Siraj Education and Welfare Society, Nepal جمعية السراج بنيبال

  • Home
  • Nepal
  • Siraha
  • Siraj Education and Welfare Society, Nepal جمعية السراج بنيبال

Siraj Education and Welfare Society, Nepal جمعية السراج بنيبال Education, Health, Information and Social Services.

*دعوتِ اسلام: نیپال کے تناظر میں*(اداریہ ہفت روزہ صدائے عام جنکپور، نیپال، 13 نومبر 2025)اسلام وہ دینِ فطرت ہے جو انسان ...
13/11/2025

*دعوتِ اسلام: نیپال کے تناظر میں*

(اداریہ ہفت روزہ صدائے عام جنکپور، نیپال، 13 نومبر 2025)

اسلام وہ دینِ فطرت ہے جو انسان کو خیر، عدل، علم اور امن کی راہوں پر گامزن کرتا ہے۔
دعوتِ اسلام دراصل انسان کو اس کے خالق و مالک اللہ عز وجل کی بندگی اور مخلوق کے لیے رحمت بننے کی تعلیم دیتی ہے۔
اللہ تعالیٰ نے فرمایا: {ادْعُ إِلَىٰ سَبِيلِ رَبِّكَ بِالْحِكْمَةِ وَالْمَوْعِظَةِ الْحَسَنَةِ} (النحل: ۱۲۵)
ترجمہ: "اپنے رب کے راستے کی طرف حکمت اور عمدہ نصیحت کے ساتھ دعوت دو۔"
دعوت کا مقصد جبر نہیں، بلکہ خیرخواہی، علم اور فہمِ حقیقت ہے۔
اسی لیے اسلام اور بہت حد تک دستورِ نیپال بھی مذہبی آزادی، انسانی وقار، اور پُرامن بقائے باہمی کے اصول پر قائم ہیں۔

*۱. دستورِ نیپال اور مذہبی آزادی: دعوت کا محفوظ دائرہ*
دستورِ نیپال (२०७२/۲۰۱۵) کا مضمون ۲۶ (धार्मिक स्वतन्त्रताको हक) مذہبی آزادی کو بنیادی حق قرار دیتا ہے:
شق 1:
“धर्ममा आस्था राख्ने प्रत्येक व्यक्तिलाई आफ्नो आस्था अनुसार धर्मको अवलम्बन, अभ्यास र संरक्षण गर्ने स्वतन्त्रता हुनेछ।”
ترجمہ: "ہر شخص کو اپنے عقیدے کے مطابق اپنے مذہب کو اپنانے، اس پر عمل کرنے اور اس کی حفاظت کرنے کی آزادی ہوگی۔"
اسلام کا یہی اصول قرآن میں صراحت کے ساتھ بیان ہوا:
لَا إِكْرَاهَ فِي الدِّينِ (البقرہ: ۲۵۶)
ترجمہ: "دین میں کوئی جبر نہیں۔"
یہ آیت اور مذکورہ قانونی شق ہمیں یہ سبق دیتی ہیں کہ اسلام کی دعوت دلائل، کردار اور حسنِ اخلاق سے کی جائے؛ کسی فرد یا برادری پر دباؤ یا نفرت کی فضا پیدا نہ کی جائے، بلکہ تعلیم، خدمت اور مکالمے کے ذریعے پیغامِ اسلام پہنچایا جائے۔

*۲. دعوت کا منہج: انبیاء کی سنت اور شریعت کا اسلوب*
دعوت کا حقیقی منہج وہی ہے جو قرآن و سنت میں آیا: {قُلْ هَٰذِهِ سَبِيلِي أَدْعُو إِلَى اللَّهِ عَلَىٰ بَصِيرَةٍ أَنَا وَمَنِ اتَّبَعَنِي} (یوسف: ۱۰۸)
ترجمہ: "کہہ دو: یہی میرا راستہ ہے، میں اور میرے پیروکار بصیرت پر اللہ کی طرف دعوت دیتے ہیں۔"
یہی طریقہ انبیاء اور سلفِ صالحین کا رہا: علم، عدل، حلم اور صبر کے ساتھ۔
دعوت کا مطلب ہے لوگوں کو خیر کی طرف بلانا، نہ کہ کسی پر جبر کر کے حکم چلانا۔
اسی منہج پر چلتے ہوئے داعیِ اسلام کو چاہیے کہ وہ نیپالی معاشرے میں علم و حکمت کے ساتھ گفتگو کرے، نیپال کی مختلف زبانوں کے ساتھ نیپالی زبان میں بات کرنے کی مہارت حاصل کرے، مقامی ثقافت کو سمجھے، اور اسلام کا پیغام علمی و قانونی احترام کے ساتھ پیش کرے۔

*۳. دعوت، قانون، اور احترامِ دستور*
دستورِ نیپال کی بنیاد عدل، مساوات اور ثقافتی ہم آہنگی پر رکھی گئی ہے۔
مضمون ۴ میں کہا گیا ہے: “नेपाल संघीय, समावेशी, धर्मनिरपेक्ष र बहुसांस्कृतिक गणराज्य हो।”
ترجمہ: "نیپال ایک وفاقی، جامع، مذہبی طور پر غیرجانبدار اور کثیر الثقافتی جمہوریہ ہے۔"
یہ "کثیرالثقافتی" پہلو دعوت کے لیے ایک مثبت فضا فراہم کرتا ہے، جہاں ہر مذہب اپنے اصول کے مطابق پُرامن انداز میں اپنی تعلیمات پیش کر سکتا ہے۔
اسلام کا پیغام کسی قوم یا نسل کے خلاف نہیں بلکہ تمام انسانیت کے لیے ہے،
جیسا کہ اللہ تعالیٰ نے فرمایا: {وَمَا أَرْسَلْنَاكَ إِلَّا رَحْمَةً لِّلْعَالَمِينَ} (الأنبياء: ۱۰۷)
ترجمہ: "ہم نے آپ کو تمام جہانوں کے لیے رحمت بنا کر بھیجا ہے۔"
یہ آیت دعوتِ اسلامی کی روح ہے: رحمت، علم، عدل، اور خیرخواہی۔

