते या कुछ खाने के बाद लें।
शरीर में खून की कमी होने से कई तरह के रोग होने लगते हैं जिनमें एनीमिया सबसे प्रमुख है। आमतौर पर महिलायें एनीमिया से ज्यादा पीड़ित रहती हैं। एनीमिया से पीड़ित महिलाओं के लिए गिलोय का रस काफी फायदेमंद है। गिलोय का रस (Giloy juice) का सेवन शरीर में खून की कमी को दूर करती है और इम्युनिटी क्षमता को मजबूत बनाती है।

खुराक और सेवन का तरीका : दो से तीन चम्मच (10-15ml) गिलोय जूस (Giloy juice) को शहद या पानी के साथ दिन में दो बार खाने से पहले लें।
गिलोय त्वचा संबंधी रोगों और एलर्जी को दूर करने में भी सहायक है। अर्टिकेरिया में त्वचा पर होने वाले चकत्ते हों या चेहरे पर निकलने वाले कील मुंहासे, गिलोय इन सबको ठीक करने में मदद करती है।

इस्तेमाल करने का तरीका : त्वचा संबंधी समस्याओं से आराम पाने के लिए गुडूची (Guduchi) के तने का पेस्ट बना लें और इस पेस्ट को सीधे प्रभावित हिस्से पर लगाएं। यह पेस्ट त्वचा पर मौजूद चकत्ते, कील-मुंहासो आदि को दूर करने में सहायक है।
गिलोय में एंटी-आर्थराइटिक गुण होते हैं। इन्हीं गुणों के कारण गिलोय (Giloy in hindi) गठिया से आराम दिलाने में कारगर होती है। खासतौर पर जो लोग जोड़ों के दर्द से परेशान रहते हैं उनके लिए गिलोय का सेवन करना काफी फायदेमंद रहता है।

खुराक और सेवन का तरीका : गठिया से आराम दिलाने में गिलोय जूस और गिलोय का काढ़ा दोनों ही उपयोगी हैं। अगर आप गिलोय जूस (Giloy juice) का सेवन कर रहे हैं तो दो से तीन चम्मच (10-15ml) गिलोय जूस को एक कप पानी में मिलाकर सुबह खाली पेट इसका सेवन करें। इसके अलावा अगर आप काढ़े का सेवन कर रहे हैं तो गिलोय का काढ़ा बनाकर उसमें शहद मिलाएं और दिन में दो बार खाने के बाद इसका सेवन करें।
गिलोय में एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण होने के कारण यह सांसो से संबंधित रोगों से आराम दिलाने में प्रभावशाली है। गिलोय या गुडूची (Guduchi) कफ को नियंत्रित करती है साथ ही साथ इम्युनिटी पॉवर को बढ़ाती है जिससे अस्थमा और खांसी जैसे रोगों से बचाव होता है और फेफड़े स्वस्थ रहते हैं।

खुराक और सेवन का तरीका : अस्थमा से बचाव के लिए गिलोय चूर्ण में मुलेठी चूर्ण मिलाकर शहद के साथ दिन में दो बार इसका सेवन करें। यह मिश्रण सांसो से जुड़ी अन्य समस्याओं से आराम दिलाने में भी कारगर है।
अधिक शराब का सेवन लीवर को कई तरीकों से नुकसान पहुंचाता है। ऐसे में गुडूची सत्व या गिलोय सत्व का सेवन लीवर के लिए टॉनिक की तरह काम करती है। यह खून को साफ़ करती है और एंटीऑक्सीडेंट एंजाइम का स्तर बढ़ाती है। इस तरह यह लीवर के कार्यभार को कम करती है और लीवर को स्वस्थ रखती है। गिलोय के नियमित सेवन से लीवर संबंधी गंभीर रोगों से बचाव होता है।

खुराक और सेवन का तरीका : एक से दो चुटकी गिलोय सत्व को शहद के साथ मिलाकर दिन में दो बार इसका सेवन करें।
किसी भी औषधि को प्रयोग करने से पहले वैद्यों से सलाह जरूर लें
आयुर्वेदिक फार्मासिस्ट रजिस्टर्ड
निखिल कुमार

