05/11/2025
मुसलमानों की राजनीति का सही रास्ता: एकता, दूरदर्शिता और यथार्थवाद
(सम्पादकीय साप्ताहिक "जनता की आवाज़" जनकपुर, नेपाल, 06-11-2025)
दक्षिण एशिया के क्षेत्र में मुसलमान एक महत्वपूर्ण अल्पसंख्यक समुदाय हैं। नेपाल में उनकी आबादी लगभग पाँच से छह प्रतिशत है, जबकि हमारे पड़ोसी देश भारत में लगभग चौदह प्रतिशत मुसलमान रहते हैं। भारत के कुछ राज्यों — जैसे बिहार — में मुसलमानों की संख्या सत्रह प्रतिशत तक पहुँचती है।
यह अनुपात हमें यह याद दिलाता है कि यदि मुसलमान सामूहिक समझ-बूझ और राजनीतिक दूरदर्शिता से काम लें, तो वे अपने अधिकारों के लिए एक सकारात्मक और प्रभावशाली राजनीतिक शक्ति बन सकते हैं।
लेकिन अफसोस की बात है कि कभी-कभी भावनाओं में आकर मुसलमान अपने नाम से अलग राजनीतिक पार्टियाँ बना लेते हैं। देखने में यह प्रतिनिधित्व का रास्ता लगता है, लेकिन असल में इसका नुकसान अधिक होता है। जब मुसलमानों का वोट कई छोटी पार्टियों में बँट जाता है, तो उनकी राजनीतिक ताकत कमज़ोर पड़ जाती है। नतीजतन, वे पार्टियाँ सफल हो जाती हैं जो मुसलमानों के संवैधानिक और सामाजिक अधिकारों का विरोध करती हैं और समाज में सांप्रदायिकता को बढ़ावा देती हैं।
कई बार कुछ भावनात्मक लोग यह दलील देते हैं कि अगर किसी राज्य में मुसलमानों की जनसंख्या यादव या किसी अन्य जाति से ज़्यादा है — जैसे बिहार में मुसलमान 17% और यादव 14% हैं — तो मुख्यमंत्री यादव ही क्यों, मुसलमान क्यों न हो?
यह सोच देखने में संख्यात्मक न्याय पर आधारित लगती है, लेकिन हकीकत इसके उलट है।
याद रखना चाहिए कि “यादव” एक जाति है, लेकिन धर्म के लिहाज़ से वे हिन्दू बहुसंख्यक समुदाय का हिस्सा हैं।
जब किसी यादव उम्मीदवार को आगे बढ़ाया जाता है, तो उसके साथ सिर्फ़ यादव वोटर ही नहीं बल्कि अन्य हिन्दू समुदाय भी धार्मिक और सामाजिक नातों के आधार पर एकजुट हो जाते हैं।
इस तरह 14% जाति का उम्मीदवार व्यवहार में 50 या 60 प्रतिशत वोट बैंक का समर्थन पा लेता है।
वहीं मुसलमान, भले ही 17% हों, लेकिन वे धार्मिक रूप से अल्पसंख्यक हैं और अक्सर बाहरी दबावों तथा आपसी मतभेदों के कारण एकजुट नहीं रह पाते।
इस तरह उनकी संख्यात्मक बढ़त राजनीतिक शक्ति में तब्दील नहीं हो पाती।
इसलिए ज़रूरी है कि मुसलमान केवल जनसंख्या या भावनाओं के आधार पर राजनीतिक नेतृत्व के सपने न देखें, बल्कि हकीकत और समझदारी के साथ अपनी राह तय करें।
राजनीतिक सफलता जनसंख्या के अनुपात से नहीं, बल्कि एकता, संगठन, दूरदर्शिता और आत्मविश्वास से मिलती है।
नेपाल हो या भारत, मुसलमानों के लिए सबसे सही रास्ता यह है कि वे अलग धार्मिक नाम वाली पार्टियाँ बनाने के बजाय
ऐसी धर्मनिरपेक्ष, न्यायप्रिय और संवैधानिक मूल्यों पर आधारित पार्टियों के साथ सहयोग करें,
जो देश में न्याय, समानता और राष्ट्रीय एकता की पक्षधर हों।
ऐसा सहयोग न सिर्फ मुसलमानों के वोट को सार्थक बनाता है, बल्कि देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था और सामाजिक सौहार्द को भी मज़बूत करता है।
क़ुरआन मजीद हमें न्याय, परामर्श और एकता की शिक्षा देता है।
इसी आधार पर मुसलमानों की राजनीतिक नीति भी सामूहिक भलाई, राष्ट्रीय हित और एकजुटता पर आधारित होनी चाहिए।
यदि मुसलमान भावनाओं के बजाय बुद्धिमत्ता और दूरदर्शिता से फैसले लें,
तो वे न केवल अपने अधिकारों के सच्चे रक्षक बन सकते हैं, बल्कि नेपाल और भारत दोनों में
एक शांतिपूर्ण, विकसित और न्यायपूर्ण समाज की स्थापना में प्रमुख भूमिका निभा सकते हैं।
(रहमतुल्लाह आले सिराज)
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