*۴. دعوت اور زبان: فہم و رسائی کی ضرورت*
اللہ تعالیٰ نے فرمایا: {وَمَا أَرْسَلْنَا مِن رَّسُولٍ إِلَّا بِلِسَانِ قَوْمِهِ لِيُبَيِّنَ لَهُمْ} (إبراهيم: ۴)
ترجمہ:" ہم نے کوئی رسول نہیں بھیجا مگر اپنی قوم کی زبان کے ساتھ، تاکہ وہ ان کے لیے بات واضح کرے۔"
یہ آیت داعیانِ اسلام کے لیے ایک بنیادی رہنما اصول بیان کرتی ہے کہ وہ نیپال کی مختلف زبانوں کے ساتھ نیپالی زبان میں بھی بات کریں،
تاکہ دعوت عام فہم ہو، دلوں تک پہنچے، اور غلط فہمیاں پیدا نہ ہوں۔
دستورِ نیپال نے بھی مضمون ۳۱(۵) میں زبان کے حق کو تسلیم کیا ہے: “नेपालमा बसोबास गर्ने प्रत्येक नेपाली समुदायलाई कानून बमोजिम आफ्नो मातृभाषामा शिक्षा पाउने ... हक हुनेछ।”
ترجمہ: "ہر شہری کو اپنی مادری زبان میں تعلیم حاصل کرنے اور تعلیمی ادارے قائم کرنے کا حق حاصل ہوگا۔"
لہٰذا دعوتِ اسلام کے لیے مختلف مقامی زبانوں کے ساتھ نیپالی زبان میں دینی مواد تیار کرنا اور تعلیم و تربیت کے مواقع فراہم کرنا نہ صرف شرعاً مطلوب ہے بلکہ قانوناً بھی درست اور مفید ہے۔

*۵. دعوت کا ادب و اخلاق: امن، علم اور خیرخواہی کا امتزاج*
دعوت کے لیے سب سے مؤثر زبان اخلاق اور خدمت کی ہے۔
اللہ تعالیٰ نے فرمایا: {وَلَا تَسُبُّوا الَّذِينَ يَدْعُونَ مِن دُونِ اللَّهِ} (الأنعام: ۱۰۸)
ترجمہ: "ان کو گالی نہ دو جنہیں وہ اللہ کے سوا پکارتے ہیں۔"
یہ آیت داعی کو عدل، احترام اور حلم کی تربیت دیتی ہے۔
دعوت وہاں کامیاب ہوتی ہے جہاں لوگ محبت، خدمت اور حسنِ عمل سے اسلام کا چہرہ دیکھیں۔
نبی ﷺ نے فرمایا: "إن الرفق لا يكون في شيء إلا زانه."
(صحیح مسلم، حدیث: 2594)
ترجمہ: “نرمی جس چیز میں ہو، اسے زینت بخش دیتی ہے۔”
نبی ﷺ کی سیرت گواہ ہے کہ نرم کلام اور خدمت کے رویّے نے دلوں کو فتح کیا، اور یہی آج بھی دعوت کی کامیابی کی کنجی ہے۔

*نتیجہ: دعوتِ اسلام: قانون کے احترام کے ساتھ خیر کی طرف پکار*
نیپال میں رہنے والے مسلمانوں کے لیے رہنمائی یہ ہے کہ وہ:
دعوت کو اپنا اصل فریضہ سمجھیں اور اسے قانونی، پُرامن، اور علمی بنیادوں پر انجام دیں۔
زبان و ثقافت کو ذریعہ بنائیں، رکاوٹ نہیں۔
اور معاشرے میں رحمت، صدق، اور خدمت کے ذریعے اسلام کا تعارف کرائیں۔
یوں دعوتِ اسلام نہ صرف دین کی خدمت ہوگی بلکہ دستورِ نیپال میں درج عدل، آزادی اور باہمی احترام کے اصولوں کی عملی تفسیر بھی بنے گی۔

(رحمت اللہ آل سراج)

05/11/2025

मुसलमानहरूको राजनीतिः एकता, दूरदर्शिता र वास्तविक सोच

(सम्पादकीय साप्ताहिक "नयॉं उपदेश" जनकपुर, नेपाल, 06-11-2025)