30/10/2025

जय आयुर्वेद जय धनवंतरी भगवान
आज हम आयुर्वेद के बहुमूल्य औषधीय के सानिध्य में जिन औषध के बारे में जानकारी लेंगे उसका उपयोग च्यवनप्राश बनाने के मुख्य घटकों में किया जाता है उसका नाम काला मुनक्का है इसकी जानकारी प्राप्त करने के उपरांत च्यवनप्राश का निर्माण भी शास्त्रों की विधि द्वारा देखेंगे
(10) काला मुनक्का

मुनक्का, जिसे काले किशमिश के नाम से भी जाना जाता है, एक स्वादिष्ट और पोषण से भरपूर सुपरफूड है जो सेहत के लिए कई फायदे प्रदान करता है. इसमें आवश्यक विटामिन, मिनरल्स और एंटीऑक्सिडेंट्स होते हैं, जो हमारे समग्र स्वास्थ्य (overall health) के लिए फायदेमंद होते हैं. इसके चबाने वाले, गूदेदार बनावट और बीजों की उपस्थिति इसे किसी भी खाद्य पदार्थ में एक अनोखा तत्व (A unique ingredient in food) बनाती है. पाचन को सहारा देने से लेकर हृदय स्वास्थ्य में सुधार करने तक, यह छोटा सा सुपरफूड वो चमत्कार कर सकता है, जिसकी हमने कल्पना भी नहीं की. आइए जानते हैं कि मुनक्का को कैसे खाएं और इसे अपनी डाइट में शामिल करने से क्या फायदे हो सकते हैं…
बता दें कि मुनक्का खाने का सबसे आसान तरीका है, 5 मुनक्कों को रातभर पानी में भिगोकर रखें और फिर अगले दिन सुबह इन्हें खाली पेट खाएं. भीगने से इसके पोषक तत्वों का अवशोषण बढ़ता है और पचाने में आसानी होती है.

आप मुनक्कों को अच्छे से धोकर, उनके बीज निकाल सकते हैं. फिर 5 से 10 मुनक्कों को एक शिशे में सजा कर, 2-3 मिनट तक मीडियम फ्लेम पर भून लें. अब इसे प्लेट पर निकालें, काला नमक और मिर्च छिड़कें, अच्छे से मिक्स करें और इसका आनंद लें.

ब्लड शुगर कंट्रोल करे: मुनक्का का सेवन ब्लड शुगर लेवल को नियंत्रित करता है. इसमें प्राकृतिक मिठास होने के बावजूद इसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स कम होता है और यह शुगर लेवल को मॉडरेशन में नियंत्रित करता है.

हड्डियों की सेहत को सुधारें: मुनक्का में बोरॉन और कैल्शियम होता है, जो हड्डियों को मजबूत बनाने में मदद करता है. यह हड्डी के गठन में मदद करता है और कैल्शियम अवशोषण को बढ़ाता है.

पाचन स्वास्थ्य में मदद करता है: मुनक्का में लैक्सेटिव गुण होते हैं जो कब्ज की समस्या को दूर करने में मदद करते हैं. यह फाइबर से भरपूर होता है जो पाचन को प्रमोट करता है और सूजन को रोकता है.
वजन घटाने में मदद करें: मुनक्का में फाइबर की मात्रा अधिक होती है, जो भूख को नियंत्रित करता है और वजन घटाने में मदद करता है. इसके प्राकृतिक मिठास के कारण यह मिठाई cravings को भी कम करता है.

मुनक्का स्किन और बालों के लिए फायदेमंद (Raisins are beneficial for skin and hair)
चमकदार त्वचा और घने बाल चाहते हैं? मुनक्का अपनी डाइट में शामिल करें. यह एंटीऑक्सिडेंट्स, विटामिन और आयरन से भरपूर होता है, जो रक्त संचार को बेहतर बनाता है और त्वचा की कोशिकाओं के पुनर्निर्माण (regeneration of skin cells) में मदद करता है. आयरन बालों के झड़ने को कम करता है और हैमोग्लोबिन के स्तर को बढ़ाता है.
दांतों के लिए फायदेमंद है मुनक्का
मुनक्का दांतों और मसूड़ों के स्वास्थ्य के लिए भी फायदेमंद है. इसमें कैल्शियम होता है, जो दांतों की मिनरलाइजेशन में मदद करता है और दांतों और मसूड़ों को सूजन से बचाता है. इसमें एंटीमाइक्रोबियल गुण होते हैं, जो कैविटी बनने से रोकते हैं.
आयुर्वेदिक फार्मासिस्ट रजिस्टर्ड
निखिल कुमार

