06/01/2026
भारत की प्राचीन चिकित्सा प्रणाली #आयुर्वेद अब वैश्विक स्वास्थ्य मंच पर औपचारिक मान्यता पा चुकी है। #विश्वस्वास्थ्यसंगठन (W H O) ने अपने नवीनतम रोग वर्गीकरण सिस्टम (International Classification of Diseases – 11th Revision) में आयुर्वेद, सिद्ध और युनानी चिकित्सा प्रणालियों को विशेष स्थान दिया है। यह कदम भारत के लिए गौरव का क्षण है और पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों के लिए नया अध्याय खोलता है।
ICD-11 क्या है, इसे आसान भाषा में समझिए—आजकल अस्पतालों, डॉक्टरों और स्वास्थ्य विभागों में हर बीमारी को एक खास कोड दिया जाता है। ये कोड दुनिया भर में एक जैसा होता है, ताकि सब जगह डेटा समझने में आसानी हो। इसी काम के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने एक बहुत महत्वपूर्ण सिस्टम बनाया है, जिसका नाम है ICD यानी International Classification of Diseases (रोगों का अंतरराष्ट्रीय वर्गीकरण)। अभी जो सबसे नया और इस्तेमाल में आने वाला संस्करण है, वो है ICD-11 – यानी रोगों का 11वां संस्करण।
ICD क्या करता है, इसे सरल शब्दों में जानें: —हर बीमारी, लक्षण, चोट या मौत के कारण को एक यूनिक कोड देता है (जैसे 8A00 या RA00 जैसा)। डॉक्टर मरीज को क्या बीमारी बताते हैं, अस्पताल में रिकॉर्ड कैसे होता है, बीमा क्लेम कैसे होता है – सबमें ये कोड काम आता है। देशों के बीच तुलना आसान हो जाती है – जैसे भारत में कितनी डायबिटीज के मामले हैं, अमेरिका में कितने – सब एक ही भाषा में समझ आता है।
सरकारें स्वास्थ्य नीतियां बनाती हैं, रिसर्च होता है, पैसा कहाँ लगाना है ये तय करने में मदद मिलती है।
पहले ICD-10 इस्तेमाल होता था (1990 के आसपास से), लेकिन अब ICD-11 ज्यादा आधुनिक, डिजिटल फ्रेंडली और ज्यादा बीमारियों को कवर करता है। जनवरी 2022 से ये आधिकारिक तौर पर शुरू हुआ और हर साल इसमें छोटे-बड़े अपडेट आते रहते हैं।
ICD-11 की सबसे खास विशेषता इसका नया “Traditional Medicine Module-1” है। इस मॉड्यूल में भारत की आयुर्वेद, तमिलनाडु की सिद्ध चिकित्सा, और यूनानी प्रणाली जैसी पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों को मानकीकृत कोडिंग सिस्टम में स्थान मिला है। पहली बार ऐसा हुआ है कि आयुर्वेद में वर्णित रोग, लक्षण व उपचार अब अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य डेटा का हिस्सा बनेंगे, जिससे निम्न लाभ होगा:—
●पहले सिर्फ आधुनिक (एलोपैथिक) दवाइयों और बीमारियों के कोड थे।
●अब आयुर्वेद में इस्तेमाल होने वाली बीमारियों के नाम (जैसे वात रोग, पित्त विकार, कफ आदि पैटर्न) को भी अंतरराष्ट्रीय कोड मिल गया।
●इससे दुनिया भर में आयुर्वेद, सिद्ध और यूनानी के इलाज का डेटा इकट्ठा करना, रिसर्च करना और तुलना करना आसान हो गया। इसकी मदद से विश्वभर के शोधकर्ता आयुर्वेदिक सिद्धांतों पर वैज्ञानिक अध्ययन कर सकेंगे।
●वैश्विक जनता को आयुर्वेदिक चिकित्सा पर भरोसा और पहुँच दोनों बढ़ेगी।
भारत सरकार का AYUSH मंत्रालय वर्षों से पारंपरिक चिकित्सा के वैश्विक मानकीकरण पर कार्य कर रहा था। WHO के साथ भारत के तकनीकी सहयोग से यह पहल संभव हुई। इससे न सिर्फ भारतीय चिकित्सा को पहचान मिली है, बल्कि इससे जुड़े वैश्विक शोध, नीति निर्माण और निवेश के क्षेत्र में नए अवसर खुल गए हैं। आने वाले वर्षों में WHO के डेटा-संग्रह में आयुर्वेदिक रोग वर्गीकरण व उपचार पैटर्न की जानकारी दर्ज होगी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों को वैश्विक मंच पर पहचान दिलाने की दिशा में ऐतिहासिक काम किया है। उनके “स्थानीय से वैश्विक” दृष्टिकोण ने आयुर्वेद को अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति में सम्मानजनक स्थान दिलाया है। यह उपलब्धि मोदी सरकार की उस सोच का परिणाम है, जो भारतीय परंपरा को आधुनिक विज्ञान से जोड़ने पर बल देती है। इससे न सिर्फ भारतीय चिकित्सा को पहचान मिली है, बल्कि इससे जुड़े वैश्विक शोध, नीति निर्माण और निवेश के क्षेत्र में नए अवसर खुल गए हैं। आने वाले वर्षों में WHO के डेटा-संग्रह में आयुर्वेदिक रोग वर्गीकरण व उपचार पैटर्न की जानकारी दर्ज होगी।
संतुलित चिकित्सा की दिशा में WHO नया कदम है ये।आयुर्वेद केवल रोग का उपचार नहीं, बल्कि जीवन दृष्टि सिखाता है — “स्वस्थस्य स्वास्थ्य रक्षणं, आतुरस्य विकार प्रशमनं।” WHO द्वारा ICD-11 में इसका स्थान देना इस सिद्धांत की अंतरराष्ट्रीय मान्यता है — कि स्वास्थ्य केवल शरीर का नहीं, बल्कि मन और आत्मा का भी संतुलन है। जैसा कि एक आयुर्वेद विशेषज्ञ ने कहा —“अब आयुर्वेद सिर्फ भारत की धरोहर नहीं, बल्कि विश्व की साझा स्वास्थ्य विरासत बन चुका है।
”CD-11 में आयुर्वेद को शामिल करना, सिर्फ एक तकनीकी सुधार ही नहीं, बल्कि प्राचीन ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के बीच पुल है। यह कदम भविष्य की स्वास्थ्य व्यवस्था को अधिक समग्र, टिकाऊ और मानवीय बनाने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा। ICD-11, दुनिया की बीमारियों की “आधिकारिक भाषा” है,
2025 अपडेट होने से अब आयुर्वेद, सिद्ध और यूनानी को भी इस भाषा में शामिल कर लिया गया। ये भारत के लिए गर्व की बात है, क्योंकि हमारी हजारों साल पुरानी चिकित्सा पद्धतियाँ अब वैश्विक स्तर पर मान्यता पा रही हैं।