दक्षिण एशियाको क्षेत्रभित्र मुसलमानहरू एक महत्वपूर्ण अल्पसंख्यक समुदाय हुन्। नेपालमा तिनीहरूको जनसंख्या करिब ५ देखि ६ प्रतिशत छ, भने हाम्रो छिमेकी देश भारतमा करिब १४ प्रतिशत मुसलमानहरू छन्। भारतका केही राज्यहरूमा — जस्तै बिहारमा — मुसलमानहरूको संख्या सत्र प्रतिशतसम्म पुगेकी छ।
यो अनुपातले यो कुराको स्मरण गराउँछ कि यदि मुसलमानहरूले आफ्नी सामूहिक बुद्धिमत्ता र राजनीतिक सूझबूझ प्रयोग गरे भने, उनीहरूले आफ्ना हकमा सकारात्मक र प्रभावकारी राजनीतिक प्रभाव सिर्जना गर्न सक्छन्।
तर दुर्भाग्यवश, कहिलेकाहीँ भावनामा आएर मुसलमानहरूले आफ्नै नाममा अलग राजनीतिक दलहरू बनाउँछन्। देख्दा यो प्रतिनिधित्वको बाटो जस्तो लाग्छ, तर वस्तुतः यसको हानि बढी हुन्छ।
जब मुसलमानको भोट साना–साना पार्टीहरूमा विभाजित हुन्छ, तब उनीहरूको शक्ति हराउँछ। परिणामस्वरूप ती पार्टीहरू सफल हुन्छन् जुन मुसलमानहरूको संवैधानिक र सामाजिक अधिकारको विरोध गर्छन् र समाजमा साम्प्रदायिकता फैलाउँछन्।
कहिलेकाहीँ भावनात्मक मानिसहरू यो पनि तर्क गर्छन् कि यदि कुनै राज्यमा मुसलमानहरूको जनसंख्या यादव वा अरू कुनै जातभन्दा बढी छ — जस्तै बिहारमा मुसलमान १७% र यादव १४% छन् — भने मुख्यमन्त्री यदि यादव बन्न सक्छ भने मुसलमान किन हुइन?
यो सोच अंकको हिसाबले ठीक लागे पनि वास्तविकता फरक छ।
ध्यान दिनु आवश्यक छ कि “यादव” एउटा जाति हो, तर धर्मका हिसाबले उनीहरू हिन्दू बहुमतकै हिस्सा हुन्।
जब कुनै यादव उम्मेदवारलाई अघि सारिन्छ, तब उसको समर्थनमा केवल यादव मतदाताहरू मात्र होइन, अन्य हिन्दू समुदाय पनि धार्मिक र सामाजिक नाताका आधारमा एकजुट हुन्छन्।
यसरी १४% जातका उम्मेदवारले व्यवहारमा ५०–६०% मत समर्थन पाउँछन्।
तर मुसलमानहरू, यद्यपि १७% भए पनि, धार्मिक दृष्टिले अल्पसंख्यक हुन्, र प्रायः आन्तरिक मतभेद र बाह्य दबाबका कारण एकतामा रहन सक्दैनन्।
यसैले जनसंख्यात्मक बहुमत राजनीतिक शक्ति बन्न सक्दैन।
त्यसैले मुसलमानहरूले केवल जनसंख्या वा भावनाका आधारमा राजनीतिक नेतृत्त्वका सपना देख्नु हुँदैन।
सफल राजनीति जनसंख्याको अनुपातले होइन, एकता, संगठन, सूझबूझ र विश्वासले प्राप्त हुन्छ।
नेपाल होस् वा भारत, मुसलमानहरूको लागि सबैभन्दा उपयुक्त बाटो यो हो कि उनीहरूले अलग धार्मिक नामका पार्टीहरू बनाउनुभन्दा
न्याय, समानता र संविधानिक सिद्धान्तमा आधारित धर्मनिरपेक्ष र निष्पक्ष दलहरूसँग सहकार्य गर्नु पर्छ।
यसरी सहकार्य गर्दा मुसलमानहरूको भोट अर्थपूर्ण बन्छ, र देशको लोकतन्त्र तथा सामाजिक सद्भाव पनि मजबुत हुन्छ।
कुरआनले हामीलाई न्याय, परामर्श र एकताको शिक्षा दिन्छ।
त्यही आधारमा मुसलमानहरूको राजनीतिक रणनीति पनि मिल्लतको एकता, सामूहिक हित र राष्ट्रिय भलाइमा आधारित हुनुपर्छ।
यदि मुसलमानहरूले भावना होइन, बुद्धिमत्ता र दूरदर्शिताबाट निर्णय गरे भने, उनीहरू आफ्ना अधिकारका उत्तम संरक्षक बन्न सक्छन् र नेपाल र भारत दुबैमा
शान्तिपूर्ण, विकसित र न्यायपूर्ण समाज निर्माणमा अग्रणी भूमिका खेल्न सक्छन्।

(रह्मतुल्लाह आले सिराज)

#जनकपुर #चुनाव #भारत #बिहार #नयॉं_उपदेश
#रह्मतुल्लाह #आले_सिराज

05/11/2025

मुसलमानों की राजनीति का सही रास्ता: एकता, दूरदर्शिता और यथार्थवाद

(सम्पादकीय साप्ताहिक "जनता की आवाज़" जनकपुर, नेपाल, 06-11-2025)

दक्षिण एशिया के क्षेत्र में मुसलमान एक महत्वपूर्ण अल्पसंख्यक समुदाय हैं। नेपाल में उनकी आबादी लगभग पाँच से छह प्रतिशत है, जबकि हमारे पड़ोसी देश भारत में लगभग चौदह प्रतिशत मुसलमान रहते हैं। भारत के कुछ राज्यों — जैसे बिहार — में मुसलमानों की संख्या सत्रह प्रतिशत तक पहुँचती है।
यह अनुपात हमें यह याद दिलाता है कि यदि मुसलमान सामूहिक समझ-बूझ और राजनीतिक दूरदर्शिता से काम लें, तो वे अपने अधिकारों के लिए एक सकारात्मक और प्रभावशाली राजनीतिक शक्ति बन सकते हैं।
लेकिन अफसोस की बात है कि कभी-कभी भावनाओं में आकर मुसलमान अपने नाम से अलग राजनीतिक पार्टियाँ बना लेते हैं। देखने में यह प्रतिनिधित्व का रास्ता लगता है, लेकिन असल में इसका नुकसान अधिक होता है। जब मुसलमानों का वोट कई छोटी पार्टियों में बँट जाता है, तो उनकी राजनीतिक ताकत कमज़ोर पड़ जाती है। नतीजतन, वे पार्टियाँ सफल हो जाती हैं जो मुसलमानों के संवैधानिक और सामाजिक अधिकारों का विरोध करती हैं और समाज में सांप्रदायिकता को बढ़ावा देती हैं।
कई बार कुछ भावनात्मक लोग यह दलील देते हैं कि अगर किसी राज्य में मुसलमानों की जनसंख्या यादव या किसी अन्य जाति से ज़्यादा है — जैसे बिहार में मुसलमान 17% और यादव 14% हैं — तो मुख्यमंत्री यादव ही क्यों, मुसलमान क्यों न हो?
यह सोच देखने में संख्यात्मक न्याय पर आधारित लगती है, लेकिन हकीकत इसके उलट है।
याद रखना चाहिए कि “यादव” एक जाति है, लेकिन धर्म के लिहाज़ से वे हिन्दू बहुसंख्यक समुदाय का हिस्सा हैं।
जब किसी यादव उम्मीदवार को आगे बढ़ाया जाता है, तो उसके साथ सिर्फ़ यादव वोटर ही नहीं बल्कि अन्य हिन्दू समुदाय भी धार्मिक और सामाजिक नातों के आधार पर एकजुट हो जाते हैं।
इस तरह 14% जाति का उम्मीदवार व्यवहार में 50 या 60 प्रतिशत वोट बैंक का समर्थन पा लेता है।
वहीं मुसलमान, भले ही 17% हों, लेकिन वे धार्मिक रूप से अल्पसंख्यक हैं और अक्सर बाहरी दबावों तथा आपसी मतभेदों के कारण एकजुट नहीं रह पाते।
इस तरह उनकी संख्यात्मक बढ़त राजनीतिक शक्ति में तब्दील नहीं हो पाती।
इसलिए ज़रूरी है कि मुसलमान केवल जनसंख्या या भावनाओं के आधार पर राजनीतिक नेतृत्व के सपने न देखें, बल्कि हकीकत और समझदारी के साथ अपनी राह तय करें।
राजनीतिक सफलता जनसंख्या के अनुपात से नहीं, बल्कि एकता, संगठन, दूरदर्शिता और आत्मविश्वास से मिलती है।
नेपाल हो या भारत, मुसलमानों के लिए सबसे सही रास्ता यह है कि वे अलग धार्मिक नाम वाली पार्टियाँ बनाने के बजाय
ऐसी धर्मनिरपेक्ष, न्यायप्रिय और संवैधानिक मूल्यों पर आधारित पार्टियों के साथ सहयोग करें,
जो देश में न्याय, समानता और राष्ट्रीय एकता की पक्षधर हों।
ऐसा सहयोग न सिर्फ मुसलमानों के वोट को सार्थक बनाता है, बल्कि देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था और सामाजिक सौहार्द को भी मज़बूत करता है।
क़ुरआन मजीद हमें न्याय, परामर्श और एकता की शिक्षा देता है।
इसी आधार पर मुसलमानों की राजनीतिक नीति भी सामूहिक भलाई, राष्ट्रीय हित और एकजुटता पर आधारित होनी चाहिए।
यदि मुसलमान भावनाओं के बजाय बुद्धिमत्ता और दूरदर्शिता से फैसले लें,
तो वे न केवल अपने अधिकारों के सच्चे रक्षक बन सकते हैं, बल्कि नेपाल और भारत दोनों में
एक शांतिपूर्ण, विकसित और न्यायपूर्ण समाज की स्थापना में प्रमुख भूमिका निभा सकते हैं।