जय आयुर्वेद जय धन्वंतरि आयुष आयुर्वेद आयुर्वेद के बहुमूल्य जड़ी बूटियां के जानकारी के अगली कड़ी में आज हम जिस औषधि के बा...
30/10/2025

जय आयुर्वेद जय धन्वंतरि आयुष आयुर्वेद आयुर्वेद के बहुमूल्य जड़ी बूटियां के जानकारी के अगली कड़ी में आज हम जिस औषधि के बारे में जानकारी लेंगे उसका नाम ककड़सिंघी है जो की चवनप्राश के निर्माण में मुख्य भूमिका निभाती है आज हम इसी के बारे में जानकारी लेंगे किस प्रकार इसका प्रयोग च्यवनप्राश के निर्माण में किया जाता है और उसके उपरांत शास्त्रोक्त विधि द्वारा च्यवनप्राश का निर्माण भी देखेंगे जो की हमारे आचार्य द्वारा ग्रन्थ में वर्णित है जिसका विस्तृत वर्णन चरक संहिता सारंगधर संहिता में और आयुर्वेद सार संग्रह आयुर्वेद रस तंत्र सार में विस्तृत रूप से दिया गया है तो नित्य नहीं जानकारी के लिए पेज को लाइक करें और फॉलो करें ताकि आपको आयुर्वेद की इसी प्रकार और जानकारी मिलती है
ककड़सिंघी
चरक, सुश्रुत आदि प्राचीन आयुर्वेदीय सहिताओं में कर्कट शृंगी का वर्णन प्राप्त होता है। इसका प्रयोग सर्दी-खांसी, सांस संबंधी समस्या आदि बीमारियों की चिकित्सा में किया जाता है।

कर्कटशृंगी का शृंगाकार-कोष (Galls)-इस वृक्ष के पत्ते या पत्तो के वृंत पर विशेष प्रकार के कीड़ों से 3-10 सेमी लम्बे तथा 1-5 सेमी चौड़े शृङ्गाकर कीटगृह बनाए जाते हैं। जिनके बाहर के तरफ हरे-भूरे रंग के, धूसर या बादामी रंग के, सिकुड़नयुक्त, कठोर, भीतर से खोखले, नवीनावस्था में चर्मिल, पुराने होने पर कठिन, तोड़ने से भीतर लाल तथा महीन होते हैं, इसे ही काकड़ा शृंगी कहते हैं। यह कणों के सफेद जाले से ढके होते हैं, तारपीन के तेल के समान गंधयुक्त होते हैं।
काकड़ासिंगी कड़वा, गर्म, गुरु, रूखा, कफ और वात को कम करने वाला, सर्दी-खांसी से राहत दिलाने में मदद करती है।

यह बुखार, सांस संबंधी समस्या, शरीर के ऊपरी भाग में वात दोष के कारण होने वाली समस्या, प्यास, खांसी, हिचकी, अरुचि, उल्टी, अतिसार, रक्तपित्त, बालरोग, रक्तदोष, कृमि, को दूर करने में मदद करती है।
मौसम के बदलने के साथ खांसी होने पर 1-2 ग्राम काकड़ासिंगी चूर्ण को शहद मिलाकर सेवन करने से वातज कास का तथा घी, मधु और मिश्री मिलाकर सेवन करने से पित्तज कास का शमन होता है।

-काकड़ासिंगी तथा कटेरी का काढ़ा बनाकर 10-20 मिली मात्रा में पिलाने से कास (खाँसी) में लाभ होता है।

-कर्कट शृंगी चूर्ण में शहद मिलाकर 125-250 मिग्रा की गोलियाँ बनाकर, मुँह में रखकर चूसते रहने से कास (खाँसी) में लाभ होता है।
कर्कटशृंगी का औषधीय गुण अस्थमा या दमा के लक्षणों से राहत दिलाने में फायदेमंद होते हैं। 1-2 ग्राम काकड़ासिंगी चूर्ण में 500 मिग्रा कायफल चूर्ण मिलाकर शहद के साथ चाटने से दमा में लाभ होता है।
काकड़ासिंगी के औषधीय गुण कफ संबंधी और पेट संबंधी समस्या में सबसे ज्यादा कार्यकारी होता है। कर्कटशृंगी को आयुर्वेद में किस तरह और कैसे इस्तेमाल किया जाता है चलिये इसके बारे में विस्तार से जानते हैं।
काकड़ासिंगी का काढ़ा बनाकर गरारा करने से शीताद (Scurvy) के लक्षणों से राहत मिलने में आसानी होती है।
अक्सर शिशुओं को बलगम वाली खांसी होने से वह उल्टी करने लगते हैं। काकड़ासिंगी और नागरमोथा को समान मात्रा में लेकर चूर्ण बनाकर, 1-2 ग्राम चूर्ण का सेवन मधु के साथ करने से कफजन्यछर्दि (उल्टी) में लाभ होता है।
अगर बार-बार हिचकी आने की समस्या है तो कर्कटशृंगी का इस तरह से उपयोग करने पर लाभ मिलता है-

-समान मात्रा में हींग, सौवर्चल नमक, जीरा, बिड नमक, पुष्करमूल, चित्रकमूल तथा काकड़ासिंगी के काढ़े से बने यवागू का सेवन करने से सांस तथा हिक्का (हिचकी) रोग में शीघ्र लाभ होता है।

-लौंग, सोंठ, काली मिर्च, पीपर, वत्सनाभ, काकड़ासिंगी, कटेरी तथा बहेड़ा, इनका चूर्ण बनाकर घृतकुमारी के रस में घोंटकर 125 मिग्रा की गोली बनाकर सुबह शाम 1-1 गोली सेवन करने से सांस संबंधी समस्या तथा खांसी में लाभ होता है।
अगर खान-पान में गड़बड़ी या संक्रमण के वजह से दस्त हो रहा है तो काकड़ासिंगी का उपयोग फायदेमंद साबित होता है।

-2 ग्राम काकड़ासिंगी चूर्ण में 1 ग्राम बेलगिरी चूर्ण मिलाकर सेवन करने से अतिसार में लाभ होता है।

-1-2 ग्राम काकड़ासिंगी चूर्ण में 500 मिग्रा पिप्पली चूर्ण मिलाकर मधु के साथ खाने से अतिसार से राहत तथा खाने में रूची आती है।

-1-2 ग्राम काकड़सिंगी चूर्ण को मलाई के साथ मिलाकर सेवन करने से अथवा घी में भूनकर उसमें शर्करा मिलाकर खाने से आमातिसार में लाभ होता है।
कर्कट शृङ्गी वाजीकरण के समस्या को दूर करने में लाभकारी होता है। काकड़ासिंगी के 1 ग्राम पेस्ट को दूध में मिलाकर पीने से तथा भोजन में मिश्री, घी एवं दूध का प्रयोग करने से सेक्स करने की इच्छा में वृद्धि होती है।
1 ग्राम काकड़ासिंगी तथा 250 मिग्रा मूली के फल चूर्ण में मधु एवं घी मिलाकर उम्र के अनुसार थोड़ी-थोड़ी मात्रा में बच्चों को खिलाने से सांस संबंधी समस्या में लाभकारी होता है।
बच्चों के तरह-तरह के रोगों से निजात दिलाने में काकड़सिंगी लाभकारी होता है।

-काकड़ा शृंगी, अतीस तथा पिप्पली से निर्मित चूर्ण को 500 मिग्रा की मात्रा में लेकर शहद के साथ सेवन कराने से शिशुओं में होने वाली खांसी, ज्वर तथा वमन में लाभ होता है।

-काकड़ासिंगी, अतीस, नागरमोथा तथा वायविडंग को बराबर मात्रा में मिलाकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को 125-250 मिग्रा की मात्रा में शहद के साथ देने से ज्वर, अतिसार, खाँसी तथा दाँत निकलने के समय होने वाले उपद्रवों में लाभ होता है।
आयुर्वेद के अनुसार कर्कटशृंगी के औषधीय गुण इसके इन भागों को प्रयोग करने पर सबसे ज्यादा मिलता है-

-कीटगृह (Galls)