(रहमतुल्लाह आले सिराज)

#जनता_की_आवाज़ #सम्पादकीय #जनकपुर #हिन्दी #बिहार #भारत
#चुनाव

05/11/2025

مسلمانوں کی سیاست کا درست راستہ; اتحاد، بصیرت
اور حقیقت پسندی

(ہفت روزہ صدائے عام جنکپور، نیپال، 6 نومبر 2025)

جنوبی ایشیا کے خطے میں مسلمان ایک اہم اقلیتی طبقہ ہیں۔ نیپال میں اُن کی آبادی تقریباً پانچ سے چھ فیصد ہے، جب کہ ہمارے پڑوسی ملک بھارت میں وہ تقریباً چودہ فیصد ہیں۔ بعض بھارتی ریاستوں، مثلاً بہار میں، مسلمانوں کی تعداد سترہ فیصد تک پہنچتی ہے۔
یہ تناسب اس حقیقت کی یاد دہانی ہے کہ اگر مسلمان اپنی ملی بصیرت اور سیاسی حکمتِ عملی سے کام لیں تو وہ اپنے حق میں مثبت اور مؤثر سیاسی اثر پیدا کر سکتے ہیں۔
مگر بدقسمتی سے، بعض اوقات جذبات میں آ کر مسلمان اپنے نام سے الگ سیاسی جماعتیں تشکیل دیتے ہیں۔ بظاہر یہ نمائندگی کا راستہ نظر آتا ہے، مگر حقیقت میں اس کا نقصان زیادہ ہوتا ہے۔ جب مسلمان ووٹ مختلف چھوٹی پارٹیوں میں تقسیم ہو جاتا ہے، تو وہ قوت کھو بیٹھتا ہے۔ نتیجتاً وہ جماعتیں کامیاب ہو جاتی ہیں جو مسلمانوں کے آئینی و سماجی حقوق کی مخالفت کرتی ہیں اور معاشرے میں فرقہ وارانہ فضا کو ہوا دیتی ہیں۔
یہ بھی دیکھنے میں آتا ہے کہ بعض جذباتی افراد یہ دلیل دیتے ہیں کہ اگر کسی ریاست میں مسلمانوں کی آبادی یادو یا کسی دوسری ذات سے زیادہ ہے، مثلاً بہار میں مسلمان سترہ فیصد اور یادو چودہ فیصد ہیں، تو وزیراعلیٰ مسلمان کیوں نہ ہو؟
یہ سوچ بظاہر عددی انصاف پر مبنی لگتی ہے، مگر حقیقت اس کے برعکس ہے۔
یاد رکھنا چاہیے کہ یادو ایک ذات ہے، مگر مذہباً وہ ہندو اکثریت کا حصہ ہے۔
جب کسی یادو امیدوار کو آگے بڑھایا جاتا ہے تو اس کے ساتھ صرف یادو ووٹر ہی نہیں بلکہ دیگر ہندو برادریاں بھی مذہبی و سماجی وابستگی کی بنیاد پر متحد ہو جاتی ہیں۔
یوں چودہ فیصد ذات کے امیدوار کو عملاً پچاس یا ساٹھ فیصد ووٹ بینک کی حمایت حاصل ہو جاتی ہے۔
جب کہ مسلمان، اگرچہ سترہ فیصد ہوں، پھر بھی وہ مذہبی اقلیت ہیں، اور اکثر حلقوں میں نہ صرف اکثریتی دباؤ بلکہ داخلی اختلافات کے باعث متحد نہیں رہ پاتے۔
یوں عددی برتری سیاسی برتری میں تبدیل نہیں ہو پاتی۔
لہٰذا ضروری ہے کہ مسلمان صرف آبادی یا جذبات کی بنیاد پر سیاسی قیادت کے خواب نہ دیکھیں، بلکہ حقیقت اور حکمت کے ساتھ اپنی راہ متعین کریں۔
سیاسی کامیابی آبادی کے تناسب سے نہیں، بلکہ اتحاد، تنظیم، بصیرت اور اعتماد سے حاصل ہوتی ہے۔
نیپال ہو یا بھارت، مسلمانوں کے لیے بہتر راستہ یہی ہے کہ وہ الگ محاذ یا مذہبی نام والی جماعتیں بنانے کے بجائے
ان سیکولر، انصاف پسند اور آئینی اصولوں پر قائم جماعتوں کے ساتھ تعاون کریں جو ملک میں عدل، مساوات اور قومی ہم آہنگی کے قیام کی حامی ہیں۔
ایسے اشتراک سے نہ صرف مسلمانوں کا ووٹ بامعنی بنتا ہے، بلکہ ملک کی جمہوریت اور فرقہ وارانہ ہم آہنگی بھی مضبوط ہوتی ہے۔
قرآن ہمیں عدل، مشاورت اور اجتماعیت کا درس دیتا ہے۔
اسی بنیاد پر مسلمانوں کی سیاسی حکمتِ عملی بھی ملی اتحاد، اجتماعی مصلحت، اور قومی بھلائی پر قائم ہونی چاہیے۔
اگر مسلمان جذبات کے بجائے حکمت اور بصیرت سے فیصلہ کریں، تو وہ نہ صرف اپنے حقوق کے بہتر محافظ بن سکتے ہیں بلکہ نیپال اور بھارت دونوں میں ایک پرامن، ترقی یافتہ اور انصاف پر مبنی معاشرے کی تعمیر میں کلیدی کردار ادا کر سکتے ہیں۔