असल में कर्कटश्रंगी कोई फल या पुष्प नहीं है वस्तुत यह एक वृक्ष विशेष के पत्तों पर कीड़ों के द्वारा बनाया एक शृंगाकार संरचना होता है। कृमि से बना शृंगाकार संरचना की वजह से इस वृक्ष को काकड़ा शृंगी नाम से जाना जाता है।
यदि आप किसी ख़ास बीमारी के घरेलू इलाज के लिए काकड़ा शृंगी का इस्तेमाल करना चाहते हैं तो बेहतर होगा कि किसी आयुर्वेदिक चिकित्सक की सलाह के अनुसार ही इसका उपयोग करें। चिकित्सक के सलाह के अनुसार वयस्क के लिए चूर्ण 1-2 ग्राम और, बच्चों के लिए 250-500 मिग्रा ले सकते हैं।
भारत में यह विभिन्न हिमालयी प्रदेशों यानि कश्मीर, उत्तराखण्ड, हिमाचल प्रदेश में 400-2500 मी की ऊँचाई तक पाया जाता है।

किसी भी औषधि को प्रयोग करने से पहले वैद्यों से सलाह जरूर लें
आयुर्वेदिक फार्मासिस्ट Reg
निखिल कुमार

30/10/2025

जय आयुर्वेद जय धन्वंतरि आज हम आयुर्वेद के बहुमूल्य औषधीय में से चवनप्राश के निर्माण में जिस औषधि का प्रयोग किया जाता है उसका नाम है छोटी कटेरी यह एक बहुत ही औज वर्धन जड़ी है जिससे शरीर का संवर्धन और संरक्षण होता है आज हम इसी के बारे में विस्तृत रूप से जानकारी दे रहे हैं इसके उपरांत सभी औषधीय की जानकारी लेने के उपरांत उसके गुणधर्म को समझने के उपरांत हम शास्त्रों की विधि द्वारा च्यवनप्राश का निर्माण भी देखेंगे
(8) छोटी कटेरी
कटेरी एक प्रकार का कांटेदार पौधा होता है जो जमीन में फैला होता है। कटेरी के पत्ते हरे रंग के, फूल नीले और बैंगनी रंग के और फल गोल और हरे रंग के सफेद धारीदार होते हैं। इस कांटेदार पौधे के इतने गुण हैं कि आयुर्वेद में इसका उपयोग औषधि के रुप में किया जाता है। चलिये इस अनजाने जड़ी-बूटी के बारे में विस्तार से जानते हैं कि ये कैसे और किन-किन बीमारियों के लिए उपचार के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

कटेरी का पौधा झाड़ी के रूप में जमीन पर फैला हुआ होता है। इसको देखने से ऐसा लगता है, जैसे कोई क्रोधित नागिन शरीर पर अनेकों कांटो का वत्र ओढ़े गर्जना करती हुई मानो कहती हो, मुझे कोई छूना मत। कटेरी में इतने कांटे होते हैं कि इसे छूना दुष्कर है, इसीलिए इसका एक नाम दुस्पर्शा है।

कटेरी की कई प्रजातियां होती है परन्तु मुख्यतया तीन प्रजातियों 1. छोटी कटेरी (Solanum virginiannumLinn.), 2. बड़ी कटेरी (Solanum anguivi Lam.) तथा 3. श्वेत कंटकारी (Solanum lasiocarpum Dunal) का प्रयोग चिकित्सा के लिए किया जाता है।

छोटी कटेरी के दो भेद होते हैं एक तो बैंगनी या नीले रंग के पुष्प वाली जो कि सभी जगह मिल जाती है। दूसरी सफेद पुष्पवाली जो हर जगह नहीं मिलती है। इस दूसरी प्रजाति को सफेद कण्टकारी कहते हैं। इस प्रजाति को श्वेतचन्द्रपुष्पा, श्वेत लक्ष्मणा, दुर्लभा, चन्द्रहासा, गर्भदा आदि नामों से जाना जाता है।

सफेद कांटा वाल पौधा वर्षायू, छोटा एवं हल्के रंग का होता है। इसके फूल सफेद रंग के होते हैं तथा फूलों के भीतर की केसर सफेद या पीले रंग के होते हैं। इसकी जड़ छोटी, पतली तथा शाखायुक्त होती है। यह पौधा शीत-ऋतु में पैदा होता है तथा वर्षा-ऋतु में गल जाता है।

गर्म प्रकृति की होने के कारण कटेरी पसीना पैदा करने वाली होती है तथा कफ वात को भी कम करने में मदद करती है। कटेरी का पौधा कटु, कड़वा और गर्म तासिर का होने के कारण खाना हजम करने में सहायता करता है। भूख कम लगने और पित्त संबंधी बीमारी को दूर करने के में यह औषधि बड़ी प्रभावशाली तरीके से काम करती है। यह मूत्र संबंधी बीमारी और बुखार को कम करने में फायदेमंद होती है। मूत्रल होने के कारण शरीर में पानी की मात्रा बढ़ाकर सूजन में, सूजाक या गोनोरिया, मूत्राघात और मूत्राशय की पथरी में भी यह औषधि लाभकारी सिद्ध हुई है। यह खून को साफ करने वाली, सूजन कम करने वाली और रक्तभार को कम करती है। यह सांस संंबंधी नलिकाओं तथा फेफड़ों से हिस्टेमीन को निकालती है। यह आवाज को बाघ या व्याघ्र के समान तेज करती है इसलिए इसको व्याघी कहते हैं।

श्वेत कंटकारी प्रकृति से कड़वी, गर्म, कफवात कम करने वाली, रुचि बढ़ाने वाली, नेत्र के लिए हितकर, भूख बढ़ाने वाली, पारद को बांधने वाली तथा गर्भस्थापक (conception promotor) होती है। इसके बीज भूख बढ़ाने में मदद करते हैं। इसकी जड़ भूख बढ़ाने तथा हजम शक्ति बढ़ाने में मदद करती है।

श्वेत कंटकारी के फल भूख बढ़ाने वाली, कृमिरोधी; सांस की तकलीफ, खांसी, बुखार या ज्वर, मूत्रकृच्छ्र या मूत्र संबंधी समस्या, अरुचि या खाने की कम इच्छा, कान में सूजन आदि बीमारियों के उपचार में हितकारी होती है। श्वेत कंटकारी के फल का काढ़ा बुखार से राहत दिलाती है।
कटेरी के फायदों के बारे में बहुत कम जानकारी लोगों को पता है। लेकिन इस कंटीले पौधे के अनगिनत औषधीय गुणों के कारण कटेरी को कई बीमारियों के उपचार स्वरूप प्रयोग किया जाता है। चलिये इसके बारे में विस्तार से जानते हैं
अगर आपको काम के तनाव और भागदौड़ भरी जिंदगी के वजह से सिरदर्द की शिकायत रहती है तो कटेरी का घरेलू उपाय बहुत लाभकारी सिद्ध होता है।

-कटेरी का काढ़ा, गोखरू का काढ़ा तथा लाल धान के चावल से बने ज्वरनाशक पेय का थोड़ी-थोड़ी मात्रा में दिन में तीन-चार बार सेवन करने से बुखार होने पर जो सिर दर्द होता उसमें आराम मिलता है।

-कटेरी के फल के रस को माथे पर लेप करने से सिर दर्द कम होता है।
अक्सर किसी बीमारी के कारण बाल झड़कर गंजेपन की अवस्था आ गई है तो कटेरी का इलाज फायदेमंद साबित हो सकता है-

-20-50 मिली कटेरी पत्ते के रस में थोड़ा शहद मिलाकर सिर में चंपी करने से इन्द्रलुप्त (गंजापन) में लाभ होता है।

-श्वेत कंटकारी के 5-10 मिली फल के रस में मधु मिलाकर सिर में लगाने से इन्द्रलुप्त में लाभ होता है
दिन भर बाहर धूल मिट्टी या धूप में काम करने पर अक्सर बालों में रूसी की समस्या हो जाती है। इससे निजात पाने के लिए कटेरी फल के रस में समान मात्रा में मिलाकर सिर में लगा सकते है।
आँख संबंधी बीमारियों में बहुत कुछ आता है, जैसे- सामान्य आँख में दर्द, रतौंधी, आँख लाल होना आदि। इन सब तरह के समस्याओं में कटेरी से बना घरेलू नुस्ख़ा बहुत काम आता है। कटेरी के 20-30 ग्राम पत्तों को पीसकर उनकी लुगदी बनाकर आंखों पर बांधने से (आंखों का दर्द ) दर्द कम होता है।
मौसम के बदलने पर नजला, जुकाम व बुखार हो जाता है, उसमें पित्तपापड़ा, गिलोय और छोटी कटेरी सबको समान मात्रा में (20 ग्राम) लेकर आधा लीटर पानी में पकाकर एक चौथाई भाग का काढ़ा पिलाने से बहुत लाभ मिलता है।
दांत दर्द की परेशानी दूर करने में कटेरी मदद करती है।

-अगर दांत बहुत दुखती हो तो कटेरी के बीजों का धुआं लेने से तुरन्त आराम मिलता है। कटेरी की जड़, छाल, पत्ते और फल लेकर उनका काढ़ा बनाकर कुल्ला करने से भी दांतों का दर्द दूर होता है।