رحمت اللہ آل سراج

#اردو #جنکپور #نیپال
#انتخابات #بہار #بھارت #ہندوستان

*نیپال میں مسلمانوں اور دیگر اقلیتوں کے حقوق: شعور، تحفظ اور عمل درآمد*(اداریہ -اضافہ شدہ- ہفت روزہ صدائے عام جنکپور، نی...
31/10/2025

*نیپال میں مسلمانوں اور دیگر اقلیتوں کے حقوق: شعور، تحفظ اور عمل درآمد*

(اداریہ -اضافہ شدہ- ہفت روزہ صدائے عام جنکپور، نیپال، 30 اکتوبر 2025)

نیپال — ایک کثیر الثقافتی اور شمولیتی ملک
نیپال متنوع ثقافتوں، زبانوں اور روایات کا سنگم ہے۔ اس ملک نے اپنے آئین ۲۰۱۵ (Constitution of Nepal, 2015) کے ذریعے واضح اعلان کیا ہے کہ نیپال ایک وفاقی، شمولیتی، سیکولر اور کثیر الثقافتی جمہوریہ ہوگا (آرٹیکل ۴)۔
یہ بنیادی اعلان ہر شہری اور کمیونٹی کو مذہبی، ثقافتی، لسانی اور سماجی حقوق کے مکمل تحفظ کی ضمانت دیتا ہے۔
اس اداریہ میں مسلمانوں اور دیگر اقلیتوں کے آئینی حقوق کو شعور، تحفظ اور عملی نفاذ کے تناظر میں پیش کیا گیا ہے۔

*۱. مذہبی آزادی: شمولیتی جمہوریت کی روح*
نیپال کے آئین، آرٹیکل ۲۶ (مذہبی آزادی کا حق):
(۱) ہر شخص کو حق حاصل ہے کہ وہ اپنی مذہبی عقیدت کے مطابق مذہب اختیار کرے، اس پر عمل کرے اور اس کے تحفظ کا حق رکھے۔
(۲) ہر مذہبی برادری کو اپنے مذہبی مقامات اور وقف کی دیکھ بھال اور انتظام کرنے کا حق حاصل ہوگا۔ لیکن مذہبی مقامات اور وقف کے انتظام کے لیے قوانین بنانے یا اس کے انتظام میں کوئی رکاوٹ پیدا نہیں ہوگی۔
(۳) اس حق کے استعمال کے دوران کوئی بھی شخص عوامی صحت، اخلاقیات یا امن عامہ کے خلاف کوئی عمل نہیں کرے گا، نہ کسی کو مذہب تبدیل کرنے پر مجبور کرے گا، اور نہ ہی کسی کے مذہب میں مداخلت کرے گا، اور ایسا کرنے پر قانونی کارروائی ہوگی۔

*عملی پیغام:*
* مساجد، مدارس اور وقف کی تنظیموں کو قانونی حیثیت دیں۔
* مذہبی عمل میں کسی قسم کی امتیاز یا رکاوٹ قبول نہ کریں۔
* تبلیغ اور دعوت میں امن، ہمدردی اور قانونی حدود کا خیال رکھیں۔

*۲. مادری زبان میں تعلیم: ثقافت کی مضبوط بنیاد*
نیپال کے آئین، آرٹیکل ۳۱(۵):
"نیپال میں مقیم ہر کمیونٹی کو قانونی طور پر اپنی مادری زبان میں تعلیم حاصل کرنے اور اس کے لیے اسکول یا تعلیمی ادارے کھولنے اور چلانے کا حق حاصل ہوگا۔"

*عملی پیغام:*
* مسلم کمیونٹی کے تعلیمی اداروں میں مادری زبان خصوصاً اردو کو تدریس کا ذریعہ بنائیں۔
* اسلامی نصاب اور کتب کو مقامی زبانوں میں ترجمہ کر کے رسائی بڑھائیں۔
* مقامی حکومت اور زبان کمیشن کے ساتھ تعاون سے لسانی حقوق کو مضبوط کریں۔

*۳. زبان اور ثقافت: کمیونٹی کی شناخت اور فخر*
آرٹیکل ۳۲:
(۱) ہر فرد اور کمیونٹی کو اپنی زبان استعمال کرنے کا حق حاصل ہوگا۔
(۲) ہر فرد اور کمیونٹی کو اپنی ثقافتی زندگی میں حصہ لینے کا حق حاصل ہوگا۔
(۳) ہر کمیونٹی کو اپنی زبان، رسم الخط، ثقافت، تہذیب اور ورثے کی حفاظت اور فروغ دینے کا حق حاصل ہوگا۔

*ثقافتی زندگی میں حصہ لینے کا مطلب:*
اس کا مطلب ہے کہ کمیونٹی اپنی روایات، تہوار، زبان، لباس، موسیقی، ادب اور فنون کو محفوظ رکھنے، پیش کرنے اور فروغ دینے میں فعال رہے۔ یہ حق ہر کمیونٹی کو اپنے تاریخی اور اخلاقی پہچان کو محفوظ رکھنے کا موقع فراہم کرتا ہے۔

*عملی پیغام:*
* اسلامی ثقافت اور جائز روایات کو دستاویزی شکل دیں۔
* مقامی سطح پر ادبی، تعلیمی اور ثقافتی پروگرام منعقد کریں۔
* مقامی حکومت کے تعاون سے کمیونٹی کی ثقافتی وراثت کو محفوظ رکھیں۔

*۴. نمائندگی اور سماجی انصاف*
نیپال کے آئین، آرٹیکل ۴۲ (پہلے ترمیم کے ساتھ):
"خواتین، دلت، قبائلی، مدھیسی، تھارو، مسلمان، پسماندہ طبقہ، اقلیت، سرحدی علاقے، معذور، جنسی اقلیت، کسان، مزدور، مظلوم یا پسماندہ علاقے کے شہری اور اقتصادی طور پر کمزور افراد ریاست کے اداروں میں مساوی شمولیت کے اصول کے تحت حصہ لینے کے حق کے حامل ہوں گے۔"

*عملی پیغام:*
* مقامی اور صوبائی سطح پر مسلم نمائندگی کو فروغ دیں۔
* نوجوانوں اور خواتین کو تربیت اور جائز قیادت کے مواقع فراہم کریں۔
* کمیونٹی میں اتحاد اور ہم آہنگی بڑھائیں تاکہ اجتماعی آواز مضبوط ہو۔

*۵. آئینی حقوق اور عدالتی تحفظ*
نیپال کے آئین، آرٹیکل ۴۶:
"اس حصے میں دیے گئے حقوق کے نفاذ کے لیے آرٹیکل ۱۳۳ یا ۱۴۴ کے مطابق آئینی چارہ جوئی کا حق حاصل ہوگا۔"

*عملی پیغام:*
* حقوق کی خلاف ورزی کی صورت میں ثبوت اور دستاویز محفوظ کریں۔
* قانونی معاونت حاصل کریں اور عدالتی عمل استعمال کریں۔
* کمیونٹی میں قانونی آگاہی پروگرام چلائیں تاکہ ہر شہری اپنے حقوق کے بارے میں شعور رکھے۔

*نتیجہ: شعور، اتحاد اور عملی اقدام*
نیپال کا آئین مسلمانوں اور دیگر اقلیتوں کے لیے برابری، آزادی اور شمولیت کا روشن چراغ ہے۔
لیکن یہ چراغ صرف تب ہی روشن رہے گا جب ہم علم، شعور اور عملی اقدامات کو یکجا کریں۔
مسلم کمیونٹی کے لیے آج کا پیغام یہ ہے:
* اپنے مذہبی اداروں کو مضبوط کریں۔
* مادری زبان اور نصاب کی حفاظت کریں۔
* ثقافت اور ادب کو فروغ دیں۔
* نمائندگی میں فعال رہیں۔
* آئینی حقوق کے استعمال میں ہوشیار رہیں۔
اس طرح ہی حقوق کا حقیقی تحفظ ممکن ہوگا اور نئی نسل اپنے مذہب، زبان اور ثقافت کے ساتھ مضبوط رشتہ قائم رکھے گی۔
حقیقی حقوق شعور اور عمل کا نتیجہ ہیں، اور نیپال کے آئین نے اس کے لیے واضح راہ فراہم کی ہے۔

*خصوصی توجہ کے قابل نکات / خلاصہ*
1- ہمیں مسلمانوں کے طور پر اکثریتی کمیونٹی کے مذہب، ثقافت اور روایات سے متاثر نہیں ہونا چاہیے۔
2- دوسروں کے مذہب، ثقافت اور روایات کا احترام کریں، لیکن اپنی مذہبی، اخلاقی اور ثقافتی پہچان پر کوئی سمجھوتہ نہ کریں۔
3- قومی زبان سیکھنا ضروری ہے، لیکن اس کے لیے مادری زبان اور خاص طور پر نیپال کے مسلمانوں کی مشترکہ رابطہ اور دینی و ثقافتی عظیم علمی ورثہ کی حامل اردو زبان سے کسی صورت سمجھوتہ نہ کریں۔
4- اپنے اسلامی لباس، اخلاقیات اور ثقافتی مشقیں فخر اور اعتماد کے ساتھ جاری رکھیں۔
5- سماجی دباؤ یا خوف کے باعث اپنی پہچان، مذہب یا ثقافت میں کمزوری نہ آنے دیں۔
6- سیاسی حقوق اور نمائندگی میں حق تلفی اور تعصب کے خلاف قانونی چارہ جوئی کے حق سے کبھی پیچھے نہ ہٹیں۔
7- علم، شعور، اتحاد اور فعال کردار ہی ہمارے حقوق کے حقیقی تحفظ کو یقینی بناتا ہے۔

*رحمت اللہ آل سراج*

#جنکپور #اردو Following

 #اردو  #हिन्दी    #جنکپور  #सम्पादकीय  #जनता_की_आवाज़  #اداریہ *پردیس کی زندگی — مجبوری، شوق یا بے توازن طرزِ فکر؟*ملک ...
28/10/2025

#اردو #हिन्दी
#جنکپور #सम्पादकीय #जनता_की_आवाज़ #اداریہ
*پردیس کی زندگی — مجبوری، شوق یا بے توازن طرزِ فکر؟*

ملک عزیز نیپال کے لاکھوں شہری گزشتہ چار دہائیوں سے زائد عرصے سے روزگار کے لیے بیرونی ممالک میں مقیم ہیں۔
پردیس کی زندگی نے معاشی مسائل کسی حد تک حل کیے ہیں، مگر خاندانی، اخلاقی اور تعلیمی نظام پر گہرے منفی اثرات بھی مرتب ہوئے ہیں۔
اب وقت ہے کہ حکومت اور عوام دونوں اس رجحان میں اعتدال اور توازن پیدا کریں، تاکہ پردیس کی مجبوری قومی کمزوری نہ بن جائے۔