-श्वेत कंटकारी के बीजों का धूम्रपान के रूप में प्रयोग करने से दाँतों का दर्द तथा दंतकृमि कम होता है।
अगर मौसम के बदलाव के कारण खांसी से परेशान है और कम होने का नाम ही नहीं ले रहा है तो बांस से इसका इलाज किया जा सकता है।

-आधा से 1 ग्राम कटेरी के फूल के चूर्ण को शहद के साथ मिलाकर चटाने से बालकों की सब प्रकार की खांसी दूर होती है।

-15-20 मिली पत्ते का रस या 20-30 मिली जड़ के काढ़े में 1 ग्राम छोटी पीपल चूर्ण एवं 250 मिग्रा सेंधानमक मिलाकर देने से खांसी में आराम मिलता है।

-छोटी कटेरी के रस से पकाए हुए घी को 5-10 ग्राम की मात्रा में सेवन करने से खाँसी में आराम मिलता है।

-25 से 50 मिली कटेरी काढ़े में 1-2 ग्राम पिप्पली चूर्ण मिलाकर सेवन करने से खांसी से राहत मिलती है।

-20-40 मिली कण्टकारी का काढ़े का सेवन करने से सांस संबंधी समस्या, खांसी तथा छाती के दर्द में लाभ होता है।

-सफेद कंटकारी के 1-2 ग्राम फल चूर्ण में मक्खन मिलाकर सेवन करने से आराम मिलता है।
मौसम के बदलते ही दमा या अस्थमा के रोगी को सांस लेने में तकलीफ होने लगती है लेकिन कटेरी का औषधीय गुण इस कष्ट से आराम दिलाने में लाभकारी होता है।

-कटेरी की प्रसिद्धि कफ को नाश करने के सम्बन्ध में बहुत अधिक है। छाती का दर्द इत्यादि रोगों में इसका बहुत प्रयोग होता है। जब छाती में कफ भरा हुआ हो तब इसका 20-30 मिली काढ़ा देने से बहुत लाभ होता है। इसके फलों के 20-30 मिली काढ़े में 500 मिग्रा भुनी हुई हींग और 1 ग्राम सेंधा नमक डालकर पीने से जीर्ण अस्थमा में भी लाभ होता है।

-कटेरी पञ्चाङ्ग को यवकुट कर आठ गुना पानी मिलाकर गाढ़ा होने तक पकाएं, गाढ़ा होने पर कांच की शीशी में रखें। इसमें 1 ग्राम मधु मिलाकर सुबह-शाम सेवन करने से आराम मिलता है।

-छोटी कटेरी के 2-4 ग्राम कल्क में 500 मिग्रा हींग तथा 2 ग्राम मधु मिलाकर, सेवन करने से अस्थमा में लाभ होता है।

-छोटी कटेरी की जड़, श्वेत जीरक और आंवला से बने चूर्णं (1-3 ग्राम) में, मधु मिलाकर प्रयोग करने से अस्थमा में लाभ होता है।
अगर मसालेदार खाना खाने या किसी बीमारी के साइड इफेक्ट के वजह से उल्टी हो रही है तो कटेरी का सेवन इस तरह से करने पर फायदा मिलता है।

-10-20 मिली कटेरी के रस में 2 चम्मच मधु मिलाकर देने से उल्टी से राहत मिलती है।

-अडूसा, गिलोय तथा छोटी कटेरी से बने काढ़े ठंडा होने पर उसमें मधु मिलाकर, 10-20 मिली की मात्रा में पीने से सूजन और खाँसी से आराम मिलता है।
अगर खान-पान में गड़बड़ी होने पर बदहजमी की समस्या हो रही है तो उसमें कटेरी का इस तरह से सेवन करने पर आराम मिलता है।

समान मात्रा में कटेरी और गिलोय के 1½ ली रस में 1 किग्रा घी डालकर पकाना चाहिए। जब केवल घी मात्र शेष रह जाए तब उसको उतार कर छान लें। इस घी को 5 ग्राम की मात्रा में सेवन करने से अपच की समस्या तथा खांसी की समस्या से राहत मिलती है।
किसी भी औषधि को प्रयोग करने से पहले वैद्यों से सलाह जरूर लें
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निखिल कुमार

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