*اعداد و شمار*
نیپال کی تازہ ترین لیبر رپورٹ کے مطابق 14 لاکھ سے زائد شہری بیرونی ملکوں میں کام کر رہے ہیں۔
بھارت میں مقیم نیپالی مزدوروں کی تعداد لاکھوں میں ہے، مگر حتمی ریکارڈ موجود نہیں۔
یہ رجحان گزشتہ 40 برسوں سے زائد عرصے سے جاری ہے۔

*مجبوری یا شوق؟*
ابتدا میں یہ قدم مجبوری تھا — وطن میں روزگار کی کمی، محدود وسائل، اور کمزور معیشت نے عوام کو پردیس جانے پر مجبور کیا۔
مگر آج یہ مجبوری ایک رواج اور فیشن بن چکی ہے۔
کئی لوگ واقعی ضرورت مند ہیں، لیکن بہت سے محض شوق یا تقلیداً وطن چھوڑ رہے ہیں۔
یہ رویہ نہ ملک کے لیے مفید ہے نہ معاشرت کے لیے۔

*خاندانی اور اخلاقی نقصان*
پردیس نے ہزاروں گھروں کی معیشت سنبھالی ہے، مگر اس کے اخلاقی، سماجی اور خاندانی نقصانات نہایت سنگین ہیں۔
گھر کے مردوں کی غیرموجودگی نے عورتوں کو گارجین بنا دیا ہے، مگر وہ فطری طور پر نرمی اور جذبات کی علامت ہیں۔ یوں گھر کا نظم کمزور پڑتا ہے، بچوں کی تربیت متاثر ہوتی ہے، اور بزرگ والدین لاچاری میں زندگی گزارتے ہیں۔
نتیجتاً: زناکاری اور ناجائز تعلقات میں اضافہ، گھریلو بگاڑ اور طلاق کی شرح میں بڑھوتری، نوجوانوں میں اخلاقی کمزوری۔
یہ سب اس کمزور خاندانی ڈھانچے کے نتائج ہیں۔

*شرعی نقطہ نظر*
نبی ﷺ کا ارشاد ہے: "تم میں سے ہر ایک نگہبان ہے، اور ہر ایک سے اس کی رعیت کے بارے میں سوال کیا جائے گا۔" (بخاری و مسلم)
اسلام نے مرد پر کفالت کے ساتھ تربیت اور نگرانی کی ذمہ داری بھی رکھی ہے۔
پردیس جانا اگر واقعی مجبوری ہے تو اس کی گنجائش ہے، لیکن اگر یہ شوق یا نمائش کے لیے ہے تو شریعت اسے ناپسند کرتی ہے، کیونکہ اس کے نتائج گھر، خاندان اور ایمان پر منفی اثر ڈالتے ہیں۔

*علمی و ہنری نقصان*
بہت سے تعلیم یافتہ نیپالی بیرونِ ملک اپنی صلاحیت سے کم درجے کے کام کرنے پر مجبور ہیں۔
کوئی اعلی تعلیم یافتہ مزدور، کوئی استاد صفائی کرنے والا بن گیا۔
یہ ملک کے لیے ایک دماغی اور ہنری نقصان ہے۔
اگر یہی لوگ وطن میں رہ کر اپنی مہارت استعمال کریں تو نیپال کی زراعت، صنعت اور معیشت میں نئی جان پیدا ہو سکتی ہے۔

*حکومت اور عوام کی ذمہ داری*
اب وقت ہے کہ موجودہ عبوری حکومت اس مسئلے کو ترجیحی بنیادوں پر حل کرے۔
ملک میں پائیدار روزگار کے مواقع پیدا کیے جائیں تاکہ عوام کو پردیس کی مجبوری نہ ہو۔
ساتھ ہی عوام بھی آئندہ ایسی قیادت منتخب کریں جو عملی منصوبہ بندی کے ساتھ اس رجحان کو متوازن کرے۔

*نتیجہ*
پردیس کی زندگی نے اگرچہ معاشی مسائل کم کیے ہیں، مگر اس کے جانبی نقصانات نے معاشرتی توازن بگاڑ دیا ہے۔
اب ضرورت ہے کہ ہم اعتدال اور توازن اپنائیں۔
جو واقعی مجبور ہے وہ منصوبہ بندی سے جائے، اور جو محض شوقیہ جانا چاہتا ہے وہ سمجھے کہ *اپنے وطن میں رہ کر خدمت کرنا ہی آج کی اہم ضرورت ہے*۔

رحمت اللہ آل سراج...

वैदेशिक जीवन — मजबूरी, शौक या असंतुलित सोच?

नेपाल के लाखों नागरिक पिछले चार दशकों से अधिक समय से रोजगार के लिए विदेश में कार्यरत हैं।
वैदेशिक जीवन ने आर्थिक समस्याओं को कुछ हद तक कम किया है, लेकिन इसके पारिवारिक, नैतिक और शैक्षिक सिस्टम पर गहरे नकारात्मक प्रभाव भी पड़े हैं।
अब समय आ गया है कि सरकार और जनता दोनों इस प्रवृत्ति में संतुलन और समरसता लाएं, ताकि विदेश में रहना राष्ट्रीय कमजोरी न बन जाए।

*आंकड़े*
नेपाल की नवीनतम श्रम रिपोर्ट के अनुसार 14 लाख से अधिक नागरिक विदेशों में कार्यरत हैं।
भारत में बसे नेपाली श्रमिकों की संख्या लाखों में है, हालांकि कोई अंतिम रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है।
यह प्रवृत्ति पिछले 40 वर्षों से अधिक समय से जारी है।

*मजबूरी या शौक?*
शुरुआत में यह कदम मजबूरी था — देश में रोजगार की कमी, सीमित संसाधन और कमजोर अर्थव्यवस्था ने लोगों को विदेश जाने के लिए मजबूर किया।
लेकिन आज यह मजबूरी एक रिवाज और फैशन बन चुकी है।
कुछ लोग वास्तव में जरूरतमंद हैं, लेकिन बहुत से लोग केवल शौक या नकल के लिए देश छोड़ रहे हैं।
यह रवैया न तो देश के लिए लाभकारी है और न ही समाज के लिए।

*पारिवारिक और नैतिक नुकसान*
वैदेशिक जीवन ने हजारों घरों की अर्थव्यवस्था को सहारा दिया है, लेकिन इसके नैतिक, सामाजिक और पारिवारिक नुकसान गंभीर हैं।
घर के पुरुषों की अनुपस्थिति में महिलाएं संरक्षक (गार्जियन) बन जाती हैं, लेकिन उनकी स्वाभाविक प्रवृत्ति कोमलता और भावनात्मक होती है।
इससे घर का प्रशासन कमजोर पड़ता है, बच्चों की परवरिश प्रभावित होती है, और बुजुर्ग माता-पिता असहाय जीवन जीते हैं।

*परिणाम:*
व्यभिचार और अवैध संबंधों में वृद्धि
घरेलू विवाद और तलाक की दर में वृद्धि
युवाओं में नैतिक कमजोरी
ये सभी कमजोर पारिवारिक संरचना के परिणाम हैं।

*इस्लामी दृष्टिकोण*
नबी ﷺ का फरमान है: "तुममें से हर एक संरक्षक है, और हर एक से उसकी जिम्मेदारियों के बारे में सवाल किया जाएगा।" (बुखारी और मुस्लिम)
इस्लाम ने पुरुष पर पालन-पोषण और निगरानी की जिम्मेदारी भी रखी है।
वैदेशिक जीवन अगर वास्तव में मजबूरी है तो जायज है, लेकिन यदि यह शौक या दिखावा के लिए है तो शरीयत इसे नापसंद करती है, क्योंकि इसके परिणाम घर, परिवार और आस्था पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं।

*शैक्षिक और कौशल हानि*
कई शिक्षित नेपाली विदेशों में अपनी क्षमता से कम दर्जे के काम करने को मजबूर हैं।
कोई उच्च शिक्षित मजदूर, कोई शिक्षक सफाई करने वाला बन गया।
यह देश के लिए एक बौद्धिक और कौशल हानि है।
यदि यही लोग अपने देश में रहकर अपनी क्षमता का उपयोग करें तो नेपाल की कृषि, उद्योग और अर्थव्यवस्था में नई ऊर्जा आ सकती है।

*सरकार और जनता की जिम्मेदारी*
अब समय है कि वर्तमान अंतरिम सरकार इस महत्वपूर्ण मुद्दे को प्राथमिकता के साथ हल करे।
देश में सतत रोजगार के अवसर पैदा किए जाएं ताकि लोगों को विदेश जाने की मजबूरी न हो।
साथ ही जनता भी भविष्य में ऐसी नेतृत्व का चयन करे जो व्यावहारिक योजना के साथ इस प्रवृत्ति को संतुलित करे।

*निष्कर्ष*
वैदेशिक जीवन ने आर्थिक समस्याओं को कुछ हद तक कम किया है, लेकिन इसके साइड इफेक्ट्स ने सामाजिक संतुलन को बिगाड़ दिया है।
अब आवश्यकता है कि हम संतुलन और समरसता अपनाएं।
जो वास्तव में मजबूर हैं वे योजना बनाकर जाएं, और जो केवल शौक के लिए जाना चाहते हैं उन्हें यह समझना चाहिए कि *अपने देश में रहकर सेवा करना ही आज की महत्वपूर्ण आवश्यकता है।*

रहमतुल्लाह आले सिराज

Following

27/09/2025

عقیدۂ توحید اور ہمارا معاشرہ
एकेश्वरवाद और हमारा समाज

18/05/2025

اندوہناک حادثہ | दुखद दुर्घटना

ہمارے محترم اور مخلص خیر خواہ ڈاکٹر ابو الکلام صاحب (رمول) براٹ نگر، نیپال گزشتہ رات ٹریفک حادثہ میں وفات پا گئے، إنا لله وإنا إليه راجعون۔

हमारे सम्मानीय और सच्चे शुभचिंतक डॉ. अबुल कलाम साहब (रमौल), विराटनगर, नेपाल बीती रात एक सड़क दुर्घटना में इंतेक़ाल फ़रमा गए।
इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन
(हम अल्लाह के हैं और उसी की ओर लौटकर जाने वाले हैं।)

اس افسوسناک خبر سے دل غمگین اور افسردہ ہے۔
इस दुखद ख़बर से दिल बेहद ग़मगीन और उदास है।

اللہ غفور رحيم سے دعا ہے کہ ان کی نیکیوں کو قبول فرمائے، خطاؤں سے درگزر کرے، انہیں قبر و جہنم کے عذاب سے محفوظ رکھے، جنت الفردوس میں اعلیٰ مقام عطا فرمائے، پسماندگان کو صبرِ جمیل اور اجرِ عظیم سے نوازے، اور ہم سب کو ان کا نعم البدل عطا فرمائے۔ آمین۔

अल्लाह ग़फ़ूर व रहीम से दुआ है कि उनकी नेकीयों को कुबूल फ़रमाए, गुनाहों को माफ़ फ़रमाए, क़ब्र और जहन्नम के अज़ाब से उनकी हिफ़ाज़त फ़रमाए, जन्नतुल फिरदौस में आला मक़ाम अता फ़रमाए, पसमांदगान को सब्र-ए-जमील और अजर-ए-अज़ीम से नवाज़े, और हम सबको उनका बेहतर बदला अता फ़रमाए। आमीन।

غمزدہ | शोकसंतप्त:
رحمت اللہ عبد القدوس
(رمول، سرہا، نیپال)
مدینہ منورہ

रहमतुल्लाह अब्दुल कुद्दूस (रमौल, सिरहा, नेपाल)
मदीना मुनव्वरा

31/03/2025

Eid Mubarak

عيد مبارك

تقبل الله منا ومنكم
Taqabbalallahu minna wa minkum

04/03/2025

Address

Central Office: Municipality Siraha_4 (Siraj Nagar, Ramaul) Siraha
Siraha

Telephone

+9779863874224

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Siraj Education and Welfare Society, Nepal جمعية السراج بنيبال posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Share

Share on Facebook Share on Twitter Share on LinkedIn
Share on Pinterest Share on Reddit Share via Email
Share on WhatsApp Share on Instagram Share on Telegram